दीवाली की कथाएँ: आख्यान और क्षेत्रीय परंपराएँ

दीवाली से जुड़ी विविध कथाओं—राम की वापसी, नरकासुर वध, लक्ष्मी-समुद्र मंथन, बलि-वामन, जैन महावीर निर्वाण और सिख बंदी छोड़ दिवस—की स्रोत-सहित तुलना।

ज्योतिष और हिंदू परंपरालेख · 13 मिनटRead in English ↗

संक्षिप्त उत्तर: दीवाली की विविध कथाएँ साथ क्यों चलती हैं?

दीवाली को पूरे दक्षिण एशिया में किसी एक ही कथा से नहीं समझाया जा सकता। कार्तिक अमावस्या के आसपास चलने वाले पाँच-दिवसीय पर्व-चक्र में हिंदू समुदाय राम की अयोध्या वापसी, चतुर्दशी को कृष्ण व सत्यभामा द्वारा नरकासुर वध, अमावस्या को लक्ष्मी-पूजन और पूर्वी भारत में काली पूजा, प्रतिपदा को बलि-वामन तथा गोवर्धन पूजा, और द्वितीया को यम-यमुना (भाई दूज) का स्मरण करते हैं। इसी कालखंड में जैन परंपरा भगवान महावीर का निर्वाण कल्याणक और सिख परंपरा बंदी छोड़ दिवस मनाती है—जो अपने स्वतंत्र ऐतिहासिक और धार्मिक संदर्भ रखते हैं।

  • वाल्मीकि रामायण के युद्धकांड (सर्ग 127–128) में राम के आगमन और राज्याभिषेक का वर्णन है, पर उन श्लोकों में कार्तिक अमावस्या के वार्षिक दीपोत्सव का नियम नहीं लिखा है।
  • दक्षिण और पश्चिम भारत में नरक चतुर्दशी (भागवत पुराण 10.59) और बलि प्रतिपदा का विशेष महत्व है।
  • जैन महावीर निर्वाण और सिख बंदी छोड़ दिवस स्वतंत्र धार्मिक पर्व हैं; उन्हें हिंदू पौराणिक कथाओं की उप-शाखा न मानें।

राम की अयोध्या वापसी

दीवाली की सबसे जानी-पहचानी कथाओं में से एक कहती है कि वनवास और रावण पर विजय के बाद राम, सीता और लक्ष्मण अयोध्या लौटे तो नगरवासियों ने दीप जलाकर उनका स्वागत किया। यह कथा रामायण-परंपरा से जुड़ी है और उत्तर भारत की कई पारिवारिक कथाओं, रामलीला तथा सामूहिक पाठ में विशेष स्थान रखती है।

इस कथा में दीप घर-वापसी, स्वागत और कठिन समय के बाद व्यवस्था लौटने का प्रतीक बनता है। अयोध्या के उत्सव में यह जुड़ाव दिखाई देता है, पर पूरे भारत में दीवाली का यही एकमात्र अर्थ नहीं। रामायण के अलग पाठों और क्षेत्रीय कथनों में विवरण बदल सकते हैं; इसलिए इसे बहुत प्रिय और व्यापक कथा कहना उचित है, पर्व की एकमात्र ऐतिहासिक उत्पत्ति नहीं।

परिवार अपनी मान्य रामायण से अंश पढ़कर, दीप सुरक्षित जलाकर या बच्चों को कथा सुनाकर घर-वापसी और जिम्मेदारी का भाव साझा कर सकते हैं।

राम की अयोध्या वापसी: महाकाव्य के मूल पाठ और पर्व-परंपरा का संबंध

उत्तर भारत और वैश्विक लोकप्रिय संस्कृति में दीवाली पर दीप जलाने का सबसे प्रसिद्ध कारण चौदह वर्ष के वनवास और रावण-वध के बाद श्रीराम, सीता और लक्ष्मण का अयोध्या लौटना माना जाता है। अमावस्या की अंधेरी रात में नागरिकों द्वारा दीपों की पंक्तियों से स्वागत करने की यह स्मृति रामचरितमानस, रामलीला की परंपराओं और घरेलू दीपोत्सव के केंद्र में गहराई से बसी हुई है।

