संक्षिप्त उत्तर: एकादशी व्रत कथा क्या है?
एकादशी व्रत कथा हिंदू चंद्र-मास के शुक्ल और कृष्ण पक्ष की ग्यारहवीं तिथि (एकादशी) को भगवान श्रीविष्णु की आराधना में पढ़ी या सुनी जाने वाली तिथि-विशेष पौराणिक कथा है। बारह चंद्र मासों की 24 नियमित एकादशियों और अधिक मास (पुरुषोत्तम मास) की 2 एकादशियों (पद्मिनी व परमा) सहित कुल 26 एकादशी कथाएँ हैं, जिनका मूल आधार पद्म पुराण की 'उत्पन्ना एकादशी' कथा है।
- वर्ष के 12 मासों की 24 नियमित और अधिक मास की 2 (पद्मिनी व परमा) मिलाकर कुल 26 एकादशी कथाएँ हैं।
- पद्म पुराण के अनुसार मुर दैत्य के संहार हेतु भगवान विष्णु की ग्यारह इंद्रियों से एकादशी देवी का प्राकट्य हुआ।
- व्रत का पालन दशमी (एकभुक्त), एकादशी (अन्न-त्याग व कथा) और द्वादशी (हरिवासर के बाद सूर्योदय पारण) के त्रिदिवसीय नियम से होता है।
पद्म पुराण की उत्पन्ना एकादशी कथा: मुर दैत्य का वध और देवी एकादशी का प्राकट्य
पद्म पुराण के उत्तराखंड और भविष्योत्तर पुराण में धर्मराज युधिष्ठिर तथा देवर्षि नारद के प्रश्न करने पर भगवान श्रीकृष्ण और ब्रह्माजी एकादशी तिथि के जन्म की मूल कथा सुनाते हैं, जिसे 'उत्पन्ना एकादशी' (पूर्णिमांत पंचांग के अनुसार मार्गशीर्ष कृष्ण एकादशी) कहा जाता है। सत्ययुग में तालजंघ वंश में उत्पन्न 'मुर' नामक एक महापराक्रमी दैत्य ने अपनी राजधानी चंद्रावती नगरी से देवराज इंद्र सहित समस्त लोकपालों को परास्त कर स्वर्ग पर अधिकार कर लिया। देवताओं की करुण पुकार सुनकर भगवान श्रीहरि विष्णु ने चंद्रावती पर आक्रमण किया और सुदर्शन चक्र व कौमोदकी गदा से एक सहस्र दिव्य वर्षों तक मुर से युद्ध किया। अंततः दैत्य को रणभूमि से दूर ले जाने की लीला रचते हुए भगवान बदरीकाश्रम की बारह योजन लंबी 'हेमवती' नामक गुफा में प्रवेश कर योगनिद्रा में शयन करने लगे।
जब मुर दैत्य ने निद्रामग्न श्रीविष्णु पर प्रहार करना चाहा, तभी भगवान के शरीर और उनकी ग्यारह इंद्रियों (पाँच ज्ञानेंद्रियाँ, पाँच कर्मेंद्रियाँ और ग्यारहवाँ मन) के दिव्य तेज से अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित एक परम तेजस्विनी कन्या प्रकट हुई। उस देवी ने हुंकार मात्र से मुर के रथ और शस्त्रों को चूर-चूर कर उसका मस्तक काट दिया। योगनिद्रा से जागने पर श्रीनारायण ने उस कन्या से परिचय पूछा और प्रसन्न होकर कहा कि चूँकि तुम मेरी ग्यारह इंद्रियों के संयम-बल से ग्यारहवीं तिथि को उत्पन्न हुई हो, इसलिए तुम्हारा नाम 'एकादशी' होगा और तुम मेरी सबसे प्रिय तिथि रहोगी। इसी शास्त्रीय आधार पर स्मार्त और वैष्णव एकादशी तिथि-निर्णय तथा अगले दिन द्वादशी एकादशी पारण समय की गणना में विशेष सावधानी रखी जाती है।
वर्ष की सभी 26 एकादशी व्रत कथाओं की तालिका और दशमी–एकादशी–द्वादशी व्रत नियम
