संक्षिप्त उत्तर: अहोई अष्टमी पूजा विधि क्या है?
अहोई अष्टमी (अहोई आठे) दीपावली से ठीक आठ दिन पूर्व और करवा चौथ के चार दिन बाद कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि—पूर्णिमांत पंचांग में कार्तिक कृष्ण अष्टमी तथा अमांत पंचांग में आश्विन कृष्ण अष्टमी—को मनाया जाने वाला वात्सल्य और संतान-मंगल का पावन पर्व है। इस दिन प्रदोष काल में दीवार पर आठ कोनों वाले 'अष्टकोष्ठक मंडल' में अहोई माता व स्याहु के बच्चों का चित्रांकन कर, चाँदी की 'स्याहु माला' और जल से भरे करवे का पूजन किया जाता है तथा सायंकाल में तारों (या चंद्रोदय) को अर्घ्य दिया जाता है।
- करवा चौथ के चार दिन बाद और दीपावली अमावस्या से आठ दिन पहले कार्तिक/आश्विन कृष्ण अष्टमी को मनाई जाती है।
- आठ कोनों वाले 'अष्टकोष्ठक' भित्ति-चित्र, चाँदी की स्याहु पेंडेंट व दानों वाली माला तथा अन्न-युक्त जल करवे का विशेष पूजन होता है।
- प्रदोष काल में सात अनाज के दाने हाथ में लेकर व्रत कथा सुनने के बाद संध्या में तारों के दर्शन (तारा-अर्घ्य) या चंद्रोदय पर व्रत खोला जाता है।
कार्तिक कृष्ण अष्टमी का पंचांगीय समय, करवा चौथ–दीपावली के मध्य स्थान और अष्टकोष्ठक व स्याहु माला का विधान
शरद ऋतु के दीपोत्सव-पूर्व व्रत-चक्र में अहोई अष्टमी कृष्ण पक्ष के ठीक मध्य बिंदु पर स्थित है: यह करवा चौथ (कार्तिक कृष्ण चतुर्थी) के ठीक चार तिथियों बाद और दीपावली (कार्तिक अमावस्या) से ठीक आठ तिथियों पूर्व कृष्ण पक्ष की अष्टमी को पड़ती है। उत्तर भारत के पूर्णिमांत पंचांगों (जहाँ पूर्णिमा के अगले दिन से नया मास शुरू होता है) में यह पक्ष कार्तिक मास कहलाता है, जबकि पश्चिम और दक्षिण भारत के अमांत पंचांगों (जहाँ अमावस्या के बाद नया मास शुरू होता है) में यही तिथि आश्विन कृष्ण अष्टमी लिखी जाती है। चूँकि चंद्र तिथि सूर्य और चंद्रमा के 12-अंश के कोणीय अंतर से चलती है—जिसका सिद्धांत हमारे तिथि बनाम कैलेंडर तारीख लेख में स्पष्ट है—इसलिए धर्मसिंधु और निर्णयसिंधु के अनुसार अहोई अष्टमी का व्रत उस दिन रखा जाता है जिस दिन सायंकाल (प्रदोष काल) और गोधूलि के बाद तारों के उदय ('तारा-दर्शन') के समय अष्टमी तिथि विद्यमान हो। गृहस्थ पूजा के साथ-साथ इसी कार्तिक कृष्ण अष्टमी ('बहुलाष्टमी') की मध्यरात्रि को ब्रज के गोवर्धन स्थित पवित्र 'राधा कुंड' और 'श्याम कुंड' के प्राकट्य पर्व पर हजारों दंपती स्नान व दीपदान भी करते हैं।
अहोई अष्टमी की घरेलू वेदी का सबसे विशिष्ट अंग 'अष्टकोष्ठक मंडल' (अष्टमी तिथि का प्रतीक आठ कोनों वाला ज्यामितीय भित्ति-चित्र) है, जिसे पारंपरिक रूप से दीवार पर गेरू और चावल के घोल (ऐपन) से उकेरा जाता है या छपे हुए पूजा-पट के रूप में लगाया जाता है। इस अष्टकोष्ठक के भीतर अहोई भगवती, सूर्य-चंद्रमा, सात पुत्र व उनकी वधुएँ तथा 'स्याहु' (मांद में रहने वाली वन्य माता—जिसे लोकपरंपरा में सेही, नेवला या बिज्जू परिवार का जीव माना गया है) और उसके सात बच्चों की आकृतियाँ बनाई जाती हैं। इसके साथ ही पूजा में 'स्याहु माला' का विशेष स्थान है: लाल कलावे (मौली) की डोरी में चाँदी की छोटी चौकोर या गोल 'स्याहु माता' की पेंडेंट (पटरी) और उसके दोनों ओर चाँदी के चिकने दाने ('चाँदी के मनके') पिरोए जाते हैं। अहोई अष्टमी की शाम को इस माला को कच्चे दूध व जल से स्नान कराकर रोली-अक्षत से पूजा जाता है; कई परिवारों की रीति में संतान जन्म या विवाह जैसे शुभ अवसरों पर इसमें चाँदी के दो नए दाने जोड़े जाते हैं और इसे अष्टमी से दीपावली तक गले में धारण किया जाता है।
संध्याकालीन चरणबद्ध पूजा विधि, पश्चाताप व करुणा की अहोई व्रत कथा और तारा बनाम चंद्र अर्घ्य नियम
अहोई अष्टमी की पूजा की तैयारी सूर्यास्त के समय प्रदोष काल में की जाती है। पूजा-स्थान को स्वच्छ कर ईशान या पूर्व की दीवार पर अहोई माता का अष्टकोष्ठक चित्र लगाया जाता है और नीचे लकड़ी की चौकी पर गेहूँ या चावल से अष्टदल कमल या स्वस्तिक बनाकर उस पर जल से भरा मिट्टी या ताँबे का टोंटीदार 'करवा' (कलश) स्थापित किया जाता है। करवे के ऊपर मिट्टी के ढक्कन (सराही) में गेहूँ और चीनी भरी जाती है अथवा एक छोटा लोटा रखा जाता है, और कई क्षेत्रों में करवे की टोंटी में 'सरई' या 'काँस' की सींकें लगाई जाती हैं। करवे के सामने कटोरी में कच्चे दूध व जल से धुली चाँदी की 'स्याहु माला', रोली, अक्षत और पुष्प रखे जाते हैं। अष्टमी तिथि के अनुरूप नैवेद्य और 'बयाना' में आठ की संख्या का विशेष विधान है: आठ पूड़ियाँ, गुड़ या चीनी के आठ मीठे 'पुए' (गुलगुले), सूजी का हलवा, उबले हुए काले चने या लोबिया और मौसमी फल सिंघाड़ा। परिवार की महिलाएँ व सदस्य दाहिने हाथ में गेहूँ या ज्वार के सात दाने और पुष्प लेकर अहोई माता की व्रत कथा सुनते हैं; कथा पूर्ण होने पर वे सात दाने आँचल या पल्लू के कोने में बाँध लिए जाते हैं और अगले दिन गाय या पक्षियों को डाल दिए जाते हैं।
अहोई अष्टमी की पारंपरिक व्रत कथा अनजाने में हुए जीव-हिंसा के अपराध पर सच्चे पश्चाताप, सेवा और सभी जीवों के प्रति मातृ-करुणा की प्रेरक सीख देती है। कथा के प्रथम प्रसंग में सात भाइयों की एक लाड़ली बहन (अथवा एक साहूकार की पुत्रवधू) दीपावली से पहले घर की लिपाई-पुताई के लिए जंगल में पीली मिट्टी खोदने जाती है। मिट्टी खोदते समय उसकी खुरपी अनजाने में जमीन के नीचे बनी मांद में लग जाती है, जिससे स्याहु के नन्हे बच्चों को चोट पहुँचती है। इस अनजाने दोष के बाद जब उसके अपने परिवार में संतान-वियोग का दुख आता है, तो वह अपने अपराध को छिपाने के बजाय वृद्ध माताओं के सामने सच्चे हृदय से पश्चाताप करती है; बुज़ुर्गों के मार्गदर्शन पर वह कृष्ण अष्टमी को दीवार पर स्याहु माता और उसके बच्चों का चित्र बनाकर श्रद्धापूर्वक अहोई माता की आराधना करती है, जिससे उसके घर में पुनः सुख-मंगल लौट आता है। कथा के दूसरे प्रसंग में जब 'सुरभि' (गौरी) गाय सातों बहुओं की परीक्षा लेती है, तो सबसे छोटी बहू अपनी ननद को सास के क्रोध से बचाने के लिए दोष अपने सिर ले लेती है और अपना बयाना भी बाँट देती है, जिससे प्रसन्न होकर माता उसे सुख-समृद्धि का आशीष देती हैं। आरती के बाद आठ पूड़ी, आठ पुए, हलवा और वस्त्र/दक्षिणा से सजी 'बयाना' की थाली सास, ननद या मंदिर के पुरोहित को भेंट कर चरण स्पर्श किए जाते हैं। इसके बाद आकाश में संध्या के तारे निकलने पर ('तारा-दर्शन')—अथवा जिन परिवारों में चंद्रोदय की रीति है वहाँ रात्रि में अष्टमी का चंद्रमा उदित होने पर—करवे से जल की धार देते हुए अर्घ्य अर्पित किया जाता है और सात्त्विक प्रसाद ग्रहण किया जाता है।
