केंद्रादि और द्रेष्काण बल में क्या अंतर है?
केंद्रादि बल ग्रह के भाव-समूह से 60, 30 या 15 विरूप देता है। द्रेष्काण बल राशि के भीतर दस अंश के खंड और ग्रहों की निर्धारित सूची से 15 या 0 देता है। दोनों स्थान बल में जुड़ते हैं, पर इनके इनपुट अलग हैं। परिणाम दोहराने के लिए भाव-पद्धति और द्रेष्काण की गणना-सारणी दोनों बतानी चाहिए।
इस लेख में पूरे राशि-भाव और जाँची गई Astrogyana गणना-पद्धति के उदाहरण हैं। साथ में Maitreya की प्रकाशित सारणी दी गई है, जो चंद्र, शुक्र, बुध और शनि के लिए अलग खंड चुनती है। इस अंतर को एक सार्वभौमिक नियम के पीछे छिपाने के बजाय स्पष्ट रखा गया है।
ये पारंपरिक ज्योतिषीय अंक-नियम हैं। अधिक अंक किसी भौतिक बल का मापन नहीं और किसी व्यक्ति के व्यवहार या जीवन-घटना की गारंटी नहीं हैं। यहाँ उद्देश्य गणना को समझना और अलग रिपोर्टों की तुलना को अधिक सटीक बनाना है।
अंक निकालने से पहले कौन-से इनपुट लिखें?
ग्रह का नाम, निरयण राशि, उस राशि के भीतर अंश, लग्न की राशि, भाव-पद्धति और द्रेष्काण सारणी लिखें। मूल निर्देशांक की सूक्ष्मता बचाकर रखें। स्क्रीन पर 10.00 अंश दिखने वाला मान सीमा से थोड़ा नीचे का गोल किया हुआ अंक भी हो सकता है। तृतीयांश के नियम में यह अंतर महत्वपूर्ण है।
मेष को 1 से शुरू कर मीन को 12 मानें। राशि के भीतर अंश शून्य से शुरू होकर तीस से कम होता है। पूरे राशिचक्र का देशांतर अलग संख्या है। उदाहरण के लिए 219 अंश देशांतर वृश्चिक के 9 अंश हैं; वृश्चिक की राशि-संख्या 8 होगी।
यह सारणी सात पारंपरिक ग्रहों के लिए है। राहु और केतु को बिना बताए किसी समूह में रखकर उसी पद्धति का परिणाम नहीं कहना चाहिए। किसी अन्य रिपोर्ट में अतिरिक्त पिंडों के लिए विस्तार हो तो उसका नियम अलग लिखना होगा। नाम समान होने से हर विस्तार अपने-आप प्रमाणित नहीं होता।
बारह भावों में केंद्रादि बल की सारणी
| भाव | समूह | विरूप |
|---|---|---|
| 1 | केंद्र | 60 |
| 2 | पणफर | 30 |
| 3 | आपोक्लिम | 15 |
| 4 | केंद्र | 60 |
| 5 | पणफर | 30 |
| 6 | आपोक्लिम | 15 |
| 7 | केंद्र | 60 |
| 8 | पणफर | 30 |
| 9 | आपोक्लिम | 15 |
| 10 | केंद्र | 60 |
| 11 | पणफर | 30 |
| 12 | आपोक्लिम | 15 |
हर तीन भाव के बाद 60, 30 और 15 का क्रम दोहरता है। यह एक विशेष भाव-समूह का अंक है, सभी भावों की सामान्य शुभता की सूची नहीं। उदाहरण के लिए नवम भाव को यहाँ 15 मिलते हैं, जबकि किसी अन्य चर्चा में उसे त्रिकोण कहा जा सकता है। दोनों वर्गीकरण अलग प्रश्नों के उत्तर देते हैं।
इस घटक में ग्रह का नाम अंक नहीं बदलता। एक ही पूरे राशि-भाव में सूर्य और शनि हों तो उनका केंद्रादि बल समान होगा। अन्य घटक अलग इनपुट लेते हैं, इसलिए उनका परिणाम फिर भी अलग हो सकता है। गणना के प्रत्येक भाग को अलग रखने से अर्थ निकालते समय अनावश्यक छलाँग कम होती है।
लग्न से भाव निकालें और राशि-चक्र का मोड़ सँभालें
लग्न की राशि-संख्या A और ग्रह की राशि-संख्या P हो तो धनात्मक शेषफल के साथ भाव = ((P − A + 12) mod 12) + 1। फिर (भाव − 1) mod 3 का मान 0, 1 या 2 होने पर क्रमशः 60, 30 या 15 लें।
