दुर्गा अष्टमी पूजा विधि: महाअष्टमी व मासिक दुर्गाष्टमी सामग्री, मंत्र, हवन और कन्या पूजन

नवरात्रि की महाअष्टमी और मासिक दुर्गाष्टमी की संपूर्ण पूजा विधि: अष्टम नवदुर्गा महागौरी पूजन, 48-मिनट संधि पूजा, सामग्री, मंत्र, हवन और कन्या पूजन।

ज्योतिष और हिंदू परंपरालेख · 13 मिनटRead in English ↗

संक्षिप्त उत्तर: दुर्गा अष्टमी पूजा कैसे करें?

दुर्गा अष्टमी शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि पर दो प्रमुख रूपों में मनाई जाती है: प्रत्येक चंद्र मास की शुक्ल अष्टमी को की जाने वाली 'मासिक दुर्गाष्टमी' और चैत्र व शारदीय नवरात्रि के आठवें दिन मनाई जाने वाली 'महाअष्टमी', जो अष्टम नवदुर्गा स्वरूप माता महागौरी को समर्पित है। शास्त्रीय शाक्त परंपरा में महाअष्टमी पर षोडशोपचार कलश व महागौरी पूजन, अस्त्र-शस्त्र पूजा, अष्टमी-नवमी के मिलन पर 48 मिनट की 'संधि पूजा', 108 आहुतियों का दुर्गा हवन और नव-कन्या पूजन का विधान है।

  • वर्ष में दो बार आने वाली नवरात्रि 'महाअष्टमी' (चैत्र व आश्विन शुक्ल अष्टमी) और प्रतिमाह की 'मासिक दुर्गाष्टमी' का स्पष्ट पंचांगीय भेद।
  • अष्टम नवदुर्गा माता महागौरी की आराधना तथा चंड-मुंड वध के स्मरण में 2 घटी (48 मिनट) की विशेष 'संधि पूजा'।
  • संपूर्ण पूजा व हवन सामग्री सूची, देवी माहात्म्य व महागौरी के प्रामाणिक संस्कृत मंत्र, 108 आहुति होम विधि और नौ-रूप कन्या पूजन।

महाअष्टमी बनाम मासिक दुर्गाष्टमी का पंचांगीय नियम, माता महागौरी का स्वरूप और 48-मिनट का संधि पूजा काल

हिंदू चंद्र पंचांग में प्रत्येक मास के शुक्ल पक्ष की आठवीं तिथि (शुक्ल अष्टमी) आदिशक्ति भगवती दुर्गा की तिथि मानी जाती है, जिसे साधक वर्ष भर 'मासिक दुर्गाष्टमी' के रूप में एकभुक्त या फलाहार व्रत, दुर्गा चालीसा या देवी अथर्वशीर्ष के पाठ और संध्या आरती के साथ मनाते हैं। किंतु वर्ष में दो बार—वसंत ऋतु की चैत्र नवरात्रि और शरद ऋतु की शारदीय नवरात्रि में, जिनका संपूर्ण पंचांगीय ढाँचा हमारे नवरात्रि के अर्थ और पंचांग नियम लेख में समझाया गया है—यही शुक्ल अष्टमी 'महाअष्टमी' (महाष्टमी) के सर्वोच्च शिखर रूप में पूजी जाती है और पूर्वी भारत के भव्य दुर्गा पूजा (दुर्गोत्सव) पंडालों से लेकर उत्तर भारत के घरों की घटस्थापना वेदी तक अनुष्ठान का केंद्र बन जाती है। निर्णयसिंधु, धर्मसिंधु और दुर्गोत्सव विवेक जैसे ग्रंथों में महाअष्टमी के लिए 'सप्तमी-विद्धा' अष्टमी के त्याग का विशेष नियम है—अर्थात् यदि सूर्योदय के बाद प्रातःकालीन पूजा के समय सप्तमी तिथि का वेध हो, तो शुद्ध अष्टमी व्याप्ति में ही महाअष्टमी का व्रत व हवन किया जाता है।

