शुक्र की कलाएँ: सुबह-शाम का तारा और एलॉन्गेशन

शुक्र की कलाएँ, सूर्य से कोणीय दूरी और बदलता आकार मूल ग्राफ तथा गणना से समझें; प्रकाशित प्रतिशत, चमक और स्थानीय दृश्यता का अंतर जानें।

पंचांग और कैलेंडरलेख · 13 मिनटRead in English ↗

लेखन और प्रकाशन: Astrogyana

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शुक्र कभी सुबह और कभी शाम का तारा क्यों कहलाता है?

शुक्र एक ही ग्रह है जिसकी कक्षा पृथ्वी की कक्षा के भीतर है। आकाश में सूर्य से पूर्व की ओर उसकी स्थिति शाम के परिचित दर्शन से जुड़ती है; सूर्य से पश्चिम की ओर स्थिति सुबह के दर्शन से। उसका प्रकाशित भाग हमें किस कोण से दिखता है, उससे कला बदलती है। सुबह और शाम का तारा दो अलग तारे नहीं हैं।

NASA की अंतरिक्ष-उड़ान मार्गदर्शिका अंतःसंयोग और बहिःसंयोग तथा भीतरी ग्रहों की कलाओं का भेद बताती है। यहाँ एक मूल वृत्ताकार मॉडल उसी ज्यामिति को गणना से खोलता है। इसमें तारीख, शहर, क्षितिज या मौसम का इनपुट नहीं है। इसलिए तालिकाएँ आज रात शुक्र खोजने का नक्शा नहीं, समझने के उदाहरण हैं।

एलॉन्गेशन, कला-कोण और कक्षीय कोण अलग रखें

एक चित्र में तीन कोण और दो अलग दूरी-संबंधी प्रश्न
चिह्नकहाँ से मापते हैंक्या बताता है
ψसूर्यपृथ्वी और शुक्र की सूर्य-केंद्रित दिशाओं का अंतर।
εपृथ्वीसूर्य और शुक्र की दिखने वाली कोणीय दूरी।
αशुक्रसूर्य और पृथ्वी की दिशाओं का कला-कोण।
dपृथ्वी से शुक्रदो पिंडों के बीच दूरी, कोण नहीं।
kदिखने वाली डिस्कआदर्श गोले की प्रकाशित डिस्क का अनुपात, चमक नहीं।

सूर्य, पृथ्वी और शुक्र को एक त्रिभुज के तीन कोने मानें। शुक्र सूर्य से कितना दूर दिखता है, यह पृथ्वी वाले कोने का प्रश्न है। शुक्र के प्रकाशित मुख का कितना हिस्सा हमारी ओर है, इसमें शुक्र वाले कोने का कोण लगता है। सूर्य के चारों ओर दोनों ग्रहों की दिशाओं का अंतर तीसरे कोने से मापा जाता है। इन तीनों को मिलाने से उत्तर संख्यात्मक दिख सकता है, लेकिन अर्थ गलत हो जाता है।

कला का प्रतिशत सामने दिखने वाली गोल डिस्क के प्रकाशित हिस्से का अनुपात है। यह पूरे ग्रह की सतह का प्रकाशित प्रतिशत नहीं है। आदर्श गोलाकार चित्र में लगभग आधी सतह सूर्य की ओर रहती है। इसी तरह पचास प्रतिशत प्रकाशित डिस्क का अर्थ पृथ्वी पर पहुँचने वाली रोशनी अपने अधिकतम की ठीक आधी होना भी नहीं है।

सूर्य से पूर्व का शुक्र शाम को पश्चिम में कैसे दिख सकता है?

दोनों वाक्यों के संदर्भ अलग हैं। सूर्य से पूर्व का अर्थ आकाश में सूर्य के सापेक्ष शुक्र की दिशा है। शाम का पश्चिमी आकाश आपके स्थानीय क्षितिज का भाग है। सूर्य से पूर्व स्थित आकाशीय स्थान सूर्य के बाद अस्त होने की ओर जा सकता है। इसलिए दोनों वर्णन साथ सही हो सकते हैं।

इसी तरह पश्चिमी एलॉन्गेशन सुबह के दर्शन से जुड़ता है, जब ग्रह अक्सर पूर्वी क्षितिज की ओर दिखाई देता है। पश्चिमी एलॉन्गेशन सुनकर भोर में पश्चिम देखने का निष्कर्ष न निकालें। सूर्य के सापेक्ष दिशा और जमीन पर खड़े व्यक्ति की कंपास दिशा एक ही चीज नहीं हैं।