किंतु स्रोत-आधारित अध्ययन में यह स्पष्ट रखना आवश्यक है कि वाल्मीकि रामायण स्वयं कार्तिक अमावस्या के वार्षिक दीवाली नियम की घोषणा नहीं करती। वाल्मीकि रामायण के युद्धकांड (सर्ग 127–128) में चौदह वर्ष पूर्ण होने के बाद पंचमी तिथि को भरत से नंदिग्राम में मिलन और सजी हुई अयोध्या में राज्याभिषेक का वर्णन है, जिसे पारंपरिक टीकाकार चैत्र के ऋतु-संदर्भ से जोड़ते हैं। कार्तिक अमावस्या के शरदकालीन दीपोत्सव के साथ राम के अयोध्या-आगमन का यह गहरा जुड़ाव बाद के पौराणिक माहात्म्यों (जैसे पद्म पुराण व स्कंद पुराण के कार्तिक माहात्म्य) और जीवित लोक-परंपरा के माध्यम से स्थापित हुआ। मूल महाकाव्य के पाठ और पर्व-परंपरा—दोनों का सम्मान तभी होता है जब हम उनके अंतर को ईमानदारी से बताएँ।

कृष्ण, नरकासुर और नरक चतुर्दशी

दक्षिण भारत की कई परंपराएँ मुख्य लक्ष्मी-पूजा वाली अमावस्या से पहले के दिन को कृष्ण द्वारा नरकासुर पर विजय से जोड़ती हैं। इसी कथा की स्मृति में नरक चतुर्दशी आती है; कुछ स्थानों में इसे छोटी दीवाली भी कहते हैं। कथा में अत्याचार का अंत और पीड़ितों की मुक्ति प्रमुख है। अलग स्थानीय कथनों में कृष्ण और सत्यभामा की भूमिका का वर्णन भिन्न हो सकता है।

यह पर्व-क्रम समझाता है कि दीवाली केवल एक शाम नहीं, कई दिनों की अवधि है। कहीं भोर का स्नान, दीप, मिठाई और पारिवारिक भेंट रीति का हिस्सा हैं; फिर भी हर घर के लिए एक ही सूची नहीं है। नरक चतुर्दशी दीवाली से जुड़ी तिथि है, पर उसका महत्त्व और विधि क्षेत्र के अनुसार बदलते हैं।

कथा सुनाते समय अपने परिवार या क्षेत्र का रूप स्पष्ट करें। किसी एक प्रथा को सबके लिए मानक न बताएं।

लक्ष्मी, समृद्धि और क्षीरसागर-मंथन

अनेक घरों में लक्ष्मी-पूजा दीवाली का प्रमुख अनुष्ठान है। भक्त लक्ष्मी को समृद्धि, सौंदर्य, उदारता और शुभ आरंभ से जुड़ी देवी मानकर पूजते हैं; कई घर गणेश की पूजा भी साथ करते हैं। कुछ पुराण-कथाओं में क्षीरसागर के समुद्र-मंथन के समय लक्ष्मी के प्राकट्य का वर्णन आता है। कुछ परिवार जन्म-कथा से अधिक कृतज्ञता, ईमानदार आजीविका और घर-समाज की देखभाल पर ध्यान देते हैं।

यहाँ समृद्धि का अर्थ केवल धन नहीं: भोजन, ज्ञान, स्वास्थ्य, संबंध और बाँटने की क्षमता भी इसमें शामिल हो सकती है। सरल पूजा में स्थान साफ करना, दीप जलाना, पुष्प या मिठाई अर्पित करना और संसाधनों के जिम्मेदार उपयोग का संकल्प लेना शामिल हो सकता है। मुहूर्त और क्रम स्थानीय पंचांग तथा कुलाचार से देखें। समय-संबंधी जानकारी के लिए दीवाली लक्ष्मी-पूजा मुहूर्त की मार्गदर्शिका पढ़ें।

राजा बलि, वामन और क्षेत्रीय दीवाली-कथाएँ

पश्चिम भारत की कुछ परंपराओं में दीवाली के दिनों को राजा बलि और विष्णु के वामन अवतार से जोड़ा जाता है। यह कथा बलि प्रतिपदा और आसपास के क्षेत्रीय पर्वों में सुनाई जाती है। कुछ कथनों में बलि की उदारता और भक्ति पर बल है; कुछ में वामन के तीन पग और लोक-व्यवस्था का उल्लेख है। यह पूरे भारत में दीवाली की एकमात्र कथा नहीं, और इसकी पूजा-तिथि या प्रमुख भाव क्षेत्र से बदल सकता है।