नवरात्रि की नौ देवियों (नवदुर्गा के नौ स्वरूप) के क्रम में आठवाँ दिन माता 'महागौरी' को समर्पित है। श्वेत वृषभ (बैल) की पीठ पर विराजमान, श्वेत वस्त्र धारण करने वाली ('श्वेताम्बरधरा') तथा शंख, चंद्रमा और कुंद के पुष्प के समान उज्ज्वल आभा वाली चतुर्भुजा माता महागौरी अपनी चार भुजाओं में त्रिशूल, डमरू, अभय मुद्रा और वरद मुद्रा धारण करती हैं। शिव पुराण के प्रसंग के अनुसार भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए कठोर वन-तपस्या करने से जब पार्वतीजी का शरीर धूल-मिट्टी से श्यामल पड़ गया, तब महादेव ने गंगाजल से उनका अभिषेक किया जिससे उनका वर्ण पुनः गौर व कांतिमय होकर 'महागौरी' कहलाया। इसी दिन का दूसरा अत्यंत गूढ़ शास्त्रीय अनुष्ठान 'संधि पूजा' है, जो मार्कंडेय पुराण के देवी माहात्म्य (सप्तशती के सप्तम अध्याय) पर आधारित है। जिस सटीक खगोलीय क्षण में अष्टमी तिथि समाप्त होती है और नवमी तिथि प्रारंभ होती है, उस संधि-बिंदु के दोनों ओर एक-एक घटी—अर्थात् अष्टमी के अंतिम 24 मिनट (1 घटी) और नवमी के प्रथम 24 मिनट (1 घटी), कुल 48 मिनट (2 घटी)—को 'संधि काल' कहा जाता है। इसी संधि काल में देवी अंबिका की भृकुटी (ललाट) से भगवती चामुंडा का प्राकट्य हुआ था जिन्होंने चंड और मुंड का संहार किया; इसलिए संधि पूजा में 108 मिट्टी के दीपक जलाए जाते हैं, 108 लाल कमल (या गुड़हल) के फूल व 108 बिल्वपत्र अर्पित किए जाते हैं, और ठीक तिथि-परिवर्तन के क्षण पर पेठे (कूष्मांड), गन्ने या केले की सात्त्विक बलि दी जाती है।

महाअष्टमी बनाम मासिक दुर्गाष्टमी पंचांग नियम, 48-मिनट संधि पूजा और हवन–कन्या पूजन क्रम1. अष्टमी पंचांग नियममासिक शुक्ल अष्टमी बनाम चैत्र व शारदीय नवरात्रि की महाअष्टमीसप्तमी-वेध का परिहार और स्थानीय पंचांग से अष्टमी-नवमी संधि काल की जाँच2. अष्टम नवदुर्गा महागौरीवृषभ-वाहिनी, श्वेताम्बरधरा, त्रिशूल-डमरू व अभय-वरद मुद्रा धारिणीमोगरा/गुड़हल पुष्प, नारियल (श्रीफल) का विशेष भोग और गुलाबी/श्वेत वस्त्र3. 48-मिनट की संधि पूजाअष्टमी के अंतिम 24 मिनट (1 घटी) + नवमी के प्रथम 24 मिनट (1 घटी)चंड-मुंड मर्दिनी चामुंडा पूजन; 108 दीपक, 108 लाल कमल व 108 बिल्वपत्र4. दुर्गा सप्तशती हवनताम्र या मिट्टी के हवन कुंड में आम्र/पलाश समिधा से अग्नि स्थापनानवार्ण मंत्र से काले तिल, जौ, घी व गुग्गुल की 108 आहुतियाँ और श्रीफल पूर्णाहुति5. नौ-रूप कन्या पूजन2 से 10 वर्ष की 9 कन्याओं और 1 बटुक भैरव (लांगूरा) का साक्षात् शक्ति पूजनपाद-प्रक्षालन, कुमकुम तिलक, रक्षासूत्र, हलवा-पूड़ी-काला चना और सम्मानजनक सहमति
दुर्गा अष्टमी के अनुष्ठानिक ढाँचे में माता महागौरी पूजन, 2-घटी संधि पूजा, 108 आहुतियों के हवन और नव-कन्या पूजन का समन्वित आरेख।

संपूर्ण पूजा व हवन सामग्री, प्रामाणिक संस्कृत मंत्र, 108-आहुति होम विधि और नौ-रूप कन्या पूजन

