दशहरा (विजयदशमी): आश्विन शुक्ल दशमी, अपराजिता व शमी पूजा और क्षेत्रीय परंपराएँ

आश्विन शुक्ल दशमी पर अपराह्न काल और विजय मुहूर्त का नियम, शमी व अपराजिता पूजन, आयुध पूजा, रामलीला तथा मैसूर, कुल्लू और बस्तर दशहरे की परंपराएँ जानें।

ज्योतिष और हिंदू परंपरालेख · 11 मिनटRead in English ↗

संक्षिप्त उत्तर: दशहरा (विजयदशमी) क्या है और यह कब मनाया जाता है?

दशहरा—जिसे शास्त्रों में ‘विजयदशमी’ कहा गया है—शारदीय नवरात्रि के समापन के बाद आश्विन शुक्ल दशमी को मनाया जाता है। पंचांग में इसका निर्णय ‘अपराह्न काल’ और ‘विजय मुहूर्त’ के आधार पर होता है। यह महापर्व दो महान आख्यानों को जोड़ता है: नौ दिनों की शक्ति-साधना के पश्चात् श्रीराम की रावण पर धर्म-विजय, और देवी दुर्गा द्वारा महिषासुर मर्दन के बाद दशमी विसर्जन। पूरे भारत में यह अपराजिता व शमी पूजन, सीमोल्लंघन, आयुध पूजा, विद्यारंभम, रामलीला तथा मैसूर, कुल्लू और बस्तर के विशिष्ट उत्सवों के रूप में मनाया जाता है।

  • पंचांग निर्णय में पंचधा दिनमान के चौथे भाग ‘अपराह्न काल’ में व्याप्त दशमी तिथि और ‘श्रवण नक्षत्र’ के संयोग को प्राथमिकता दी जाती है।
  • शास्त्रीय विधान में अपराजिता देवी पूजन, ईशान कोण में शमी/अश्मंतक (आपटा) वृक्ष पूजा और सीमोल्लंघन प्रमुख हैं।
  • क्षेत्रीय विविधता में उत्तर भारत का रावण-दहन, मैसूर की चामुंडेश्वरी जंबू सवारी, कुल्लू की रघुनाथजी रथयात्रा और बस्तर का ७५-दिवसीय दंतेश्वरी पर्व शामिल हैं।

पंचांग निर्णय: अपराह्न काल, विजय मुहूर्त और श्रवण नक्षत्र का शास्त्रीय नियम

निर्णयसिंधु और धर्मसिंधु जैसे प्रामाणिक धर्मशास्त्रीय ग्रंथों में विजयदशमी की तिथि तय करने के लिए केवल सूर्योदय की उदयातिथि नहीं देखी जाती। सूर्योदय से सूर्यास्त तक के दिनमान को पाँच बराबर भागों (प्रातः, संगव, मध्याह्न, अपराह्न और सायाह्न) में बाँटने पर चौथा भाग ‘अपराह्न काल’ कहलाता है। विजयदशमी के मुख्य शास्त्रीय कृत्य—अपराजिता पूजन, शमी पूजन और सीमोल्लंघन—अपराह्न काल में ही विहित हैं, इसलिए जिस दिन अपराह्न में आश्विन शुक्ल दशमी व्याप्त हो, वही दिन मुख्य पर्व माना जाता है। यदि दशमी तिथि के साथ ‘श्रवण नक्षत्र’ का संयोग बन जाए, तो वह अत्यंत मंगलकारी और सिद्धिदायक कहलाता है। चंद्र तिथि और घड़ी की तारीख के अंतर को विस्तार से समझने के लिए हमारी हिंदू पंचांग में तिथि और कैलेंडर तारीख का अंतर मार्गदर्शिका देखें।