गुजराती नववर्ष, गोवर्धन पूजा और बलि प्रतिपदा इसी उत्सवी अवधि में आ सकते हैं। कैलेंडर में पास होने से इनका अर्थ एक नहीं हो जाता। परिवार बेस्टु वरस, बलि प्रतिपदा या गोवर्धन पूजा कहे तो उस खास रीति के बारे में पूछें, उसे सामान्य दीवाली-कथा में न मिला दें।

पाँच दिनों का कथा-चक्र: नरकासुर, लक्ष्मी, बलि-वामन और काली पूजा

केवल एक कथा बताने से यह भी स्पष्ट नहीं होता कि दीवाली के पाँचों दिनों से अलग-अलग क्षेत्रों में अलग आख्यान क्यों जुड़े हैं। कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी (अमांत पंचांग में आश्विन कृष्ण चतुर्दशी) को तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, गोवा और महाराष्ट्र में ‘नरक चतुर्दशी’ प्रमुख होती है। इसका आधार भागवत पुराण (10.59), विष्णु पुराण और हरिवंश की वह कथा है जिसमें श्रीकृष्ण और सत्यभामा गरुड़ पर आरूढ़ होकर प्राग्ज्योतिषपुर के राजा नरकासुर (भौमासुर) का वध करते हैं और सोलह हजार बंदी राजकुमारियों को मुक्त कराते हैं। दक्षिण भारत के अनेक घरों में चतुर्दशी के अरुणोदय काल का तेल-स्नान (अभ्यंग स्नान) ही दीवाली का मुख्य अनुष्ठान माना जाता है, जबकि गोवा में नरकासुर के पुतले दहन किए जाते हैं।

अमावस्या की रात्रि को वैष्णव और स्मार्त परिवारों में लक्ष्मी-पूजन होता है, जिसे समुद्र-मंथन (क्षीरसागर मंथन) से लक्ष्मी और धन्वंतरि के प्राकट्य से जोड़ा जाता है; वहीं पश्चिम बंगाल, ओडिशा और असम की शाक्त परंपरा में इसी कार्तिक अमावस्या की मध्यरात्रि को ‘श्यामा पूजा’ या ‘काली पूजा’ मनाई जाती है। अगले दिन कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को पश्चिम और दक्षिण भारत में वामन अवतार व दानी राजा बलि की स्मृति में ‘बलि प्रतिपदा’ (बलिपद्यमी) तथा ब्रज व उत्तर भारत में गोवर्धन-धारण (भागवत 10.24–25) की स्मृति में अन्नकूट मनाया जाता है। पाँचवें दिन यम द्वितीया (भाई दूज) को यमराज और उनकी बहन यमुना के आतिथ्य की कथा याद की जाती है।

दीवाली के पाँच-दिवसीय पर्व-चक्र में तिथि-वार आख्यान मानचित्रदिन 1: त्रयोदशी (धनतेरस)समुद्र-मंथन से धन्वंतरि प्राकट्य; यम दीपदानस्वास्थ्य की प्रार्थना, शुभ आरंभ और सायंकालीन दीपदिन 2: चतुर्दशी (नरक चतुर्दशी)कृष्ण और सत्यभामा द्वारा नरकासुर वध (भागवत 10.59)दक्षिण भारत में अरुणोदय अभ्यंग-स्नान और गोवा में नरकासुर दहनदिन 3: अमावस्या (दीवाली / काली पूजा)लक्ष्मी पूजन, राम का स्वागत; बंगाल में श्यामा/काली पूजाजैन महावीर निर्वाण और सिख बंदी छोड़ दिवस भी इसी काल मेंदिन 4: शुक्ल प्रतिपदाराजा बलि और वामन (बलि प्रतिपदा); गोवर्धन पूजाअन्नकूट प्रसाद और गुजराती विक्रम संवत नववर्षदिन 5: शुक्ल द्वितीया (भाई दूज)यमुना द्वारा भाई यमराज का सत्कार (यम द्वितीया)भाई-बहन का स्नेह, तिलक और पारिवारिक भोजन
पाँच चंद्र-तिथियों से जुड़े विभिन्न पौराणिक, क्षेत्रीय और सामुदायिक आख्यानों को दिखाने वाला मूल आरेख।