चाहे परिवार नौ-दिवसीय घटस्थापना और जवारों के साथ महाअष्टमी का पूर्ण अनुष्ठान कर रहा हो या मासिक दुर्गाष्टमी की संक्षिप्त पूजा, सामग्री को तीन भागों—षोडशोपचार पूजन द्रव्य, सुहाग श्रृंगार व नैवेद्य, और हवन सामग्री—में व्यवस्थित कर लेने से पूजा निर्विघ्न संपन्न होती है। प्रातः स्नान के बाद स्वच्छ लाल, पीले या श्वेत वस्त्र पहनकर आचमन, प्राणायाम और देश-काल का संकल्प लें; सर्वप्रथम भगवान गणेश, कलश और नवग्रह का पूजन कर भगवती दुर्गा / महागौरी का षोडशोपचार पूजन करें। देवी को लाल गुड़हल (जपाकुसुम), लाल गुलाब या सुगंधित श्वेत मोगरे के फूल, सिंदूर, रोली, अक्षत और 'सोलह श्रृंगार' की सामग्री (लाल चुनरी, चूड़ियाँ, बिंदी, मेहंदी, आलता, दर्पण, कंघी व इत्र) अर्पित करें। माता महागौरी को नारियल (श्रीफल या नारियल की बर्फी/लड्डू) का विशेष भोग लगाने के साथ सूजी का हलवा, पूड़ी और मसालेदार सूखे काले चने का नैवेद्य चढ़ाया जाता है। पूजा में चार प्रमुख शास्त्रीय संस्कृत मंत्रों का श्रद्धापूर्वक जप व पाठ किया जाता है: (1) नवार्ण मंत्र—'ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे', (2) दुर्गा ध्यान मंत्र—'ॐ जटाजूटसमायुक्तमर्धेंन्दुकृतलक्षणाम्। लोचनत्रयसंयुक्तां पद्मेन्दुसदृशाननाम्॥', (3) महागौरी स्तुति—'श्वेते वृषे समारूढा श्वेताम्बरधरा शुचिः। महागौरी शुभं दद्यान्महादेवप्रमोददा॥', और (4) सर्वमंगल प्रार्थना (दुर्गा सप्तशती, अध्याय 11)—'सर्वमंगलमांगल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके। शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते॥'।

जिन कुल-परंपराओं में अष्टमी को ही नवरात्रि का समापन ('अष्टमी पूजन') होता है, वहाँ मुख्य पूजा के तुरंत बाद 'दुर्गा होम' (हवन) और 'कन्या पूजन' (कुमारी पूजा) किया जाता है। घरेलू हवन के लिए हवादार स्थान पर ताँबे या मिट्टी के हवन कुंड में आम या पलाश की समिधा और कपूर से अग्नि प्रज्वलित कर अग्निदेव का आवाहन ('ॐ अग्नये स्वाहा') करें, फिर काले तिल, जौ (यव), अक्षत, गाय का शुद्ध घी, गुग्गुल, नागरमोथा, कमलगट्टा, इलायची और सूखे नारियल के मिश्रण (हवन सामग्री) से नवार्ण मंत्र के अंत में 'स्वाहा' जोड़ते हुए ('ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे स्वाहा') 28 या 108 आहुतियाँ प्रदान करें, और अंत में सूखे गोले में घी व गुड़ भरकर 'पूर्णाहुति' अर्पित करें। शाक्त तंत्र और रुद्रयामल के अनुसार कन्या पूजन में 2 से 10 वर्ष तक की नौ कन्याओं को नवदुर्गा के नौ जीवंत स्वरूपों और एक बालक को 'बटुक भैरव' (लांगूरा) के रूप में आमंत्रित किया जाता है: दो वर्ष की कन्या 'कुमारी', तीन वर्ष की 'त्रिमूर्ति', चार वर्ष की 'कल्याणी', पाँच वर्ष की 'रोहिणी', छह वर्ष की 'कालिका', सात वर्ष की 'चण्डिका', आठ वर्ष की 'शाम्भवी' (महाअष्टमी पर विशेष प्रधान), नौ वर्ष की 'दुर्गा' और दस वर्ष की कन्या 'सुभद्रा' कहलाती है। बच्चों और उनके अभिभावकों की प्रसन्न सहमति, स्वच्छता और खाद्य-एलर्जी का पूरा ध्यान रखते हुए उनके चरण धोएँ, तिलक व रक्षासूत्र बाँधें, हलवा-पूड़ी-चना व फल परोसें और चुनरी/उपहार भेंट कर आशीर्वाद लें।

