संक्षिप्त उत्तर: नवरात्रि पारण क्या है?
नवरात्रि पारण नौ-दिवसीय नवरात्रि उपवास को विधिपूर्वक पूर्ण करने और स्थापित कलश व जवारों (खेत्री/जयंती) का सम्मानपूर्वक विसर्जन करने की प्रक्रिया है। धर्मशास्त्र के ग्रंथों (निर्णयसिंधु व धर्मसिंधु) में नवमी तिथि समाप्त होने पर दशमी प्रातः पारण का विधान है, जबकि अनेक कुल-परंपराओं में महाअष्टमी या महानवमी को हवन व कन्या पूजन के बाद प्रसाद से व्रत खोला जाता है।
- शास्त्रीय दशमी प्रातः पारण ('नवम्यन्ते दशम्यां पारणम्') और कुलाचार के अष्टमी/नवमी कन्या-पूजन पारण की स्पष्ट तुलना करता है।
- उत्तर-पूजा, कलश जल छिड़काव, नारियल प्रसाद, सिक्का-सुपारी और जवारे (जयंती) धारण करने की चरणबद्ध विधि बताता है।
- घर पर पर्यावरण-अनुकूल विसर्जन और नौ दिन के उपवास के बाद सुरक्षित पाचन-आहार के नियम समझाता है।
दशमी प्रातः बनाम अष्टमी/नवमी कन्या-पूजन पारण: धर्मशास्त्र और कुलाचार का समन्वय
शारदीय और चैत्र दोनों नवरात्रियों—जिनके व्यापक स्वरूप का परिचय हमारी नवरात्रि क्या है और क्यों मनाई जाती है मार्गदर्शिका में मिलता है—के समापन पर सबसे अधिक पूछा जाने वाला प्रश्न यह है कि पंचांग में नवरात्रि पारण का समय दशमी की सुबह क्यों दिया जाता है, जबकि कई परिवार अष्टमी या नवमी की दोपहर को ही कन्या पूजन के बाद व्रत खोल लेते हैं। वास्तव में ये दोनों ही पद्धतियाँ अपने-अपने स्थान पर प्रामाणिक हैं: एक शास्त्रीय तिथि-व्रत नियम है और दूसरी पारिवारिक कुलाचार की परंपरा। निर्णयसिंधु, धर्मसिंधु और दुर्गार्चन पद्धति के अनुसार 'नवरात्र' का अर्थ नौ पूर्ण रात्रियों का व्रत है; इसलिए जो साधक पूरे नौ दिन का शास्त्रीय व्रत रखते हैं, वे महानवमी को हवन और कन्या पूजन संपन्न करने के बाद नवमी तिथि समाप्त होने पर अगले दिन शुक्ल दशमी—अर्थात् दशहरा (विजयादशमी)—के प्रातःकाल में उत्तर-पूजा और कलश विसर्जन करके पारण करते हैं ('नवम्यन्ते दशम्यां पारणम्')।
दूसरी ओर, उत्तर, मध्य और पश्चिम भारत के गृहस्थ परिवारों में कुलाचार के तीन व्यावहारिक नियम प्रचलित हैं, जिनका संदर्भ हमारी सरल नौ-दिवसीय नवरात्रि पूजा विधि में भी दिया गया है। पहला, जिन परिवारों में कुलदेवी की रीति से महाअष्टमी को ही मुख्य हवन और कन्या पूजन होता है ('अष्टमी कुल'), वहाँ अष्टमी को कन्याओं को भोजन कराने और आशीर्वाद लेने के पश्चात् माता के हलवा-पूड़ी-चना प्रसाद से पारण किया जाता है। दूसरा, जिन घरों में महानवमी को हवन और कन्या पूजन होता है ('नवमी कुल'), वहाँ नवमी की दोपहर को कन्या पूजन के बाद प्रसाद ग्रहण कर व्रत खोला जाता है। तीसरा, जो भक्त 'चढ़ती–उतरती' (प्रथम और अंतिम—जोड़े का व्रत) रखते हैं, वे पहला व्रत प्रतिपदा (दिन 1) को रखते हैं और दूसरा व्रत अपने घर के कन्या-पूजन के दिन—अर्थात् अष्टमी कुल वाले महाअष्टमी को और नवमी कुल वाले महानवमी को—रखकर कन्या पूजन व हवन के बाद ही पारण करते हैं।