अन्य समुदायों की दीवाली-कालीन स्मृतियाँ

दीवाली का समय उन समुदायों के लिए भी महत्त्व रखता है जिनकी कथाएँ हिंदू कथाओं से अलग हैं। अनेक जैन महावीर के निर्वाण की स्मृति दीवाली पर मनाते हैं। सिख समुदाय बंदी छोड़ दिवस मनाते हैं, जिसे गुरु हरगोबिंद की कारावास से मुक्ति से जोड़ा जाता है। ये केवल हिंदू कथा के दूसरे रूप नहीं हैं; इनके अपने समुदाय-इतिहास और अर्थ हैं।

मिश्रित परिवार या पड़ोस में एक दीवाली-समारोह में लोग अलग कारणों से शामिल हो सकते हैं, और कुछ लोग धार्मिक विधि न भी करें। पहले पूछना कि यह दिन उनके लिए क्या अर्थ रखता है, अनुमान लगाने से बेहतर है। भारत और प्रवासी समुदायों के लिए यह विशेष रूप से उपयोगी संदर्भ है, जहाँ एक सार्वजनिक छुट्टी अनेक समुदाय साझा कर सकते हैं।

अतिथि-सत्कार, स्मरण, नए आरंभ और उदारता जैसे व्यापक भाव बताए जा सकते हैं, पर हर समुदाय की विशिष्ट धार्मिक स्मृति को भी अलग सम्मान दें।

जैन और सिख परंपराओं की स्वतंत्र पहचान: महावीर निर्वाण और बंदी छोड़ दिवस

चूँकि दीवाली के समय जैन और सिख समुदाय भी दीप जलाते हैं और मंदिरों या गुरुद्वारों में एकत्र होते हैं, इसलिए कई बार सतही लेखों में उनके पर्वों को हिंदू पौराणिक कथाओं का ही हिस्सा मान लिया जाता है। जैन परंपरा में कार्तिक अमावस्या की प्रत्यूष वेला चौबीसवें तीर्थंकर भगवान महावीर के पावापुरी में मोक्ष (निर्वाण कल्याणक) और उनके प्रमुख गणधर इंद्रभूति गौतम (गौतम स्वामी) को केवलज्ञान प्राप्त होने की पुण्य स्मृति है। कल्पसूत्र की परंपरा के अनुसार जब ज्ञान का भौतिक आलोक निर्वाण को प्राप्त हुआ, तब उपस्थित गणराज्यों ने बाहरी दीपक जलाकर ज्ञान-ज्योति को स्मरण रखने का संकल्प लिया। जैन परिवार इस अवसर पर उत्तराध्ययन सूत्र का पाठ करते हैं, प्रातः निर्वाण लाडू चढ़ाते हैं और वीर निर्वाण संवत के नए वर्ष का आरंभ करते हैं।

सिख इतिहास में यह पर्व ‘बंदी छोड़ दिवस’ के रूप में मनाया जाता है। यह छठे गुरु, श्री गुरु हरगोबिंद साहिब जी द्वारा ग्वालियर के किले से बावन (52) बंदी राजाओं को अपने चोले की बावन कलियाँ पकड़वाकर मुक्त कराने और श्री अमृतसर साहिब लौटने की ऐतिहासिक स्मृति है, जहाँ श्री हरिमंदिर साहिब (स्वर्ण मंदिर) में दीपमाला कर उनका स्वागत किया गया। बाद के सिख इतिहास में भाई मनी सिंह जी की शहादत को भी इसी कालखंड में श्रद्धा से याद किया जाता है। महावीर निर्वाण और बंदी छोड़ दिवस को उनके सटीक नाम और स्वतंत्र इतिहास के साथ प्रस्तुत करना ही सम्मानजनक संपादकीय पद्धति है।

