संक्षिप्त उत्तर: गोवर्धन पूजा और अन्नकूट विधि क्या है?
गोवर्धन पूजा—जिसे 'अन्नकूट' (अन्न का पर्वत) उत्सव के साथ मनाया जाता है—पाँच दिवसीय दीपावली महापर्व के चौथे दिन कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि को पड़ती है। श्रीमद्भागवत महापुराण (दशम स्कंध, अध्याय 24–25) की कथा में जब बालकृष्ण ने इंद्र के अहंकार के स्थान पर गोवर्धन पर्वत, गौ-वंश, वनस्पति और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता जगाई, उसी स्मृति में घरों व मंदिरों में गोवर्धन आकृति बनाकर गो-पूजा, छप्पन भोग/अन्नकूट नैवेद्य और सात परिक्रमाएँ की जाती हैं।
- कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा (अमावस्या के बाद प्रातः या सायाह्न व्यापिनी प्रतिपदा) को गोवर्धन पूजा और अन्नकूट मनाया जाता है।
- श्रीमद्भागवत पुराण (10.24–25) में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा सात दिनों तक कनिष्ठा उँगली पर गिरिराज धारण करने का शास्त्रीय वर्णन है।
- घर या अपार्टमेंट में गोबर अथवा चावल/हलवे/मिट्टी से गिरिराज आकृति, गो-पूजा, मौसमी अन्नकूट सब्जी और सप्त-परिक्रमा का विधान है।
कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा के पंचांग नियम और श्रीमद्भागवत पुराण (10.24–25) की गिरिराज कथा
पाँच दिवसीय दीपोत्सव—धनतेरस (त्रयोदशी), नरक चतुर्दशी, लक्ष्मी पूजन (कार्तिक अमावस्या), गोवर्धन पूजा / बलि प्रतिपदा (कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा) और भाई दूज (यम द्वितीया)—के क्रम में चौथा दिन प्रकृति, कृषि और गौ-संवर्धन को समर्पित गोवर्धन पूजा का होता है। धर्मसिंधु और निर्णयसिंधु के अनुसार गोवर्धन पूजा तथा गो-पूजा के लिए कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा का प्रातःकाल अथवा सायाह्न/प्रदोष काल ग्राह्य होता है। जिस वर्ष कार्तिक अमावस्या दूसरे दिन सूर्यास्त के आसपास तक रहती है या अमावस्या के अंत में सूर्य ग्रहण पड़ता है, उस वर्ष लक्ष्मी पूजन और गोवर्धन पूजा के बीच एक दिन का अंतर आ सकता है, इसलिए सदैव अपने शहर के पंचांग में प्रतिपदा की व्याप्ति देखनी चाहिए। दीपावली के पाँचों दिनों के समन्वित पंचांग को समझने के लिए आप हमारी दीपावली: पंच-दिवसीय पंचांग, लक्ष्मी पूजन और आध्यात्मिक महत्त्व तथा पौराणिक संदर्भों के लिए दीपावली चक्र से जुड़ी प्रमुख पौराणिक कथाएँ मार्गदर्शिका पढ़ सकते हैं।