कलश, नारियल और जवारे (खेत्री/जयंती) विसर्जन की चरणबद्ध विधि तथा सुरक्षित पाचन-आहार
नवरात्रि की समाप्ति पर (चाहे दशमी प्रातः श्रवण नक्षत्र में हो या नवमी के पूजन के बाद) स्थापित कलश और चौकी को कभी भी बिना विधि के अचानक नहीं हटाना चाहिए। सबसे पहले 'उत्तर-पूजा' करें: स्नान या हाथ-मुख धोकर आचमन करें, दीपक जलाएँ, माँ दुर्गा और वरुण कलश को गंध, अक्षत, पुष्प और मिष्ठान्न अर्पित करें तथा अंतिम आरती करें। इसके बाद हाथ में फूल और अक्षत लेकर क्षमा-प्रार्थना और विसर्जन मंत्र बोलें ('आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम्... गच्छ गच्छ सुरश्रेष्ठे स्वस्थानं परमेश्वरी, पूजाराधनकाले च पुनरागमनाय च'—अर्थात् हे माँ जगदंबे, हमारे हृदय में निवास करें और अगले पर्व पर पुनः पधारें)। अब कलश और देवी चित्रपट को आदरपूर्वक थोड़ा-सा उत्तर या पूर्व दिशा की ओर खिसकाएँ (इसे 'कलश चालन' या 'उत्थापन' कहते हैं)।
इसके पश्चात् चौकी की प्रत्येक अभिमंत्रित वस्तु का सम्मानपूर्वक उपयोग करें: (1) कलश का नारियल (श्रीफल)—कलश के ऊपर से लाल चुनरी हटाकर नारियल उठाएँ; अधिकांश उत्तर व पश्चिम भारतीय परंपराओं में इस अभिमंत्रित नारियल को फोड़कर उसकी गरी परिवार के सदस्यों में प्रसाद रूप में बाँटी जाती है (या उसकी मिठाई/बर्फी बनाई जाती है), जबकि कुछ कुलों में इसे लाल कपड़े में बाँधकर पूजा-घर में रखा जाता है; (2) कलश का जल और आम के पत्ते—आम्रपल्लव से कलश का पवित्र जल घर के सभी कमरों और मुख्य द्वार पर छिड़कें और शेष जल तुलसी के गमले या बगीचे के पौधों में अर्पित करें (इसे कभी नाली या पैर पड़ने वाली जगह में न डालें); (3) कलश का सिक्का, सुपारी और अक्षत—इन्हें सुखाकर लाल चुनरी के छोटे टुकड़े में थोड़े अक्षत के साथ बाँधकर घर की तिजोरी या धन-स्थान में रखें; और (4) जवारे / खेत्री (जयंती)—मिट्टी के पात्र में उगे सुनहरे-हरे जौ के अंकुरों को 'जयंती' कहा जाता है; इनकी कुछ पत्तियाँ भगवान के चरणों में चढ़ाएँ, घर के बड़ों और बच्चों के मस्तक या कान के पीछे आशीर्वाद रूप में लगाएँ, कुछ अंकुर तिजोरी और विद्यार्थियों की पुस्तकों में रखें, तथा शेष मिट्टी और जवारों को प्लास्टिक की थैली में फेंकने के बजाय घर के किसी बड़े गमले या क्यारी में मिला दें।