दिन के पंद्रह मुहूर्तों में ग्यारहवाँ मुहूर्त ‘विजय मुहूर्त’ कहलाता है, जो अपराह्न काल के भीतर आता है। ज्योतिष और मुहूर्त ग्रंथों में विजयदशमी को वर्ष के साढ़े तीन या प्रमुख ‘अबूझ मुहूर्तों’ में गिना गया है, जिसमें बिना किसी जटिल पंचांग-शोधन के नया व्यवसाय, यात्रा, शस्त्र/उपकरण पूजन और बच्चों का अक्षरारंभ (‘विद्यारंभम’) किया जा सकता है। यही खगोलीय समय-सीमा पूरे भारत में शारदीय नवरात्रि के समापन को एक सूत्र में पिरोती है।

आश्विन शुक्ल दशमी (विजयदशमी) का पंचांगीय और अनुष्ठानिक क्रम१. प्रातःकालीन विधिनवमी हवन समापन अथवा दशमी दर्पण विसर्जनसरस्वती ‘पूजा एडुप्पु’ और बच्चों का ‘विद्यारंभम’ संस्कार२. अपराह्न व विजय मुहूर्तदिनमान का चौथा भाग (अपराह्न कर्मकाल)अपराजिता देवी पूजन और ईशान कोण में शमी/आपटा वृक्ष पूजा३. सायंकाल / प्रदोष पूर्वसीमोल्लंघन (प्रतीकात्मक सीमा-पार गमन)उत्तर भारत में रामलीला रावण-दहन या मैसूर की जंबू सवारी४. संध्या मिलन और विसर्जनपूर्वी भारत में दुर्गा प्रतिमा विसर्जन व सिंदूर खेलाशमी-पत्र (‘सोना’) का आदान-प्रदान, बिजोया प्रणाम और आशीर्वाद
प्रातःकालीन विद्यारंभम और दर्पण विसर्जन से लेकर अपराह्न शमी-पूजा तथा सायंकालीन रावण-दहन और प्रतिमा विसर्जन तक विजयदशमी का क्रम।

शमी व अपराजिता पूजन, आयुध पूजा और भारत के विविध क्षेत्रीय दशहरा उत्सव

रामलीला और प्रतिमा विसर्जन के सार्वजनिक आयोजनों के साथ-साथ शास्त्रीय विजयदशमी के केंद्र में तीन गहन पारंपरिक अनुष्ठान हैं: अपराजिता पूजा, शमी पूजा और आयुध पूजा। अपराह्न काल में साधक अष्टदल कमल पर जया और विजया सहित देवी ‘अपराजिता’ का पूजन करते हैं और कलाई पर श्वेत अपराजिता लता बाँधते हैं। इसके पश्चात् गाँव या नगर के ईशान कोण (उत्तर-पूर्व) में जाकर ‘शमी वृक्ष’ (या अश्मंतक/आपटा वृक्ष) की पूजा की जाती है। महाभारत के विराट पर्व के अनुसार पांडवों ने अपने एक वर्ष के अज्ञातवास के दौरान गांडीव सहित अपने दिव्य अस्त्र-शस्त्र इसी शमी वृक्ष के कोटर में छिपाए थे और विजयदशमी के दिन ही उन्हें उतारकर गो-हरण युद्ध में विजय पाई थी। दूसरी कथा कालिदास के रघुवंश और पुराणों के कौत्स-रघु संवाद की है, जब गुरुदक्षिणा के लिए राजा रघु के संकल्प से प्रसन्न होकर कुबेर ने अयोध्या के अश्मंतक/शमी वृक्षों पर स्वर्ण-मुद्राओं की वर्षा की थी। इसी स्मृति में महाराष्ट्र, कर्नाटक और मध्य भारत में लोग आज भी आपटा/शमी की पत्तियाँ ‘सोना’ कहकर एक-दूसरे को भेंट करते हैं।