गोवर्धन पूजा का मूल शास्त्रीय आधार श्रीमद्भागवत महापुराण के दशम स्कंध (अध्याय 24 और 25) में मिलता है। ब्रज में नंदबाबा और गोपों को वर्षा के देवता इंद्र की प्रसन्नता के लिए इंद्र-याग की तैयारी करते देख बालकृष्ण अत्यंत तार्किक और पारिस्थितिक प्रश्न उठाते हैं कि गोप-समाज की आजीविका किसी दूरस्थ स्वर्गीय देवता की कृपा के भय से नहीं, बल्कि प्रत्यक्ष रूप से गोवर्धन पर्वत (गिरिराज), चरागाहों, वनों, नदियों और गायों (गौ-धन) से चलती है। श्रीकृष्ण के समझाने पर ब्रजवासी इंद्र-यज्ञ की समस्त सामग्री से गिरिराज गोवर्धन और गौ-वंश का पूजन करते हैं तथा पर्वत की परिक्रमा करते हैं। इससे क्रुद्ध होकर जब इंद्र प्रलयंकारी 'सांवर्तक' मेघों से सात दिन और सात रात मूसलाधार वर्षा कराते हैं, तब सात वर्ष के बालकृष्ण अपने बाएँ हाथ की कनिष्ठा (छोटी) उँगली पर गोवर्धन पर्वत को छत्र की तरह उठा लेते हैं और संपूर्ण ब्रज के मनुष्यों, गायों व पशु-पक्षियों की रक्षा करते हैं, जिसके बाद इंद्र का अहंकार टूटता है और कामधेनु सुरभि श्रीकृष्ण का 'गोविंद' नाम से अभिषेक करती हैं।
घर और अपार्टमेंट में चरणबद्ध गोवर्धन पूजा विधि, अन्नकूट व्यंजन और 7-परिक्रमा के नियम
ब्रज, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा, मध्य प्रदेश और बिहार के पारंपरिक आँगनों में कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा के दिन गाय के ताजे गोबर (गोमय) से लेटे हुए गिरिराज गोवर्धन की आकृति बनाई जाती है, जिसके साथ ग्वाल-बाल, गाय-बछड़े, मथनी और वृक्षों का अंकन किया जाता है। शहरों के फ्लैट, अपार्टमेंट या विदेश में रहने वाले परिवारों के लिए, जहाँ गोबर उपलब्ध न हो, वैष्णव आचार्यों और पुष्टिमार्ग (वल्लभ संप्रदाय) में पूर्णतः सात्त्विक विकल्प मान्य हैं: एक बड़ी पीतल की थाली या लकड़ी की चौकी पर पके हुए चावल, सूजी के हलवे, गेहूँ के आटे, अथवा स्वच्छ मिट्टी से छोटा गोवर्धन पर्वत बनाया जा सकता है, या गिरिराज शिला व श्रीनाथजी/गिरिधारी के चित्र का पूजन किया जा सकता है। पूजन में शास्त्रीय हिंदू पूजा के 16 चरणों (षोडशोपचार) का संक्षिप्त रूप अपनाते हुए गाय के घी का दीपक जलाया जाता है, गिरिराज आकृति पर रोली, हल्दी, अक्षत और पीले गेंदे के फूल चढ़ाए जाते हैं, नाभि-स्थान पर मिट्टी के कुल्हड़ या कटोरी में दूध, दही, शहद और खील-बताशे रखे जाते हैं तथा वृंदावन के वनों के प्रतीक रूप में तुलसी या अपामार्ग/आम की छोटी टहनियाँ लगाई जाती हैं।
इसके साथ ही रसोई में 'अन्नकूट' (अन्न का पहाड़) तैयार किया जाता है। नाथद्वारा, मथुरा द्वारकाधीश, वृंदावन बांके बिहारी व राधारमण तथा स्वामीनारायण मंदिरों में इस दिन नए चावल के ढेर और 'छप्पन भोग' (अष्टयाम की आठ सेवाओं को सात दिनों से गुणा करने पर बने 56 व्यंजन) सजाए जाते हैं। घरों में अन्नकूट का सबसे प्रसिद्ध व्यंजन 'अन्नकूट की मिक्स सब्जी' (गड्ड) है, जिसमें शरद ऋतु की 15 से 20 ताजी मौसमी सब्जियाँ (मूली, पत्ते, बैंगन, सूरन, पालक, मेथी, कद्दू, गोभी, कच्चा केला, सेम आदि) बिना प्याज-लहसुन के एक साथ पकाई जाती हैं, और इसके साथ बेसन की कढ़ी, बाजरे की खिचड़ी, गरमागरम पूड़ी तथा खीर का भोग तुलसी दल रखकर लगाया जाता है। पूजा के अंत में परिवार के सभी सदस्य हाथ में जल का लोटा और जौ/खील लेकर आँगन या चौकी पर रखे गोवर्धन की घड़ी की दिशा में सात परिक्रमाएँ (ब्रज की 7 कोस / 21 किलोमीटर की गिरिराज परिक्रमा के प्रतीक रूप में) करते हैं और 'श्री गोवर्धन महाराज, तेरे माथे मुकुट विराज रह्यो' की आरती गाकर प्रसाद बाँटते हैं।