अंत में, नौ दिनों के फलाहार या जलाहार उपवास के बाद पारण करते समय शरीर की पाचन-अग्नि (जठराग्नि) का विशेष ध्यान रखें। लंबे उपवास के बाद अचानक अधिक मात्रा में तली हुई पूड़ियाँ, भारी मसालेदार भोजन या अत्यधिक मिठाई खाने से अम्लता (एसिडिटी), पेट दर्द, चक्कर या रक्त-शर्करा में अचानक उतार-चढ़ाव हो सकता है। इसलिए पारण की शुरुआत गुनगुने जल, नारियल पानी, जीरा-अदरक के पानी या पतली छाछ से करें; 15–20 मिनट रुककर माता के प्रसाद स्वरूप थोड़ा-सा सूजी का हलवा, उबले काले चने और एक छोटी पूड़ी या हल्की मूँग दाल की खिचड़ी धीरे-धीरे चबाकर खाएँ और अगले 24 घंटों में सामान्य आहार पर लौटें।
| पारण की परंपरा | व्रत कब खोला जाता है | पारण से पूर्व आवश्यक अनुष्ठान | शास्त्रीय और पारिवारिक आधार |
|---|---|---|---|
| 1. शास्त्रीय दशमी प्रातः पारण | नवमी तिथि समाप्त होने के बाद शुक्ल दशमी के प्रातःकाल में। | नवमी को हवन व कन्या पूजन तथा दशमी प्रातः उत्तर-पूजा और कलश उत्थापन। | निर्णयसिंधु व धर्मसिंधु ('नवम्यन्ते दशम्यां पारणम्'); पूरे नौ अहोरात्र के व्रत की पूर्णता। |
| 2. कुलाचार महानवमी दोपहर पारण | महानवमी तिथि रहते हुए दोपहर में कन्या पूजन के बाद। | प्रातः नवमी देवी पूजन, अग्यारी हवन और नौ कन्याओं को भोजन व दक्षिणा। | उत्तर व मध्य भारत के अनेक परिवारों की रीति, जहाँ माता के हलवा-चना प्रसाद से व्रत खुलता है। |
| 3. कुलाचार महाअष्टमी दोपहर पारण | महाअष्टमी को कन्या पूजन के बाद (या अष्टमी पूजन के बाद नवमी को)। | प्रातः दुर्गा अष्टमी पूजा, हवन और कुल-रीति के अनुसार अष्टमी कन्या पूजन। | उन कुलों की परंपरा जहाँ अष्टमी को ही मुख्य कुलदेवी पूजन और कन्या-भोज होता है। |
| 4. चढ़ती–उतरती (प्रथम व अंतिम व्रत) | प्रतिपदा के साथ अपने घर के कन्या-पूजन दिवस (अष्टमी या नवमी) के बाद। | पहला व्रत प्रतिपदा को और दूसरा व्रत अष्टमी या नवमी को रखकर हवन-कन्या पूजन। | कामकाजी लोगों, विद्यार्थियों और बुजुर्गों के लिए प्रचलित दो-दिवसीय जोड़े का व्रत। |
| पूजा-चौकी की पवित्र वस्तु | नवरात्रि के बाद पारंपरिक उपयोग | घर पर पर्यावरण-अनुकूल (इको-फ्रेंडली) विधि | किस सामान्य गलती से बचें |
|---|---|---|---|
| कलश का नारियल (श्रीफल) | उत्तर-पूजा के बाद कलश से उतारकर देवी के आशीर्वाद रूप में ग्रहण करना। | फोड़कर परिवार में प्रसाद बाँटें या नारियल बर्फी बनाएँ (यदि कुलाचार में बाँधने की रीति न हो)। | चुनरी लिपटे साबुत नारियल को प्रदूषित नदी या कचरे में न फेंकें। |
| कलश का जल और आम के पत्ते | नौ दिनों के मंत्र-जप से अभिमंत्रित वरुण-तीर्थ। | आम के पत्तों से पूरे घर में जल छिड़कें और शेष जल तुलसी या गमलों में डालें; सूखे पत्ते खाद में मिलाएँ। | कलश का पवित्र जल सिंक, नाली या पैरों के नीचे आने वाले स्थान पर न डालें। |
