निर्जला एकादशी (भीमसेनी एकादशी): ज्येष्ठ शुक्ल नियम, व्रत कथा और पारण विधि

ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी (निर्जला/भीमसेनी/पांडव एकादशी) की पद्म पुराण भीम-व्यास कथा, निर्जला व फलाहारी विकल्प, जलकुंभ दान और द्वादशी पारण नियम जानें।

ज्योतिष और हिंदू परंपरालेख · 11 मिनटRead in English ↗

संक्षिप्त उत्तर: निर्जला (भीमसेनी) एकादशी क्या है?

निर्जला एकादशी—जिसे ‘भीमसेनी एकादशी’ या ‘पांडव एकादशी’ भी कहा जाता है—ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी (मई–जून) को भीषण ग्रीष्म ऋतु में मनाई जाती है। पद्म पुराण (उत्तर खंड) के भीमसेन–महर्षि वेदव्यास संवाद पर आधारित इस व्रत की कठोर शास्त्रीय विधि में एकादशी के सूर्योदय से द्वादशी के पारण तक अन्न और जल दोनों का त्याग किया जाता है, जिससे वर्ष की चौबीसों एकादशियों के समतुल्य पुण्य कहा गया है। साथ ही, धर्मशास्त्र में स्वास्थ्य, गर्भावस्था, वृद्धावस्था, औषधि या लू के जोखिम को देखते हुए ‘सजल’ व ‘फलाहारी’ व्रत तथा प्याऊ और ‘जलकुंभ दान’ के करुणामय विकल्प भी दिए गए हैं।

  • ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी (वृषभ या मिथुन संक्रांति काल) को वर्ष के सबसे लंबे और तप्त दिनों में पड़ने वाली प्रमुख एकादशी।
  • उदर की तीव्र ‘वृकोदर’ जठराग्नि के कारण वर्ष की २४ एकादशियाँ न कर पाने वाले भीमसेन को महर्षि व्यास द्वारा बताया गया एकमात्र वार्षिक व्रत।
  • हरिवासर के बाद द्वादशी पारण के साथ शर्करोदक जलकुंभ (मीठे जल से भरा मिट्टी का घड़ा), खरबूजा, पंखा, छत्र और प्याऊ सेवा का विशेष महत्व।

पद्म पुराण का शास्त्रीय आधार: भीमसेन और महर्षि वेदव्यास का संवाद

निर्जला एकादशी का मूल शास्त्रीय आधार ‘पद्म पुराण’ के उत्तर खंड में वर्णित ‘निर्जला एकादशी माहात्म्य’ है। कथा के अनुसार जब युधिष्ठिर, अर्जुन, नकुल, सहदेव, माता कुंती और द्रौपदी वर्ष भर की प्रत्येक कृष्ण और शुक्ल पक्ष की एकादशियों (कुल २४, और अधिकमास होने पर २६) का निष्ठापूर्वक उपवास करते थे, तब महाबली भीमसेन ने व्याकुल होकर अपने पितामह महर्षि वेदव्यास से निवेदन किया। भीम ने कहा कि उनके उदर में ‘वृकोदर’ नामक अत्यंत तीव्र जठराग्नि प्रज्वलित रहती है, जो प्रचुर भोजन के बिना शांत नहीं होती; वे भगवान केशव की भक्ति तो करना चाहते हैं, किंतु प्रतिमाह दो बार उपवास करना उनके शरीर के लिए असंभव है। अतः उन्होंने व्यासजी से ऐसा कोई एक वार्षिक उपाय पूछा जिससे वे वर्ष भर की एकादशियों के आध्यात्मिक फल केभागी बन सकें।

महर्षि व्यास ने उत्तर दिया कि सूर्य के वृषभ या मिथुन राशि में रहते ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की जो एकादशी आती है, उसका अत्यंत विशिष्ट स्थान है। व्यासजी ने स्पष्ट किया कि जो साधक इस एक दिन एकादशी के सूर्योदय से द्वादशी के सूर्योदय (पारण काल) तक अन्न और जल का संयम रखता है, केवल शुद्धि के लिए विधिपूर्वक ‘आचमन’ करता है, ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ मंत्र से भगवान त्रिविक्रम/वासुदेव की अर्चना करता है, और द्वादशी को प्रातः जल से भरे घड़े (जलकुंभ) का दान करता है, उसे वर्ष की समस्त एकादशियों का पुण्य प्राप्त होता है। चूँकि पांडुपुत्र भीमसेन ने इस व्रत का निष्ठापूर्वक पालन किया, इसलिए यह तिथि पूरे भारत में ‘भीमसेनी एकादशी’ या ‘पांडव एकादशी’ के नाम से प्रसिद्ध हुई।