दीवाली काल के विविध आख्यानों और समुदायों की तुलनात्मक तालिका
परंपरा और पर्व का नामचंद्र-तिथि और प्रमुख क्षेत्रमुख्य ग्रंथ या ऐतिहासिक साक्ष्यध्यान रखने योग्य मुख्य अंतर
राम का अयोध्या आगमन (दीपावली)कार्तिक अमावस्या; उत्तर और मध्य भारत में प्रमुख।वाल्मीकि रामायण युद्धकांड 127–128 (राज्याभिषेक); परवर्ती पौराणिक कार्तिक माहात्म्य।मूल महाकाव्य के राज्याभिषेक वर्णन और बाद के कार्तिक अमावस्या नियम को अलग रखें।
नरक चतुर्दशीकार्तिक (या अमांत आश्विन) कृष्ण चतुर्दशी; दक्षिण भारत, गोवा, महाराष्ट्र।भागवत पुराण 10.59, विष्णु पुराण और हरिवंश।यह अमावस्या की शाम के बजाय चतुर्दशी के प्रातःकाल (अभ्यंग स्नान) पर केंद्रित है।
लक्ष्मी पूजन और समुद्र-मंथनकार्तिक अमावस्या की संध्या; अखिल भारतीय गृह व व्यापारिक पूजन।पौराणिक समुद्र-मंथन प्रसंग और पद्म/स्कंद पुराण।यहाँ केवल कथा-संदर्भ है; पूजा-विधि और मुहूर्त के लिए अलग लक्ष्मी-पूजा मार्गदर्शक देखें।
काली पूजा / दीपन्विताकार्तिक अमावस्या की मध्यरात्रि; पश्चिम बंगाल, ओडिशा, असम और मिथिला।शाक्त तांत्रिक निबंध (जैसे कृष्णानंद आगमवागीश कृत तंत्रसार)।अमावस्या की अर्धरात्रि में माँ काली की उपासना; केवल सायंकालीन लक्ष्मी पूजा नहीं।
बलि प्रतिपदा और गोवर्धन पूजाकार्तिक शुक्ल प्रतिपदा; महाराष्ट्र, कर्नाटक, गुजरात और ब्रज।भागवत पुराण अष्टम स्कंध (वामन-बलि) और 10.24–25 (गोवर्धन)।राजा बलि की दानशीलता और कृष्ण द्वारा गोवर्धन-धारण का स्मरण।
जैन महावीर निर्वाण कल्याणककार्तिक अमावस्या व प्रतिपदा प्रातः; पावापुरी और विश्वभर के जैन मंदिर।कल्पसूत्र और उत्तराध्ययन सूत्र।भगवान महावीर के मोक्ष और गौतम स्वामी के केवलज्ञान की स्वतंत्र जैन स्मृति।
सिख बंदी छोड़ दिवसदीवाली के समय; श्री अमृतसर साहिब और विश्वभर के गुरुद्वारे।गुरु हरगोबिंद साहिब जी द्वारा ग्वालियर से 52 राजाओं की मुक्ति का सिख इतिहास।न्याय और मुक्ति से जुड़ा ऐतिहासिक सिख पर्व; यह पौराणिक आख्यान नहीं है।
दीवाली की कथाएँ साझा करने से पहले स्रोत-जाँच की सूची
आम सामान्यीकरणस्रोत-सम्मत सटीक कथनव्यावहारिक पूजा के लिए कहाँ देखें
“वाल्मीकि रामायण में लिखा है कि राम कार्तिक अमावस्या को लौटे।”वाल्मीकि रामायण युद्धकांड 127–128 में राम की वापसी और अभिषेक का वर्णन है; कार्तिक अमावस्या के दीपोत्सव से जुड़ाव पौराणिक व क्षेत्रीय परंपरा का है।पर्व के समग्र परिचय के लिए हमारा मुख्य दीवाली महत्व पृष्ठ देखें।
“पूरे भारत में एक ही कारण से एक ही दिन दीवाली मनाई जाती है।”दक्षिण की नरक चतुर्दशी, बंगाल की काली पूजा, पश्चिम की बलि प्रतिपदा, जैन निर्वाण और सिख बंदी छोड़ दिवस अलग-अलग दिन व आख्यान रखते हैं।कथा बताते समय क्षेत्र, समुदाय और चंद्र-तिथि स्पष्ट लिखें।
“इसी कथा-लेख में इस वर्ष का लक्ष्मी पूजा मुहूर्त मिलेगा।”यह पृष्ठ आख्यानों और स्रोतों की तुलना के लिए है; वार्षिक प्रदोष मुहूर्त और पूजा-विधि के लिए समर्पित पूजा मार्गदर्शक बना है।घर व कार्यालय की पूजा के लिए लक्ष्मी पूजा समय और विधि मार्गदर्शक देखें।

इन कथाओं को सम्मान से कैसे साझा करें

  1. कथा के साथ उसका क्षेत्र, समुदाय या ग्रंथ-परंपरा बताएं।
  2. रूप अलग हों तो “एक प्रचलित कथा के अनुसार” जैसे शब्द चुनें।
  3. धार्मिक आख्यान को निश्चित तिथि वाली ऐतिहासिक घटना के दावे से अलग रखें।
  4. बच्चों को अलग परिवारों के दीप, स्वागत या विजय के अर्थ समझने दें।
  5. पूज्य पात्रों को रूढ़ छवि या तुलना का साधन न बनाएं।

