संक्षिप्त उत्तर: नवरात्रि क्या है और इसके चार ऋतु-चक्र कैसे चलते हैं?
नवरात्रि (‘नौ रातें’) आदि पराशक्ति की उपासना के चार वार्षिक चंद्र-पखवाड़ों का नाम है, जो ऋतु-संधि के समय शुक्ल प्रतिपदा से शुक्ल नवमी तक मनाए जाते हैं। आश्विन की शारदीय नवरात्रि और चैत्र की वासंतिक नवरात्रि दो प्रमुख सार्वजनिक महापर्व हैं, जबकि आषाढ़ और माघ की गुप्त नवरात्रियाँ अंतरंग शाक्त साधना के लिए जानी जाती हैं। चंद्र तिथि की अवधि २० से २६ घंटे के बीच रहने से तिथि-क्षय या तिथि-वृद्धि के कारण पंचांग में नवरात्रि ८ या १० नागरिक दिनों की हो सकती है।
- वर्ष के चार चक्र: चैत्र (वसंत), आषाढ़ (गुप्त), आश्विन (शारदीय) और माघ (गुप्त) मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से नवमी।
- मुख्य ग्रंथीय आधार मार्कंडेय पुराण अंतर्गत ७०० श्लोकों की ‘दुर्गा सप्तशती’ (देवी माहात्म्य) और ‘देवी भागवत महापुराण’ हैं।
- क्षेत्रीय विविधता में गुजरात का गरबा, बंगाल की दुर्गा पूजा, दक्षिण भारत की गोलू सजावट और सरस्वती-आयुध पूजा शामिल हैं।
वर्ष की चार नवरात्रियाँ और ऋतु-संधि का पंचांगीय सिद्धांत
निर्णयसिंधु, धर्मसिंधु और दुर्गोत्सव-विवेक जैसे शास्त्रीय धर्मग्रंथों में नवरात्रि केवल शरद ऋतु का एक अकेला पर्व नहीं, बल्कि वर्ष के चार ऋतु-परिवर्तनों से जुड़ा एक व्यवस्थित उपासना-चक्र है। इनमें से दो नवरात्रियाँ—चैत्र मास की वासंतिक नवरात्रि और आश्विन मास की शारदीय नवरात्रि—प्रकट या लोक-प्रचलित महापर्व हैं। ये दोनों उस समय आती हैं जब शीत से ग्रीष्म और वर्षा से शरद ऋतु का संधिकाल (ऋतु-संधि) होता है। आयुर्वेद और धर्मशास्त्र दोनों में ऋतु-संधि के समय सात्त्विक आहार, संयम, जप और नियमित दिनचर्या को शरीर तथा मन के संतुलन के लिए उपयोगी माना गया है।
इन दो प्रकट पर्वों के अतिरिक्त आषाढ़ शुक्ल पक्ष (जून–जुलाई) और माघ शुक्ल पक्ष (जनवरी–फरवरी) में दो ‘गुप्त नवरात्रियाँ’ मनाई जाती हैं। जहाँ चैत्र नवरात्रि की पूर्णता राम नवमी पर और शारदीय नवरात्रि की पूर्णता महानवमी व विजयादशमी पर होती है, वहीं आषाढ़ और माघ की गुप्त नवरात्रियाँ मुख्यतः शाक्त साधकों, कुल-परंपराओं और गंभीर पारायण करने वाले गृहस्थों द्वारा शांत जप, दश महाविद्या चिंतन और सप्तशती पाठ के रूप में मनाई जाती हैं। शरद ऋतु के प्रथम दिन की कलश स्थापना के विस्तृत नियमों के लिए हमारी शारदीय नवरात्रि घटस्थापना मुहूर्त और पूजन विधि मार्गदर्शिका देखें।
| नवरात्रि का नाम | चंद्र मास और पक्ष | ऋतु-परिवर्तन (ऋतु-संधि) | मुख्य उपासना और सांस्कृतिक विशेषता |
|---|---|---|---|
| चैत्र / वासंतिक नवरात्रि | चैत्र शुक्ल प्रतिपदा–नवमी | वसंत ऋतु का आगमन | प्रतिपदा पर संवत्सर आरंभ (उगादि / गुड़ी पड़वा) और नवमी पर श्रीराम जन्मोत्सव के साथ समापन। |