| जवारे / खेत्री (जौ के अंकुर व मिट्टी) | समृद्धि, आरोग्य और सौभाग्य के प्रतीक 'जयंती' अंकुर। | कुछ अंकुर भगवान को चढ़ाएँ, बड़ों/बच्चों के कान व सिर पर रखें, तिजोरी/पुस्तक में रखें और मिट्टी गमले में मिलाएँ। | गीली मिट्टी और हरे जवारों को पॉलिथीन में बंद करके न फेंकें। |
| कलश का सिक्का, सुपारी और अक्षत | स्थिरता और लक्ष्मी-कृपा के अभिमंत्रित प्रतीक। | सुखाकर लाल कपड़े की छोटी पोटली में बाँधकर घर की तिजोरी या गल्ले में रखें। | कलश के अभिमंत्रित सिक्के को अनजाने में सामान्य खर्च में न मिलाएँ। |
| चढ़े हुए फूल (निर्माल्य) और हवन भस्म | नौ दिनों की पूजा के पुष्प और अग्यारी हवन की विभूति। | हवन भस्म का तिलक लगाएँ; सूखे फूलों और भस्म को गमलों की मिट्टी में खाद के रूप में मिलाएँ। | फूलों के साथ प्लास्टिक की पन्नी या कृत्रिम चमकीली पन्नी जल में न बहाएँ। |
नवरात्रि पारण की तारीख़ अलग क्यों होती है?
नवरात्रि चंद्र तिथियों से जुड़ी है, जबकि घड़ी और अंग्रेज़ी कैलेंडर स्थानीय समय मानते हैं। अष्टमी, नवमी और दशमी अलग-अलग समय शुरू या समाप्त हो सकती हैं; एक तिथि दो अंग्रेज़ी तारीख़ों में भी पड़ सकती है। कोई घर अष्टमी की कन्या पूजा के बाद व्रत खोल सकता है, दूसरा यही पूजा नवमी को कर सकता है और कोई परिवार दशमी की पूजा या तिथि-परिवर्तन तक व्रत रख सकता है।
ये अपने-आप में गलतियाँ नहीं, अलग पालन-रीतियाँ हैं। कैलेंडर में देखें कि वह पूजा-दिन बता रहा है, कन्या पूजन का समय, व्रत खोलने का नियम या सार्वजनिक कार्यक्रम। जिस शहर में पालन करना है वही चुनें। निर्णय में आने वाले दिनों के लिए हमारी महा नवमी और विजयादशमी मार्गदर्शिका भी देखें।
पारण, कन्या पूजा और समापन विधि
कुछ घरों में कन्या पूजन, हवन या प्रसाद के बाद पारण होता है। दूसरे परिवार पूजा और भोजन का क्रम तिथि के नियम से तय करते हैं। पारण शब्द व्रत खोलने को बताता है; इससे अपने-आप यह तय नहीं होता कि परिवार अष्टमी, नवमी या दशमी को व्रत खोले। दिन का चुनाव आपकी परंपरा के नियम से होता है।
पंचांग देखते समय स्पष्ट सवाल पूछें: “इस शहर में हमारी रीति के अनुसार नवरात्रि-व्रत किस दिन खोलें और कौन-सी स्थानीय तिथि मानें?” यह सामान्य “पारण समय” खोजने से उपयोगी है। पूजा, कन्या पूजन और भोजन को उसी क्रम में रखें जो आपका परिवार या मंदिर सिखाता है।
योजना बनाने की सरल सूची
- नवरात्रि का चक्र और व्रत करने वाला शहर चुनें।
- परिवार का नियम जानें: अष्टमी, नवमी या दशमी पर व्रत पूरा होता है।
- विश्वसनीय स्थानीय पंचांग में तिथि और पारण अवधि देखें।
- पूछें कि आपकी परंपरा में पहले कन्या पूजन, हवन या दूसरी विधि करनी है या नहीं।
- उचित भोजन तथा बच्चों, मेहमानों या यात्रा की तैयारी करें।
- स्रोत, वर्ष और शहर लिख लें ताकि पुराने समय को अगले साल न दोहराएँ।