घर में रामायण या पुराण के भरोसेमंद अनुवाद, स्थानीय रामलीला, मंदिर की कथा या परिवार के बुज़ुर्ग से सीखी बात सुनाई जा सकती है। किसी समुदाय की कथा मालूम न हो तो पहले सुनें और अपनी परंपरा को स्पष्ट रूप से नाम दें। पर्व की विधि और प्रतीक के व्यापक परिचय के लिए दीवाली के महत्त्व की मार्गदर्शिका देखें।

किन गलतियों से बचें

  • कहना कि हर हिंदू राम की अयोध्या-वापसी के लिए ही दीवाली मनाता है।
  • नरकासुर-कथा को दक्षिण भारत की एकमात्र दीवाली-परंपरा बताना।
  • जैन और सिख पर्वों को हिंदू कथाएँ कहना।
  • हर पुराण-कथा और क्षेत्रीय रूप को समान मानना।
  • कई दिनों के उत्सव को एक तय पूजा-क्रम में समेट देना।
  • कथा से यह निष्कर्ष निकालना कि समृद्धि केवल धन है या कठिनाई किसी गलती का दंड है।

दीवाली की विविधता तब स्पष्ट होती है जब कई कथाओं का परिचय दिया जाए, हर एक का क्षेत्र बताया जाए और परिवार की अपनी रीति के लिए जगह छोड़ी जाए।

आगे पढ़ें

दीवाली के समग्र पर्व-परिचय, घर व कार्यालय की लक्ष्मी पूजा विधि और कार्तिक पूर्णिमा के लिए नीचे दिए गए मार्गदर्शक देखें।

सामान्य प्रश्न

पाठकों के सामान्य प्रश्नों के संक्षिप्त उत्तर।

दीवाली के पीछे एक से अधिक कथाएँ क्यों प्रचलित हैं?

क्योंकि दीवाली कार्तिक अमावस्या के आसपास पाँच चंद्र-तिथियों का पर्व-समूह है और विभिन्न क्षेत्रों व धर्म-परंपराओं में मनाई जाती है; इसलिए अलग समुदाय इसे राम, कृष्ण, लक्ष्मी, काली, बलि, भगवान महावीर या गुरु हरगोबिंद साहिब जी से जोड़ते हैं।

क्या वाल्मीकि रामायण में कार्तिक अमावस्या की दीवाली का सीधा आदेश है?

वाल्मीकि रामायण के युद्धकांड (127–128) में राम के नंदिग्राम व अयोध्या आगमन और राज्याभिषेक का वर्णन है, जबकि कार्तिक अमावस्या के वार्षिक दीपोत्सव के साथ इसका समन्वय परवर्ती पुराणों और जीवित लोक-परंपरा में विकसित हुआ।

दक्षिण भारत और गोवा में नरक चतुर्दशी का इतना महत्व क्यों है?

तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र-तेलंगाना और गोवा में चतुर्दशी को कृष्ण व सत्यभामा द्वारा नरकासुर वध (भागवत पुराण 10.59) की स्मृति में अरुणोदय के तैल-स्नान (अभ्यंग स्नान) या पुतला-दहन के साथ मुख्य उत्सव मनाया जाता है।

जैन परंपरा में दीवाली के दिन क्या मनाया जाता है?

जैन समाज कार्तिक अमावस्या को चौबीसवें तीर्थंकर भगवान महावीर के पावापुरी में निर्वाण (मोक्ष कल्याणक) और गणधर गौतम स्वामी के केवलज्ञान की स्मृति में दीप प्रज्वलन व निर्वाण लाडू अर्पण करता है।

सिख परंपरा में ‘बंदी छोड़ दिवस’ क्या है?

बंदी छोड़ दिवस छठे सिख गुरु, श्री गुरु हरगोबिंद साहिब जी द्वारा ग्वालियर के किले से 52 बंदी राजाओं को मुक्त कराकर श्री अमृतसर साहिब लौटने की ऐतिहासिक स्मृति है।

घर और कार्यालय के लिए लक्ष्मी पूजा की विधि और मुहूर्त कहाँ देखें?

यह लेख आख्यानों और क्षेत्रीय परंपराओं की तुलना पर केंद्रित है; चरण-दर-चरण पूजा विधि और प्रदोष काल के नियम के लिए हमारा समर्पित लक्ष्मी पूजा समय और विधि मार्गदर्शक देखें।

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