ज्येष्ठ शुक्ल निर्जला (भीमसेनी) एकादशी का दशमी से द्वादशी पारण तक का क्रम१. दशमी संध्या (दिन १०)संध्या नियम और शारीरिक तैयारीसूर्यास्त पूर्व सुपाच्य सात्त्विक भोजन और पर्याप्त जल-ग्रहण२. एकादशी प्रातः (दिन ११)ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी संकल्प और पूजनस्नान, आचमन, विष्णु-लक्ष्मी अर्चना और स्वास्थ्य-अनुकूल व्रत-विकल्प३. एकादशी मध्याह्न व रात्रिनाम-जप, कथा श्रवण और जल-सेवा‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ जप, भीम-व्यास कथा और प्याऊ/पक्षी-जल सेवा४. द्वादशी प्रातः (दिन १२)हरिवासर प्रतीक्षा और शर्करोदक जलकुंभ दानहरिवासर बीतने पर मिट्टी का घड़ा, शर्करा, खरबूजा व पंखा दान५. द्वादशी पारण कालक्रमिक जल-ग्रहण और सुरक्षित पारणपहले तुलसी-चरणामृत व सादा जल, फिर २० मिनट बाद हल्का सात्त्विक आहार
निर्जला एकादशी का त्रि-दिवसीय अनुष्ठान और स्वास्थ्य-संतुलन चक्र: दशमी की तैयारी, एकादशी की उपासना व जलदान, और द्वादशी का सुरक्षित पारण।

धर्मशास्त्र के चार उपासना-विकल्प, शर्करोदक जलकुंभ दान और द्वादशी पारण गणित

हिंदू धर्मशास्त्र और आयुर्वेद का मूल सिद्धांत है—‘शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्’ (शरीर ही धर्म के पालन का प्रथम साधन है) तथा ‘आपद्धर्म’ की करुणामयी व्यवस्था। ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी मई–जून के उस तप्त काल में आती है जब उत्तर, मध्य और पश्चिम भारत में तापमान ४० से ४५ डिग्री सेल्सियस से ऊपर रहता है। इसलिए शास्त्र और कुल-परंपराएँ सभी व्यक्तियों पर बिना जल के उपवास थोपने के बजाय क्षमता और स्वास्थ्य के अनुसार चार स्तर स्वीकार करती हैं: (१) ‘निर्जला व्रत’ (केवल पूर्ण स्वस्थ और अभ्यस्त वयस्कों के लिए, जो धूप और श्रम से बचते हुए एकादशी सूर्योदय से द्वादशी पारण तक अन्न-जल त्यागते हैं), (२) ‘सजल / जलाहार व्रत’ (अन्न और ठोस आहार का त्याग कर जल, नींबू-पानी या नारियल पानी लेते हुए उपवास), (३) ‘फलाहारी व्रत’ (जल, दूध, छाछ और मौसमी फलों के साथ अनाज-रहित व्रत), और (४) ‘मानसिक जप व जलदान उपासना’ (गर्भवती व स्तनपान कराने वाली महिलाओं, बच्चों, वृद्धों, तथा मधुमेह, रक्तचाप, गुर्दे या हृदय की दवा लेने वाले व्यक्तियों के लिए नियमित भोजन व औषधि लेते हुए विष्णु सहस्रनाम पाठ और जलदान करना)।

भोजन का नियम चाहे जो भी चुना जाए, निर्जला एकादशी का सबसे बड़ा लोक-धर्म ‘जलदान’ है। ज्येष्ठ की तपती दुपहरी में राहगीरों और श्रमिकों के लिए शीतल जल या मीठे शरबत की ‘प्याऊ’ (छबील) लगाना, पशुओं की खेल (हौद) भरना, पक्षियों के लिए छत व वृक्षों पर मिट्टी के सकोरे रखना, और द्वादशी को ‘शर्करोदक कुंभ दान’ (ठंडे जल, शर्करा/गुड़, सफेद वस्त्र, खरबूजे/आम, हाथ के पंखे और छत्र सहित मिट्टी के घड़े का दान) करना इस पर्व की आत्मा है। आपके शहर में स्मार्त और वैष्णव एकादशी एक ही दिन है या दो अलग तारीखों पर, यह समझने के लिए हमारी स्मार्त और वैष्णव एकादशी का अंतर मार्गदर्शिका देखें, और द्वादशी के पारण व हरिवासर की सटीक गणना के लिए एकादशी पारण समय और हरिवासर नियम तथा पंचांग में तिथि और कैलेंडर तारीख का संबंध पढ़ें।