| आषाढ़ गुप्त नवरात्रि | आषाढ़ शुक्ल प्रतिपदा–नवमी | ग्रीष्म से वर्षा संधिकाल | सार्वजनिक पंडालों के बजाय शांत गृह-साधना, सप्तशती पारायण और दश महाविद्या उपासना। |
| शारदीय / महा नवरात्रि | आश्विन शुक्ल प्रतिपदा–नवमी | वर्षा से शरद ऋतु संधिकाल | सर्वाधिक व्यापक उत्सव: घटस्थापना, नवदुर्गा पूजन, गरबा, बंगाल दुर्गा पूजा, गोलू और विजयादशमी। |
| माघ गुप्त नवरात्रि | माघ शुक्ल प्रतिपदा–नवमी | शिशिर से वसंत की ओर संक्रमण | अंतरंग देवी-उपासना और स्तोत्र पाठ; इसी के पाँचवें दिन (माघ शुक्ल पंचमी) वसंत पंचमी मनाई जाती है। |
शाक्त ग्रंथों का आधार: दुर्गा सप्तशती, देवी भागवत और नवदुर्गा पाठ
नवरात्रि उपासना का सबसे प्रमुख शास्त्रीय आधार मार्कंडेय पुराण के अध्याय ८१ से ९३ तक निबद्ध ‘देवी माहात्म्य’ है, जिसे लोक और पूजा-परंपरा में ‘दुर्गा सप्तशती’ या ‘चंडी पाठ’ कहा जाता है। १३ अध्यायों और ७०० मंत्र-श्लोकों वाला यह ग्रंथ तीन चरित्रों—प्रथम चरित्र (मधु-कैटभ प्रसंग में महाकाली का स्तवन), मध्यम चरित्र (देवताओं के सम्मिलित तेज से प्रकट महालक्ष्मी/दुर्गा द्वारा महिषासुर मर्दन) और उत्तम चरित्र (महासरस्वती/कौशिकी द्वारा शुंभ-निशुंभ, चंड-मुंड और रक्तबीज का संहार)—में विभाजित है। मेधा ऋषि द्वारा राजा सुरथ और समाधि वैश्य को सुनाया गया यह संवाद महामाया को बंधन और मुक्ति दोनों की अधिष्ठात्री शक्ति के रूप में स्थापित करता है।
दूसरा महत्त्वपूर्ण ग्रंथ ‘श्रीमद्देवी भागवत महापुराण’ (विशेषतः तृतीय, पंचम और नवम स्कंध) तथा कालिका पुराण हैं, जिनमें नवरात्रि व्रत-विधान, कुमारी पूजन और शरद काल में श्रीराम द्वारा किए गए देवी-आवाहन (अकाल बोधन) का विस्तार मिलता है। गृहस्थ साधक जब संपूर्ण सप्तशती का संस्कृत पारायण नहीं कर पाते, तब वे सप्तशती के पूर्वंग—अर्गला, कीलक और देवी कवच (जिसमें नवदुर्गा के नौ स्वरूपों के नाम और क्रम आते हैं)—के साथ श्रद्धापूर्वक दुर्गा चालीसा या सिद्ध कुंजिका स्तोत्र का पाठ करते हैं। मूल मार्कंडेय पुराण के तीनों चरित्रों और कवच-अंगों के अंतर को समझने से पाठक मंदिर के विस्तृत चंडी-हवन और घर की सरल उपासना दोनों का संबंध स्पष्ट देख सकते हैं।
नवदुर्गा: नौ रूपों का एक प्रचलित क्रम
उत्तर भारत में प्रचलित एक क्रम में पर्व के नौ दिनों को दुर्गा के नौ रूपों यानी नवदुर्गा से जोड़ा जाता है। उनके नाम शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री हैं।
यह भक्ति का एक क्रम है, अकेली मान्य सूची नहीं। दक्षिण भारतीय, वैष्णव, माध्व और अन्य समुदाय अलग नाम या देवी-रूप पूज सकते हैं। मंदिर या परिवार की सूची अपनाएँ; क्षेत्रीय अंतर को गलती न कहें।
पंचांग गणित: नवरात्रि कभी ८ और कभी १० दिनों की क्यों होती है?
