खवेदांश या D40 में राशि कैसे तय होती है?
जन्मराशि के 30° को 0°45′, अर्थात 2,700 चाप-सेकंड, के चालीस बराबर भागों में बाँटें। विषम क्रमांक वाली जन्मराशि में मेष से और सम क्रमांक वाली जन्मराशि में तुला से आगे गिनें। पहले भाग को आरंभिक राशि ही मिलती है; मीन के बाद मेष से चक्र जारी होता है।
यह लेख खवेदांश, जिसे चत्वारिंशांश भी कहा जाता है, का राशि-नियम समझाता है। दिए हुए निरयन देशांतर से परिणाम जाँचना इसका उद्देश्य है। अकेली गणना व्यक्ति के परिवार, वंशगत पुण्य या भविष्य के दावे सिद्ध नहीं करती।
भाग गिनने से पहले आरंभिक राशि चुनें
| जन्मराशि समूह | राशियाँ | पहला D40 भाग |
|---|---|---|
| विषम: 1, 3, 5, 7, 9, 11 | मेष, मिथुन, सिंह, तुला, धनु, कुंभ | मेष |
| सम: 2, 4, 6, 8, 10, 12 | वृषभ, कर्क, कन्या, वृश्चिक, मकर, मीन | तुला |
सम-विषम जन्मराशि के प्रचलित क्रमांक के लिए है; ग्रह का नाम, भाव-संख्या या जन्म का दिन इसके आधार नहीं हैं। मेष पहली राशि है, इसलिए विषम है। किसी प्रोग्राम में मेष का आंतरिक सूचकांक 0 हो सकता है; उससे पारंपरिक सम-विषम का अर्थ उलटना नहीं चाहिए।
राशि के भीतर समान अंश पर दोनों स्तंभों के परिणाम छह राशियाँ दूर हैं। इसलिए मेष और वृषभ के समान भीतर वाले अंश पर विपरीत गंतव्य राशियाँ मिलती हैं। मेष और मिथुन जैसी दो विषम राशियों में भीतर के अंश समान हों तो D40 का गंतव्य समान होगा।
सभी चालीस भागों की सारणी
d को जन्मराशि के भीतर का अंश पढ़ें, पूरा 0°–360° देशांतर नहीं। हर खंड की निचली सीमा शामिल है। ऊपरी सीमा के बराबर मान अगली पंक्ति आरंभ करता है। ठीक 30° अगली जन्मराशि का है, इसलिए वहाँ सम-विषम फिर चुनना होगा।
| भाग | राशि के भीतर d | विषम राशि | सम राशि |
|---|---|---|---|
| 1 | 0°00′00″ ≤ d < 0°45′00″ | मेष | तुला |
| 2 | 0°45′00″ ≤ d < 1°30′00″ | वृषभ | वृश्चिक |
| 3 | 1°30′00″ ≤ d < 2°15′00″ | मिथुन | धनु |
| 4 | 2°15′00″ ≤ d < 3°00′00″ | कर्क | मकर |
| 5 | 3°00′00″ ≤ d < 3°45′00″ | सिंह | कुंभ |
| 6 | 3°45′00″ ≤ d < 4°30′00″ | कन्या | मीन |
| 7 | 4°30′00″ ≤ d < 5°15′00″ | तुला | मेष |
| 8 | 5°15′00″ ≤ d < 6°00′00″ | वृश्चिक | वृषभ |
| 9 | 6°00′00″ ≤ d < 6°45′00″ | धनु | मिथुन |
| 10 | 6°45′00″ ≤ d < 7°30′00″ | मकर | कर्क |
| 11 | 7°30′00″ ≤ d < 8°15′00″ | कुंभ | सिंह |
| 12 | 8°15′00″ ≤ d < 9°00′00″ | मीन | कन्या |
| 13 | 9°00′00″ ≤ d < 9°45′00″ | मेष | तुला |
| 14 | 9°45′00″ ≤ d < 10°30′00″ | वृषभ | वृश्चिक |
| 15 | 10°30′00″ ≤ d < 11°15′00″ | मिथुन | धनु |
| 16 | 11°15′00″ ≤ d < 12°00′00″ | कर्क | मकर |
| 17 | 12°00′00″ ≤ d < 12°45′00″ | सिंह | कुंभ |
| 18 | 12°45′00″ ≤ d < 13°30′00″ | कन्या | मीन |
| 19 | 13°30′00″ ≤ d < 14°15′00″ | तुला | मेष |
| 20 | 14°15′00″ ≤ d < 15°00′00″ | वृश्चिक | वृषभ |
| 21 | 15°00′00″ ≤ d < 15°45′00″ | धनु | मिथुन |
| 22 | 15°45′00″ ≤ d < 16°30′00″ | मकर | कर्क |
| 23 | 16°30′00″ ≤ d < 17°15′00″ | कुंभ | सिंह |
