हर नवचंद्र या पूर्ण चंद्र पर ग्रहण क्यों नहीं होता?
चंद्र की कक्षा पृथ्वी के कक्षीय तल, यानी क्रांतिवृत्त, से करीब 5° झुकी है। अधिकांश नवचंद्रों पर उसकी छाया पृथ्वी के ऊपर या नीचे निकल जाती है। अधिकांश पूर्ण चंद्रों पर चंद्र पृथ्वी की छाया से बचकर जाता है। ग्रहण के लिए उचित कला उस जगह के पर्याप्त पास होनी चाहिए जहाँ चंद्र की कक्षा क्रांतिवृत्त को काटती है। इन दो बिंदुओं को पात या nodes कहते हैं।
नवचंद्र या पूर्ण चंद्र संरेखण की एक शर्त पूरी करते हैं। उनसे अपने आप तीनों पिंड तीन आयामों में ग्रहण के लिए पर्याप्त पास की रेखा में नहीं आ जाते। NASA के ग्रहण-ज्यामिति विवरण का मुख्य अंतर यही है।
कला और कक्षीय ऊँचाई अलग जानकारियाँ हैं
खगोलीय नवचंद्र पर चंद्र और सूर्य का भूकेन्द्रीय क्रांतिवृत्तीय देशांतर बराबर होता है। पूर्ण चंद्र के पास यह अंतर 180° होता है। देशांतर संदर्भ-तल के चारों ओर स्थिति बताता है; उससे यह नहीं पता चलता कि चंद्र उस तल के कितना ऊपर या नीचे है।
दूसरा निर्देशांक क्रांतिवृत्तीय अक्षांश है। यह आपके शहर का भौगोलिक अक्षांश नहीं है और स्थानीय क्षितिज से चंद्र की ऊँचाई भी नहीं। “अक्षांश” और “ऊँचाई” के इन अलग प्रयोगों को मिला देने से ग्रहण का चित्र समझना कठिन हो जाता है।
सूर्य ग्रहण में चंद्र पृथ्वी और सूर्य के बीच होता है तथा उसकी छाया पृथ्वी के किसी हिस्से तक पहुँचती है। चंद्र ग्रहण में पृथ्वी सूर्य और चंद्र के बीच होती है तथा चंद्र पृथ्वी की छाया में प्रवेश करता है। आवश्यक कला के बिना केवल पात पार करना किसी ग्रहण के लिए पर्याप्त नहीं है।
चंद्र के पात वास्तव में क्या हैं?
दो झुके कक्षीय तल एक रेखा पर मिलते हैं। चंद्र उस रेखा के दो विपरीत बिंदुओं पर क्रांतिवृत्त पार करता है। आरोही पात पर वह क्रांतिवृत्त के दक्षिणी पक्ष से उत्तरी पक्ष में जाता है; अवरोही पात पर उल्टी दिशा में पार करता है।
ये ज्यामितीय बिंदु हैं, छाया डालने वाले अतिरिक्त भौतिक पिंड नहीं। ज्योतिष में प्रयुक्त खगोलीय संबंध में राहु और केतु क्रमशः आरोही और अवरोही चंद्र पात हैं। माध्य और स्पष्ट पात का लेख बताता है कि अलग गणना-मॉडल में उनके निर्देशांक अलग क्यों दिख सकते हैं।