निर्जला एकादशी को सुरक्षित और शास्त्रसम्मत रूप से मनाने के चार व्यावहारिक स्तर
व्रत का स्तरकिनके लिए उपयुक्त हैआहार और जल का नियमप्रमुख उपासना और सेवा कर्म
१. शास्त्रीय निर्जला व्रतपूर्ण स्वस्थ और उपवास के अभ्यस्त वयस्क जो शीतल/छायादार स्थान में रहते होंएकादशी सूर्योदय से द्वादशी पारण तक अन्न और पेयजल का त्याग (केवल पूजा में शास्त्रीय आचमन)मानसिक नाम-जप, धूप से बचाव, और द्वादशी पर धीरे-धीरे जल से पारण।
२. सजल / जलाहार व्रतगर्मी में कार्यरत स्वस्थ वयस्क जिन्हें निर्जलीकरण (डिहाइड्रेशन) से बचना होअनाज और ठोस भोजन का त्याग; सादा जल, नींबू-जल या नारियल पानी का सेवनविष्णु-लक्ष्मी पूजन, भीम-व्यास कथा श्रवण और लू से पूर्ण सुरक्षा।
३. फलाहारी व्रतवरिष्ठ नागरिक, विद्यार्थी, गृहकार्य में संलग्नजन या एसिडिटी/माइग्रेन से प्रभावित लोगमौसमी फल (आम, खरबूजा, केला), दूध, दही/छाछ और पर्याप्त जल; अन्न का त्यागशारीरिक संतुलन बनाए रखते हुए एकादशी के सात्त्विक संयम का पालन।
४. नाम-जप एवं जलदान (चिकित्सीय छूट)गर्भवती/धात्री महिलाएँ, बच्चे, वृद्ध और नियमित दवा लेने वाले रोगीनियमित पौष्टिक भोजन, समय पर दवा और दिन भर पर्याप्त जल‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ जप, प्याऊ सेवा और जलकुंभ व फल का दान।
निर्जला एकादशी पर किए जाने वाले पारंपरिक ग्रीष्मकालीन दान और उनका महत्व
दान की वस्तु (शास्त्रीय / लोक नाम)अर्पण की पारंपरिक विधिज्येष्ठ मास में व्यावहारिक उपयोगिताशास्त्रीय और मानवीय भाव
शर्करोदक जलकुंभ (मिट्टी का घड़ा)नए मटके या सुराही में शीतल जल भरकर, सफेद वस्त्र बाँधकर ऊपर शर्करा/गुड़ और फल रखनाग्रीष्म की भीषण गर्मी में प्राकृतिक रूप से ठंडा पेयजल उपलब्ध करानापद्म पुराण में ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी का सर्वोच्च पुण्यदायी दान कहा गया है।
प्याऊ / छबील सेवाराहगीरों, मजदूरों और यात्रियों को ठंडा जल, सत्तू, छाछ या गुलाब-शरबत पिलानाधूप में चलने वाले श्रमजीवियों को लू और निर्जलीकरण से बचानाग्रीष्म ऋतु में अन्नदान से भी बढ़कर प्राणरक्षक ‘जलदान’ की महिमा।
ऋतुफल (खरबूजा और आम)जलकुंभ के ऊपर रसीला खरबूजा, तरबूज या पका आम रखकर दान करनाशरीर में जल और खनिज लवण (इलेक्ट्रोलाइट्स) की तुरंत पूर्ति करनानई ग्रीष्मकालीन फसल का प्रथम भाग भगवान और समाज को अर्पित करना।
व्यजन (पंखा), छत्र और पादुकाबांस/ताड़ का पंखा, छाता, सूती वस्त्र और जूते-चप्पल जरूरतमंदों को देनातपती धरती और सीधी धूप से सिर व पैरों की रक्षा करनाअन्य प्राणियों के शारीरिक संताप को कम करने की वैष्णव करुणा।
गो-जल एवं पक्षी-सकोरागायों व पशुओं की हौद में पानी भरना और पक्षियों के लिए छाया में मिट्टी के पात्र रखनामानसून से पूर्व सूखते जलस्रोतों के समय मूक प्राणियों के प्राण बचाना‘भूत-दया’ और सर्वभूतेषु नारायण के दर्शन का प्रत्यक्ष आचरण।