| पूजा सामग्री | पारंपरिक स्वरूप | अष्टमी पूजन में अनुष्ठानिक भूमिका | सरल एवं सुलभ घरेलू विकल्प |
|---|---|---|---|
| अहोई माता का अष्टकोष्ठक चित्र | गेरू व चावल के घोल से बना 8 कोनों का भित्ति-चित्र या छपा पट | अहोई भगवती, स्याहु और उसके बच्चों के स्मरण का केंद्रबिंदु | बाजार में उपलब्ध साफ कागज का कैलेंडर या चार्ट पेपर पर बना अष्टकोण चित्र। |
| स्याहु माला और चाँदी के दाने | लाल कलावे में पिरोई चाँदी की स्याहु पटरी व चाँदी के मनके | कच्चे दूध से स्नान कराकर चौकी पर पूजन के बाद धारण की जाती है | यदि चाँदी की पटरी न हो तो पवित्र लाल कलावा (मौली) और चाँदी का सिक्का रखें। |
| करवा / जल कलश | गेहूँ की ढेरी पर रखा मिट्टी या ताँबे का टोंटीदार करवा | तारा या चंद्र अर्घ्य के लिए अभिमंत्रित जल; दीपावली तक सुरक्षित रखा जाता है | घर का कोई भी स्वच्छ पीतल, ताँबे या मिट्टी का जल-पात्र (लोटा)। |
| अष्टमी का भोग व बयाना (8 की संख्या) | 8 पूड़ी, 8 मीठे पुए, सूजी का हलवा, काले चने और सिंघाड़ा | अष्टमी तिथि के सम्मान में अर्पित भोग, जिसे बड़ों को बयाना रूप में देते हैं | परिवार के स्वास्थ्य के अनुकूल घर में बना ताजा सात्त्विक भोजन और ऋतुफल। |
| कथा के सात अनाज दाने | गेहूँ, जौ या ज्वार के 7 साबुत दाने | व्रत कथा सुनते समय दाहिने हाथ में रखे जाते हैं | साबुत अक्षत (चावल) या गेहूँ के दाने जिन्हें बाद में पक्षियों या गौ को अर्पित करें। |
| तुलना का आधार | करवा चौथ (करक चतुर्थी) | अहोई अष्टमी (अहोई आठे) | साझा भक्ति एवं नैतिक सिद्धांत |
|---|---|---|---|
| चंद्र तिथि और समय | कार्तिक/आश्विन कृष्ण चतुर्थी (चौथी तिथि) | कार्तिक/आश्विन कृष्ण अष्टमी (आठवीं तिथि, ठीक 4 दिन बाद) | दोनों पर्व शरद पूर्णिमा और दीपावली के बीच कृष्ण पक्ष में आते हैं। |
| मुख्य आराध्य और प्रतीक | चौथ माता, शिव-पार्वती, कार्तिकेय, गणेश और चंद्रमा | आठ कोनों वाले अष्टकोष्ठक मंडल में अहोई भगवती और स्याहु माता | प्रदोष काल में चित्र/चौकी पूजन, व्रत कथा श्रवण और सास को बयाना भेंट। |
| व्रत खोलने का पारंपरिक संकेत | रात्रि में छलनी से चंद्रोदय दर्शन और चंद्र अर्घ्य | संध्या में तारा-दर्शन (तारा अर्घ्य) अथवा रात्रि चंद्रोदय अर्घ्य | अभिमंत्रित करवे से जल की धार अर्पित करने के बाद पारणा। |
| आध्यात्मिक भाव और स्वास्थ्य नियम | दांपत्य सौहार्द, परस्पर आदर और परिवार का कल्याण | संतान का मंगल, अनजाने दोष पर पश्चाताप और वात्सल्य भाव | उपवास स्वैच्छिक है; गर्भावस्था, स्तनपान व चिकित्सा में स्वास्थ्य सर्वोपरि है। |
तिथि, मास-नाम और संध्या का समय