इन नामों से अकेले ऊँचाई या अस्त होने में बचा समय नहीं मिलता। ग्रह का मार्ग क्षितिज से किस कोण पर मिलता है, आपका अक्षांश और तारीख क्या है, यह सब जरूरी है। एलॉन्गेशन को 15° प्रति घंटे से भाग देकर शाम में बचे घंटे निकालना विश्वसनीय स्थानीय दृश्यता-गणना नहीं है।

दो संयोगों में दूरी और कला बहुत अलग होती हैं

अंतःसंयोग में शुक्र लगभग पृथ्वी और सूर्य के बीच होता है। बहिःसंयोग में वह लगभग सूर्य की दूसरी ओर होता है। दोनों स्थितियों में हमारे आकाश में वह सूर्य के पास आता है, लेकिन पृथ्वी से दूरी और हमारी ओर मुड़ा प्रकाशित भाग अलग होते हैं।

एक ही तल वाले आदर्श मॉडल में निकट संरेखण पर अंधेरा मुख और दूर संरेखण पर प्रकाशित मुख हमारी ओर आता है। ये ज्यामितीय अंतिम स्थितियाँ हैं। वास्तविक आकाश में पूरा या नया शुक्र साफ दिखेगा, ऐसा वादा इनमें नहीं है। सूर्य की चकाचौंध और वास्तविक संरेखण को अलग देखना पड़ता है।

हर अंतःसंयोग सूर्य के सामने शुक्र का पारगमन नहीं होता। वास्तविक कक्षाएँ ठीक एक तल में नहीं हैं। NASA लगभग संरेखण और सूर्य की डिस्क पार करने वाली सटीक दृष्टि-रेखा में अंतर रखता है। नीचे का मॉडल कक्षा का झुकाव छोड़ता है, इसलिए उससे पारगमन की तारीख या उसका होना नहीं निकाला जा सकता।

सरल और खुली मान्यताओं वाला वृत्ताकार मॉडल

सूर्य को (0, 0), पृथ्वी को (1, 0) और शुक्र को (r cos ψ, r sin ψ) पर रखें। यहाँ r = 0.72 है। NASA शुक्र की औसत सूर्य-दूरी लगभग 0.72 AU बताता है; हम इसी गोल किए अनुपात को अभ्यास में ले रहे हैं। दोनों कक्षाएँ वृत्ताकार और एक तल में हैं। चित्र में पृथ्वी को स्थिर रखना सूर्य-पृथ्वी रेखा के सापेक्ष दिशा मापना है, पृथ्वी की असली गति रोकना नहीं।

ψ को 0° से 180° तक बदलने पर निकट संरेखण से एक ओर होते हुए दूर संरेखण तक पहुँचते हैं। ग्राफ का क्षैतिज अक्ष कोण है, बीते दिन नहीं। दूसरी आधी विन्यास-श्रृंखला इन निरपेक्ष दूरी, एलॉन्गेशन और कला मानों की दर्पण-समान पुनरावृत्ति देती है। तारीख वाला नक्शा बनाने के लिए गति की दिशा और दर भी चाहिए।

पाइथागोरस से पृथ्वी-शुक्र दूरी d = √(1 + r² − 2r cos ψ) मिलती है। इकाई इस मॉडल की पृथ्वी-कक्षा त्रिज्या है। ψ = 0° पर d = 0.28 और 180° पर d = 1.72 आता है। ये घोषित वृत्तों के सटीक उत्तर हैं, वास्तविक शुक्र की अत्यंत सटीक न्यूनतम और अधिकतम दूरी नहीं।

कोणीय दूरी, प्रकाशित अंश और आकार निकालें

इसी त्रिभुज से cos ε = (1 − r cos ψ) / d और cos α = (r − cos ψ) / d मिलते हैं। गोलाकार डिस्क का प्रकाशित अनुपात k = (1 + cos α) / 2 है। प्रतिशत के लिए k को सौ से गुणा करें। कैलकुलेटर में डिग्री और रेडियन का मोड जाँचना जरूरी है; सूत्र में अंक सही डालने पर भी गलत मोड उत्तर बदल देगा।