पात का देशांतर कक्षीय ज्यामिति समझने में उपयोगी है। उस बिंदु से जोड़ा ज्योतिषीय अर्थ अलग व्याख्या है; वह ग्रहण निकालने के लिए आवश्यक सूर्य, चंद्र और पृथ्वी की स्थितियों की जगह नहीं लेता।
छोटा ज्यामितीय उदाहरण: तल को पार करना और उससे दूर होना
ठीक 5° झुकी काल्पनिक वृत्ताकार कक्षा लें। u उस झुकी कक्षा के भीतर आरोही पात से मापा कोण है। यह कक्षीय कोण है, मेष से मापा चंद्र का क्रांतिवृत्तीय देशांतर नहीं। इस मॉडल में अक्षांश का संबंध है: sin β = sin 5° × sin u।
| आरोही पात से कक्षीय कोण u | क्रांतिवृत्तीय अक्षांश β |
|---|---|
| 0 | 0.000000 |
| 30 | 2.497619 |
| 90 | 5.000000 |
| 180 | 0.000000 |
| 210 | -2.497619 |
| 270 | -5.000000 |
u = 0° और 180° पर चंद्र संदर्भ-तल में है: यही दो पार करने वाले स्थान हैं। 90° और 270° पर इस मॉडल में वह उत्तर या दक्षिण की सबसे अधिक दूरी तक जाता है। केवल एक ओर से बना चित्र यह अंतर छिपा सकता है, जिससे हर नवचंद्र वास्तविकता से अधिक सीधी रेखा में दिखता है।
सारणी में सूर्य की स्थिति, पिंडों की दूरियाँ या दिखाई देने वाले बिंबों के आकार नहीं हैं। इसलिए वह ग्रहण होने या उसके पूर्ण होने का निर्णय नहीं कर सकती। उसका उद्देश्य छूटा हुआ आयाम दिखाना है। वास्तविक पूर्वानुमान समय के साथ बदलती कक्षा और पूरी छाया-ज्यामिति लेते हैं।
ग्रहण ऋतु क्या होती है?
ग्रहण ऋतु वह समय-खिड़की है जब सूर्य चंद्र के किसी पात के पर्याप्त पास होता है और उचित नवचंद्र या पूर्ण चंद्र पर ग्रहण हो सकता है। NASA Goddard का विवरण लगभग 34–35 दिन की खिड़की तथा ऋतुओं के मध्यबिंदुओं में औसतन करीब 173.3 दिन का अंतर बताता है।
सिनोडिक माह लगभग 29.53 दिन का है, इसलिए एक ऋतु में लगातार आने वाली संबंधित कलाएँ और कभी एक से अधिक नवचंद्र भी आ सकते हैं। इससे ग्रहण की तारीखें समूह में दिखने का कारण समझ आता है। इसका अर्थ हर स्थान से उस समूह के सभी ग्रहण दिखना नहीं है।
पिंड और छायाएँ आकार रखते हैं, इसलिए संभावना की खिड़की कुछ चौड़ी होती है; चंद्र का केंद्र ठीक पात पर होना अनिवार्य नहीं। दूरियाँ बदलने से सीमा की ज्यामिति भी बदलती है। “पात के पास” को समझाने का तरीका मानें, सभी ग्रहण प्रकारों का एक सार्वभौम संख्यात्मक परीक्षण नहीं।
ग्रहण ऋतुएँ कैलेंडर में क्यों खिसकती हैं?