| पूजा का घटक | पारंपरिक आँगन विधि (ब्रज / उत्तर भारत) | अपार्टमेंट और प्रवासी परिवारों के लिए विकल्प | मूल आध्यात्मिक और भक्ति सिद्धांत |
|---|---|---|---|
| गोवर्धन पर्वत आकृति | स्वच्छ आँगन में गाय के ताजे गोबर (गोमय) से पर्वत व ग्वाल बनाना | बड़ी थाली या चौकी पर पके चावल, हलवे, आटे या शुद्ध मिट्टी से पर्वत बनाना | गिरिराज गोवर्धन को प्रकृति और श्रीहरि के प्रत्यक्ष स्वरूप में पूजना। |
| वनस्पति व मेघ प्रतीक | अपामार्ग/आम की टहनियाँ, रुई के फाहे और खील-बताशे सजाना | तुलसी मंजरी, गेंदे की पंखुड़ियाँ और खील-बताशे थाली के पर्वत पर रखना | पर्वत की छत्रछाया में सुरक्षित वृंदावन की जैव-विविधता का सम्मान। |
| गो-पूजा (गौ-वंदना) | गाय-बछड़ों को स्नान कराकर हल्दी-तिलक, माला और गुड़-रोटी खिलाना | घर के मंदिर में कामधेनु प्रतिमा का पूजन और गौशाला में चारे की सेवा भेजना | कृषि व जीवन को पोषण देने वाले पशुधन के प्रति अहिंसक कृतज्ञता। |
| अन्नकूट नैवेद्य | बड़ी कड़ाही में बनी मौसमी मिक्स सब्जी, कढ़ी, बाजरा और 56 मिष्ठान्न | घर में बनी सात्त्विक अन्नकूट सब्जी, पूड़ी, कढ़ी, चावल और 5 या 7 मिठाइयाँ (तुलसी सहित) | शरद ऋतु की नई फसल का प्रथम भाग भगवान और समाज को समर्पित करना। |
| सप्त-परिक्रमा विधि | आँगन के गोवर्धन के चारों ओर जल और जौ की धारा से 7 प्रदक्षिणा | गोवर्धन की थाली को बीच में स्टूल पर रखकर परिवार सहित 7 परिक्रमा करना | ब्रज के गिरिराज जी की 7 कोस (21 किमी) परिक्रमा का भावनात्मक स्मरण। |
| पर्व का नाम | प्रमुख क्षेत्र और परंपराएँ | मुख्य आराध्य / पौराणिक प्रसंग | प्रमुख अनुष्ठानिक रीति |
|---|---|---|---|
| गोवर्धन पूजा और अन्नकूट | ब्रज (मथुरा-वृंदावन), उप्र, राजस्थान, हरियाणा, मप्र, बिहार, गुजरात | श्रीकृष्ण गिरिधारी व गिरिराज गोवर्धन (भागवत पुराण 10.24–25) | गोवर्धन आकृति पूजन, मौसमी अन्नकूट सब्जी/छप्पन भोग और 7 परिक्रमा। |
| बलि प्रतिपदा / दीपावली पाड़वा | महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु और केरल | दानवीर राजा महाबली और भगवान वामन | पाँच रंगों की रंगोली से बलि-विंध्यावली चित्रण और पति-पत्नी का पाड़वा औक्षण। |
| बेस्तु वरस (गुजराती नववर्ष) | गुजरात तथा विश्वभर के पुष्टिमार्गीय व स्वामीनारायण समाज | विक्रम संवत् कार्तिक नववर्ष और मंदिर अन्नकूट | चोपड़ा पूजन (बहीखाता), प्रातः अन्नकूट दर्शन और 'साल मुबारक' शुभकामनाएँ। |