| 24 | 17°15′00″ ≤ d < 18°00′00″ | मीन | कन्या |
| 25 | 18°00′00″ ≤ d < 18°45′00″ | मेष | तुला |
| 26 | 18°45′00″ ≤ d < 19°30′00″ | वृषभ | वृश्चिक |
| 27 | 19°30′00″ ≤ d < 20°15′00″ | मिथुन | धनु |
| 28 | 20°15′00″ ≤ d < 21°00′00″ | कर्क | मकर |
| 29 | 21°00′00″ ≤ d < 21°45′00″ | सिंह | कुंभ |
| 30 | 21°45′00″ ≤ d < 22°30′00″ | कन्या | मीन |
| 31 | 22°30′00″ ≤ d < 23°15′00″ | तुला | मेष |
| 32 | 23°15′00″ ≤ d < 24°00′00″ | वृश्चिक | वृषभ |
| 33 | 24°00′00″ ≤ d < 24°45′00″ | धनु | मिथुन |
| 34 | 24°45′00″ ≤ d < 25°30′00″ | मकर | कर्क |
| 35 | 25°30′00″ ≤ d < 26°15′00″ | कुंभ | सिंह |
| 36 | 26°15′00″ ≤ d < 27°00′00″ | मीन | कन्या |
| 37 | 27°00′00″ ≤ d < 27°45′00″ | मेष | तुला |
| 38 | 27°45′00″ ≤ d < 28°30′00″ | वृषभ | वृश्चिक |
| 39 | 28°30′00″ ≤ d < 29°15′00″ | मिथुन | धनु |
| 40 | 29°15′00″ ≤ d < 30°00′00″ | कर्क | मकर |
चालीस भागों में बारह राशियों के तीन पूरे चक्र और चार अतिरिक्त भाग आते हैं। भाग 13–24 तथा 25–36 पहले बारह भागों को दोहराते हैं; 37–40 पहले चार को दोहराते हैं। हर स्तंभ में चार गंतव्य चार बार और आठ गंतव्य तीन बार आते हैं। नाम दोहरने से चालीस इनपुट-खंड बारह में नहीं बदल जाते।
कर्क के उदाहरण से पाँच चरण समझें
- पूर्ण निरयन देशांतर को 0° ≤ L < 360° में लाएँ।
- जन्मराशि और उसके भीतर का अंश निकालें। सम-विषम के लिए प्रचलित 1–12 क्रमांक लें।
- राशि के भीतर की स्थिति चाप-सेकंड में बदलकर 2,700 से भाग दें।
- भागफल का floor लेकर एक जोड़ें; यह एक से शुरू भाग क्रमांक है।
- मेष या तुला से आरंभ करके भाग क्रमांक से एक कम कदम आगे बढ़ें।
काल्पनिक पूर्ण देशांतर 101°15′00″ लें। यह कर्क 11°15′00″ है। कर्क चौथी राशि है, इसलिए आरंभ तुला से होगा। भीतर के 40,500″ में पंद्रह भाग पूरे हो चुके हैं और भाग 16 शुरू होता है। तुला से पंद्रह कदम आगे मकर आता है।
एक चाप-सेकंड पहले 101°14′59″ पर भीतर का मान 40,499″ है। वह भाग 15 में होगा और धनु देगा। दोनों को गोल करके 101°15′ दिखाने पर अंतर छिप जाएगा। सीमा तय करते समय मूल निर्देशांक लें।
शीट या रिपोर्ट जाँचने के उन्नीस निर्देशांक
| पूर्ण देशांतर | जन्मराशि | राशि के भीतर | भाग | D40 राशि |
|---|---|---|---|---|
| 0°00′00″ | मेष | 0°00′00″ | 1 | मेष |
| 0°44′59″ | मेष | 0°44′59″ | 1 | मेष |
| 0°45′00″ | मेष | 0°45′00″ | 2 | वृषभ |
| 8°59′59″ | मेष | 8°59′59″ | 12 | मीन |
| 9°00′00″ | मेष | 9°00′00″ | 13 | मेष |
| 17°59′59″ | मेष | 17°59′59″ | 24 | मीन |
| 18°00′00″ | मेष | 18°00′00″ | 25 | मेष |
| 26°59′59″ | मेष | 26°59′59″ | 36 | मीन |
| 27°00′00″ | मेष | 27°00′00″ | 37 | मेष |
| 29°14′59″ | मेष | 29°14′59″ | 39 | मिथुन |
| 29°15′00″ | मेष | 29°15′00″ | 40 | कर्क |
| 29°59′59″ | मेष | 29°59′59″ | 40 | कर्क |
| 30°00′00″ | वृषभ | 0°00′00″ | 1 | तुला |
| 44°59′59″ | वृषभ | 14°59′59″ | 20 | वृषभ |
| 45°00′00″ | वृषभ | 15°00′00″ | 21 | मिथुन |