“निर्जला” का अर्थ और परंपरा में भिन्नता

निर्जला का शाब्दिक संकेत पानी के बिना होने से है। कई पंचांगों में कठोर विधि में व्रत-अवधि के दौरान भोजन और पानी दोनों का त्याग बताया जाता है और अगले दिन द्वादशी पर पारण होता है। दूसरे परिवार अपनी परंपरा के अनुसार फलाहार, अनुमत भोजन या पानी सहित एकादशी-व्रत रखते हैं। व्रत कब शुरू और समाप्त हो, यह उसी परिवार, मंदिर या वैष्णव नियम से लें।

इंटरनेट की एक भोजन-सूची को सबके लिए अनिवार्य न मानें। बिना पानी का व्रत सुरक्षित न हो तो किसी को शर्मिंदा न करें या यह न कहें कि उसके बदले हुए पालन में भक्ति नहीं। परिवार या मंदिर से उपयुक्त विकल्प पूछें; चुनाव स्वैच्छिक रहना चाहिए।

पूजा, प्रार्थना और पालन के दूसरे तरीके

सरल पालन में विष्णु-स्मरण, भीम-कथा का पाठ या श्रवण, परिचित प्रार्थना, मंदिर-दर्शन या अपनी क्षमता के अनुसार दान शामिल हो सकता है। कोई व्यक्ति दूसरों को पानी, भोजन या सहायता दे सकता है और स्वयं अपनी चुनी रीति अपना सकता है। समुदायों में पूजा और भेंट अलग-अलग हैं।

  1. स्थानीय एकादशी तारीख़ और द्वादशी पारण देखें।
  2. अपनी परंपरा और स्वास्थ्य के अनुसार व्रत चुनें।
  3. उपवास को भक्ति की परीक्षा बनाए बिना प्रार्थना, कथा या सेवा करें।
  4. निर्धारित दवा और दैनिक देखभाल जारी रखें।
  5. जिस पंचांग से व्रत शुरू किया, उसी के अनुसार समाप्त करें।

सच्ची भक्ति के लिए महँगी भेंट या कठिनाई का सार्वजनिक प्रदर्शन आवश्यक नहीं।

व्रत से पहले स्वास्थ्य का ध्यान

तरल न लेने से निर्जलीकरण हो सकता है; गर्मी, शारीरिक मेहनत, बीमारी और कुछ दवाएँ जोखिम बढ़ा सकती हैं। गर्भवती या स्तनपान कराने वाले लोग, बच्चे, वृद्धजन, स्वास्थ्य समस्या वाले या नियमित दवा लेने वाले व्यक्ति—विशेषकर बिना पानी के व्रत से पहले—योग्य चिकित्सक से सलाह लें। यह लेख किसी व्यक्ति के लिए उपवास सुरक्षित है या नहीं, तय नहीं कर सकता।

निर्जला व्रत उपयुक्त न हो तो प्रार्थना, कथा-श्रवण, दान या परिवार/मंदिर द्वारा स्वीकार कोई दूसरा विकल्प चुनें। दवा बंद न करें, चिकित्सकीय सलाह के विरुद्ध पानी न रोकें और किसी पर व्रत का दबाव न डालें। स्वास्थ्य कारण से व्रत बदलना या न रखना उचित है।

भारत और विदेश में पालन

निर्जला एकादशी विष्णु-भक्तों में प्रचलित है, पर पंचांग मास-नाम, व्रत-दिन या पारण में अलग हो सकते हैं। वैष्णव समुदाय अपना कैलेंडर दे सकता है। इसका अर्थ यह नहीं कि हर परिवार सबसे कठोर नियम अपनाए; अपनी मिली परंपरा के अनुसार चलें और तारीख़ साझा करते समय उसका उल्लेख करें।

भारत से बाहर रहते हों तो वास्तविक शहर का पंचांग चुनें। स्थानीय सूर्योदय और समय-क्षेत्र से अंग्रेज़ी दिन और पारण बदलते हैं। मंदिर सप्ताहांत में कथा या भोजन रख सकता है, जो चंद्र तिथि से अलग हो। सालाना समय प्रकाशित करते हुए वर्ष, शहर और कैलेंडर-पद्धति लिखें; उसे सदाबहार तारीख़ न मानें।