अहोई अष्टमी दीपावली से लगभग आठ दिन पहले कृष्ण पक्ष की अष्टमी को आती है। मास-नाम चंद्र कैलेंडर की गणना से बदलता है: पूर्णिमांत पद्धति में कृष्ण पक्ष का नाम कार्तिक हो सकता है, जबकि अमांत पंचांग में वही पक्ष आश्विन कहलाता है। इससे यह जरूरी नहीं कि दोनों कैलेंडर अलग पर्व-दिन बता रहे हों।
अष्टमी चंद्र तिथि है; यह नागरिक घड़ी की आधी रात से शुरू नहीं होती। कई परिवार सूर्यास्त के बाद स्थानीय संध्या में पूजा करते हैं। शहर का पंचांग तिथि और पूजा-मुहूर्त दिखा सकता है। व्रत खोलने की रीति भी हर जगह समान नहीं: पहले से जान लें कि घर में तारे, चंद्र-दर्शन या मंदिर का कोई अन्य नियम माना जाता है। पास के शरदकालीन पर्व के लिए हमारी दीपावली पूजा मार्गदर्शिका पढ़ें।
अहोई माता और व्रत-कथा
अहोई माता को रक्षक मातृ-स्वरूप में पूजा जाता है। उत्तर भारत में प्रचलित एक कथा में एक स्त्री घर के काम के लिए मिट्टी लेने या वन में जाती है। एक पाठ में अनजाने में उससे जंगली जीव के बच्चे को चोट पहुँच जाती है; उसे स्याहू कहा जाता है। जीव की माता उसे शाप देती है और बाद में स्त्री अपने बच्चों के वियोग से दुखी होती है। वह प्रार्थना करती, अष्टमी-व्रत रखती और अहोई माता की कृपा माँगती है।
दूसरे पारिवारिक पाठ में व्यापारी के परिवार और अहोई या स्याहू माता की भक्ति से बच्चों के फिर मिलने का प्रसंग आता है। जीव का नाम, बच्चों की संख्या और कथा का क्रम बदल सकता है। साझा भाव अनजाने नुकसान पर पछतावा, कमजोर जीवन के प्रति करुणा, प्रार्थना और परिवार के मंगल की आशा है। इसे भक्ति-कथा की तरह सुनाएँ, बीमारी या खतरे से निश्चित बचाव की गारंटी की तरह नहीं।
पूजा की सामग्री और स्थान की तैयारी
परिवार अहोई माता का दीवार पर चित्र बना सकता है, छपी तस्वीर रख सकता है या छोटी मूर्ति का पूजन कर सकता है। पारंपरिक चित्र में माता और उनके बच्चे हो सकते हैं; कुछ चित्रों में अष्टमी से जुड़ा आठ कोनों का आकार बनाया जाता है। साफ़ कपड़ा, जल-पात्र, दीप, रोली, चावल, पुष्प और साधारण भोग आम घरेलू सामग्री हैं, लेकिन पूरी सूची सब जगह समान नहीं। परिवार के बुज़ुर्ग या मंदिर से अपनी रीति पूछें।
चित्र ऐसी जगह रखें जहाँ सभी देख सकें और दीप स्थिर स्थान पर हो। पानी और भोग बच्चों तथा बुज़ुर्गों की पहुँच में रखें। सुरक्षित और परिचित वस्तुएँ ही चुनें; सजावट की महँगी सामग्री जरूरी नहीं। देखभाल, दिव्यांगता या यात्रा के कारण पूरा आयोजन कठिन हो तो छोटी प्रार्थना, कथा की रिकॉर्डिंग या वीडियो कॉल से भी परिवार जुड़ सकता है।
संध्या में सरल पूजा-विधि
सभी परिवारों के लिए एक ही पूजा-पाठ नहीं है, पर संध्या की सरल तैयारी पहले की जा सकती है। स्थानीय समय देखें, चित्र और भेंट सजाएँ तथा परिवार को सुविधाजनक समय पर शामिल करें। नीचे एक व्यावहारिक रूपरेखा है; घर की पूजा-पुस्तिका में अलग मंत्र, भोग या क्रम हो सकता है।
- पूजा-स्थान साफ़ करके अहोई माता का चित्र या प्रतिमा रखें।
- जल-पात्र, दीप, रोली, चावल, फूल और उचित भोग सजाएँ।
- अहोई माता की छोटी प्रार्थना करें और बच्चों व देखभाल करने वालों के मंगल का स्मरण करें।