प्रत्येक वर्ष पाठकों के मन में यह स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि जिस पर्व का नाम ही ‘नवरात्रि’ है, वह किसी वर्ष ८ नागरिक दिनों में क्यों सिमट जाता है और किसी वर्ष १० दिनों तक क्यों चलता है। इसका कारण ‘सावन दिन’ (एक सूर्योदय से अगले सूर्योदय तक का २४ घंटे का नागरिक दिन) और ‘चंद्र तिथि’ (सूर्य और चंद्रमा के बीच १२ अंश के कोणीय अंतराल से बनने वाली तिथि) का खगोलीय अंतर है। चंद्रमा की कक्षा दीर्घवृत्ताकार होने के कारण उसकी गति एकसमान नहीं रहती; इसलिए कोई तिथि लगभग १९.५ घंटे में पूरी हो जाती है तो कोई २६.५ घंटे तक चलती है।
भारतीय पंचांग में पर्व के दिनों की गिनती मुख्यतः ‘उदयातिथि’ (सूर्योदय के समय उपस्थित तिथि) तथा सप्तमी, महाष्टमी और महानवमी के विशिष्ट धर्मशास्त्रीय नियमों से होती है। जब कोई छोटी तिथि एक दिन सूर्योदय के बाद शुरू होकर अगले दिन सूर्योदय से पहले ही समाप्त हो जाती है (उदाहरण के लिए चतुर्थी सुबह ०७:१५ बजे शुरू होकर अगली सुबह ०५:२० बजे समाप्त हो जाए), तो वह किसी भी सूर्योदय को स्पर्श नहीं करती। इसे ‘तिथि-क्षय’ कहते हैं, जिसमें दो तिथियाँ एक ही कैलेंडर तारीख में पड़ जाती हैं और नवरात्रि ८ दिनों की दिखती है। इसके विपरीत, जब कोई लंबी तिथि लगातार दो सूर्योदयों को स्पर्श करती है, तो उसे ‘तिथि-वृद्धि’ कहते हैं और पंचांग में नवरात्रि १० नागरिक दिनों की हो जाती है, यद्यपि पूजी जाने वाली चंद्र-तिथियाँ नौ ही रहती हैं।
भारत के विभिन्न क्षेत्रों में नवरात्रि की विविध परंपराएँ
आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से नवमी तक का चंद्र-काल पूरे भारत में साझा होने पर भी क्षेत्रीय उपासना के केंद्र और रीतियाँ अत्यंत विविध हैं। गुजरात और पश्चिमी भारत में नवरात्रि का केंद्र ‘गरबो’ है—छिद्रों वाला मिट्टी का घड़ा जिसके भीतर अखंड दीप जलता है और जो शक्ति के सृजनशील गर्भ का प्रतीक माना जाता है; इसके चारों ओर भजन-गरबा और डांडिया रास के माध्यम से सामूहिक आराधना होती है। पश्चिम बंगाल, असम, ओडिशा और त्रिपुरा में मुख्य उत्सव महाषष्ठी के ‘बोधन’, ‘आमंत्रण’ और ‘अधिवास’ से आरंभ होकर महासप्तमी के ‘नवपत्रिका स्नान’ (नौ वनस्पतियों का समूह), अष्टमी-नवमी की संधि में ४८ मिनट (दो घटी) की ‘संधि पूजा’, और दशमी के सिंदूर खेला व विसर्जन तक चलता है।
तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में घरों के भीतर विषम संख्या की सीढ़ियों (३, ५, ७, ९ या ११) पर देवी-देवताओं, संतों और लोक-जीवन की गुड़ियों की कलात्मक सज्जा की जाती है, जिसे ‘बोम्मई गोलू’, ‘कोलु’ या ‘बोम्बे हब्बा’ कहते हैं। केरल और दक्षिण भारत के कई भागों में अंतिम तीन तिथियाँ—दुर्गाष्टमी, महानवमी और विजयादशमी—विद्या और कौशल की उपासना को समर्पित हैं: अष्टमी की संध्या को पुस्तकें, वाद्ययंत्र और कार्य-उपकरण देवी के समक्ष विश्राम के लिए रखे जाते हैं (‘पूजा वैप्पु’), महानवमी को सरस्वती व आयुध पूजा होती है, और विजयादशमी की सुबह ‘पूजा एडुप्पु’ तथा बच्चों के अक्षरारंभ संस्कार ‘विद्यारंभम’ के साथ अध्ययन पुनः शुरू होता है।