दो पंचांग अलग हों तो समय का औसत न निकालें। पहले शहर, चंद्र-मास पद्धति और व्रत-नियम का अंतर देखें। मंदिर समुदाय से जुड़े हों तो सदस्यों के लिए दी सूचना अपनाएँ या पुजारी से नियम पूछें।
व्रत के बाद सुरक्षित भोजन
कई दिनों के सीमित भोजन के बाद सामान्य मात्रा में भोजन और पर्याप्त तरल लेना व्यावहारिक है। पारण को बहुत अधिक खाने या छूटे हर भोजन की भरपाई का अवसर न बनाएं। उचित भोजन इस बात पर निर्भर है कि किस तरह का व्रत किया और व्यक्ति की स्वास्थ्य-ज़रूरत क्या है।
उपवास वैकल्पिक है। बच्चे, गर्भवती व्यक्ति, वृद्ध, बीमारी या दिव्यांगता से जूझ रहे लोग, दवा लेने वाले और कठिन शारीरिक काम करने वाले अलग तरीके से भाग ले सकते हैं। दवा न रोकें और चिकित्सकीय सलाह के विरुद्ध पानी न रोकें। स्वास्थ्य के लिए योग्य चिकित्सक से बात करें; धार्मिक मार्गदर्शक बिना उपवास के पूजा का विकल्प बता सकते हैं। किसी को असुरक्षित व्रत के लिए बाध्य न करें।
भारत और विदेश में क्षेत्रीय पालन
उत्तर भारत के कई घर कन्या पूजन के बाद अष्टमी या नवमी को व्रत खोलते हैं, जबकि दूसरे समुदाय या पंचांग दशमी अथवा तय तिथि-परिवर्तन पर समापन बताते हैं। एक ही क्षेत्र के परिवार भी अलग कुल-परंपरा या मंदिर-रीति अपना सकते हैं। पूर्वी भारत की दुर्गा पूजा, दक्षिण के सरस्वती या आयुध पूजा और पश्चिम भारत के गरबा उत्सवों का पारण-क्रम एक जैसा नहीं है।
भारत से बाहर स्थानीय सूर्योदय और समय-क्षेत्र तिथि-गणना के लिए मायने रखते हैं। सप्ताहांत का मंदिर-भोजन सामुदायिक उत्सव हो सकता है, हर सदस्य के व्रत का औपचारिक समापन नहीं। सूचना अस्पष्ट हो तो आयोजक से पूछें। वर्ष-विशेष समय बताते हुए शहर और रीति लिखें; एक समय को पूरी दुनिया के लिए सही न कहें।
इन गलतियों से बचें
- “सब लोग नवमी को व्रत खोलते हैं।” कुछ घर अष्टमी या दशमी की रीति मानते हैं।
- “कन्या पूजा का एक ही सार्वभौमिक पारण समय है।” उसका दिन और व्रत से संबंध अलग हो सकता है।
- “कोई भी पंचांग समय चलेगा।” शहर, तिथि और व्रत-नियम परिणाम बदलते हैं।
- “नवरात्रि पर एकादशी का पारण नियम लगाएँ।” दोनों व्रतों की विधि और कैलेंडर अलग हैं।
- “तबीयत खराब हो तब भी व्रत पूरा करना होगा।” स्वास्थ्य पहले है; सुरक्षित भक्ति-विकल्प अपनाएँ।
साफ़ उत्तर में वर्ष, शहर, नवरात्रि-रीति और व्रत-समापन नियम बताएँ—सिर्फ़ घड़ी का समय नहीं।
संबंधित पर्व और उपासना मार्गदर्शिकाएँ
नवरात्रि के आध्यात्मिक महत्त्व व ऋतु-चक्र, नौ-दिवसीय सरल घरेलू पूजा विधि और दशमी के विजयादशमी (दशहरा) पर्व को जानने के लिए नीचे दिए गए लेख पढ़ें।
सामान्य प्रश्न
पाठकों के सामान्य प्रश्नों के संक्षिप्त उत्तर।
नवरात्रि का पारण नवमी की दोपहर को करना चाहिए या दशमी की सुबह?