शास्त्रीय शाक्त ग्रंथों के अनुसार आयु के क्रम से नौ-रूप कन्या पूजन (कुमारी पूजा) का विधान
कन्या की आयुशास्त्रीय संस्कृत नामदेवी शक्ति का आराध्य स्वरूपपारंपरिक आध्यात्मिक एवं भक्तिपूर्ण भाव
2 वर्षकुमारीनिर्मल सृजन-शक्ति और निष्पाप चेतनादुःख-दारिद्र्य के निवारण और अंतःकरण की पवित्रता के लिए वंदनीय।
3 वर्षत्रिमूर्तिसृजन, पालन और नवीनीकरण की त्रिगुणात्मिका शक्तिपरिवार में धर्म, धन-धान्य और आपसी सामंजस्य की वृद्धि का प्रतीक।
4 वर्षकल्याणीविद्या और लोकमंगल की अधिष्ठात्री माताशिक्षा, विवेक, ज्ञान और गृह-सुख की कामना से पूजित।
5 वर्षरोहिणीआरोग्य और पोषण देने वाली सौम्य शक्तिस्वास्थ्य, मानसिक शांति और रोग-कष्ट से मुक्ति की प्रार्थना।
6 वर्षकालिकाआंतरिक बाधाओं और भय का नाश करने वाली रक्षक शक्तिसाहस, अनुशासन और आत्मबल की प्राप्ति हेतु आराधना।
7 वर्षचण्डिकादेवी माहात्म्य की तेजस्वी धर्म-रक्षिकानीति, न्याय, धैर्य और संकल्प-बल का आशीर्वाद।
8 वर्षशाम्भवीशंभु-प्रिया और अष्टमी की अधिष्ठात्री महागौरीमहाअष्टमी पर विशेष पूजनीय; करुणा, शांति और सौभाग्य की दात्री।
9 वर्षदुर्गासंकटों से पार ले जाने वाली दुर्गतिनाशिनी माताअष्टमी व नवमी पर साधना की पूर्णता और अडिग श्रद्धा का प्रतीक।
10 वर्षसुभद्रामंगल और सौम्य आनंद प्रदान करने वाली शक्तिएक बटुक भैरव (लांगूरा) बालक के साथ नव-कन्या मंडल को पूर्ण करती हैं।
नवरात्रि की महाअष्टमी, संधि पूजा और प्रतिमाह की मासिक दुर्गाष्टमी की तुलना
अनुष्ठान का प्रकारपंचांग समय और आवृत्तिमुख्य आराध्य एवं अनुष्ठान केंद्रप्रमुख भोग, हवन और पारणा नियम
महाअष्टमी (दैनिक पूजन)वर्ष में दो बार: चैत्र व आश्विन शुक्ल अष्टमी (पूर्वाह्न/मध्याह्न)अष्टम नवदुर्गा महागौरी, घटस्थापना कलश, अस्त्र पूजा व सप्तशतीनारियल भोग, हलवा-पूड़ी-काला चना, 108 आहुति हवन और नव-कन्या पूजन।
संधि पूजा (अष्टमी–नवमी संधि)अष्टमी के अंतिम 24 मिनट + नवमी के प्रथम 24 मिनट (कुल 48 मिनट / 2 घटी)चंड-मुंड का वध करने वाली भगवती चामुंडा108 मिट्टी के दीपक, 108 लाल कमल, 108 बिल्वपत्र और पेठे/केले की सात्त्विक बलि।
मासिक दुर्गाष्टमीप्रतिमाह: सभी 12 चंद्र मासों के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथिभगवती दुर्गा / आदिशक्ति का गृहस्थ स्मरणसरल दिनभर का व्रत, लाल गुड़हल पुष्प, दुर्गा चालीसा/स्तुति और सायंकाल सात्त्विक पारणा।

दुर्गा अष्टमी, महाष्टमी और मासिक दुर्गाष्टमी

अष्टमी चंद्र मास का आठवाँ दिन है। दुर्गा अष्टमी शब्द मासिक व्रत के लिए भी आता है; शारदीय नवरात्रि या दुर्गा-पूजा का आठवाँ दिन प्रायः महाष्टमी कहलाता है। चैत्र नवरात्रि में भी अष्टमी को देवी-पूजा होती है। पंचांग तय करता है कि तिथि किस अंग्रेज़ी तारीख को पड़ेगी; तिथि दिन के बीच शुरू या समाप्त हो सकती है, इसलिए हर साल एक ही कैलेंडर तारीख नहीं होती।

क्षेत्रीय रीति भी उत्सव को आकार देती है। उत्तर भारत के कई परिवार अष्टमी या नवमी को कन्या/कंजक पूजन करते हैं। बंगाल में कुमारी-पूजा दुर्गा-पूजा का हिस्सा हो सकती है। ये देवी-भक्ति की जुड़ी हुई, पर एक जैसी नहीं, विधियाँ हैं। अपने घर या मंदिर की मान्य परंपरा अपनाएँ।