| द्यूत प्रतिपदा और गो-क्रीड़ा | धर्मशास्त्र निबंध (निर्णयसिंधु / कृत्यरत्नाकर) | शिव-पार्वती की प्रतीकात्मक पासा-लीला और गौ-श्रृंगार | गौ-वंश को हल-श्रम से विश्राम देना, सींगों का श्रृंगार और सामुदायिक उत्सव। |
गोवर्धन कथा और भक्ति का भाव
भागवत पुराण की प्रसिद्ध कथा में कृष्ण व्रजवासियों को गोवर्धन और उनके जीवन को सहारा देने वाले परिवेश का सम्मान करने को कहते हैं। इंद्र वर्षा और तूफान भेजते हैं तो कथा के अनुसार कृष्ण पर्वत उठाकर समुदाय को आश्रय देते हैं। भक्त इस प्रसंग में रक्षा, विनम्रता, विश्वास और मनुष्य, भूमि, पशु तथा भोजन के संबंध को याद करते हैं।
यह वैष्णव भक्ति की पवित्र कथा है। परिवार उसके अलग-अलग भाव पर ध्यान दे सकते हैं; संक्षिप्त मार्गदर्शिका को धार्मिक आख्यान को वैज्ञानिक इतिहास के दावे में नहीं बदलना चाहिए। पूजा भोजन और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता जगाती है, साथ ही समुदाय की अपनी भक्ति-पद्धति से जुड़ी रहती है।
पूजा कब की जाती है?
गोवर्धन पूजा सामान्यतः कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा से जुड़ी है। कई स्थानों पर यह दीपावली के बाद आती है, फिर भी स्थानीय तिथि-गणना, सूर्योदय के नियम और क्षेत्रीय पंचांग तारीख को प्रभावित कर सकते हैं। कुछ घर पास के दूसरे पर्व के साथ समय तय करते हैं; दूसरे मंदिर की घोषणा मानते हैं।
दूसरे क्षेत्र या पिछले वर्ष की तारीख को बिना जाँच न अपनाएँ। तिथि दो नागरिक दिनों तक हो या स्थानीय मार्गदर्शन अलग लगे तो पूछें कि परिवार कौन-सी परंपरा मानता है। पूजा के लिए बहुत विस्तृत तैयारी जरूरी नहीं; घर के स्वीकार्य समय पर सरल प्रार्थना भी कर सकते हैं।
अन्नकूट और भोजन का भोग
अन्नकूट का अर्थ भोजन का पर्वत या ढेर है। मंदिर या घर में पके पकवान, अनाज, सब्जियाँ, मिठाई या अन्य भोजन नैवेद्य के रूप में सजाया जा सकता है। सूची स्थानीय सामग्री, मौसम, परिवार की पद्धति और प्रसाद पाने वाले लोगों की संख्या के अनुसार बनती है। व्यंजनों की कोई सार्वभौमिक गिनती या अनिवार्य मेन्यू नहीं है।
उतना ही भोजन बनाएँ जिसे बाँटा या सुरक्षित रखा जा सके। गर्म और ठंडे भोजन का उचित ध्यान रखें, आम एलर्जी की जानकारी दें और अलग आहार वाले मेहमानों के लिए विकल्प रखें। सजावट बड़ी दिखाने के लिए अन्न बर्बाद न करें। सादा भोग और उसका सोच-समझकर वितरण आतिथ्य और भक्ति दोनों हैं।
घर पर सरल पूजा
परिवार पूजा-स्थान साफ करके गोवर्धन का प्रतीक बना सकता है, यदि यह उसकी रीति हो; फिर कृष्ण, गोवर्धन या कुलदेवता की प्रार्थना कर भोजन का नैवेद्य अर्पित कर सकता है। कुछ घर गोबर से रूप बनाते हैं या छोटी पर्वताकार रचना रखते हैं; सामग्री और अर्थ क्षेत्र के अनुसार हैं। वही तरीका चुनें जो सहज, स्वच्छ और घर की परंपरा में स्वीकार्य हो।
- स्थानीय तिथि और पूजा का रूप निश्चित करें।
