सप्तवर्गज बल कैसे निकाला जाता है?
सप्तवर्गज बल में ग्रह के सात वर्गों—D1, D2, D3, D7, D9, D12 और D30—के राशि-स्थान से मिलने वाले बल जोड़े जाते हैं। हर वर्ग में ग्रह की राशि निकालें, घोषित मूलत्रिकोण, स्वराशि और मैत्री नियम लागू करें, फिर सात योगदानों का विरूप में योग करें। इसी उप-योग को रूप में दिखाने के लिए 60 से भाग दें।
यह स्थान बल का एक हिस्सा है और स्थान बल स्वयं षड्बल के छह समूहों में से एक है। इसलिए सप्तवर्गज संख्या को पूरा स्थान बल या पूरा षड्बल न समझें। नीचे के उदाहरण में सूर्य को इस एक घटक से 165 विरूप, अर्थात 2.75 रूप मिलते हैं।
यह लेख ज्योतिष की एक गणना-पद्धति समझाता है। सही जोड़ से इतना पता चलता है कि चुना हुआ नियम ठीक लागू हुआ; उससे किसी जीवन-घटना की भविष्यवाणी प्रमाणित नहीं होती। संख्या का अर्थ लगाने से पहले उसके इनपुट और नियम पढ़ना अधिक उपयोगी है।
पहले गणना की परंपरा स्पष्ट करें
यहाँ Astrogyana की मौजूदा पद्धति ली गई है: सात वर्गों के पाराशरी राशि-स्थान, तात्कालिक मैत्री के लिए जन्म की D1 राशियाँ और केवल D1 में अंश-सीमा के आधार पर मूलत्रिकोण का अंक। सूर्य के उदाहरण में यह सीमा सिंह के 0° को शामिल करती है और 20° को शामिल नहीं करती। उसके बाद स्वराशि की शर्त देखी जाती है।
गणना-पद्धति पृष्ठ पूरे मॉडल का संदर्भ देता है। यहाँ उसी वर्तमान प्रोफाइल का विवरण है। Maitreya के स्थान बल दस्तावेज़ में उच्च वर्गों में राशि के आधार पर मूलत्रिकोण मानने का विकल्प मिलता है; तात्कालिक मैत्री किस चार्ट से ली जाए, इस पर मतांतर भी बताया गया है।
जन्म-देशांतर समान होने पर भी इन विकल्पों से योग बदल सकता है। इसलिए संख्या के पास नियम लिखें। दो सॉफ्टवेयर “सात वर्ग” लेते हैं, इतना जानना पर्याप्त नहीं है; वर्ग की राशि, मूलत्रिकोण और मैत्री के निर्णय भी मिलने चाहिए।
श्रेणियाँ, अंक और प्राथमिकता
| श्रेणी | विरूप |
|---|---|
| मूलत्रिकोण: घोषित D1 नियम | 45 |
| स्वराशि | 30 |
| अधिमित्र | 20 |
| मित्र | 15 |
| सम | 10 |
| शत्रु | 4 |
| अधिशत्रु | 2 |
हर पंक्ति में केवल एक लागू श्रेणी चुनें। घोषित D1 मूलत्रिकोण में सूर्य को 45 मिलेगा; सिंह स्वराशि भी है, इसलिए अलग से 30 जोड़ना गलत होगा। सामान्य स्वराशि में 30 लें और ग्रह की स्वयं से मैत्री निकालने की कोशिश न करें। दूसरी राशि में उसके स्वामी के प्रति इस ग्रह का संबंध देखें।
यह अंक-सारणी समान दूरी वाली सीढ़ी नहीं है। शत्रु से सम तक अंतर 6 है, जबकि स्वराशि से मूलत्रिकोण तक 15 है। अपनी सुविधा से बराबर अंतर वाले अंक देना गणना बदल देता है। इसी तरह D30 का योगदान तीस गुना नहीं होता। हर वर्ग अपना चुना हुआ अंक एक बार देता है।
सूर्य के उदाहरण के लिए कौन-से इनपुट चाहिए?