दुर्गा अष्टमी पूजा सामग्री: सरल सूची

सामग्री कम रखें और अपने परिवार की रीति के अनुसार बदलें। पूजा के लिए बाजार में मिलने वाली हर वस्तु जरूरी नहीं।

व्रत रखें तो स्वास्थ्य, आयु और चिकित्सकीय सलाह के अनुसार निर्णय लें। बच्चों, गर्भवती लोगों और स्वास्थ्य समस्या वाले किसी भी व्यक्ति पर उपवास का दबाव न डालें।

घर में दुर्गा अष्टमी पूजा की क्रमबद्ध विधि

सरल घरेलू पूजा के लिए स्थान साफ करें, देवी का चित्र या कलश सुरक्षित रखें और उतनी सामग्री सजाएँ जितनी उपयोग करनी है। जो परिवार के सदस्य भाग लेना चाहें, उनके साथ बैठें और अपनी भाषा में संकल्प बोलें। घर की रीति के अनुसार जल, फूल या फल चढ़ाएँ। दुर्गा-स्तुति पढ़ें या परिचित छोटा नाम-मंत्र जपें और अंत में प्रसाद बाँटें।

  1. स्थानीय तिथि देखें और तय करें कि परिवार अष्टमी या नवमी की रीति मानता है।
  2. स्वच्छ, स्थिर स्थान और सुरक्षित भेंट तैयार करें।
  3. प्रार्थना और स्पष्ट, सम्मानजनक संकल्प से शुरुआत करें।
  4. अपनी परंपरा के अनुसार फूल, जल, फल या स्तुति अर्पित करें।
  5. रीति हो तो आरती करें और प्रसाद सुरक्षित बाँटें।

जब परिवार विस्तृत पद्धति नहीं मानता, तब छोटी भक्ति-पूजा उचित है। औपचारिक हवन के लिए अनुभवी पुरोहित से सीखें और अग्नि-सुरक्षा के नियम अपनाएँ।

मंत्र, कन्या पूजन और सहभागियों का सम्मान

कई भक्त छोटा नाम-मंत्र ॐ दुं दुर्गायै नमः कहते हैं, जिसका भाव देवी दुर्गा को प्रणाम है। उच्चारण, न्यास और मंत्र का चुनाव संप्रदाय के अनुसार बदल सकता है; घर या पुरोहित द्वारा सिखाया रूप लें। परिवार की प्रार्थना में भाग लेने के लिए संस्कृत मंत्र बोलना जरूरी नहीं।

कुछ नवरात्रि परंपराओं में कन्याओं को देवी का रूप मानकर कन्या पूजन होता है। संख्या, आयु, भेंट और दिन सभी जगह एक जैसे नहीं हैं। बच्चे और अभिभावक को रीति समझाएँ, हर क्रिया के लिए सहमति लें, एलर्जी का ध्यान रखकर स्वच्छ भोजन दें और किसी बच्चे को स्पर्श या कर्मकांड से मना करने की स्वतंत्रता दें। सूची पूरी करने से बढ़कर सम्मान है। परिवार कन्या पूजन न करता हो तो अपनी परंपरा में स्वीकृत प्रार्थना, भोजन-साझा या सेवा से अष्टमी मना सकता है।

पंचांग, मुहूर्त और आम भूलें

अपने शहर का नया पंचांग या मंदिर का स्थानीय कैलेंडर देखें। भारत का मुहूर्त दूसरे समय-क्षेत्र में रहने वाले परिवार पर लागू नहीं हो सकता; क्षेत्रीय पंचांग भी पर्व-दिन की अलग गणना कर सकते हैं। रिश्तेदार, मंदिर या आमंत्रित बच्चे आने वाले हों तो पहले से योजना बनाएँ। पिछले साल के समय फिर से उपयोग न करें।

आम गलतियों में हर अष्टमी को एक ही पर्व मानना, कन्या पूजन को सभी के लिए अनिवार्य बताना, सामर्थ्य से अधिक उपवास करना या छूटा हुआ कदम देवी के दंड से जोड़ना शामिल है। पूजा सरल, स्वागतपूर्ण और सुरक्षित रखें। दबाव में महँगी व्यवस्था करने से श्रद्धापूर्वक छोटी प्रार्थना बेहतर है।