एक ही भौतिक व्यास वाला बहुत दूर का पिंड छोटे-कोण सन्निकटन में लगभग 1/d के अनुपात में बड़ा दिखता है। नीचे अंतिम स्तंभ यही सापेक्ष आकार है, जिसकी आधार दूरी एक मॉडल इकाई है। वह arcsecond में कोणीय व्यास नहीं है। हमने ग्रह का भौतिक व्यास या कैमरे का मापन-पैमाना सूत्र में नहीं दिया।

ψ = 90° पर दूरी √1.5184, लगभग 1.2322 है। प्रकाशित भाग लगभग 79.22% और एलॉन्गेशन लगभग 35.754° आता है। इसलिए सूर्य वाले कोने पर समकोण होने से शुक्र आधा प्रकाशित नहीं बनता। आधी कला के लिए शुक्र वाला कोण α समकोण होना चाहिए।

नौ स्थितियों के उत्तर साथ रखकर पढ़ें

आदर्श वृत्ताकार मॉडल: पृथ्वी की त्रिज्या 1, शुक्र की 0.72; वास्तविक तारीखें नहीं
सूर्य पर ψपृथ्वी से दूरीएलॉन्गेशन εप्रकाशित डिस्कसापेक्ष व्यास 1/d
0.000°0.28000.000°0.00%3.571
15.000°0.357031.463°15.56%2.801
30.000°0.520943.720°35.98%1.920
43.946°0.694046.054°50.00%1.441
60.000°0.893544.254°62.31%1.119
90.000°1.232235.754°79.22%0.812
120.000°1.496124.631°90.77%0.668
150.000°1.663012.502°97.69%0.601
180.000°1.72000.000°100.00%0.581

180° से 0° की ओर पंक्तियाँ पढ़ें। यह दूर संरेखण से निकट संरेखण की ओर ज्यामितीय बढ़त है। पूरी डिस्क का सापेक्ष व्यास बढ़ता है, जबकि प्रकाशित प्रतिशत घटता है। एलॉन्गेशन पहले बढ़कर अधिकतम होता है, फिर घटता है। तीनों संख्याएँ एक साथ ऊपर या नीचे नहीं जातीं।

सबसे बड़े और छोटे सापेक्ष व्यास का अनुपात 1.72/0.28, लगभग 6.14 है। यह पूरी डिस्क के व्यास की तुलना है। इससे पतला चंद्राकार शुक्र छह गुना अधिक चमकीला होना या सबसे निकट संरेखण पर दिखाई देना सिद्ध नहीं होता। तालिका से संख्या लेते समय उसका नाम और इकाई साथ रखना आवश्यक है।

किसी तारीख की तस्वीर से तुलना करनी हो तो पहले जाँचें कि तस्वीर में पूरा व्यास किस पैमाने पर है। अलग-अलग कटे और स्क्रीन पर बराबर चौड़ाई में रखे चित्र इस तालिका के सापेक्ष व्यास का परीक्षण नहीं हैं। दृश्य रूप से बड़ा दिखता चित्र वास्तव में केवल अधिक बड़ा करके प्रदर्शित किया गया हो सकता है।

मूल ग्राफ में दोनों पैनल कैसे पढ़ें?

शून्य से 180 अंश सूर्य-केंद्रित कोण पर दो मॉडल ग्राफ: ऊपर शुक्र का एलॉन्गेशन लगभग 46 अंश तक बढ़कर घटता है, नीचे प्रकाशित डिस्क शून्य से सौ प्रतिशत तक बढ़ती है। खड़ी रेखा आधी कला और अधिकतम एलॉन्गेशन का साझा आदर्श विन्यास दिखाती है।
मूल ग्राफ में हर 0.5° पर कुल 361 विन्यास हैं। ऊपर निरपेक्ष एलॉन्गेशन और नीचे प्रकाशित डिस्क का प्रतिशत है। पृथ्वी त्रिज्या 1 और शुक्र 0.72; वृत्ताकार, एकतलीय मॉडल में तारीख या स्थानीय क्षितिज शामिल नहीं।

खड़ी रेखा ऊपर के अधिकतम को नीचे के पचास प्रतिशत से जोड़ती है। नीचे का वक्र वहाँ अधिकतम नहीं होता जहाँ ऊपर वाला होता है। एक पैनल को दूसरे का विकल्प मान लेने पर सूर्य से दूरी और प्रकाशित भाग का अंतर छूट जाएगा।

इस मॉडल में अधिकतम एलॉन्गेशन पर आधी कला क्यों?