वृश्चिक लग्न के लिए A = 8 है। सिंह में ग्रह हो तो P = 5 और गणना ((5 − 8 + 12) mod 12) + 1 = 10 होगी। इसलिए केंद्रादि बल 60 है। तुला में ग्रह होने पर भाव 12 और अंक 15 होंगे। मेष के पार गिनती जाने पर भी यही सूत्र काम करता है।
अंश-आधारित भाव-चलित चित्र में ग्रह का भाव इस पूरे राशि-भाव से अलग हो सकता है। उस चित्र का भाव लेकर इन उदाहरणों की हूबहू पुनरावृत्ति का दावा न करें। दूसरी पद्धति का स्पष्ट उपयोग संभव है, लेकिन तब तुलना के इनपुट बदलते हैं। अपनी स्थिति देखने के लिए कुंडली प्रवेश-पृष्ठ उपयोगी संदर्भ है।
राशि के दस अंश वाले खंड बिना गोल किए निकालें
राशि के भीतर d अंश हों तो खंड-संख्या floor(d / 10) + 1 है। अंतराल [0,10), [10,20) और [20,30) हैं। ठीक 10 अंश दूसरे खंड की शुरुआत है और ठीक 20 तीसरे की। ठीक 30 अंश को पहले अगली राशि के शून्य अंश में बदलना होगा।
हाथ की गणना में कोणीय सेकंड उपयोगी हैं। एक राशि के 108,000 सेकंड में सीमाएँ 36,000 और 72,000 हैं। 9°59′59″ पहले खंड में है; एक सेकंड जोड़ने पर दूसरा शुरू हो जाता है। ये छलाँगें स्वयं अंक-नियम का भाग हैं, ग्रह के भौतिक गुण का अचानक बदलना नहीं।
यह खंड-संख्या अभी D3 की राशि नहीं है। द्रेष्काण वर्ग-चक्र बनाने के लिए अलग मानचित्रण होता है। D3 राशि, उसमें ग्रह का संबंध और यह पंद्रह-अंकीय बल एक-दूसरे की जगह न रखें। D3 की गणना का लेख उस मानचित्रण को अलग समझाता है।
दो द्रेष्काण सारणियाँ एक ही परिणाम क्यों नहीं देतीं?
| ग्रह | Astrogyana: 0–10 / 10–20 / 20–30° | Maitreya: 0–10 / 10–20 / 20–30° |
|---|---|---|
| सूर्य | 15 / 0 / 0 | 15 / 0 / 0 |
| चंद्र | 0 / 0 / 15 | 0 / 15 / 0 |
| मंगल | 15 / 0 / 0 | 15 / 0 / 0 |
| बुध | 0 / 15 / 0 | 0 / 0 / 15 |
| गुरु | 15 / 0 / 0 | 15 / 0 / 0 |
| शुक्र | 0 / 0 / 15 | 0 / 15 / 0 |
| शनि | 0 / 15 / 0 | 0 / 0 / 15 |
यहाँ प्रयुक्त Astrogyana पद्धति में सूर्य, मंगल और गुरु पहले; बुध और शनि दूसरे; चंद्र और शुक्र तीसरे खंड में 15 पाते हैं। Maitreya की प्रकाशित सारणी पहले समूह पर सहमत है, लेकिन चंद्र-शुक्र को दूसरा और बुध-शनि को तीसरा खंड देती है।
यह नियम का वास्तविक अंतर है, दशमलव गोल करने की त्रुटि नहीं। लेख दोनों को नाम सहित दिखाता है; यह दावा नहीं करता कि परंपरा के सभी मतों का अंतिम समाधान कर दिया गया है। मुख्य उदाहरण Astrogyana स्तंभ से चलते हैं और अंतिम स्तंभ दूसरे नियम का द्रेष्काण अंक दिखाता है।
संदर्भ इन समूहों को समझाने में पारंपरिक ग्रह-वर्गों के नाम भी प्रयोग करता है। वे ज्योतिषीय वर्ग हैं, किसी व्यक्ति के लिंग या सम्मान का निर्णय नहीं। संख्यात्मक तुलना के लिए स्पष्ट ग्रह-सूची उपयोगी है, क्योंकि केवल वर्ग का नाम सुनने से अलग पुस्तकों के बीच भ्रम रह सकता है।
वृश्चिक लग्न के साथ सात उदाहरण
| ग्रह | राशि संख्या | राशि में अंश | भाव | केंद्रादि | द्रेष्काण: Astrogyana | योग | द्रेष्काण: Maitreya |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| सूर्य | 5 | 9°59′59″ | 10 | 60 | 15 | 75 | 15 |
| चंद्र | 2 | 20°00′00″ | 7 | 60 | 15 | 75 | 0 |
| मंगल | 9 | 10°00′00″ | 2 | 30 | 0 | 30 | 0 |
| बुध | 8 | 10°00′00″ | 1 | 60 | 15 | 75 | 0 |