सूर्य का काल्पनिक निरयण देशांतर 132°, यानी सिंह में 12° लें। नीचे आवश्यक राशि-स्वामियों के संबंध निकालने के लिए D1 में गुरु और शुक्र को कन्या तथा चंद्र को वृश्चिक में रखें। इस विशेष मैत्री-चरण के लिए उनके पूरे अंश आवश्यक नहीं हैं। यह आंशिक शिक्षण-वर्कशीट है, किसी तारीख की वास्तविक जन्मकुंडली या पंचांग गणना नहीं।
मेष राशि क्रमांक 1, वृषभ 2 और आगे इसी तरह गिनें। सिंह 5, कन्या 6, तुला 7, वृश्चिक 8 और धनु 9 हैं। सूर्य के एक देशांतर से उसके सात वर्ग-स्थान निकालेंगे। दूसरे ग्रहों की D1 राशियाँ केवल तात्कालिक संबंध बताएँगी; उन्हें सूर्य के वर्ग-स्थानों के बदले नहीं रखा जाएगा।
यहाँ दो अलग प्रश्न पूछे जा रहे हैं: संबंधित वर्ग में सूर्य किस स्वामी की राशि में गया, और उस स्वामी की जन्म-राशि सूर्य से कितनी दूर है? पहले प्रश्न का उत्तर वर्ग से, दूसरे का उत्तर चुनी हुई D1 पद्धति से आएगा। दोनों को मिला देने पर अंक बदल सकते हैं।
सिंह के 12° से सात वर्ग-राशियाँ निकालें
| वर्ग | स्थान निकालने का आधार | राशि क्रमांक | राशि |
|---|---|---|---|
| D1 | मूल राशि; भीतर 12° | 5 | सिंह |
| D2 | विषम राशि का पहला 15° भाग | 5 | सिंह |
| D3 | दूसरा 10° भाग: पाँचवीं राशि | 9 | धनु |
| D7 | तीसरा 30°/7 भाग: सिंह से तीसरी | 7 | तुला |
| D9 | चौथा 3°20′ भाग: मेष से चौथी | 4 | कर्क |
| D12 | पाँचवाँ 2°30′ भाग: सिंह से पाँचवीं | 9 | धनु |
| D30 | विषम राशि का 10° से 18° गुरु भाग | 9 | धनु |
D7 में 30° को सात बराबर हिस्सों में बाँटें। शून्य से शुरू होने वाला सूचकांक floor(12 × 7 ÷ 30) = 2 है, इसलिए यह तीसरा हिस्सा है। सिंह विषम राशि है; सिंह से आगे तीसरी राशि तुला मिलेगी। floor का अर्थ नीचे का पूरा पूर्णांक लेना है, निकटतम पूर्णांक तक सामान्य राउंडिंग करना नहीं।
D9 में सिंह स्थिर राशि है, इसलिए क्रम सिंह से नवम राशि मेष से शुरू होता है। चौथा नवांश कर्क देता है। D12 में सिंह से पाँचवाँ हिस्सा धनु है। D3 में तीन हिस्से जन्म-राशि, उससे पाँचवीं और नवम राशि में जाते हैं; दूसरा हिस्सा यहाँ धनु देगा। इस प्रकार समान राशि अलग-अलग नियमों से भी मिल सकती है।
D30 पर खास ध्यान दें। यहाँ पाराशरी त्रिंशांश के असमान भाग हैं, तीस बराबर एक-अंश हिस्से नहीं। विषम राशि में 10° से 18° वाला गुरु-भाग धनु देता है; सूर्य के 12° इसी के अंदर हैं। दूसरी त्रिंशांश विधि ली जाए तो बल लगाने से पहले ही यह राशि बदल सकती है।
गुरु, शुक्र और चंद्र के प्रति सूर्य का संबंध
स्वराशि के अतिरिक्त किसी राशि के लिए नैसर्गिक मित्र को +1, सम को 0 और शत्रु को −1 का कोड दें। स्वामी D1 में ग्रह से दूसरी, तीसरी, चौथी, दसवीं, ग्यारहवीं या बारहवीं राशि में हो तो तात्कालिक +1, अन्य स्थानों पर −1 लें। दोनों कोड जोड़कर संयुक्त श्रेणी चुनें। ये कोड स्वयं विरूप नहीं हैं।
सूर्य के लिए गुरु और चंद्र नैसर्गिक मित्र, जबकि शुक्र नैसर्गिक शत्रु है। हमारे इनपुट में गुरु और शुक्र सूर्य से दूसरे तथा चंद्र चौथे हैं। तीनों का तात्कालिक कोड +1 है, फिर भी नैसर्गिक कोड अलग होने से अंतिम संबंध समान नहीं होगा। पूरी संबंध-सारणी के लिए पंचधा मैत्री का लेख पढ़ें।