आम गलतफहमियाँ

  • “सबको पानी के बिना व्रत रखना चाहिए।” व्रत वैकल्पिक है और स्वास्थ्य का ध्यान पहले है।
  • “तारीख़ हर वर्ष समान होती है।” यह चंद्र तिथि है; अंग्रेज़ी तारीख़ बदलती है।
  • “भीम की कथा चिकित्सा-सलाह है।” यह भक्ति-कथा है, स्वास्थ्य-निर्देश नहीं।
  • “बदली हुई रीति अनादर है।” परिवार और समुदाय अलग प्रकार के व्रत रखते हैं।
  • “पारण समय हर शहर में समान है।” स्थानीय पंचांग और अपनी परंपरा अपनाएँ।

दिन को विश्वसनीय स्थानीय पंचांग, स्वेच्छा से चुने सुरक्षित पालन और स्वास्थ्य के सम्मान के साथ मनाएँ।

संबंधित पर्व और उपासना मार्गदर्शिकाएँ

द्वादशी पारण के शुभ समय, स्मार्त और वैष्णव एकादशी के भेद तथा हिंदू पंचांग की तिथि-गणना को समझने के लिए नीचे दिए गए लेख पढ़ें।

सामान्य प्रश्न

पाठकों के सामान्य प्रश्नों के संक्षिप्त उत्तर।

निर्जला एकादशी को ‘भीमसेनी एकादशी’ या ‘पांडव एकादशी’ क्यों कहा जाता है?

पद्म पुराण के अनुसार पांडुपुत्र भीमसेन के उदर में ‘वृकोदर’ नामक तीव्र अग्नि होने के कारण वे वर्ष की २४ एकादशियों का उपवास नहीं कर पाते थे; महर्षि वेदव्यास की आज्ञा से उन्होंने ज्येष्ठ शुक्ल की इस एक एकादशी का व्रत रखा, जिससे इसका नाम भीमसेनी एकादशी पड़ा।

क्या पूजा के समय ‘आचमन’ करने से निर्जला व्रत खंडित हो जाता है?

नहीं। धर्मशास्त्र के श्लोक स्पष्ट करते हैं कि पूजा और शुद्धि के लिए विधिपूर्वक आचमन में ग्रहण किया गया राई या माष के दाने जितना सूक्ष्म जल निर्जला व्रत को भंग नहीं करता।

यदि भीषण गर्मी या स्वास्थ्य के कारण बिना पानी के रहना संभव न हो तो निर्जला एकादशी कैसे मनाएँ?

धर्मशास्त्र में स्वास्थ्य-रक्षा को सर्वोपरि माना गया है; जो लोग निर्जल नहीं रह सकते, वे जल पीकर (‘सजल’), दूध व फल लेकर (‘फलाहारी’), अथवा अपनी नियमित दवा और भोजन लेते हुए नाम-जप और जलदान के माध्यम से यह पर्व मना सकते हैं।

द्वादशी के दिन निर्जला एकादशी का पारण करते समय किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?

द्वादशी की सुबह ‘हरिवासर’ समाप्त होने के बाद पारण काल में सबसे पहले तुलसी-चरणामृत और सामान्य तापमान का सादा जल धीरे-धीरे पीना चाहिए; १५–२० मिनट बाद हल्का और सुपाच्य सात्त्विक भोजन लें, एक साथ भारी या तला हुआ भोजन न करें।

निर्जला एकादशी पर ‘शर्करोदक जलकुंभ दान’ क्या होता है?

द्वादशी को पारण से पूर्व मिट्टी के नए घड़े (मटके) में स्वच्छ जल भरकर, उस पर सफेद वस्त्र बाँधकर तथा ऊपर शर्करा (चीनी/मिश्री या गुड़), दक्षिणा और खरबूजा या आम रखकर किसी जरूरतमंद या आचार्य को दान करने को शर्करोदक कुंभ दान कहते हैं।

निर्जला एकादशी हमेशा वर्ष के सबसे गर्म समय में ही क्यों पड़ती है?

यह ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी है, जब सूर्य वृषभ या मिथुन राशि में ग्रीष्म अयनांत के निकट होता है; इसी तप्त ऋतु के कारण इसमें व्यक्तिगत संयम के साथ-साथ प्याऊ और जलदान को सर्वोच्च धर्म माना गया है।

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