उत्पन्ना एकादशी जहाँ स्वयं तिथि के प्राकट्य की कथा है, वहीं वर्ष के प्रत्येक पक्ष की एकादशी का अपना स्वतंत्र नाम, देवता-नाम (केशव, नारायण, माधव, गोविंद, विष्णु, मधुसूदन, त्रिविक्रम, वामन, श्रीधर, हृषीकेश, पद्मनाभ और दामोदर) तथा एक विशिष्ट कथा है। उत्तर भारत के पूर्णिमांत पंचांग में मास का प्रारंभ कृष्ण पक्ष से होता है, जबकि महाराष्ट्र, गुजरात, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और कर्नाटक के अमांत पंचांग में शुक्ल पक्ष पहले आता है; इसी कारण कृष्ण पक्ष की एकादशी के महीने का नाम दोनों पंचांगों में एक मास आगे-पीछे दिखता है, किंतु एकादशी का नाम (जैसे कामिका, अजा, इंदिरा या रमा) पूरे भारत में एक ही रहता है। जब लगभग हर 32.5 महीने में अधिक मास (पुरुषोत्तम मास) आता है, तब पद्मिनी (शुक्ल) और परमा (कृष्ण) नामक दो अतिरिक्त एकादशियों के जुड़ने से कुल संख्या 26 हो जाती है। इनमें ज्येष्ठ की निर्जला (भीमसेनी) एकादशी, आषाढ़ की देवशयनी (आषाढ़ी) एकादशी और कार्तिक की देवउठनी (प्रबोधिनी) एकादशी वार्षिक व्रत-चक्र के प्रमुख स्तंभ हैं।
निर्णयसिंधु, धर्मसिंधु और हरिभक्तिविलास के अनुसार एकादशी केवल एक दिन का उपवास नहीं, बल्कि दशमी, एकादशी और द्वादशी—तीन दिनों की सात्त्विक साधना है। दशमी के दिन सूर्यास्त से पहले केवल एक बार सात्त्विक भोजन (एकभुक्त) किया जाता है तथा काँसे के बर्तन, मसूर की दाल, शहद और तामसिक वस्तुओं का त्याग रहता है। चूँकि एकादशी और द्वादशी को तुलसी-दल तोड़ना वर्जित माना गया है, इसलिए दशमी को ही सूर्यास्त से पूर्व तुलसी के पत्ते तोड़कर रख लिए जाते हैं। एकादशी को प्रातः स्नान कर भगवान विष्णु का पीले पुष्प, चंदन, धूप-दीप और तुलसी-दल से पूजन किया जाता है, समस्त अनाज व दालों का त्याग (अन्न-वर्जन) रखा जाता है और उस पक्ष की निर्धारित कथा पढ़ी जाती है। अगले दिन द्वादशी को सूर्योदय के पश्चात्, 'हरिवासर' (द्वादशी तिथि का पहला चौथाई भाग) बीतने पर और द्वादशी समाप्त होने से पूर्व तुलसी-तीर्थ व सात्त्विक भोजन से पारण किया जाता है।
| चंद्र मास (पूर्णिमांत / अमांत) | कृष्ण पक्ष एकादशी और मुख्य कथा-सार | शुक्ल पक्ष एकादशी और मुख्य कथा-सार | मास के आराध्य विष्णु नाम व विशेष पर्व |
|---|---|---|---|
| चैत्र (मार्च–अप्रैल) | पापमोचनी (चैत्र/फाल्गुन कृष्ण): च्यवन-पुत्र मेधावी ऋषि और अप्सरा मंजुघोषा के प्रायश्चित की कथा। | कामदा (चैत्र शुक्ल): गंधर्व ललित और ललिता की राक्षस-शाप से मुक्ति की भक्ति-कथा। | विष्णु / मधुसूदन — चैत्र नवरात्रि के बाद संवत्सर की प्रथम एकादशी। |