| मेजबान | D1 राशि क्रमांक | सूर्य से गिनती | नैसर्गिक | तात्कालिक | योग | विरूप |
|---|---|---|---|---|---|---|
| गुरु | 6 | 2 | 1 | 1 | 2 | 20 |
| शुक्र | 6 | 2 | -1 | 1 | 0 | 10 |
| चंद्र | 8 | 4 | 1 | 1 | 2 | 20 |
ग्रह की राशि p और स्वामी की h हो तो समावेशी गिनती ((h − p + 12) mod 12) + 1 है। सिंह 5 से कन्या 6 तक उत्तर 2 है, 1 नहीं। नैसर्गिक संबंध सूर्य की दृष्टि से उसके मेजबान की ओर पढ़ा गया है। दिशा उलटने पर हर जोड़ी का उत्तर समान मानना उचित नहीं।
सात पंक्तियाँ जोड़कर रूप में बदलें
| वर्ग | चुनी गई श्रेणी | विरूप | चलता योग |
|---|---|---|---|
| D1 | D1 मूलत्रिकोण | 45 | 45 |
| D2 | स्वराशि; D2 में मूलत्रिकोण लागू नहीं | 30 | 75 |
| D3 | गुरु: अधिमित्र | 20 | 95 |
| D7 | शुक्र: सम | 10 | 105 |
| D9 | चंद्र: अधिमित्र | 20 | 125 |
| D12 | गुरु: अधिमित्र | 20 | 145 |
| D30 | गुरु: अधिमित्र | 20 | 165 |
पूरा जोड़ है 45 + 30 + 20 + 10 + 20 + 20 + 20 = 165 विरूप। इकाई बदलने पर 165 ÷ 60 = 2.75 रूप मिलते हैं। यह प्रतिशत नहीं है और इसे अपने आप ग्रह के आवश्यक पूर्ण षड्बल से तुलना करने वाला अनुपात भी नहीं कहा जा सकता। पहले पूरे षड्बल के बाकी घटक चाहिए।
कई वर्गों में धनु दोहराया गया है, फिर भी हर वर्ग का योगदान अलग गिना जाएगा। D3, D12 और D30 तीन इनपुट हैं, प्रत्येक यहाँ 20 देता है। धनु को केवल एक बार रखने से दो सही योगदान हट जाएँगे। इसके उलट D9 गलती से दो बार लिखने पर सात वर्गों के बाहर एक अतिरिक्त अंक जुड़ जाएगा।
चलता योग रखने से असहमति ढूँढना आसान है। दूसरे हिसाब में D3 तक 95 मिले लेकिन D7 पर अंतर आए, तो पहले D7 राशि और शुक्र संबंध देखें। केवल अंतिम कुल संख्या देखकर पूरा हिसाब फिर करना अक्सर अनावश्यक होता है।
एक नियम बदलने पर कितना अंतर पड़ता है?
| बदलाव | प्रभावित पंक्तियाँ | योग में अंतर | नया योग |
|---|---|---|---|
| केवल D2 सिंह को मूलत्रिकोण मानना | D2 | 15 | 180 |
| D1 गुरु को कन्या से धनु में रखना | D3, D12, D30 | -30 | 135 |
| D1 शुक्र को कन्या से तुला में रखना | D7 | 0 | 165 |
सारणी का हर अभ्यास मूल 165 से शुरू होता है। ये लगातार किए गए परिवर्तन नहीं हैं। यदि उच्च-वर्ग मूलत्रिकोण के राशि-आधारित नियम से D2 सिंह को 30 के बजाय 45 दें, तो कुल 180 होगा। केवल एक श्रेणी बदली है; सूर्य का जन्म-देशांतर और सातों राशि-स्थान पहले जैसे हैं।
दूसरे अभ्यास में गुरु की D1 राशि कन्या से धनु कर दें। वह सूर्य से पाँचवाँ हो जाता है और तात्कालिक कोड −1 मिलेगा। नैसर्गिक +1 के साथ योग 0, यानी सम है। गुरु की तीन मेजबान राशियों वाले योगदान 20 से 10 हो जाएँगे; 30 घटकर नया कुल 135 मिलेगा।
शुक्र को कन्या से तुला करने पर वह दूसरे से तीसरे स्थान पर आता है। दोनों तात्कालिक मित्र-स्थान हैं, इसलिए संयुक्त श्रेणी सम ही रहती है और योग 165 ही है। हर इनपुट परिवर्तन से अंक बदलना आवश्यक नहीं। इन तीनों अभ्यासों में सूर्य की स्थिति स्थिर रखी गई है।
सीमा पर अंश की शुद्धता क्यों जरूरी है?