इसी प्रकार ‘आयुध पूजा’ और ‘विद्यारंभम’ में आजीविका के प्रत्येक साधन—पुस्तक, लेखनी, वाद्ययंत्र, कृषि-हल, कारीगरी के औज़ार और वाहन—को विश्वकर्मा तथा लक्ष्मी-सरस्वती का प्रसाद मानकर स्वच्छ किया जाता है और हल्दी-कुमकुम व पुष्प अर्पित किए जाते हैं। बंगाल के दुर्गा पूजा विसर्जन और सिंदूर खेला से लेकर मैसूर, कुल्लू और बस्तर तक की परंपराओं की तुलना से स्पष्ट होता है कि विजयदशमी केवल एक रूप में सीमित नहीं है।

भारत के प्रमुख क्षेत्रों में दशहरा, दसरा और विजयदशमी की विविध परंपराएँ
क्षेत्र और पर्व का नामकेंद्रीय आराध्य या आख्यानउत्सव की अवधिप्रमुख सार्वजनिक और पारिवारिक रीतियाँ
उत्तर भारत (दशहरा / रामलीला)श्रीराम की रावण पर विजय (रामचरितमानस / वाल्मीकि रामायण)१० दिन (प्रतिपदा से दशमी सायंकाल)मंचित रामलीला, सूर्यास्त के समय रावण, कुंभकर्ण व मेघनाद के पुतलों का दहन और नीलकंठ पक्षी का दर्शन।
मैसूर, कर्नाटक (नाड हब्बा दसरा)देवी चामुंडेश्वरी द्वारा महिषासुर का संहार१० दिन (विजयदशमी को शिखर आयोजन)दीपों से सुसज्जित मैसूर महल, बोम्बे हब्बा गुड़िया सज्जा, आयुध पूजा और स्वर्ण हौदे वाली भव्य ‘जंबू सवारी’।
कुल्लू घाटी, हिमाचल प्रदेशभगवान रघुनाथजी (श्रीराम) और २००+ ग्राम देवता७ दिन (विजयदशमी से आश्विन पूर्णिमा तक)विजयदशमी से ही उत्सव का आरंभ; ढालपुर मैदान में देव-पालकियों का मिलन; रावण का पुतला नहीं जलता, अंत में व्यास तट पर लंकादहन।
बस्तर, छत्तीसगढ़ (बस्तर दशहरा)माँ दंतेश्वरी और स्थानीय वनवासी मातृ-शक्तियाँ७५ दिन (श्रावण हरियाली अमावस्या से आश्विन शुक्ल त्रयोदशी)विश्व का सबसे लंबा दशहरा: पाट जात्रा, काछन गादी, जोगी बिठाई और विशाल काष्ठ-रथ की परिक्रमा; रावण-वध से असंबंधित।
महाराष्ट्र और गोवा (दसरा / सीमोल्लंघन)देवी भवानी, खंडोबा और शमी/आपटा वृक्ष पूजन९ दिन घटस्थापना तथा दशमीद्वार व उपकरणों पर गेंदे के तोरण, सीमोल्लंघन, सरस्वती/शस्त्र पूजन और आपटा की पत्तियों का ‘सोना’ के रूप में आदान-प्रदान।
बंगाल, असम व ओडिशा (बिजोया दशमी)महिषासुरमर्दिनी दुर्गा (उमा) की कैलाश वापसीषष्ठी से दशमी (५ मुख्य दिन)दर्पण विसर्जन, देवी बरण, सिंदूर खेला, जल-विसर्जन, कोलाकुली आलिंगन और बड़ों को प्रणाम।
केरल व तमिलनाडु (विद्यारंभम)ज्ञान और कला की अधिष्ठात्री देवी महासरस्वतीदुर्गाष्टमी संध्या से विजयदशमी प्रातः‘पूजा एडुप्पु’ (पुस्तकों व वाद्यों का पुनः ग्रहण) और बच्चों द्वारा चावल पर ‘हरि श्री गणपतये नमः’ लिखकर अक्षरारंभ।
विजयदशमी के पाँच शास्त्रीय संस्कार-कर्म और उनका आध्यात्मिक उद्देश्य
शास्त्रीय कर्म का नामविहित काल / मुहूर्तमुख्य पूजा-विधिधर्मशास्त्रीय और व्यावहारिक भाव
अपराजिता पूजनअपराह्न काल (दोपहर बाद)जया-विजया सहित देवी अपराजिता की पूजा और श्वेत अपराजिता सूत्र धारणसत्कर्मों में अजेय धैर्य, आत्मबल और रक्षा की प्रार्थना।
शमी / अश्मंतक पूजनअपराह्न काल या विजय मुहूर्तईशान कोण में ‘शमी शमयते पापम्...’ मंत्र से शमी वृक्ष व मूल मृत्तिका का पूजनपाप व अमंगल का शमन तथा पांडवों के अस्त्र-रक्षण और रघु-कौत्स के त्याग का स्मरण।
सीमोल्लंघनअपराह्न से सूर्यास्त पूर्वग्राम या नगर की उत्तर-पूर्वी सीमा के बाहर प्रतीकात्मक प्रस्थानसंकीर्ण सीमाओं से ऊपर उठकर उद्यम और ज्ञान के नए क्षेत्रों में प्रवेश।
आयुध / शस्त्र पूजामहानवमी या दशमी प्रातःपुस्तक, औज़ार, वाद्य, कृषि-यंत्र व वाहन का चंदन-कुमकुम व पुष्प से पूजनआजीविका के साधनों के प्रति कृतज्ञता और उनके सात्त्विक उपयोग का संकल्प।
विद्यारंभम / अक्षराभ्यासविजयदशमी प्रातः (विशेषतः श्रवण नक्षत्र)धान या चावल की थाली में शिशु की अँगुली से प्रथम अक्षर लिखवानामाँ सरस्वती की कृपा से आजीवन स्वाध्याय और विद्या-साधना का शुभारंभ।