| वैशाख (अप्रैल–मई) | वरूथिनी (वैशाख/चैत्र कृष्ण): राजा मान्धाता और वराह भगवान द्वारा दान व संयम का उपदेश। | मोहिनी (वैशाख शुक्ल): धनपाल वैश्य के पथभ्रष्ट पुत्र धृष्टबुद्धि के सुधार व उद्धार की कथा। | मधुसूदन — समुद्र-मंथन के मोहिनी स्वरूप से संबद्ध। |
| ज्येष्ठ (मई–जून) | अपरा / अचला (ज्येष्ठ/वैशाख कृष्ण): राजा महीध्वज को पीपल के प्रेत-योनि बंधन से मुक्ति। | निर्जला / भीमसेनी (ज्येष्ठ शुक्ल): महर्षि व्यास द्वारा भीमसेन को ग्रीष्मकालीन निर्जल व्रत का उपदेश। | त्रिविक्रम — वर्ष की समस्त एकादशियों के समतुल्य प्रमुख व्रत। |
| आषाढ़ (जून–जुलाई) | योगिनी (आषाढ़/ज्येष्ठ कृष्ण): कुबेर के सेवक हेममाली यक्ष की कुष्ठ-शाप से मुक्ति। | देवशयनी / आषाढ़ी / पद्मा (आषाढ़ शुक्ल): राजा मान्धाता के राज्य में वर्षा और श्रीहरि का योगनिद्रा शयन। | वामन — चार मासीय चातुर्मास और पंढरपुर वारी का आरंभ। |
| श्रावण (जुलाई–अगस्त) | कामिका (श्रावण/आषाढ़ कृष्ण): चातुर्मास में भगवान श्रीधर को तुलसी-मंजरी अर्पण का माहात्म्य। | श्रावण पुत्रदा / पवित्रा (श्रावण शुक्ल): महिष्मती के राजा महीजित को लोमश ऋषि का मार्गदर्शन। | श्रीधर — भगवान विष्णु को पवित्रक (रेशमी/सूती सूत्र) अर्पण। |
| भाद्रपद (अगस्त–सितंबर) | अजा / अन्नदा (भाद्रपद/श्रावण कृष्ण): सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र के संकट-निवारण और सत्य-निष्ठा की कथा। | परिवर्तिनी / पार्श्व / वामन (भाद्रपद शुक्ल): योगनिद्रा में प्रभु का करवट बदलना और राजा बलि की भक्ति। | हृषीकेश — चातुर्मास का मध्य-बिंदु और वामन जयंती। |
| आश्विन (सितंबर–अक्टूबर) | इंदिरा (आश्विन/भाद्रपद कृष्ण): पितृपक्ष में राजा इंद्रसेन द्वारा अपने पितरों के उद्धार की कथा। | पापांकुशा (आश्विन शुक्ल): भगवान पद्मनाभ की उपासना से प्रमाद रूपी हाथी पर धर्म के अंकुश की सीख। | पद्मनाभ — पितृपक्ष और शारदीय नवरात्रि के मध्य की एकादशियाँ। |
| कार्तिक (अक्टूबर–नवंबर) | रमा (कार्तिक/आश्विन कृष्ण): राजकुमारी चंद्रभागा की अटल एकादशी-निष्ठा (दीपावली से चार दिन पूर्व)। | देवउठनी / प्रबोधिनी (कार्तिक शुक्ल): भगवान विष्णु का योगनिद्रा से जागरण और तुलसी-शालिग्राम विवाह। | दामोदर — चातुर्मास का समापन और भीष्म पंचक का आरंभ। |
| मार्गशीर्ष (नवंबर–दिसंबर) | उत्पन्ना (मार्गशीर्ष/कार्तिक कृष्ण): मुर दैत्य के वध हेतु श्रीविष्णु से एकादशी देवी का प्राकट्य। | मोक्षदा / वैकुंठ (मार्गशीर्ष शुक्ल): गीता जयंती दिवस; राजा वैखानस द्वारा पितृ-मोक्ष की कथा। | केशव — नए एकादशी व्रत-संकल्प के आरंभ की मुख्य तिथि। |
| पौष (दिसंबर–जनवरी) | सफला (पौष/मार्गशीर्ष कृष्ण): महिष्मान के पुत्र लुंपक के हृदय-परिवर्तन और सफल साधना की कथा। | पौष पुत्रदा / वैकुंठ (पौष शुक्ल): भद्रावती के राजा सुकेतुमान और विश्वदेवों के संवाद की कथा। | नारायण — शीतकालीन उत्तरायण-संधि की उपासना। |