अधिकतम एलॉन्गेशन पर पृथ्वी से शुक्र की दृष्टि-रेखा शुक्र की वृत्ताकार कक्षा की स्पर्शरेखा है। वृत्त की त्रिज्या स्पर्शरेखा से समकोण बनाती है। इसलिए शुक्र वाला कोण α = 90°, cos α = 0 और k = 0.5 होता है। उसी समकोण त्रिभुज से sin εmax = r मिलता है।

r = 0.72 रखने पर अधिकतम ε लगभग 46.054° और ψ = arccos(0.72), लगभग 43.946° है। वहाँ पृथ्वी-शुक्र दूरी √(1 − 0.72²), लगभग 0.6940 है। आधी कला का परिणाम इस वृत्ताकार ज्यामिति से निकला है। इसे वास्तविक प्रेक्षण में आधी कला और अधिकतम एलॉन्गेशन हमेशा बिल्कुल एक ही क्षण होने का दावा न बनाएँ।

ग्राफ ज्यामितीय मोड़ दिखाता है, किसी शहर का सबसे अच्छा अवलोकन दिन नहीं। बड़ी सूर्य-दूरी के बावजूद स्थानीय क्षितिज पर ग्रह की ऊँचाई कम हो सकती है। बादल, धुंध और संध्या का प्रकाश व्यावहारिक दृश्यता में अलग भूमिका निभाते हैं।

एक ही एलॉन्गेशन पर दो अलग कलाएँ संभव हैं

एक ही कोणीय दूरी, दो अलग मॉडल स्थितियाँ; सुबह-शाम का चुनाव इससे अकेले नहीं होता
एलॉन्गेशनशाखापृथ्वी से दूरीप्रकाशित डिस्क
10°निकट शाखा0.28611.48%
10°दूर शाखा1.683698.52%
20°निकट शाखा0.30616.00%
20°दूर शाखा1.573394.00%
30°निकट शाखा0.348014.02%
30°दूर शाखा1.384185.98%
40°निकट शाखा0.441727.47%
40°दूर शाखा1.090472.53%

अधिकतम से छोटे कोण पर पृथ्वी से निकली किरण शुक्र के वृत्त को दो जगह काट सकती है। उसी किरण पर दूरी हल करने से d = cos ε ± √(r² − sin² ε) मिलता है। घटाने वाला चिह्न निकट और जोड़ने वाला दूर प्रतिच्छेद चुनता है। स्पर्श की स्थिति में दोनों एक हो जाते हैं।

इसलिए केवल शुक्र सूर्य से 20° दूर है कहना उसकी दूरी या कला तय नहीं करता। एक प्रतिच्छेद पर चंद्राकार और दूसरे पर उभरी हुई, आधे से अधिक प्रकाशित डिस्क मिलती है। सूर्य के पूर्व या पश्चिम का चुनाव इससे अलग सूचना है। निरपेक्ष एलॉन्गेशन अकेले पूरे विन्यास का वर्णन नहीं करता।

प्रकाशित प्रतिशत चमक का पूर्वानुमान क्यों नहीं है?

डिस्क के दिखने वाले क्षेत्रफल को प्रकाशित अनुपात से गुणा करें तो प्रकाशित क्षेत्रफल जैसा मान बनेगा। फिर भी वह मापी गई चमक का पूरा मॉडल नहीं है। परावर्तन बादलों या सतह की विशेषताओं और देखने तथा प्रकाश पड़ने के कोण पर निर्भर करता है। इस ग्राफ में प्रकाश-प्रकीर्णन नियम, चमक का अंशांकन, वायुमंडलीय क्षय या कैमरे की प्रतिक्रिया शामिल नहीं है।

प्रतिशत से यह भी नहीं पता चलता कि बिना उपकरण आँख पतली कला पहचान सकेगी। स्क्रीन भरकर बड़ा किया गया चित्र नग्न आँख से वही आकृति स्पष्ट दिखने का प्रमाण नहीं है। उपकरण, प्रसंस्करण और प्रदर्शन का आकार अलग चरण हैं; उन्हें ग्रह के वास्तविक कोणीय आकार से न मिलाएँ।