राम और रावण की कथा

रामलीला की अनेक परंपराएँ रामायण के प्रसंग सुनाती हैं और राम की रावण पर विजय के साथ चरम पर पहुँचती हैं। दशहरे पर सार्वजनिक नाटक के अंत में पुतला-दहन हो सकता है, जिसके बाद परिवार मिलते या स्थानीय मेला देखते हैं। प्रस्तुति के अनुसार यह कथा साहस, कर्तव्य, विवेक और गलत चुनाव के परिणामों पर सोचने का अवसर देती है।

रामायण के कई रूप हैं और मंचन अलग कथनों से प्रसंग चुन सकते हैं। स्थानीय रामलीला किस संस्करण का अनुसरण करती है, यह बताना अधिक सटीक है; हर समुदाय एक दृश्य या पात्र को एक जैसा नहीं समझता। पुतला-दहन अनेक स्थानों की सार्वजनिक रीति है, हर हिंदू घर का अनिवार्य कर्म नहीं।

बड़े आयोजन में अग्नि-सुरक्षा घेरे का पालन करें, बच्चों को वयस्क के साथ रखें और भीड़-सूचना मानें। घर पर पुतला बनाए या जलाए बिना पाठ, नाटक या बातचीत से कथा याद की जा सकती है।

दुर्गा, महिषासुर और बंगाल की विदाई

विजयादशमी की दूसरी प्रमुख परंपरा देवी दुर्गा की महिषासुर पर विजय से जुड़ी है। बंगाल और अनेक बंगाली समुदायों में दशमी दुर्गा पूजा की विदाई का दिन है: भक्त अंतिम प्रार्थना करते हैं, देवी को विदा कहते हैं और प्रतिमा-विसर्जन में साथ जा सकते हैं। बिजोया की शुभकामना, भेंट और मिठाई परिवार तथा पड़ोस में उत्सव को आगे बढ़ाती है।