- प्रार्थना और भोग के लिए साफ, स्थिर स्थान रखें।
- परंपरा हो तो छोटा प्रतीक बनाएँ।
- परिवार के क्रम में भोजन और प्रार्थना अर्पित करें।
- प्रसाद बाँटें और स्थान सावधानी से साफ करें।
यह तैयारी का खाका है, सार्वभौमिक मंत्र-विधि नहीं। मंदिर की पूजा में अतिरिक्त चरण हो सकते हैं; वहाँ पूछें कि आगंतुक किस भाग में शामिल हो सकते हैं।
परिक्रमा और सामुदायिक आयोजन
ब्रज क्षेत्र में गोवर्धन परिक्रमा अनेक तीर्थयात्रियों की महत्वपूर्ण भक्ति-साधना है। लोग स्वास्थ्य, समय, स्थानीय व्यवस्था और अपनी श्रद्धा के अनुसार पूरी या आंशिक यात्रा कर सकते हैं। घर पर पर्व मनाने वाले हर व्यक्ति के लिए यह आवश्यक नहीं; किसी पर लंबी पैदल यात्रा का दबाव नहीं होना चाहिए।
यात्रा से पहले स्थानीय प्रशासन या मंदिर आयोजकों से मार्ग, मौसम, सुविधाओं और भीड़ के निर्देश जाँचें। पानी रखें, उपयुक्त जूते पहनें, बुज़ुर्गों और बच्चों की देखभाल करें और मार्ग न रोकें। चलना संभव न हो तो प्रार्थना या स्थानीय पूजा में सहभागिता परिवार की परंपरा में सार्थक विकल्प हो सकती है।
गायों, पशुओं और पर्यावरण की देखभाल
अनेक हिंदू समुदायों में गाय का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व है; गोवर्धन कथा में प्रकृति और जीवन की देखभाल का भाव भी है। परिवार गो-पूजन करे तो पशु के साथ कोमल व्यवहार और अनुभवी देखरेख जरूरी है। उसे अपरिचित भोजन खिलाने, रंगने, भीड़ में बाँधने या असुरक्षित यातायात में ले जाने से बचें।
भेंट और सजावट में जहाँ संभव हो जैव-अवक्रमणशील सामग्री रखें। प्लास्टिक की प्लेट, कृत्रिम माला और सार्वजनिक स्थान पर छोड़ा भोजन न हो। पशु-देखभाल, सार्वजनिक सभा और कचरे के स्थानीय नियम मानें। श्रद्धा का अर्थ मानवीय व्यवहार और साफ-सुथरा वातावरण है, दिखावा नहीं।
क्षेत्रीय भिन्नताएँ और आम गलतफहमियाँ
गोवर्धन पूजा, अन्नकूट, बली प्रतिपदा और दीपावली के बाद के अन्य पर्व पास-पास आ सकते हैं, लेकिन हर क्षेत्र में एक ही पूजा नहीं हैं। कहीं कृष्ण और गोवर्धन केंद्र में होते हैं; कहीं दिन किसी अलग स्थानीय रीति से मनाया जाता है। अलग परंपराओं को एक सार्वभौमिक कर्म न मानें और यह न मानें कि हर हिंदू परिक्रमा करता है।
इसी तरह भोजन का बड़ा पर्वत एक पहचाना जाने वाला रूप है, खर्च का पैमाना नहीं। स्थानीय रीति समझकर सुरक्षित तरीके से मनाएँ। मंदिर या परिवार के बुज़ुर्ग से पूछना अक्सर सामान्य इंटरनेट-सूची अपनाने से अधिक उपयोगी है।
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पाँच दिवसीय दीपावली पर्व-चक्र, दीपोत्सव की पौराणिक कथाओं और हिंदू उपासना के 16 पारंपरिक उपचारों को समझने के लिए नीचे दिए गए लेख पढ़ें।
सामान्य प्रश्न
पाठकों के सामान्य प्रश्नों के संक्षिप्त उत्तर।
कभी-कभी दीपावली की अगली सुबह गोवर्धन पूजा न होकर एक दिन का अंतर क्यों आ जाता है?