12° का उदाहरण अधिकतर संबंधित सीमाओं के अंदर है। वास्तविक ग्रह सीमा के बहुत पास हो सकता है। सिंह में ठीक 12°30′ पर D12 का पाँचवाँ हिस्सा समाप्त होकर छठा शुरू होता है। 13°20′ पर अगला नवांश शुरू होता है। राशि बदलने पर नया स्वामी मिलेगा; अंतिम योग बदलेगा या नहीं, यह उसकी श्रेणी पर निर्भर है।
सिंह के ठीक 20° पर यहाँ सूर्य की D1 मूलत्रिकोण सीमा समाप्त होती है और स्वराशि की श्रेणी लागू होती है। उसी बिंदु पर अन्य वर्ग भी बदल सकते हैं। वास्तविक देशांतर को सीमा के पार ले जाने को केवल D1 का परिवर्तन न कहें, जब तक बाकी पंक्तियाँ न जाँच लें। ऊपर का अलग नियम बदलने वाला अभ्यास इससे भिन्न है।
अंतराल चुनने तक पूरा मूल अंश रखें। स्क्रीन पर 12.50° दिखना यह सिद्ध नहीं करता कि वास्तविक मान ठीक 12°30′ है। वह नीचे या ऊपर के मान का गोल किया हुआ प्रदर्शन हो सकता है। सीमा का परिणाम दोहराने के लिए मूल देशांतर और समान अयनांश जरूरी हैं।
इसे दूसरे बलों से अलग पहचानें
उच्च बल नीच बिंदु से कोणीय दूरी पर आधारित अलग स्थान-बल घटक है। उसे सप्तवर्गज की हर पंक्ति में दोबारा नहीं जोड़ते। इसी तरह अलग वर्ग-भारों वाली विंशोपक पद्धति दूसरा माप है। उसके भार इस जोड़ में डालने से वही नाम रखते हुए दूसरी गणना बनने लगेगी।
अनुकूल श्रेणी बार-बार मिलने से कोई घटना निश्चित नहीं हो जाती। यह उप-योग बाकी बलों का स्थान नहीं लेता और रोजगार, विवाह या दूसरे परिणाम के लिए स्वतंत्र सीमा नहीं देता। रूप, विरूप और षड्बल अनुपात का लेख घटक, पूर्ण कुल और संदर्भ-आवश्यकता के अनुपात का अंतर समझाता है।
अपनी रिपोर्ट जाँचने का क्रम
- ग्रह, पूरा निरयण देशांतर और अयनांश लिखें।
- D1, D2, D3, D7, D9, D12 और D30 को ठीक एक-एक बार लिखें तथा वर्ग-नियम दर्ज करें।
- बल लगाने से पहले सात प्राप्त राशियाँ निकालें।
- मूलत्रिकोण का नियम और तात्कालिक मैत्री का आधार-चार्ट लिखें।
- हर पंक्ति की एक श्रेणी चुनें, विरूप जोड़ें और केवल रूप दिखाने के लिए 60 से भाग दें।
- कुंडली रिपोर्ट में समान मध्यवर्ती पंक्तियाँ मिलाएँ; अनुपलब्ध सूचना को वास्तविक शून्य न मानें।
वर्कशीट के साथ नियम भी सुरक्षित रखें। केवल अंतिम अंक का स्क्रीनशॉट बाद में दोहराने के लिए पर्याप्त नहीं हो सकता, भले ही सारे अंक ठीक उतारे गए हों।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
सप्तवर्गज बल में कौन-से सात वर्ग हैं?
यहाँ D1, D2, D3, D7, D9, D12 और D30 हैं। घोषित पद्धति में प्रत्येक वर्ग एक श्रेणी का योगदान देता है; वर्ग क्रमांक उसका गुणक नहीं है।
उदाहरण में सूर्य को 165 विरूप कैसे मिले?
सात योगदान 45, 30, 20, 10, 20, 20 और 20 हैं। इनका योग 165 विरूप या 2.75 रूप है, जो केवल सप्तवर्गज बल का उप-योग है।
क्या उच्च वर्गों में हमेशा मूलत्रिकोण गिना जाता है?
इस पर पद्धतियाँ अलग हैं। यहाँ Astrogyana की अंश-आधारित D1 मूलत्रिकोण पद्धति है। उच्च वर्ग में राशि-आधारित अंक देने पर उदाहरण का D2 सिंह बदलकर कुल 180 कर सकता है।
तात्कालिक मैत्री जन्मकुंडली से लें या वर्ग से?
इस वर्कशीट में सभी दूरियाँ D1 से ली गई हैं। दूसरी पद्धतियाँ संबंधित वर्ग से ले सकती हैं। तुलना से पहले यह नियम लिखना आवश्यक है।
धनु तीन बार आए तो एक ही बार जोड़ें?
नहीं। D3, D12 और D30 अलग वर्ग हैं। प्राप्त राशि समान होने पर भी प्रत्येक अपना योगदान एक बार देता है।
क्या 2.75 रूप सूर्य का पूरा षड्बल है?
नहीं। यह काल्पनिक उदाहरण का केवल सप्तवर्गज उप-योग है। पूर्ण षड्बल में स्थान बल के अन्य घटक और पाँच अन्य बल-समूह भी शामिल हैं।