यह राम और रावण के युद्ध से अलग कथा है, भले ही अनेक पंचांगों में दोनों परंपराएँ एक ही पर्व-दिन पर आती हों। जहाँ नवरात्रि और रामलीला दोनों होते हैं, कार्यक्रम साथ चल सकते हैं। सम्मानजनक जानकारी दोनों कथाओं को अलग पहचानती है; एक को दूसरी की क्षेत्रीय सजावट नहीं कहती।

बंगाल के पूरे क्रम के लिए दुर्गा पूजा की मार्गदर्शिका और शरद ऋतु के व्यापक पर्व के लिए शारदीय नवरात्रि का परिचय पढ़ें।

विजय और पर्व का भाव

दशहरे को अक्सर “अच्छाई की बुराई पर जीत” के रूप में समझाया जाता है। यह सार आसानी से याद रहता है, पर असली लोगों या समुदायों को बुरा ठहराने में इसका उपयोग नुकसानदेह हो सकता है। पवित्र कथाओं में विजय साहस, रक्षा, नैतिक स्पष्टता या संतुलन लौटने का प्रतीक है। परिवार इन मूल्यों पर बात कर सकते हैं, बिना किसी को लज्जित या आहत करने को पर्व का संदेश बनाए।

कुछ घर इस समय आयुध पूजा करते हैं या औज़ार, पुस्तक, वाहन अथवा वाद्य का पूजन करते हैं; दक्षिण भारत के कुछ भागों में यह रीति विशेष है। इससे काम और विद्या के प्रति आदर जताया जाता है, लेकिन क्या पूजें और किस दिन, यह अलग हो सकता है। चाकू, मशीन, वाहन और दीप के पास सुरक्षा रखें।

व्यक्तिगत संकल्प पूजा के साथ जोड़ सकते हैं: उचित हो तो संबंध सुधारें, नया कौशल सीखें, सहायता करने वाले को धन्यवाद दें या अधिकार का न्यायपूर्ण उपयोग करें।

सम्मानपूर्वक भाग लेने का तरीका

  1. स्थानीय पंचांग या आयोजक से दशमी की तारीख़ और कार्यक्रम देखें।
  2. अपनी परिस्थिति के अनुसार मंदिर, रामलीला, शोभायात्रा, घर की पूजा या शांत चिंतन चुनें।
  3. दूसरों को बताने से पहले जानें कि आयोजन किस क्षेत्रीय कथा पर आधारित है।
  4. सार्वजनिक कार्यक्रम में भीड़, अग्नि, तस्वीर और विसर्जन के नियम मानें।
  5. दूसरी रीति मानने वाले या सार्वजनिक उत्सव में न आने वाले लोगों का सम्मान करें।
  6. सुरक्षित रूप से कृतज्ञता, सीख या सेवा का एक काम करें।

सार्वजनिक आयोजन में भीड़ और सड़क-बंदी हो सकती है। आने-जाने व सुविधाओं की जानकारी पहले लें, जरूरत हो तो पानी साथ रखें और बच्चों पर नज़र रखें। आगंतुक हों तो पूजा-स्थान में स्थानीय लोगों को आगे रहने दें।

किन गलतियों से बचें

  • कहना कि हर दशहरा राम की रावण पर विजय ही मनाता है।
  • मानना कि हर जगह पुतला-दहन या एक ही रामलीला होती है।
  • बस्तर दशहरा को रावण का पर्व बताना।
  • दशहरा, दशरा और विजयादशमी के स्थानीय अर्थ बताए बिना अदल-बदल कर उपयोग करना।
  • मानना कि अंग्रेज़ी तारीख़ और कार्यक्रम हर शहर में एक हैं।
  • “अच्छाई-बुराई” की भाषा से असली समूहों को दोष देना या असुरक्षित व्यवहार सही ठहराना।

अच्छा परिचय साझा पंचांग-काल और अलग स्थानीय कथाओं दोनों को समझाता है। तिथि या पूजा का प्रश्न हो तो वही समुदाय बताता है जिसकी रीति है।

संबंधित पर्व और उपासना मार्गदर्शिकाएँ

बंगाल व पूर्वी भारत की दुर्गा पूजा विधि, चारों मौसमी नवरात्रि चक्रों और पंचांग की तिथि-गणना को समझने के लिए नीचे दी गई मार्गदर्शिकाएँ देखें।

सामान्य प्रश्न

पाठकों के सामान्य प्रश्नों के संक्षिप्त उत्तर।

विजयदशमी की तिथि तय करने में सूर्योदय के बजाय ‘अपराह्न काल’ को क्यों देखा जाता है?