चंद्रकला और तिथि वाला लेख दूसरे ऐसे कोणों और प्रकाशित अनुपातों का भेद समझाता है। ग्रह-अस्त का लेख परंपरागत वर्गीकरण से संबंधित है; वह शुक्र की दिखाई देने वाली कला का मापन या इस ज्यामिति का स्थानापन्न नहीं है।

पहले से उपलब्ध चित्रों से सुरक्षित अभ्यास करें

  1. तारीख और समान कोणीय पैमाना बताने वाली चित्र-श्रृंखला चुनें।
  2. देखें कि हर चित्र अलग काटकर या बड़ा करके तो नहीं रखा गया।
  3. बाहरी घेराव से पूरे व्यास की तुलना करें, केवल चमकदार पट्टी की नहीं।
  4. चंद्राकार भाग की मोटाई को व्यास से अलग दर्ज करें।
  5. लिखें कि कौन-सी बात चित्र से और कौन-सी ग्रह-सारणी से आई है।
  6. मॉडल के अभ्यास-मानों को वास्तविक तारीख के माप से अलग रखें।

इन मॉडल कोणों से सूर्य के आसपास दूरबीन या बाइनोक्युलर घुमाकर खोज न करें। NASA की सौर-दर्शन सुरक्षा जानकारी के अनुसार सामान्य धूप का चश्मा पर्याप्त नहीं है और बिना उचित फिल्टर वाले प्रकाशीय उपकरण के पीछे ग्रहण-चश्मा लगाना सुरक्षित नहीं। यह पूरा अभ्यास उपलब्ध चित्रों से किया जा सकता है।

स्थानीय समय का संदर्भ समझने के लिए सूर्योदय-सूर्यास्त और सौर मध्याह्न बनाम घड़ी का दोपहर देखें। केवल सूर्य की समय-सारणी शुक्र को आकाश में नहीं रखती। वास्तविक अवलोकन के लिए तारीख और स्थान लेने वाली ग्रह-सारणी चाहिए।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

क्या सुबह और शाम का तारा अलग-अलग ग्रह हैं?

इस संदर्भ में दोनों नाम शुक्र के हैं। सूर्य के सापेक्ष उसकी दिखने वाली स्थिति बदलती है। नाम परिचित दृश्यता के समय बताते हैं, दो अलग तारों की पहचान नहीं।

क्या अधिकतम एलॉन्गेशन पर शुक्र क्षितिज से सबसे ऊँचा होगा?

जरूरी नहीं। एलॉन्गेशन सूर्य से कोणीय दूरी है, जबकि ऊँचाई स्थानीय क्षितिज से मापते हैं। दोनों को जोड़ने के लिए अक्षांश, तारीख और क्षितिज के सापेक्ष आकाश की दिशा चाहिए।

क्या अधिकतम एलॉन्गेशन पर शुक्र आधा प्रकाशित होता है?

घोषित वृत्ताकार और एकतलीय मॉडल में हाँ। पृथ्वी-शुक्र रेखा कक्षा की स्पर्शरेखा बनती है और शुक्र पर कला-कोण 90° होता है। इस आदर्श बराबरी को वास्तविक तारीख का बिल्कुल सटीक पूर्वानुमान न मानें।

पतला शुक्र लगभग पूरे शुक्र से बड़ा क्यों दिख सकता है?

निकट विन्यास में पृथ्वी-शुक्र दूरी छोटी होती है, जिससे पूरी डिस्क का कोणीय व्यास बढ़ता है। उसी समय प्रकाशित मुख का कम हिस्सा पृथ्वी की ओर होता है। आकार और प्रकाशित अनुपात अलग माप हैं।

क्या हर अंतःसंयोग में शुक्र सूर्य के सामने से गुजरता है?

नहीं। पारगमन के लिए सूर्य की दिखाई देने वाली डिस्क पार करने वाली दृष्टि-रेखा चाहिए। लगभग संयोग पर्याप्त नहीं है और वास्तविक कक्षा का झुकाव महत्वपूर्ण है। यह मॉडल पारगमन नहीं बताता।

क्या तालिका से आज रात की दृश्यता पता चलेगी?

नहीं। इसमें तारीख, शहर, क्षितिज, वातावरण और चमक का मॉडल नहीं है। यह ज्यामिति का अभ्यास है। वास्तविक दृश्यता के लिए ग्रह-सारणी और स्थानीय परिस्थितियाँ देखें; इन कोणों से सूर्य के आसपास उपकरण न घुमाएँ।

स्रोत और संदर्भ

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