ओजयुग्म बल कैसे निकाला जाता है?
ग्रह की D1 राशि और नवांश, D9, में मिली राशि को अलग-अलग देखें। चंद्र और शुक्र को प्रत्येक सम क्रमांक वाली राशि के लिए 15 विरूप मिलते हैं। सूर्य, मंगल, बुध, गुरु और शनि को प्रत्येक विषम राशि के लिए 15 मिलते हैं। दोनों योगदान जोड़ने पर कुल 0, 15 या 30 विरूप होगा।
ओजयुग्म बल, स्थान बल का एक घटक है और स्थान बल षड्बल का हिस्सा है। नाम के लंबे लिप्यंतरण ओजयुग्मराश्यंश या Ojhajugmariamsa जैसे भी मिलते हैं। गणना में महत्वपूर्ण बात दो राशियों की विषम-सम जाँच है; अंग्रेजी वर्तनी का थोड़ा अंतर नई गणना-पद्धति नहीं बना देता।
यह लेख Astrogyana के वर्तमान प्रोफाइल और Maitreya के स्थान बल विवरण में दिए नियम का अनुसरण करता है। संख्या पारंपरिक ज्योतिष का वर्गीकरण बताती है। इसे ग्रह की भौतिक ऊर्जा, व्यक्ति का मूल्य या किसी घटना की वैज्ञानिक संभावना न समझें।
विषम-सम राशि के क्रमांक हैं, भाव के नहीं
| क्रमांक | राशि | विषम/सम |
|---|---|---|
| 1 | मेष | विषम |
| 2 | वृषभ | सम |
| 3 | मिथुन | विषम |
| 4 | कर्क | सम |
| 5 | सिंह | विषम |
| 6 | कन्या | सम |
| 7 | तुला | विषम |
| 8 | वृश्चिक | सम |
| 9 | धनु | विषम |
| 10 | मकर | सम |
| 11 | कुंभ | विषम |
| 12 | मीन | सम |
मेष पहली और मीन बारहवीं राशि है। विषम या सम होना इसी स्थिर क्रम से तय होता है। वृषभ पहले, पाँचवें या नौवें भाव में हो, उसका राशि-क्रमांक दो ही रहेगा। इसलिए इस घटक में भाव-संख्या को राशि-संख्या के स्थान पर नहीं रखा जा सकता। चार्ट की आकृति बदलने से भी राशि का क्रमांक नहीं बदलता।
पारंपरिक ग्रह-वर्गीकरण में चंद्र और शुक्र का एक समूह बनता है, जबकि इस खास नियम में बुध और शनि बाकी तीन ग्रहों के साथ आते हैं। इन सांकेतिक श्रेणियों से व्यक्ति के लिंग, पहचान, चरित्र या श्रेष्ठता के निष्कर्ष निकालना गणना का भाग नहीं है। नियम को केवल घोषित ग्रह-समूह और दो राशि-संख्याएँ चाहिए।
उदाहरण के लिए सूर्य सम D1 राशि में है तो किसी विषम भाव में बैठने से उसे D1 के पंद्रह नहीं मिलेंगे। इसी तरह राशि के भीतर विषम क्रमांक वाला नवांश-भाग अपने-आप विषम D9 राशि नहीं है। पहले उस भाग से नवांश राशि निकालें, फिर निकली राशि की parity जाँचें।
दोनों पंद्रह-विरूप योगदान अलग दिखाएँ
D1 का क्रमांक s₁ और D9 का s₉ मानें; दोनों 1 से 12 के बीच हों। ग्रह को चाहिए शेष p: चंद्र और शुक्र के लिए p=0, अन्य पाँच के लिए p=1। तब B = 15 × I(s₁ mod 2 = p) + 15 × I(s₉ mod 2 = p) है। I का अर्थ शर्त सही हो तो एक और गलत हो तो शून्य है।
| D1 | D9 | चंद्र/शुक्र विरूप | अन्य पाँच ग्रह विरूप |
|---|---|---|---|
| विषम | विषम | 0 | 30 |
| विषम | सम | 15 | 15 |
| सम | विषम | 15 | 15 |
| सम | सम | 30 | 0 |
कुल पंद्रह किसी भी चार्ट से आ सकता है। चंद्र विषम D1 और सम D9 में हो तो 0+15 होगा। सम D1 तथा विषम D9 में हो तो 15+0 होगा। योग एक है, लेकिन उसके पीछे की स्थितियाँ अलग हैं। दोनों स्तंभ रखने से तुलना और त्रुटि खोजने में सहायता मिलती है।