- परिवार की अहोई अष्टमी कथा पढ़ें या सुनें।
- तारे या चंद्रमा को जल तभी अर्पित करें जब घर की परंपरा में ऐसा हो।
- अपनी रीति के अनुसार व्रत पूरा करें या भोजन करें।
ध्यान प्रार्थना और देखभाल पर रहे। महँगी थाली या मंत्र का पूर्ण उच्चारण माता-पिता के प्रेम का माप नहीं।
उपवास, देखभाल और स्वास्थ्य
कुछ लोग सुबह से संध्या तक उपवास रखते हैं; कुछ निर्जल व्रत करते हैं और कुछ परिवार के नियम के अनुसार पानी या भोजन लेते हैं। कठोर उपवास को अनिवार्य न मानें। गर्भवती या स्तनपान कराने वालों, बच्चों, बुज़ुर्गों, मधुमेह या अन्य स्वास्थ्य-स्थिति वाले लोगों तथा भोजन-पानी के साथ दवा लेने वालों को उपवास से पहले योग्य चिकित्सा-पेशेवर से सलाह लेनी चाहिए। व्रत पूरा करने के लिए दवा कभी न रोकें।
देखभाल करने वाले बिना उपवास के भी पूजा, कथा, दान या परिवार के भोजन से दिन मना सकते हैं। बच्चों को यह जिम्मेदारी न दें कि किसी बड़े के उपवास या पूर्ण विधि से उनकी सुरक्षा तय होगी। मंगल की प्रार्थना के साथ सामान्य देखभाल भी जरूरी है—समय पर चिकित्सा, सुरक्षित यात्रा, बच्चों पर ध्यान और जरूरत पड़ने पर मदद माँगना।
क्षेत्रीय रीति और पारिवारिक बदलाव
अहोई अष्टमी का विशेष संबंध उत्तर भारतीय परिवारों की परंपरा से है, और प्रवासी समुदाय भी इसे अपने घरों में मनाते हैं। कोई दीवार पर चित्र बनाता है, कोई छपी तस्वीर या कढ़ाई वाला वस्त्र रखता है; मंदिर-दर्शन, भोजन और कथा के पाठ भी अलग हो सकते हैं। कुछ परिवार पहले तारे दिखने पर व्रत खोलते हैं, कुछ चंद्र-दर्शन या स्थानीय नियम मानते हैं। इनमें से किसी एक को पूरे भारत की एकमात्र रीति न कहें।
भारत से बाहर तिथि स्थानीय शहर के लिए देखें। मंदिर से पूछें कि वह किस पंचांग और संध्या-पूजा के नियम का पालन करता है। अलग समय-क्षेत्रों में रहने वाले रिश्तेदार कथा सुनने का साझा समय तय कर सकते हैं, लेकिन पूजा का समय हर व्यक्ति के स्थानीय पंचांग से रखें। घर की परिचित छोटी पूजा को संदर्भ के बिना किसी और क्षेत्र की रीति जैसा बनाने की जरूरत नहीं।
आम गलतफहमियाँ
- “अहोई अष्टमी हर पंचांग में कार्तिक है।” अमांत पद्धति में वही कृष्ण पक्ष आश्विन कहलाता है।
- “सबको एक ही दर्शन पर व्रत खोलना चाहिए।” तारे, चंद्रमा और दूसरी रीति अलग हो सकती है।
- “केवल माताएँ प्रार्थना कर सकती हैं।” परिवार और देखभाल करने वाले अपनी रीति से शामिल हो सकते हैं।
- “कठोर उपवास जरूरी है।” बिना उपवास भी पूजा हो सकती है; स्वास्थ्य प्राथमिक है।
- “व्रत से बच्चे का स्वास्थ्य या भविष्य निश्चित होता है।” कथा भक्ति व्यक्त करती है, गारंटी या व्यावहारिक देखभाल का विकल्प नहीं।
उपयोगी मार्गदर्शिका स्थानीय तिथि बताती है, पूजा के एक रूप को उदाहरण कहती है और परिवार की रीति तथा व्यक्तिगत चुनाव के लिए जगह रखती है।
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सामान्य प्रश्न
पाठकों के सामान्य प्रश्नों के संक्षिप्त उत्तर।
अहोई अष्टमी को उत्तर भारत के पंचांग कार्तिक मास में और पश्चिम/दक्षिण के पंचांग आश्विन मास में क्यों दिखाते हैं?