| क्षेत्र या परंपरा | प्रमुख तिथि-अवधि | केंद्रीय पूजा-प्रतीक या माध्यम | विशिष्ट अनुष्ठान और उत्सव |
|---|---|---|---|
| उत्तर और मध्य भारत | प्रतिपदा से नवमी (९ तिथियाँ) | मिट्टी की वेदी में जौ (जवारे/खेत्री) के साथ घटस्थापना और अखंड ज्योति | नवदुर्गा पूजन, दुर्गा सप्तशती पाठ, और अष्टमी या नवमी को हलवा-पूड़ी-चना के साथ कन्या पूजन व हवन। |
| गुजरात और पश्चिम भारत | प्रतिपदा से नवमी की रात्रियाँ | आँगन या चौक के मध्य प्रज्वलित दीप-युक्त छिद्रित मिट्टी का ‘गरबो’ | देवी के चारों ओर ताली-आधारित गरबा, डांडिया रास और अंबाजी, बहुचराजी व खोडियार माता की आरती। |
| बंगाल, असम और पूर्वी भारत | महाषष्ठी से विजयादशमी (५ दिन) | लक्ष्मी, सरस्वती, कार्तिकेय और गणेश सहित महिषासुरमर्दिनी की मृण्मयी प्रतिमा | षष्ठी बोधन, सप्तमी नवपत्रिका प्रवेश, अष्टमी पुष्पांजलि, १०८ कमल व १०८ दीपों से संधि पूजा और धुनुची नृत्य। |
| तमिलनाडु, आंध्र और कर्नाटक | प्रतिपदा से विजयादशमी | विषम सीढ़ियों वाली ‘गोलू / बोम्बे हब्बा’ गुड़िया-मंच और कलश | संध्या भजन, प्रतिदिन अलग ‘सुंडल’ नैवेद्य, ललिता सहस्रनाम पाठ, तांबूल आदान-प्रदान और मैसूर दशहरा। |
| केरल और दक्षिणी विद्या-परंपरा | दुर्गाष्टमी संध्या से विजयादशमी प्रातः | सरस्वती वेदी पर रखी पुस्तकें, ग्रंथ, वाद्ययंत्र और शिल्प-उपकरण | अष्टमी को ‘पूजा वैप्पु’ (पुस्तक-विश्राम), महानवमी को सरस्वती/आयुध पूजा और दशमी को ‘विद्यारंभम’ (अक्षरारंभ)। |
| तेलंगाना बथुकम्मा उत्सव | महालया अमावस्या से दुर्गाष्टमी | पीतल की थाली (तांबलम) में औषधीय और मौसमी फूलों का शंक्वाकार स्तंभ | महिलाओं द्वारा पुष्प-स्तंभ के चारों ओर पारंपरिक लोकगीत और ‘सद्दुला बथुकम्मा’ के साथ जल-विसर्जन। |
आम पूजा-विधियाँ और परिवार की पसंद
रीतियों में घटस्थापना या कलश स्थापना, दैनिक पूजा, देवी-पाठ, दीपक, संगीत, भोग, गरबा या डांडिया, गोलू की गुड़िया-सजावट, कन्या या कुमारी पूजन और समापन पर हवन या विसर्जन हो सकता है। कोई भक्त पूरे नौ दिन, चुने हुए दिन, केवल संध्या में या घर की खास रीति से पूजा कर सकता है।
व्रत की भी अनेक शैलियाँ हैं। कुछ लोग एक समय भोजन, कुछ खास भोजन से परहेज, कुछ फलाहार और कुछ व्रत नहीं रखते। सभी के लिए एक ही भोजन-नियम नहीं है। स्वास्थ्य की जरूरत, गर्भावस्था, दवा का समय, खाने से जुड़ी बीमारी या शारीरिक श्रम हो तो सुरक्षित तरीका चुनें और स्वास्थ्य-विशेषज्ञ की सलाह लें।
भाग लेने का सहज तरीका
- नवरात्रि पहचानें। देखें कि पंचांग चैत्र, शारदीय, माघ गुप्त या आषाढ़ गुप्त नवरात्रि बता रहा है।
- घर की रीति पूछें। तय करें कि कौन-सी पूजा, व्रत या सामुदायिक आयोजन अर्थपूर्ण है।
- सुरक्षित अभ्यास रखें। भोजन और गतिविधि को स्वास्थ्य, आयु, काम और उपलब्धता के अनुसार अपनाएँ।
- अंतर का सम्मान करें। पड़ोसी की देवी-सूची, भोजन-नियम या उत्सव आपसे अलग हो सकता है।
- अपनी परंपरा में समापन करें। नवमी, दशमी, विजयादशमी या स्थानीय समापन-पर्व हो सकता है।