अधिकतम तीस विरूप अर्थात आधा रूप है। दूसरे कई बलों में साठ परिचित संख्या होने से यहाँ का अधिकतम भी साठ नहीं हो जाता। पंद्रह को पूरे ग्रह का “आधा बल” न कहें। यह इस घटक के अधिकतम का आधा है, ग्रह के पूरे षड्बल या उसके संदर्भ मान का आधा नहीं।
पहले D9 राशि निकालें, उसके बाद विषम-सम देखें
यहाँ प्रयुक्त पाराशरी नवांश में हर 30° राशि के नौ भाग हैं, प्रत्येक 3°20′ का। चर राशि की गिनती स्वयं से, स्थिर की नवमी से और द्विस्वभाव की पाँचवीं से शुरू होती है; गिनती समावेशी है। आगे के भागों के लिए राशि-क्रम में आगे बढ़ते हैं। केवल भाग क्रमांक जानना अंतिम राशि जानना नहीं है।
पूरे सामान्यीकृत निरयण देशांतर λ के लिए, जहाँ 0 ≤ λ < 360°, एक समान अंकगणितीय रूप है: s₉ = (floor(9λ/30) mod 12)+1। D1 के लिए floor(λ/30)+1 लें। यह shortcut इसी D9 mapping के लिए है। दूसरी नामित नवांश पद्धति हो तो पहले उसकी सही mapping इस्तेमाल करनी होगी।
ठीक सीमाएँ कोणीय सेकंड में सरल हो सकती हैं। पूरी राशि 108,000 arcseconds और एक नवांश 12,000 arcseconds है। इस इकाई में पूर्णांक S के लिए D1=floor(S/108000)+1 और D9=(floor(S/12000) mod 12)+1 होगा। इससे 3.333… जैसे आवर्ती दशमलव को पहले छोटा करके गलत सीमा बनाने से बचते हैं।
D9 की गणना वाला लेख mapping विस्तार से समझाता है। यहाँ वही एक अलग बल-गणना का input है। नवांश में ग्रह को दूसरी राशि मिलने का अर्थ यह नहीं कि दिखाई देने वाले आकाश में भौतिक ग्रह किसी दूसरे स्थान पर चला गया है।
ग्यारह स्थितियाँ और ठीक सीमा के दोनों ओर परिणाम
| पूरा देशांतर | D1 | D9 | चंद्र/शुक्र | अन्य पाँच |
|---|---|---|---|---|
| 0°00′00″ | 1 | 1 | 0 | 30 |
| 3°19′59″ | 1 | 1 | 0 | 30 |
| 3°20′00″ | 1 | 2 | 15 | 15 |
| 6°40′00″ | 1 | 3 | 0 | 30 |
| 29°59′59″ | 1 | 9 | 0 | 30 |
| 30°00′00″ | 2 | 10 | 30 | 0 |
| 35°00′00″ | 2 | 11 | 15 | 15 |
| 70°00′00″ | 3 | 10 | 15 | 15 |
| 134°10′00″ | 5 | 5 | 0 | 30 |
| 331°00′00″ | 12 | 4 | 30 | 0 |
| 359°59′00″ | 12 | 12 | 30 | 0 |
मेष 0° पर D1 और D9 दोनों मेष, क्रमांक एक हैं। सूर्य वाले समूह को 15+15=30 मिलता है और चंद्र-शुक्र को शून्य। मेष 3°20′ पर D1 अभी मेष है, लेकिन D9 वृषभ हो गया है। अब दोनों ग्रह-समूहों को पंद्रह मिलता है, हालांकि पंद्रह आने का स्तंभ अलग है।
वृषभ 5°, अर्थात पूरा देशांतर 35°, नवांश में कुंभ यानी ग्यारहवीं राशि देता है। चंद्र-शुक्र को सम वृषभ से पंद्रह और विषम कुंभ से शून्य मिलेगा। बाकी पाँच को वृषभ से शून्य और कुंभ से पंद्रह मिलेगा। समान कुल का अर्थ न समान राशियाँ है, न समान ग्रह-नियम।
पूरा देशांतर 134°10′, सिंह 14°10′ है। यहाँ D1 भी सिंह और D9 भी सिंह है। दोनों विषम हैं, इसलिए बुध को इस घटक में तीस मिलेगा। मीन 1°, यानी पूरे 331°, पर चंद्र की D1 मीन और D9 कर्क है। दोनों सम होने से दूसरी ग्रह-शाखा के नियम से भी तीस मिलता है।
सात ग्रहों का योगदान अलग स्तंभों में
| ग्रह | देशांतर | D1 | D9 | D1 विरूप | D9 विरूप | योग |
|---|---|---|---|---|---|---|
| सूर्य | 0°00′00″ | 1 | 1 | 15 | 15 | 30 |
| चंद्र | 331°00′00″ | 12 | 4 | 15 | 15 | 30 |
| मंगल | 10°00′00″ | 1 | 4 | 15 | 0 | 15 |