दोनों ही विधियाँ अपनी परंपरा के अनुसार सही हैं। धर्मशास्त्र के ग्रंथों (निर्णयसिंधु व धर्मसिंधु) में नौ रात्रियों का व्रत पूर्ण कर दशमी प्रातः (नवमी समाप्त होने पर) पारण का विधान है, जबकि अनेक पारिवारिक कुलाचारों में अष्टमी या नवमी को हवन और कन्या पूजन के बाद प्रसाद से व्रत खोला जाता है।
चढ़ती-उतरती (पहला और आखिरी) व्रत रखने वालों को दूसरा व्रत अष्टमी को रखना चाहिए या नवमी को?
दूसरा व्रत आपके परिवार के कन्या-पूजन के दिन के अनुसार रखा जाता है: यदि आपके घर में महाअष्टमी को कन्या पूजन होता है तो प्रतिपदा के साथ सप्तमी/अष्टमी का जोड़ा रखें, और यदि महानवमी को कन्या पूजन होता है तो प्रतिपदा (दिन 1) और महानवमी (दिन 9) को व्रत रखें।
कलश के ऊपर रखे नारियल का विसर्जन के बाद क्या करना चाहिए?
कलश विसर्जन के बाद अधिकांश परिवार इस अभिमंत्रित नारियल को फोड़कर परिवार व कन्याओं में प्रसाद रूप में बाँटते हैं। यदि संयोगवश नारियल भीतर से खराब निकले तो किसी अनिष्ट की आशंका न करें—परंपरा में यह माना जाता है कि माता ने स्वयं भोग स्वीकार कर लिया है; उसे गमले की मिट्टी में दबा दें और दूसरा मिष्ठान्न बाँट लें।
नवरात्रि के बाद जवारों (खेत्री / जयंती) का क्या उपयोग किया जाता है?
दशमी को कलश उत्थापन के बाद जौ के सुनहरे-हरे अंकुरों (जयंती) को निकालकर पहले भगवान के चरणों में चढ़ाएँ, फिर परिवार के सदस्यों के मस्तक या कान पर आशीर्वाद रूप में लगाएँ, कुछ अंकुर तिजोरी और पढ़ाई की पुस्तकों में रखें तथा शेष मिट्टी और जवारों को घर के गमले में मिला दें।
क्या नदी या तालाब पर गए बिना घर पर ही कलश विसर्जन किया जा सकता है?
हाँ, घर पर इको-फ्रेंडली विसर्जन पूर्णतः शास्त्र-सम्मत और स्वच्छ है: आम के पत्तों से कलश का जल पूरे घर में छिड़ककर शेष जल तुलसी या पौधों में डालें, नारियल प्रसाद रूप में बाँटें, सिक्का तिजोरी में रखें और जवारों की मिट्टी गमले में मिला दें।
नौ दिन के नवरात्रि उपवास के बाद पारण में सबसे पहले क्या खाना सुरक्षित रहता है?
पारण की शुरुआत गुनगुने पानी, नारियल पानी, जीरा-अदरक जल या पतली छाछ से करें; 15 मिनट बाद माता के प्रसाद का थोड़ा-सा हलवा, उबले काले चने या हल्की मूँग दाल की खिचड़ी धीरे-धीरे खाएँ और एक साथ बहुत अधिक तली हुई पूड़ियों से बचें।