खास तौर पर शरद ऋतु के पर्व के लिए शारदीय नवरात्रि की मार्गदर्शिका पढ़ें; उसमें क्रम और क्षेत्रीय पर्व दिए हैं।
एक ही तय विधि के बिना भी अर्थपूर्ण पर्व
भक्तों के लिए नवरात्रि पूजा, नवीनीकरण, आत्म-अनुशासन, कृतज्ञता और समुदाय का समय हो सकती है। महिषासुर पर दुर्गा की विजय और राम द्वारा देवी-पूजा की कथाएँ इससे जुड़े उत्सवों में आती हैं, जबकि स्थानीय रूप दूसरी कथाओं और अर्थों को प्रमुख कर सकते हैं।
कम दिन पूजा करने, व्रत न रखने या अलग क्षेत्रीय रीति अपनाने पर किसी को शर्मिंदा न करें। स्वेच्छा और सावधानी से किया गया कर्म भक्ति को गहरा कर सकता है। पर्व डर, सामाजिक दबाव या स्वास्थ्य और जिम्मेदारी की उपेक्षा का कारण नहीं होना चाहिए।
संबंधित पर्व और उपासना मार्गदर्शिकाएँ
नवदुर्गा के नौ स्वरूपों, शारदीय नवरात्रि घटस्थापना विधि और दुर्गा चालीसा के अर्थ को विस्तार से पढ़ने के लिए नीचे दिए गए पृष्ठ देखें।
सामान्य प्रश्न
पाठकों के सामान्य प्रश्नों के संक्षिप्त उत्तर।
पंचांग में चार नवरात्रियाँ कौन-सी होती हैं और उनमें से दो को ‘गुप्त’ क्यों कहा जाता है?
चैत्र (वसंत) और आश्विन (शरद) की नवरात्रियाँ सार्वजनिक उत्सव के रूप में प्रसिद्ध हैं, जबकि आषाढ़ और माघ शुक्ल पक्ष की नवरात्रियाँ मुख्यतः साधकों द्वारा शांत जप, पाठ और अंतरंग शाक्त उपासना के लिए मनाई जाती हैं, इसलिए उन्हें गुप्त नवरात्रि कहते हैं।
नवरात्रि का अर्थ नौ रातें होने पर भी कभी यह ८ दिन और कभी १० दिन की क्यों होती है?
नवरात्रि सदैव शुक्ल प्रतिपदा से नवमी तक नौ चंद्र-तिथियों की ही होती है, किंतु चंद्र तिथि के २४ घंटे से छोटे या बड़े होने के कारण जब तिथि-क्षय होता है तब ८ नागरिक दिन और जब तिथि-वृद्धि होती है तब १० नागरिक दिन दिखते हैं।
दुर्गा सप्तशती और देवी कवच के पाठ में क्या संबंध और अंतर है?
दुर्गा सप्तशती (देवी माहात्म्य) मार्कंडेय पुराण के १३ अध्यायों का ७०० श्लोकी मुख्य आख्यान है, जबकि देवी कवच सप्तशती पाठ से पूर्व पढ़ा जाने वाला रक्षा-अंग है जिसमें नवदुर्गा के नौ नामों का प्रसिद्ध श्लोक आता है।
शारदीय नवरात्रि और दुर्गा पूजा में ‘संधि पूजा’ कब की जाती है?
संधि पूजा महाष्टमी के अंतिम २४ मिनट और महानवमी के प्रारंभिक २४ मिनट—कुल ४८ मिनट (दो घटी) के संधिकाल—में की जाती है, जो चंड और मुंड के संहार के लिए देवी चामुंडा के प्राकट्य का स्मरण है।
कन्या पूजन अष्टमी को करना चाहिए या नवमी को?
दोनों तिथियाँ शास्त्र और परंपरा में मान्य हैं; अनेक परिवार महाष्टमी को कन्या पूजन और हवन करते हैं, जबकि कई कुल-परंपराओं में महानवमी को व्रत-पारायण और कन्या भोज कराया जाता है।
दक्षिण भारत में नवरात्रि के अंतिम दिनों में पुस्तकों और औजारों को विश्राम क्यों दिया जाता है?
सरस्वती पूजा और आयुध पूजा की परंपरा में दुर्गाष्टमी की संध्या को ज्ञान और आजीविका के साधनों को देवी के समक्ष रखकर महानवमी को पूजन किया जाता है, तथा विजयादशमी को विद्यारंभम के बाद उन्हें कृतज्ञतापूर्वक पुनः ग्रहण किया जाता है।