निर्णयसिंधु और धर्मसिंधु के अनुसार विजयदशमी के मुख्य शास्त्रीय अनुष्ठान—अपराजिता पूजा, शमी पूजा और सीमोल्लंघन—दिन के चौथे भाग ‘अपराह्न काल’ में किए जाते हैं, इसलिए जिस दिन अपराह्न में दशमी तिथि व्याप्त हो, वही दिन मान्य होता है।

दशहरे पर ‘विजय मुहूर्त’ कब होता है और इसे ‘अबूझ मुहूर्त’ क्यों कहते हैं?

दिनमान के १५ मुहूर्तों में ग्यारहवाँ मुहूर्त ‘विजय मुहूर्त’ कहलाता है जो दोपहर बाद अपराह्न में आता है। विजयदशमी को स्वयंसिद्ध अबूझ मुहूर्त माना जाता है, जिसमें नया कार्य, विद्यारंभ या यात्रा बिना किसी अतिरिक्त पंचांग-दोष विचार के शुरू की जा सकती है।

दशहरे पर शमी या आपटा वृक्ष की पूजा क्यों होती है और उसकी पत्तियाँ ‘सोना’ कहकर क्यों बाँटी जाती हैं?

महाभारत में पांडवों ने अज्ञातवास के समय अपने दिव्य अस्त्र शमी वृक्ष में छिपाए थे और विजयदशमी को ही उन्हें वापस लिया था; वहीं रघुवंश की कथा में राजा रघु और शिष्य कौत्स के प्रसंग में कुबेर ने अश्मंतक/आपटा वृक्ष पर स्वर्ण-वृष्टि की थी।

कुल्लू दशहरा और बस्तर दशहरा उत्तर भारत के रामलीला दशहरे से कैसे भिन्न हैं?

उत्तर भारत में दशमी की संध्या को रावण-दहन के साथ पर्व पूर्ण होता है, जबकि कुल्लू दशहरा विजयदशमी के दिन से शुरू होकर सात दिनों तक भगवान रघुनाथजी और २०० से अधिक पहाड़ी देवताओं के मिलन के रूप में चलता है; और बस्तर दशहरा ७५ दिनों तक माँ दंतेश्वरी की आराधना करता है जिसमें रावण-दहन नहीं होता।

शमी पूजन के समय कौन-सा पारंपरिक संस्कृत श्लोक बोला जाता है?

शमी पूजन का प्रसिद्ध मंत्र है—‘शमी शमयते पापं शमी शत्रुविनाशिनी। अर्जुनस्य धनुर्धारी रामस्य प्रियदर्शिनी॥’—जिसमें अर्जुन के धनुष-रक्षण और लंका-प्रस्थान से पूर्व श्रीराम की प्रसन्नता दोनों का स्मरण है।

दक्षिण भारत में आयुध पूजा और विद्यारंभम किस क्रम में किए जाते हैं?

दुर्गाष्टमी की संध्या को पुस्तकें और उपकरण सरस्वती वेदी पर विश्राम के लिए रखे जाते हैं (‘पूजा वैप्पु’), महानवमी को आयुध और सरस्वती पूजा होती है, और विजयदशमी की सुबह ‘पूजा एडुप्पु’ तथा बच्चों के अक्षरारंभ (‘विद्यारंभम’) के साथ अध्ययन पुनः शुरू होता है।

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