| माघ (जनवरी–फरवरी) | षट्तिला (माघ/पौष कृष्ण): माघ मास में तिल के छह प्रकार के प्रयोग (स्नान, उबटन, हवन, तर्पण, भोजन, दान)। | जया / भैमी (माघ शुक्ल): गंधर्व माल्यवान और पुष्पवती की पिशाच-योनि से मुक्ति की कथा। | माधव — माघ स्नान और तिल-दान का विशेष महत्त्व। |
| फाल्गुन (फरवरी–मार्च) | विजया (फाल्गुन/माघ कृष्ण): लंका प्रस्थान से पूर्व बकदाल्भ्य ऋषि की सलाह पर श्रीराम द्वारा व्रत-पालन। | आमलकी / रंगभरी (फाल्गुन शुक्ल): आंवले के वृक्ष के नीचे भगवान विष्णु और शिव-पार्वती पूजन। | गोविंद — काशी व ब्रज के फाग उत्सव से जुड़ी एकादशी। |
| अधिक मास (पुरुषोत्तम मास) | परमा (अधिक कृष्ण): कौंडिन्य ऋषि द्वारा सुमेधा और कुबेर के पंचरात्रि दान-संयम की कथा। | पद्मिनी / कमला (अधिक शुक्ल): कृतवीर्य और रानी पद्मिनी की पुरुषोत्तम मास साधना। | पुरुषोत्तम — लगभग हर 32.5 मास में आने वाले अधिक मास के विशेष व्रत। |
| व्रत का चरण | पंचांगीय समय और सीमा | शास्त्रीय आहार व पूजा अनुशासन | गृहस्थों के लिए व्यावहारिक रूप |
|---|---|---|---|
| दशमी (प्रथम दिवस तैयारी) | एकादशी से पूर्व दशमी की संध्या | सूर्यास्त से पूर्व एक बार सात्त्विक भोजन (एकभुक्त); शहद, मसूर, बैंगन और काँसे के पात्र का त्याग; सूर्यास्त से पहले तुलसी-दल चयन। | शाम से पहले हल्का सात्त्विक भोजन करें और रात्रि में मुख-शुद्धि कर लें ताकि अन्न का अंश न रहे। |
| एकादशी प्रातः (संकल्प व पूजा) | स्थानीय सूर्योदय (उदय/अरुणोदय) | स्मार्त व वैष्णव दशमी-वेध की जाँच; स्नान कर पीतांबरधारी विष्णु को पीले पुष्प, चंदन और तुलसी अर्पण। | कार्यरत भक्त प्रातः 15 मिनट पूजा कर 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' मंत्र का जप करें। |
| एकादशी दिवस (अन्न-त्याग व कथा) | संपूर्ण एकादशी तिथि | सभी प्रकार के अनाज और दालों का पूर्ण त्याग (अन्न-वर्जन); उस पक्ष की निर्धारित एकादशी व्रत कथा का पाठ या श्रवण। | स्वास्थ्य के अनुसार फलाहार (फल, दूध, मेवे, कुट्टू/सिंघाड़ा) या बिना उपवास के केवल कथा-पूजन चुनें। |
| एकादशी रात्रि (जागरण व भजन) | एकादशी की रात्रि | विष्णु सहस्रनाम या भगवद्गीता का पाठ, भजन-कीर्तन तथा क्रोध व परनिंदा से दूर रहना। | संध्या आरती के बाद परिवार के साथ 30–60 मिनट कथा-चर्चा या भजन कर विश्राम करें। |
| द्वादशी प्रातः (व्रत पारण) | सूर्योदय के बाद द्वादशी तिथि में | हरिवासर (द्वादशी का प्रथम चतुर्थांश) बीतने के बाद और द्वादशी समाप्त होने से पूर्व तुलसी-तीर्थ व सात्त्विक अन्न से पारण। | यदि द्वादशी बहुत जल्दी समाप्त हो रही हो, तो मुहूर्त में तुलसी-दल और जल ग्रहण कर पारण का नियम पूर्ण करें। |
एकादशी की अनेक कथाएँ क्यों हैं?