दीपावली की लक्ष्मी पूजा के लिए प्रदोष/निशीथ काल में कार्तिक अमावस्या आवश्यक है, जबकि गोवर्धन पूजा के लिए दिन के समय कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा होनी चाहिए। जब अमावस्या अगले दिन दोपहर बाद तक रहती है या सूर्य ग्रहण पड़ता है, तब दोनों पर्वों के बीच एक दिन का अंतर आ सकता है।
शहर के फ्लैट या अपार्टमेंट में बिना गोबर के गोवर्धन पूजा कैसे की जा सकती है?
आप एक स्वच्छ थाली या चौकी पर पके हुए चावल, सूजी के हलवे, गेहूँ के आटे या शुद्ध मिट्टी से छोटा गोवर्धन पर्वत बना सकते हैं, उसे गेंदे के फूलों और तुलसी दल से सजाकर श्रीकृष्ण गिरिधारी के चित्र के साथ पूज सकते हैं और स्टूल के चारों ओर 7 परिक्रमा कर सकते हैं।
अन्नकूट में 'छप्पन भोग' (56 व्यंजन) की संख्या का क्या रहस्य है?
वैष्णव परंपरा के अनुसार माता यशोदा बालकृष्ण को दिन के आठ प्रहरों में आठ बार भोजन कराती थीं। जब श्रीकृष्ण ने सात दिनों तक बिना कुछ खाए लगातार गोवर्धन पर्वत उठाए रखा, तब वर्षा रुकने पर ब्रजवासियों ने 8 × 7 = 56 प्रकार के व्यंजन बनाकर उन्हें अर्पित किए।
उत्तर भारत में बनने वाली पारंपरिक 'अन्नकूट सब्जी' (गड्ड) में क्या विशेष होता है?
अन्नकूट की सब्जी में शरद ऋतु में आने वाली लगभग सभी ताजी मौसमी सब्जियाँ (मूली, मूली के पत्ते, बैंगन, सूरन/जमीकंद, पालक, मेथी, कद्दू, गोभी, सेम, कच्चा केला आदि) बिना प्याज और लहसुन के एक साथ पकाई जाती हैं और कढ़ी, बाजरा व पूड़ी के साथ भोग लगाई जाती हैं।
घर के गोवर्धन की सात परिक्रमाएँ क्यों की जाती हैं?
सात प्रदक्षिणाएँ भगवान श्रीकृष्ण द्वारा सात दिन और सात रात तक गिरिराज पर्वत को धारण करने तथा मथुरा में स्थित वास्तविक गोवर्धन पर्वत की 7 कोस (लगभग 21 किलोमीटर) की पारंपरिक परिक्रमा का प्रतीक हैं।
बलि प्रतिपदा और गुजराती नववर्ष (बेस्तु वरस) का गोवर्धन पूजा से क्या संबंध है?
ये तीनों पर्व एक ही तिथि—कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा—को मनाए जाते हैं। उत्तर भारत और वैष्णव मंदिरों में यह गोवर्धन पूजा व अन्नकूट का दिन है, महाराष्ट्र व दक्षिण में दानवीर राजा बलि के सम्मान में बलि प्रतिपदा (पाड़वा) मनाई जाती है, और गुजरात में इसी दिन से विक्रम संवत् के नए वर्ष (बेस्तु वरस) का आरंभ होता है।