उत्सव का भाव

भक्तों के लिए दुर्गा अष्टमी देवी के साहस, रक्षा और परिवर्तनकारी शक्ति का स्मरण हो सकती है। यह प्रार्थना, परिवार के साथ और उदारता के लिए समय देता है। पूजा का अर्थ सामग्री की लंबी सूची खरीदने या निजी फल की गारंटी से तय नहीं होता। परिवार बच्चों को कथा और गीत समझाते हुए क्षेत्र के अलग पूजन-रूपों का सम्मान कर सकता है।

दूसरे देश के पाठक के लिए लिखते समय बताएँ कि अष्टमी चंद्र तिथि है और स्थानीय पंचांग देखना चाहिए। यह जानकारी पूजा-मार्गदर्शिका को गलत तारीख बताने से बचाती है।

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सामान्य प्रश्न

पाठकों के सामान्य प्रश्नों के संक्षिप्त उत्तर।

नवरात्रि की 'महाअष्टमी' और हर महीने आने वाली 'मासिक दुर्गाष्टमी' में क्या अंतर है?

मासिक दुर्गाष्टमी प्रत्येक चंद्र मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाई जाती है, जिसमें भक्त साधारण घरेलू पूजा और व्रत करते हैं। इसके विपरीत चैत्र और शारदीय नवरात्रि के आठवें दिन आने वाली अष्टमी को 'महाअष्टमी' कहा जाता है, जिसमें माता महागौरी की विशेष पूजा, संधि पूजा, सप्तशती हवन और कन्या पूजन संपन्न होता है।

महाअष्टमी को नवदुर्गा के किस स्वरूप की पूजा होती है और उन्हें किस वस्तु का विशेष भोग लगता है?

महाअष्टमी को नवदुर्गा के आठवें स्वरूप माता 'महागौरी' की पूजा की जाती है। श्वेत वृषभ पर सवार और श्वेत वस्त्र धारिणी माता महागौरी को नारियल (श्रीफल या नारियल की मिठाई) का विशेष भोग लगाया जाता है तथा हलवा, पूड़ी और काले चने अर्पित किए जाते हैं।

दुर्गा अष्टमी पर 48 मिनट की 'संधि पूजा' का समय कैसे निकाला जाता है?

जिस क्षण अष्टमी तिथि समाप्त होती है और नवमी तिथि आरंभ होती है, उस मिलन बिंदु से ठीक पहले के 24 मिनट (अष्टमी की अंतिम 1 घटी) और बाद के 24 मिनट (नवमी की प्रथम 1 घटी)—कुल 48 मिनट (2 घटी)—को संधि काल कहते हैं। इसी समय देवी चामुंडा की स्मृति में 108 दीपक और 108 लाल कमल अर्पित कर संधि पूजा की जाती है।

कुछ परिवार अष्टमी को और कुछ नवमी को हवन व कन्या पूजन क्यों करते हैं?

उत्तर और पश्चिम भारत में कुल-परंपरा (कुलरीति) के अनुसार दो पद्धतियाँ हैं: 'अष्टमी पूजने वाले' परिवार महाअष्टमी के दिन ही हवन, कन्या पूजन और व्रत का पारणा करते हैं, जबकि 'नवमी पूजने वाले' परिवार महानवमी को सिद्धिदात्री पूजन, हवन और कन्या पूजन कर नवमी या दशमी प्रातः व्रत खोलते हैं।

दुर्गा अष्टमी के घरेलू हवन में 108 आहुतियाँ किस मंत्र से दी जाती हैं?

घरेलू दुर्गा हवन में काले तिल, जौ, अक्षत और गाय के घी से युक्त हवन सामग्री की 28 या 108 आहुतियाँ प्रायः नवार्ण मंत्र के अंत में 'स्वाहा' लगाकर दी जाती हैं: 'ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे स्वाहा', अथवा दुर्गा सप्तशती के ग्यारहवें अध्याय ('नारायणी स्तुति') के श्लोकों से हवन किया जाता है।

कन्या पूजन में नौ कन्याओं के साथ एक बालक (बटुक भैरव / लांगूरा) को क्यों बैठाया जाता है?

शास्त्रीय शाक्त परंपरा में शक्तिपीठ और देवी के दरबार की पूजा बटुक भैरव और गणपति के बिना पूर्ण नहीं मानी जाती। इसलिए नवदुर्गा की प्रतीक नौ कन्याओं के साथ एक बालक को 'बटुक भैरव' (लोकभाषा में लांगूरा या लंगूरवीर) के रूप में आमंत्रित कर तिलक व भोजन कराया जाता है।

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