| बुध | 134°10′00″ | 5 | 5 | 15 | 15 | 30 |
| गुरु | 70°00′00″ | 3 | 10 | 15 | 0 | 15 |
| शुक्र | 3°20′00″ | 1 | 2 | 0 | 15 | 15 |
| शनि | 359°59′00″ | 12 | 12 | 0 | 0 | 0 |
ये सात स्वतंत्र शिक्षण स्थितियाँ हैं। इनसे यह दावा नहीं कि किसी वास्तविक तारीख पर सभी ग्रह एक साथ इन्हीं देशांतरों पर थे। सूर्य और बुध विषम राशि का नियम लेते हैं, जैसे मंगल, गुरु और शनि। चंद्र और शुक्र दोनों स्तंभों में सम राशि का नियम ही लेते हैं; D9 पर पहुँचकर ग्रह का समूह नहीं बदलता।
शनि की पंक्ति के दो शून्य बताते हैं कि इन राशियों से उसे ओजयुग्म योगदान नहीं मिला। वे उसका नैसर्गिक बल, गति-बल या अन्य घटक नहीं मिटाते। चंद्र के तीस से भी यह तय नहीं होता कि पूरी कुंडली में उसका कुल सबसे अधिक है। घटक का नाम साथ रखने से संख्या अपनी सीमा में समझ आती है।
इन पंक्तियों का संयुक्त योग संयोग से 135 विरूप है। यह बनाए गए उदाहरण की विशेषता है, पद्धति का स्थिर योग नहीं। त्रिभाग बल में दो ग्रहों को साठ-साठ मिलने का जो नियम था, ओजयुग्म में सातों के संयुक्त योग पर वैसी शर्त नहीं है।
छोटे देशांतर बदलाव से पंद्रह या तीस क्यों बदल सकते हैं?
मेष 3°19′59″ और मेष 3°20′00″ की तुलना करें। नया नवांश अपने ठीक आरंभ से शामिल होता है। D1 नहीं बदला, पर D9 मेष से वृषभ हो गया। विषम-राशि समूह का योग तीस से पंद्रह और चंद्र-शुक्र का शून्य से पंद्रह हुआ। यहाँ केवल एक योगदान बदला है।
अब मेष 29°59′59″ और वृषभ 0°00′00″ देखें। D1 और D9 दोनों की parity बदलती है: मेष/धनु से वृषभ/मकर बनता है। विषम समूह तीस से शून्य और सम समूह शून्य से तीस पर जाता है। इसलिए इस mapping में राशि-सीमा पर तीस अंकों का बदलाव संभव है।
स्क्रीन पर 3°20′ दिखता देशांतर मूल में सीमा से थोड़ा नीचे से गोल हुआ हो सकता है। बिना गोल किए देशांतर का उपयोग करें या अनिश्चितता बताएँ। मूल मान उपलब्ध हो तो छोटे प्रदर्शन से भाग तय न करें। पूरे चक्र के अंत पर 360° को पहले 0° में सामान्यीकृत करना भी जरूरी है।
पूरे 108 नवांश क्षेत्रों से नियम की जाँच
| विरूप | क्षेत्रों की संख्या | कुल देशांतर-विस्तार |
|---|---|---|
| 0 | 30 | 100° |
| 15 | 48 | 160° |
| 30 | 30 | 100° |
हर D1 राशि की पहली D9 राशि उसी parity की होती है। नौ क्रमिक नवांश राशियों में विषम-सम बदलता रहता है: पाँच D1 जैसी parity के और चार दूसरी parity के होंगे। छह विषम तथा छह सम D1 राशियों पर गिनें तो किसी एक स्थिर ग्रह-समूह के लिए तीस क्षेत्रों में तीस, अड़तालीस में पंद्रह और तीस में शून्य मिलता है।
हर क्षेत्र 3°20′ का है। इसलिए कुल देशांतर-विस्तार क्रम से 100°, 160° और 100° है; जोड़ने पर 360° आता है। यह बताई mapping की मौलिक संयोजन-गणना है। इससे यह भी स्पष्ट है कि चारों parity संयोजनों को पूरे राशि-चक्र में बराबर बार मिलने वाला मान लेना सही shortcut नहीं।
ये जन्म या प्रेक्षण की संभावनाएँ नहीं हैं। सभी ग्रह एकसमान गति से नहीं चलते, जन्मों का रिकॉर्ड पूरे देशांतर को बराबर चुनने वाला प्रयोग नहीं है, और किसी खास चार्ट की राशियाँ उसके input से तय होती हैं। ज्यामितीय गिनती को भविष्यवाणी की सफलता का प्रमाण बनाकर प्रस्तुत नहीं करना चाहिए।