दोनों पंचांग एक ही खगोलीय दिन—दीपावली से आठ दिन पहले कृष्ण पक्ष की अष्टमी—को दर्शाते हैं। उत्तर भारत की पूर्णिमांत पद्धति में पूर्णिमा के बाद नया महीना शुरू होने से यह कार्तिक कृष्ण अष्टमी कहलाती है, जबकि अमांत पद्धति में अमावस्या तक आश्विन मास चलने से इसे आश्विन कृष्ण अष्टमी कहा जाता है।
'अष्टकोष्ठक मंडल' क्या होता है और इसमें आठ कोने क्यों बनाए जाते हैं?
अष्टकोष्ठक का अर्थ है आठ कोनों या आठ खानों वाली आकृति। चूँकि अहोई माता की पूजा अष्टमी (आठवीं) तिथि को होती है, इसलिए दीवार पर गेरू या कागज पर आठ कोनों वाला मंडल बनाकर उसमें अहोई माता, सूर्य-चंद्रमा और स्याहु व उसके बच्चों का चित्रांकन किया जाता है।
'स्याहु माला' क्या है और अहोई अष्टमी की पूजा में इसका क्या नियम है?
स्याहु माला लाल कलावे (मौली) में पिरोई गई चाँदी की छोटी स्याहु माता की पटरी (पेंडेंट) और चाँदी के दानों की माला होती है। अहोई अष्टमी की शाम इसे कच्चे दूध व जल से धोकर चौकी पर रखकर रोली-अक्षत से पूजा जाता है और फिर दीपावली तक धारण किया जाता है।
अहोई अष्टमी पर कुछ परिवार तारों को अर्घ्य क्यों देते हैं और कुछ चंद्रमा का इंतजार क्यों करते हैं?
कृष्ण पक्ष की अष्टमी को चंद्रमा काफी देर रात (प्रायः रात 11 बजे के बाद) उदित होता है। इसलिए उत्तर भारत के अधिकांश परिवारों में संध्याकाल में आकाश में तारे निकलते ही ('तारा-दर्शन') करवे से जल अर्घ्य देकर व्रत खोलने की शास्त्रीय परंपरा है, जबकि कुछ कुल-परंपराओं में रात्रि के चंद्रोदय पर अर्घ्य दिया जाता है।
अहोई अष्टमी की पूजा में प्रयुक्त मिट्टी के करवे और उसके जल का बाद में क्या किया जाता है?
तारा या चंद्र अर्घ्य के बाद पूजा के करवे को कई घरों में दीपावली तक पूजा-स्थान पर सुरक्षित रखा जाता है और दीपावली या गोवर्धन के दिन उसके शेष जल को घर में छिड़ककर अथवा तुलसी व पीपल के पौधे में अर्पित कर दिया जाता है।
क्या गर्भवती, स्तनपान कराने वाली माताओं या दवा लेने वाले लोगों को निर्जल व्रत रखना चाहिए?
नहीं। धर्मशास्त्र के आपद्धर्म नियम और चिकित्सा विज्ञान दोनों के अनुसार गर्भवती या स्तनपान कराने वाली महिलाओं, बुज़ुर्गों और मधुमेह या नियमित दवा लेने वाले किसी भी व्यक्ति को पानी या आवश्यक भोजन व दवा कभी नहीं रोकनी चाहिए। जल-फल लेते हुए संध्या पूजा, कथा श्रवण और बयाना भेंट करना पूर्णतः श्रद्धापूर्ण और मान्य है।