| गुरु | 7 | 0°00′00″ | 12 | 15 | 15 | 30 | 15 |
| शुक्र | 3 | 19°59′59″ | 8 | 30 | 0 | 30 | 15 |
| शनि | 4 | 29°59′59″ | 9 | 15 | 0 | 15 | 15 |
ये सात स्वतंत्र शिक्षण स्थितियाँ हैं; ऐसा दावा नहीं कि सभी एक वास्तविक समय के आकाश की संयुक्त स्थिति हैं। योग में केवल केंद्रादि और द्रेष्काण जुड़े हैं। सूर्य की पंक्ति देखें: सिंह वृश्चिक से दसवाँ पूरा राशि-भाव है और 9°59′59″ पहला खंड है। 60 और 15 मिलकर 75 विरूप बनते हैं।
बुध का उदाहरण गणना को साफ रखता है। वृश्चिक पहला भाव है, इसलिए केंद्रादि 60। ठीक 10 अंश पर दूसरा खंड शुरू होने से Astrogyana में द्रेष्काण 15 और Maitreya में 0 है। दोनों के केंद्रादि-द्रेष्काण योग क्रमशः 75 और 60 होंगे।
मिथुन में शुक्र आठवें भाव में है, इसलिए केंद्रादि 30। 19°59′59″ पर वह अभी दूसरे खंड में है। मुख्य पद्धति में द्रेष्काण 0 और तुलना वाली सारणी में 15 मिलता है। एक सेकंड आगे जाने पर खंड बदलता है, इसलिए यह नियम और सीमा दोनों को जाँचने का अच्छा उदाहरण है।
दस और बीस अंश की सीमा पर अलग-अलग घटक देखें
| अंश | तृतीयांश | केंद्रादि | द्रेष्काण: Astrogyana | द्रेष्काण: Maitreya |
|---|---|---|---|---|
| 0°00′00″ | 1 | 60 | 0 | 0 |
| 9°59′59″ | 1 | 60 | 0 | 0 |
| 10°00′00″ | 2 | 60 | 15 | 0 |
| 19°59′59″ | 2 | 60 | 15 | 0 |
| 20°00′00″ | 3 | 60 | 0 | 15 |
| 29°59′59″ | 3 | 60 | 0 | 15 |
वृश्चिक लग्न और वृश्चिक में बुध को स्थिर रखते हुए सभी पंक्तियों में केंद्रादि 60 रहता है। अंश राशि के भीतर बदलते हैं, पूरा राशि-भाव नहीं। केवल खंड पर निर्भर घटक बदलता है। कई इनपुट एक साथ बदलने के बजाय यह तरीका दो नियमों को अलग पहचानता है।
अब राशि का अंत देखें। वृश्चिक 29°59′59″ पर बुध का केंद्रादि 60 और Astrogyana द्रेष्काण 0 है। धनु 0°00′00″ पर वह दूसरे पूरे राशि-भाव में आता है, इसलिए केंद्रादि 30 हो जाता है; नया पहला खंड होने से द्रेष्काण फिर 0 रहता है। खंड का अंक समान रहने पर भी राशि-परिवर्तन सही सँभालना जरूरी है।
मूल इनपुट की अनिश्चितता 10 या 20 अंश की सीमा को पार करती हो तो दोनों संभव परिणाम और उनका अंतराल लिखें। अधिक दशमलव छापने से अनिश्चित निर्देशांक निश्चित नहीं हो जाता। ऐसी स्थिति गणना की संवेदनशीलता बताने का कारण है, मनमाना सटीक जन्म-समय निकालने का आधार नहीं।
सभी 36 राशि-खंडों से संपूर्ण अंक-जाँच
| केंद्रादि + द्रेष्काण | खंडों की संख्या | कुल कोण |
|---|---|---|
| 15 | 8 | 80° |
| 30 | 12 | 120° |
| 45 | 4 | 40° |
| 60 | 8 | 80° |
| 75 | 4 | 40° |
एक लग्न और एक ग्रह तय करें। बारह राशियों के तीन-तीन समान खंड मिलकर दस अंश के 36 भाग बनाते हैं। हर केंद्रादि अंक के चार भाव हैं और प्रत्येक राशि में उस ग्रह का एक पसंदीदा खंड है। दोनों नामित पद्धतियों में कुल योग का वितरण ऊपर जैसा आता है।
30 का योग दो रास्तों से बनता है: 15 वाले भाव में पसंदीदा खंड, अथवा 30 वाले भाव में दो अन्य खंडों में से कोई। पहले रास्ते से चार और दूसरे से आठ भाग आते हैं। समान योगों को जोड़कर बारह भाग मिलते हैं; केवल एक रास्ता गिनने पर जाँच गलत होगी।