| 101°14′59″ | कर्क | 11°14′59″ | 15 | धनु |
| 101°15′00″ | कर्क | 11°15′00″ | 16 | मकर |
| 359°59′59″ | मीन | 29°59′59″ | 40 | मकर |
| 360°00′00″ | मेष | 0°00′00″ | 1 | मेष |
29°59′59″ से 30°00′00″ की जोड़ी जन्मराशि बदलना दिखाती है। मेष का अंतिम भाग कर्क देता है, लेकिन वृषभ का पहला भाग तुला देता है। राशिचक्र में देशांतर लगातार बढ़ने का अर्थ यह नहीं कि इस खास वर्ग का राशि-मानचित्र हर सीमा पर लगातार ही चलेगा।
अंतिम जोड़ी पूरे राशिचक्र का सिरा जाँचती है। मीन का अंत D40 मकर में होता है; 360° को मेष 0° में लौटाने पर D40 मेष मिलता है। बाहर रखी गई अंतिम सीमा के लिए इकतालीसवाँ भाग या तेरहवीं जन्मराशि न बनाएँ।
सूचकांक स्पष्ट रखकर छोटा सूत्र लिखें
p को शून्य से शुरू भाग-सूचकांक मानें, जिसका मान 0 से 39 है। विषम जन्मराशि में b = 0 और सम में b = 6 रखें। यदि गंतव्य राशियाँ भी मेष = 0 से मीन = 11 तक गिनी हैं, तो गंतव्य = (b + p) mod 12 होगा।
कर्क वाले उदाहरण में p = 15 और b = 6 है। 21 को 12 से भाग देने पर शेष 9 है, जो शून्य-आधारित क्रम में मकर है। आपकी शीट मेष = 1 लेती हो तो शेष लेने के बाद ही एक जोड़ें। शून्य और एक से शुरू क्रमों को मिलाने पर सभी परिणाम एक राशि खिसक सकते हैं।
यह सूत्र राशि तय करता है। इससे अपने-आप भाव नहीं निकलता और गंतव्य राशि के भीतर अंश दिखाने की कोई एक पद्धति तय नहीं होती। दो रिपोर्ट अलग दिखें तो एक जैसे क्षेत्र मिलाएँ। राशि को भाव या अधिदेवता से मिलाने पर गणना सही होकर भी विरोध जैसा दिखाई दे सकता है।
पूर्ण देशांतर को चालीस से गुणा करना पर्याप्त क्यों नहीं है?
D27 के लेख में हार्मोनिक जाँच उसकी खास तत्व-आधारित रचना के कारण सही है। केवल गुणक बदलकर वही जाँच D40 में नहीं लगा सकते। नीचे के मौलिक प्रतिउदाहरण ठीक जन्मराशि की सीमाओं पर हैं, इसलिए गोल करने की समस्या नहीं है।
| पूर्ण L | इस पद्धति की D40 राशि | 40L mod 360° | उस हार्मोनिक की राशि |
|---|---|---|---|
| 30° | तुला | 120° | सिंह |
| 60° | मेष | 240° | धनु |
| 90° | तुला | 0° | मेष |
वृषभ 0° पर बताई D40 पद्धति तुला से शुरू होती है। उसका पूरा देशांतर 30° है; चालीस से गुणा करके 360° का शेष लेने पर 120°, यानी सिंह मिलता है। दोनों गणनाएँ अपने भीतर सुसंगत हैं, लेकिन अलग मानचित्र लागू करती हैं।
केवल राशि के भीतर के अंश का चालीस गुना भी हर बार मेष से शुरू होगा, जब तक सम-विषम वाला आरंभिक अंतर न जोड़ा जाए। वर्ग की संख्या इनपुट के भागों की संख्या बताती है; भाग किस राशि में भेजे जाएँगे, यह पूरा नियम नहीं बताती।
कोण की कला और घड़ी का मिनट न मिलाएँ
45′ का अर्थ पैंतालीस चाप-मिनट या 0.75 अंश है। यह घड़ी के पैंतालीस मिनट नहीं हैं। 0°45′00″ में ठीक 2,700 चाप-सेकंड हैं; इसे 0.45 दशमलव अंश नहीं पढ़ना चाहिए।
संवेदनशीलता का एक काल्पनिक मॉडल लें: यदि कोई निर्देशांक लगातार 15° प्रति घंटे बदले, तो वह 0.75° तीन मिनट में पार करेगा। यह अंकगणित वास्तविक लग्न की चाल हर समय इतनी ही होने का दावा नहीं है। उसकी दर परिस्थितियों से बदलती है और ग्रहों की गति भी अलग-अलग होती है।