एकादशी चंद्र-पक्ष की ग्यारहवीं तिथि है। इसलिए अधिकांश महीनों में शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष की एक-एक एकादशी होती है। हर तिथि का अलग नाम है और पुराण तथा क्षेत्रीय व्रत-परंपराओं में उसकी अपनी कथा या माहात्म्य मिलता है। अधिक मास आने पर अतिरिक्त व्रत भी हो सकते हैं। पंचांग के अनुसार क्रम और संख्या का वर्णन बदल सकता है; कथा-संग्रह एक सूची है, सबके लिए एक समान अनुष्ठान-पुस्तिका नहीं।
कथा में राजा या जिज्ञासु व्रत के बारे में पूछता है और ऋषि या देवता उसका वृत्तांत समझाते हैं। कोई कथा भक्ति, सत्य, दान, संयम या गलती के बाद मार्गदर्शन लेने पर बल देती है। नाम, प्रसंग और समापन के विवरण अलग पाठों में बदल सकते हैं। परिवार किसी पुराण, संप्रदाय या क्षेत्रीय पुस्तक का पाठ करता है तो उसी रूप को स्पष्ट रखें; अलग कथाओं के प्रसंग न मिलाएँ।
उदाहरण: तिथि बदले तो कथा भी बदलती है
कुछ उदाहरण बताते हैं कि एकादशी का नाम जानना क्यों जरूरी है। उत्पन्ना एकादशी की एक प्रसिद्ध कथा में देवी एकादशी का प्राकट्य और मुर नामक असुर का वध आता है। मोक्षदा एकादशी की कथा में राजा वैखानस अपने दिवंगत पिता की सहायता का मार्ग पूछते हैं। निर्जला एकादशी को भीम और बार-बार उपवास न रख पाने की कठिनाई से जोड़ा जाता है। अजा एकादशी की कथा में राजा हरिश्चंद्र के संघर्ष आते हैं; प्रबोधिनी एकादशी के कुछ कथा-संग्रहों में नारद और ब्रह्मा का संवाद है। ये छोटे परिचय हैं, पूरे अनुवाद नहीं; प्रकाशित कथाओं के रूप अलग हो सकते हैं।
केवल परिचित होने के कारण दूसरी तिथि की कथा न चुनें। मोक्षदा की कथा अपने आप निर्जला की कथा नहीं बनती। कथा-संग्रह किसी खास चंद्र-पंचांग के अनुसार महीने और पक्ष बताता हो सकता है। दो पंचांगों में महीने का नाम अलग मिले तो केवल अंग्रेज़ी महीना न देखकर तिथि, नाम और व्रत-परंपरा की तुलना करें।
व्रत-विधि के उदाहरणों के लिए अजा एकादशी, देवशयनी एकादशी और देवउठनी एकादशी की मार्गदर्शिकाएँ पढ़ें।
सही कथा चुनने और पढ़ने का तरीका
- परिवार या मंदिर के पंचांग में एकादशी का नाम देखें।
- शुक्ल या कृष्ण पक्ष पहचानें और पंचांग-पद्धति नोट करें।
- उसी एकादशी का नाम रखने वाली और अपनी परंपरा बताने वाली कथा चुनें।
- समझ में आने वाली भाषा में पढ़ें और अपरिचित शब्दों का अर्थ समझें।
- प्रार्थना या चिंतन से समापन करें; कथा को भौतिक फल की गारंटी न मानें।
अच्छा पाठ कथा की पृष्ठभूमि बताता है, पात्रों का परिचय देता है और अंत में उस गुण पर विचार करता है जिसका अभ्यास कथा प्रेरित करती है। संस्कृत या क्षेत्रीय शब्द के कई अर्थ हों तो भरोसेमंद शिक्षक की व्याख्या लें। परिवार में छोटी कथा पढ़ना पर्याप्त है; पूरा संग्रह एक बैठक में पढ़ना जरूरी नहीं।
बच्चों को सुनाते समय उनके निर्णय और संबंधों पर बात करें। कथा का उपयोग निश्चित दंड का भय दिखाने या उपवास न कर पाने वाले व्यक्ति को शर्मिंदा करने में न करें।
कथा, पूजा, उपवास और पारण अलग चरण हैं
कथा सुनना या पढ़ना कई एकादशी-व्रतों का एक हिस्सा है, पर यह भोजन-व्रत के समान नहीं। परिवार विष्णु-पूजा, भजन, पुष्प या जल अर्पण, अपने अनुकूल उपवास और पंचांग के अनुसार बाद में पारण कर सकता है। कोई फल खाता है, कोई अनाज छोड़ता है, कोई एक समय भोजन करता है और कोई भोजन पर रोक के बिना पूजा करता है। नियम अलग हैं और स्वास्थ्य पहले है।