36 भाग मिलकर पूरे 360 अंश हैं। उनके योगों का कुल 1,440 है, इसलिए समान देशांतर-खंडों का अंकगणितीय औसत 40 विरूप है। यह वास्तविक जन्मों की संभावना नहीं। ग्रहों की गति, समय का चयन और बदलता लग्न समान वितरण मानने की अनुमति इस सारणी से अपने-आप नहीं मिलती।
विरूप, रूप और पूरे षड्बल को अलग रखें
इस पद्धति में दोनों घटकों के योग 15, 30, 45, 60 और 75 हो सकते हैं। 60 से भाग देने पर 0.25, 0.5, 0.75, 1 और 1.25 रूप मिलते हैं। 75 संभव है क्योंकि दो घटक जोड़े गए हैं; इससे अकेला साठ-अंकीय घटक अपनी सीमा से बड़ा नहीं हो जाता।
स्थान बल में उच्च, सप्तवर्गज और ओजयुग्म के योगदान भी जुड़ते हैं। पूर्ण षड्बल में अन्य बल-परिवार शामिल होते हैं। किसी छोटे योग को कुल आवश्यक सीमा से तुलना करने से पहले D1 और D9 का विषम-सम घटक तथा रूप, विरूप और आवश्यकता-अनुपात का संदर्भ देखें।
केंद्रादि और दिग्बल भी अलग हैं। पहला दोहरते भाव-समूह से चलता है, दूसरा ग्रह-विशेष के दिशात्मक संबंध से। दोनों में भावों की चर्चा मिलना उनकी संख्याओं को अदल-बदल करने का कारण नहीं है।
दो कैलकुलेटर की तुलना के लिए छोटा कार्यपत्र
पहले वही ग्रह और बिना गोल किया वही निरयण निर्देशांक मिलाएँ। फिर लग्न की राशि और भाव-पद्धति मिलाएँ। इसके बाद नामित खंड-सारणी देखें। अंत में इकाई और प्रदर्शित क्षेत्र का अर्थ तय करें: द्रेष्काण अकेला, केंद्रादि अकेला, उनका योग या कोई बड़ा कुल।
एक समय में एक इनपुट बदलें। खंड-सारणी जाँचने के लिए राशि और लग्न स्थिर रखकर 5, 15 और 25 अंश लें। केंद्रादि जाँचने के लिए राशि के भीतर अंश स्थिर रखें और बारह राशि-संख्याओं में ग्रह को ले जाएँ। हर अभ्यास अलग नियम को परखता है और अपेक्षित परिणाम साफ देता है।
इनपुट, पद्धति और बीच के अंकों का छोटा रिकॉर्ड रखें। सभी बातें मिल जाने पर भी अंतर रहे तो उदाहरण समीक्षा के लिए बचाएँ; केवल अधिक अनुकूल सुनाई देने वाली संख्या न चुनें। गणना-पद्धति पृष्ठ व्यापक संदर्भ देता है, जबकि इस लेख की स्पष्ट सारणियाँ यहाँ के उदाहरण परिभाषित करती हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
केंद्रादि बल अधिकतम कितना है?
बताई गई भाव-पद्धति में 1, 4, 7 और 10 भाव के लिए 60 विरूप। शेष दो समूहों को 30 या 15 मिलते हैं।
क्या द्रेष्काण बल और D3 राशि एक ही हैं?
नहीं। यहाँ अंक D1 राशि के भीतर दस अंश के खंड और नामित ग्रह-सारणी से मिलता है। D3 राशि बनाना अलग मानचित्रण है।
दो द्रेष्काण नियम अलग क्यों दिखाए गए हैं?
इस Astrogyana पद्धति में बुध-शनि को दूसरा और चंद्र-शुक्र को तीसरा खंड मिलता है। Maitreya की प्रकाशित सारणी इन दोनों समूहों को उलटे खंड देती है। तुलना में चुना नियम स्पष्ट होना चाहिए।
ठीक 10 अंश किस खंड में हैं?
दूसरे में। अंतराल अपनी निचली सीमा को शामिल और ऊपरी को बाहर रखते हैं। ठीक 20 अंश से तीसरा खंड शुरू होता है।
क्या दोनों बलों का योग एक रूप से बड़ा हो सकता है?
हाँ। केंद्रादि 60 और द्रेष्काण 15 का योग 75 विरूप या 1.25 रूप है। यह दो घटकों का योग है, अकेले साठ-अंकीय घटक का मान नहीं।
क्या अधिक अंक बेहतर घटना की गारंटी हैं?
नहीं। यह निर्धारित परंपरागत नियमों का घटक-अंक है। न यह पूरा षड्बल है, न वास्तविक जीवन के परिणाम की गारंटी।