राशि की parity, गरिमा, उच्चता और भाव अलग रखें
सप्तवर्गज बल सात वर्गों में ग्रह की गरिमा देखता है और उसके अंक अलग हैं। ओजयुग्म केवल D1 तथा D9 की विषम-सम राशियाँ देखता है। ग्रह स्वगृही न होते हुए भी parity के पंद्रह पा सकता है। कोई परिचित गरिमा-नाम इस जाँच का स्थान नहीं लेता।
रिपोर्ट जोड़ते समय स्थान बल की दूसरी प्रविष्टियाँ अलग रहें। ओजयुग्म का तीस पूरा स्थान बल नहीं है और पूरा स्थान बल भी पूरा षड्बल नहीं। घटक, विरूप, रूप तथा संदर्भ अनुपात को अलग समझने के लिए इकाइयों और अनुपात का लेख पढ़ें।
ग्रह की D1 और D9 राशि स्थिर रखते हुए केवल लग्न बदलें तो यह घटक नहीं बदलता। निरयण देशांतर या D9 mapping बदले तो बदल सकता है। दो रिपोर्टों में अंतर हो तो पहले इसी घटक द्वारा उपयोग किए गए input जाँचना उपयोगी है; हर संभावित सेटिंग को एक साथ कारण मानना जरूरी नहीं।
स्रोत में शब्दगत अंतर और दोबारा जाँचने योग्य रिकॉर्ड
जुड़े Maitreya पृष्ठ के मीन वाले उदाहरण में शब्दगत असंगति है: वह D1 स्थिति को विषम कहता है, जबकि मीन बारहवीं राशि है और उसी पृष्ठ का चंद्र-नियम सम राशि माँगता है। उसके मीन/कर्क और तीस विरूप, सम-राशि नियम से मेल खाते हैं। यहाँ स्पष्ट नियम अपनाया गया है और शब्दगत समस्या बताई गई है।
दोबारा गणना के लिए ग्रह, बिना गोल किया निरयण देशांतर, अयनांश या frame setting, D9 पद्धति, दोनों राशि-क्रमांक, पंद्रह अथवा शून्य वाले दोनों योगदान और योग रखें। मूल जन्म-समय अनिश्चित है तो पहले उससे निकलने वाला देशांतर-अंतराल जानें, फिर देखें वह संबंधित सीमा पार करता है या नहीं।
चार्ट का संदर्भ कुंडली उपकरण में और नामित प्रोफाइल गणना-पद्धति में पढ़ें। यदि पूरे षड्बल के अन्य जरूरी input नहीं मिले हैं, तो स्वतंत्र रूप से parity नियम समझ लेना पूरी रिपोर्ट को उपलब्ध नहीं बना देता।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
ओजयुग्म में किन ग्रहों को सम राशि से बल मिलता है?
चंद्र और शुक्र को सम D1 राशि के पंद्रह और अलग सम D9 राशि के पंद्रह विरूप मिलते हैं। बाकी पाँच शास्त्रीय ग्रह विषम राशियों का नियम लेते हैं।
ओजयुग्म बल का अधिकतम कितना है?
तीस विरूप या आधा रूप। दोनों राशियाँ पंद्रह-पंद्रह दे सकती हैं; संभव योग शून्य, पंद्रह और तीस हैं।
विषम भाव देखें या विषम राशि?
मेष एक से मीन बारह तक राशि के क्रमांक देखें। भाव-संख्या और राशि के भीतर नवांश-भाग का क्रमांक अलग हैं; वे निकली हुई राशि-संख्या का स्थान नहीं लेते।
क्या दोनों ग्रह-समूहों को एक जैसा कुल मिल सकता है?
हाँ। एक विषम और एक सम राशि होने पर दोनों समूहों का कुल पंद्रह है, लेकिन योगदान देने वाला चार्ट अलग होगा।
ठीक नवांश-सीमा पर अंक क्यों बदलते हैं?
D1 स्थिर रहते D9 की parity बदल सकती है, जिससे पंद्रह का योगदान बदलता है। कुछ D1 सीमाओं पर दोनों parity बदलती हैं और तीस का अंतर संभव होता है।
शून्य ओजयुग्म का अर्थ ग्रह में कोई बल नहीं है?
यह केवल इस parity घटक का शून्य है। स्थान बल के दूसरे हिस्से, अन्य षड्बल घटक और पूरा संदर्भ-अनुपात अलग हैं।