चंद्र पात धीरे-धीरे पश्चिम की ओर पीछे जाते हैं। सूर्य अगली पात-दिशा तक आधे कैलेंडर-वर्ष से कुछ कम समय में लौटता है। गोल औसत अंतर को केवल शिक्षण मॉडल में लगाएँ:
| मध्यबिंदु क्रमांक | आरंभ से मॉडल-दिन |
|---|---|
| 0 | 0.0 |
| 1 | 173.3 |
| 2 | 346.6 |
| 3 | 519.9 |
दो अंतराल मिलकर 346.6 दिन होते हैं। 365.24-दिन के मॉडल-वर्ष की तुलना में यह लगभग 18.64 दिन पहले है। इसलिए ऋतुएँ कैलेंडर की तारीखों में खिसकती हैं; वे हमेशा मार्च और सितंबर के विषुव से बँधी नहीं रहतीं।
ये संख्याएँ ऋतु के मध्यबिंदु बताती हैं, अलग-अलग ग्रहण नहीं। किसी ज्ञात ग्रहण के समय में 173.3 दिन जोड़ना अगले ग्रहण का समय, प्रकार या दृश्य-पथ निकालने की विश्वसनीय विधि नहीं है। वास्तविक घटना को कला और छाया की शर्तें भी पूरी करनी होंगी।
चंद्र माह की दो लंबाइयों का लेख यहाँ की कला-संबंधी घड़ी समझाता है। पात का चक्र एक और संदर्भ-चक्र है; एक अवधि को बाकी सभी अवधियों की जगह नहीं रखा जा सकता।
पृथ्वी पर ग्रहण होना और आपके शहर से दिखना अलग दावे हैं
पृथ्वी पर कहीं सूर्य ग्रहण हो सकता है, जबकि आपका शहर छाया-पथ से बाहर हो। चंद्र ग्रहण के संबंधित भाग को देखने के लिए चंद्र आपके क्षितिज के ऊपर होना चाहिए। बादल और भू-आकृति देखने को प्रभावित कर सकते हैं, लेकिन उनसे वैश्विक घटना का होना नहीं बदलता।
असली घटना के लिए खगोलीय सूची से प्रकार और समय लें, फिर स्थान-विशेष की दृश्यता जाँचें। स्थानीय क्षितिज के संदर्भ के लिए चंद्रोदय-चंद्रास्त और चरण समझने के लिए चंद्रग्रहण संपर्क-समय का लेख देखें। केवल उदय-अस्त समय ग्रहण की गणना नहीं करते।
इसी तरह अमावस्या-पूर्णिमा कैलेंडर कैलेंडर का प्रश्न हल करता है। उसकी सूची में प्रत्येक पर्व पर ग्रहण का वादा नहीं है। कला, कक्षीय संरेखण, स्थानीय दृश्यता और कैलेंडर-पद्धति चार अलग प्रश्न हैं; उन्हें स्पष्ट रखना उपयोगी है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
क्या पूर्ण चंद्र पर सूर्य ग्रहण हो सकता है?
नहीं। सूर्य ग्रहण के लिए नवचंद्र वाली स्थिति चाहिए, जिसमें चंद्र पृथ्वी और सूर्य के बीच है। चंद्र ग्रहण पूर्ण चंद्र पर होता है, जब पृथ्वी सूर्य और चंद्र के बीच होती है।
क्या हर बार पात पार करने पर ग्रहण होता है?
नहीं। पात पर चंद्र क्रांतिवृत्तीय तल में आता है, लेकिन उचित कला और पर्याप्त निकट छाया-संरेखण भी चाहिए।
क्या राहु-केतु ग्रहण की छाया डालने वाले अतिरिक्त पिंड हैं?
खगोलीय विवरण में नहीं। वे चंद्र की कक्षा के आरोही और अवरोही पात से संबंधित हैं। भौतिक छाया चंद्र या पृथ्वी डालते हैं।
क्या ग्रहण ऋतु हमेशा मार्च और सितंबर में होती है?
नहीं। मध्यबिंदुओं के बीच औसतन लगभग 173.3 दिन हैं और पात-दिशाएँ पीछे जाती हैं। ऋतुएँ विषुव से स्थायी रूप से जुड़ी रहने के बजाय कैलेंडर में खिसकती हैं।
क्या 173.3 दिन जोड़कर अगला ग्रहण निकाल सकते हैं?
नहीं। यह अनुमानित संख्या ऋतुओं के मध्यबिंदुओं का अंतर है। अलग ग्रहण के लिए उचित कला, ज्यामिति और दूरियाँ चाहिए; स्थानीय दृश्यता की गणना भी अलग है।
क्या ग्रहण ऋतु का मतलब मेरे शहर में ग्रहण दिखेगा?
नहीं। वैश्विक ग्रहण आपके स्थान से अदृश्य हो सकता है। सूर्य ग्रहण का स्थान-विशेष पूर्वानुमान और चंद्र ग्रहण के समय चंद्र की क्षितिज-स्थिति जाँचें।