पारण का अर्थ है व्रत खोलना। कई पंचांग अगले दिन का समय देते हैं, अक्सर द्वादशी तिथि और सूर्योदय के संदर्भ में। गणना स्थान के अनुसार बदल सकती है और समुदायों के नियम अलग हो सकते हैं। दूसरे शहर का पारण-समय न दोहराएँ और यह न मानें कि आधी रात होते ही तिथि बदलती है। परिवार का नियम स्पष्ट न हो तो भरोसेमंद स्थानीय मंदिर या पुरोहित से पूछें।
उद्यापन कुछ व्रत-परंपराओं में तय अवधि या संकल्प पूरा होने के बाद का समापन-अनुष्ठान है। हर एकादशी-भक्त के लिए यह अनिवार्य नहीं। सामग्री या खर्च जुटाने से पहले पता करें कि यह आपके कुलाचार का भाग है या नहीं।
घर पर सरल व्रत-पालन
साधारण पालन में पंचांग देखना, साफ पूजा-स्थान बनाना, कथा के लिए समय रखना, परिचित प्रार्थना करना और परिवार के पारण-नियम के अनुसार भोजन करना शामिल हो सकता है। पूजा की बहुत सामग्री खरीदना जरूरी नहीं। बीमारी, दवा, गर्भावस्था, आयु, कठिन काम या देखभाल की जिम्मेदारी के कारण उपवास ठीक न हो तो बिना भोजन-रोक वाला पाठ, प्रार्थना या दान बेहतर विकल्प हो सकता है।
व्रत के लिए दवा बंद न करें और निर्जलीकरण का जोखिम न लें। बच्चों पर भोजन छोड़ने का दबाव न डालें। स्वास्थ्य की चिंता हो तो योग्य स्वास्थ्यकर्मी से पूछें; धार्मिक पालन सुरक्षित और स्वैच्छिक रहे।
क्षेत्र और विदेश के पंचांग में अंतर
पूर्णिमांत और अमांत मास-गणना या स्मार्त और वैष्णव पंचांगों में एकादशी के नाम और तारीख़ अलग रूप में दिए जा सकते हैं। कुछ मंदिर अपने समुदाय के लिए अलग तिथि प्रकाशित करते हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि एक परिवार की कथा गलत है; वह अलग लेकिन सुव्यवस्थित परंपरा का पालन कर सकता है। व्रत के लिए जो पंचांग मानते हैं, कथा भी उसी के नाम से मिलाएँ।
भारत से बाहर रहने वाले भक्त व्रत वाले शहर का पंचांग देखें। तिथि-सीमा और सूर्योदय स्थान तथा समय-क्षेत्र से बदलते हैं। मंदिर सुविधा के लिए सप्ताहांत में सार्वजनिक कार्यक्रम रख सकता है; पूछें कि सूचना व्रत की तारीख़ बताती है या केवल मिलन की। यात्रा पर हों तो उपवास तय करने से पहले मेजबान परिवार या मंदिर से उनकी परंपरा पूछें।
दुनिया भर के पाठकों के लिए प्रकाशित कथा-मार्गदर्शिका में तिथि और परंपरा का नाम बताएँ, फिर स्थानीय समय देखने को कहें। किसी एक भारतीय शहर की घड़ी को सार्वभौमिक न बताएं।
किन गलतियों से बचें
- एक कथा को वर्ष की हर एकादशी की कथा बताना।
- अंग्रेज़ी महीने का नाम मिलता देखकर दूसरी तिथि की कथा मिला देना।
- भक्ति-कथा को तारीख़ सहित ऐतिहासिक घटना बताना।
- मानना कि हर भक्त को सबसे कठोर उपवास ही करना चाहिए।
- दूसरे शहर या पंचांग का पारण-समय लागू करना।
- कथा पढ़ने से किसी निश्चित भौतिक फल की गारंटी देना।
उपयोगी तरीका सरल है: नामित एकादशी पहचानें, एक भरोसेमंद कथा-परंपरा अपनाएँ और व्रत का निर्णय सुरक्षित, स्थानीय और स्वैच्छिक रखें।
संबंधित पर्व और उपासना मार्गदर्शिकाएँ
द्वादशी पारण समय की गणना, स्मार्त बनाम वैष्णव दशमी-वेध नियमों और वर्ष की प्रमुख एकादशियों को विस्तार से समझने के लिए संबंधित लेख पढ़ें।
सामान्य प्रश्न
पाठकों के सामान्य प्रश्नों के संक्षिप्त उत्तर।
एक हिंदू चंद्र वर्ष में कुल कितनी एकादशी व्रत कथाएँ होती हैं?