वास्तविक रिपोर्ट में सबसे पहले और सबसे बाद के संभावित जन्मसमय की गणना करें; स्थान तथा संदर्भ-सेटिंग समान रखें। लिखें कि कौन-से स्थान समान रहे और कौन सीमा पार कर गए। बारीक विभाजन जन्म-सूचना से अधिक निश्चितता पैदा नहीं करता। केवल अंश के अधिक दशमलव दिखा देने से जन्मसमय की अनिश्चितता समाप्त नहीं होती।
स्रोत का निर्माण-नियम और फलित अलग रखें
बृहत्पाराशरहोराशास्त्र 6.29 विषम राशि में मेष और सम राशि में तुला का आरंभ बताता है; अगले श्लोक में अधिदेवता-सूची आती है। नरसिंह राव की पुस्तक का खंड 6.2.18 चालीस समान 45′ खंड और यही आरंभ देता है। ऊपर की सारणी इन्हीं निर्माण-कथनों का उपयोग करती है।
अधिदेवता, गंतव्य राशि और भाव अलग स्तर हैं। यह लेख D40 के किसी स्थान से पूर्वज का आचरण तय नहीं करता और किसी परिवार को दोष नहीं देता। ऐसे दावे पारंपरिक वर्ग की गणना दोहराने से सिद्ध नहीं होते।
D24 के लेख में सम-विषम के आरंभ अलग हैं, जबकि D30 में खंड असमान हैं। सभी सूक्ष्म वर्गों को एक जैसा मानने के बजाय संबंधित पद्धति का नाम और नियम साथ रखें।
D40 का फलित पढ़ने से पहले छह जाँचें
- समान, बिना गोल किया निरयन देशांतर और संदर्भ-सेटिंग निश्चित करें।
- पूरा देशांतर तथा राशि के भीतर का शेष अलग रखें।
- मेष = 1 वाली जन्मराशि से सम-विषम तय करें।
- 2,700″ वाला खंड निचली सीमा शामिल करके जाँचें।
- भाव या अधिदेवता से पहले समान प्रकार की गंतव्य राशि मिलाएँ।
- जन्मसमय की अनिश्चितता निष्कर्ष में बनाए रखें।
कुंडली में अपनी रिपोर्ट के उपलब्ध स्थान देख सकते हैं। अंतर पूछते समय देशांतर, राशि-नियम और मिलाया जा रहा क्षेत्र साथ दें। दो वर्ग-नामों के आधार पर बहस से बेहतर शुरुआत दोहराई जा सकने वाली गणना है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
D40 का एक भाग कितना है?
30° का चालीसवाँ भाग, अर्थात 0°45′ या 0.75 अंश, ठीक 2,700 चाप-सेकंड। ये कोण की इकाइयाँ हैं, घड़ी के मिनट नहीं।
D40 में सम-विषम राशियाँ कहाँ से शुरू होती हैं?
विषम जन्मराशियाँ मेष से और सम जन्मराशियाँ तुला से शुरू होती हैं। दोनों में आगे गिनते हैं। प्रचलित क्रम में मेष पहली राशि है।
इस नियम में कर्क 11°15′ क्या देता है?
यह भाग 16 शुरू करता है। कर्क सम है, इसलिए तुला से गिनने पर मकर मिलता है। एक चाप-सेकंड पहले भाग 15, यानी धनु था।
क्या पूर्ण देशांतर का चालीस गुना D40 दे देता है?
इस पद्धति में नहीं। वृषभ 0° पर D40 तुला है, लेकिन पूरे 30° देशांतर के चालीस गुने का 360° से शेष सिंह में आता है।
चालीस पंक्तियों में राशियाँ क्यों दोहरती हैं?
चालीस भागों में बारह राशियों के तीन चक्र और चार अतिरिक्त गंतव्य आते हैं। दोहरती राशि फिर भी अलग इनपुट-खंडों से जुड़ी होती है।
क्या सटीक D40 से परिवार या पूर्वज के बारे में दावा सिद्ध होता है?
नहीं। राशि की गणना दोहराने से पूर्वज के बारे में तथ्य सिद्ध नहीं होते और परिवार को दोष देना उचित नहीं बनता। अंकगणित, फलित और इनपुट की अनिश्चितता अलग रखें।