सामान्य बारह चंद्र महीनों में शुक्ल और कृष्ण पक्ष की मिलाकर कुल 24 एकादशियाँ होती हैं। जिस वर्ष अधिक मास (मलमास/पुरुषोत्तम मास) आता है, उस वर्ष पद्मिनी और परमा नामक दो अतिरिक्त एकादशियों सहित कुल 26 एकादशी कथाएँ होती हैं।
उत्पन्ना एकादशी को सभी एकादशी व्रतों की मूल कथा क्यों माना जाता है?
पद्म पुराण के अनुसार मार्गशीर्ष कृष्ण एकादशी के दिन बदरीकाश्रम की हेमवती गुफा में मुर दैत्य का वध करने के लिए भगवान विष्णु की ग्यारह इंद्रियों से देवी एकादशी प्रकट हुई थीं। इसलिए नया एकादशी व्रत शुरू करने वाले भक्त अक्सर उत्पन्ना एकादशी से संकल्प लेते हैं।
उत्तर और दक्षिण/पश्चिम भारत के पंचांगों में कृष्ण पक्ष की एकादशी के महीने का नाम अलग क्यों दिखता है?
उत्तर भारत के पूर्णिमांत पंचांग में पूर्णिमा के बाद कृष्ण पक्ष से नया महीना शुरू होता है, जबकि अमांत पंचांग में अमावस्या के बाद शुक्ल पक्ष से। इसलिए उत्पन्ना एकादशी उत्तर में मार्गशीर्ष कृष्ण और अमांत पंचांग में कार्तिक कृष्ण कहलाती है, पर दोनों एक ही दिन पड़ती हैं।
एकादशी के दिन चावल और अनाज (अन्न) खाने की मनाही क्यों है?
पौराणिक व्रत-ग्रंथों में मान्यता है कि एकादशी के दिन अन्न और दालों में तामसिक या दोषपूर्ण सूक्ष्म प्रभाव रहता है; साथ ही आयुर्वेदिक दृष्टि से चंद्र-चक्र की ग्यारहवीं तिथि पर पाचन तंत्र को हल्का रखना और फलाहार/जलाहार लेना मन की एकाग्रता में सहायक माना गया है।
क्या एकादशी के दिन भगवान विष्णु की पूजा के लिए तुलसी के पत्ते तोड़े जा सकते हैं?
शास्त्रों में एकादशी, द्वादशी, रविवार और सूर्यास्त के बाद तुलसी के पत्ते तोड़ना वर्जित बताया गया है। इसलिए भक्त दशमी के दिन सूर्यास्त से पहले ही तुलसी-दल तोड़कर रख लेते हैं, अथवा पूजा-चौकी पर पहले से चढ़े या स्वतः गिरे तुलसी पत्तों को धोकर अर्पित करते हैं।
यदि काम या यात्रा के कारण द्वादशी के पारण मुहूर्त में भोजन करना संभव न हो तो क्या करें?
एकादशी पारण द्वादशी तिथि में सूर्योदय और हरिवासर के बाद तथा द्वादशी समाप्त होने से पहले करना आवश्यक होता है। यदि उस समय पूरा भोजन संभव न हो, तो पारण मुहूर्त के भीतर भगवान का स्मरण कर तुलसी-दल और शुद्ध जल ग्रहण करने से भी पारण की विधि पूरी हो जाती है।