दिग्बल की गणना: वास्तविक लग्न, मध्याकाश और पूरे उदाहरण

ASC, DSC, MC और IC से दिग्बल निकालें। सात ग्रह-अभ्यास, राशि-आरंभ से होने वाली गलती, कोण बदलने का प्रभाव और रूप-विरूप का अंतर समझें।

कुंडली और गणना-पद्धतियाँलेख · 14 मिनटRead in English ↗

लेखन और प्रकाशन: Astrogyana

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दिग्बल कैसे निकाला जाता है?

ग्रह और उसके निर्धारित न्यूनतम-बल वाले कुंडली-कोण के बीच छोटी देशांतरीय दूरी का एक तिहाई दिग्बल है। दूरी अंश में और उत्तर विरूप में रखें। मान 0 से 60 के बीच होगा। ग्रह के अनुसार न्यूनतम लक्ष्य IC, DSC, MC या ASC होता है।

यह षड्बल के भीतर ज्योतिष का पारंपरिक घटक है। दिशात्मक बल नाम होने से यह मापा गया भौतिक बल या घटना की वैज्ञानिक संभावना नहीं बन जाता। सही गणना में वास्तविक कुंडली-कोण और उनका निर्देशांक-संदर्भ चाहिए; केवल किसी अनुकूल भाव में ग्रह होने का सामान्य कथन पर्याप्त नहीं है।

चार कोण और दो विपरीत जोड़ियाँ

ASC लग्न या Ascendant और DSC उसका विपरीत Descendant है। MC, Medium Coeli अर्थात मध्याकाश का संदर्भ है; IC उसका विपरीत Imum Coeli है। यहाँ प्रयुक्त देशांतर-गणना में DSC = ASC + 180° और IC = MC + 180° है। जरूरत होने पर पूरा चक्कर घटाकर मान सामान्यीकृत करें।

लग्न और MC अलग-अलग निकाले जाने वाले कोण हैं। उनके देशांतरों में हमेशा ठीक 90 अंश का अंतर मान लेना सही नहीं है। इस कार्य-पत्र में दोनों विपरीत जोड़ियाँ महत्वपूर्ण हैं। MC क्रांतिवृत्त और मध्याह्न-वृत्त से संबंधित संदर्भ है; उसे सीधे सिर के ऊपर के बिंदु का दूसरा नाम न मानें।

घोषित अभ्यास-कोण; शून्य मेष से देशांतर
कोणदेशांतरविपरीत बिंदु
ASC103°DSC
DSC283°ASC
MC17°IC
IC197°MC

अभ्यास में ASC = 103°, अर्थात कर्क के 13 अंश, और MC = 17°, अर्थात मेष के 17 अंश रखा गया है। विपरीत बिंदु 283° और 197° हैं। ये शिक्षण के घोषित इनपुट हैं। इनसे किसी तारीख या भौगोलिक स्थान का अनुमान नहीं लगाया जा रहा।

उसी ग्रह का सही लक्ष्य चुनें

दिग्बल के अधिकतम और न्यूनतम लक्ष्य
ग्रहअधिकतम 60 विरूपन्यूनतम 0 विरूप
सूर्य, मंगलMCIC
बुध, गुरुASCDSC
चंद्र, शुक्रICMC
शनिDSCASC

सारणी अधिकतम बिंदु और उसके विपरीत न्यूनतम बिंदु को दिखाती है। सूर्य और मंगल के लिए शून्य संदर्भ IC है, इसलिए अधिकतम MC पर है। बुध और गुरु के लिए शून्य DSC है, इसलिए अधिकतम ASC पर है। चंद्र और शुक्र का न्यूनतम MC है; शनि का न्यूनतम ASC है।

जाँच शुरू करते समय न्यूनतम लक्ष्य अलग लिखना उपयोगी है। सही कोणीय-दूरी सूत्र भी गलत उत्तर देगा यदि दूसरे ग्रह का संदर्भ लिया गया हो। आगे सात ग्रह-अभ्यासों में इसी कारण न्यूनतम लक्ष्य का कॉलम रखा गया है। बीच का चरण छिपाने के बजाय दिखाने से तुलना आसान होती है।

नियम ग्रह और कुंडली के कोण का संबंध बताता है। उससे यात्रा की दिशा, भवन की कंपास-दिशा या व्यक्ति के चरित्र का निर्णय अपने आप नहीं मिलता। वे अलग व्याख्याएँ होंगी, इस अंकगणित का सीधा परिणाम नहीं।

छोटी वृत्तीय दूरी और इकाई

ग्रह-देशांतर L तथा न्यूनतम लक्ष्य W को 0° ≤ मान < 360° में सामान्यीकृत करें। a = |L − W| और d = min(a, 360° − a) निकालें। अब दिग्बल = d/3 विरूप। छोटी दूरी 180 अंश से अधिक नहीं हो सकती, इसलिए 60 से अधिक उत्तर किसी गलती या अलग मात्रा का संकेत है।

अधिकतम लक्ष्य S से दूसरी जाँच करें: दिग्बल = 60 − distance(L,S)/3। S और W विपरीत हैं, इसलिए दोनों विधियाँ समान उत्तर देती हैं। W पर शून्य, S पर 60 और दोनों को जोड़ने वाले किसी भी अर्धचाप के मध्य में 30 मिलते हैं।

एक रूप में 60 विरूप हैं। 50 विरूप लगभग 0.833333 रूप और 30 विरूप आधा रूप है। इस घटक के अधिकतम से प्रतिशत तुलना करने पर केवल पैमाने पर स्थिति मिलती है। वह सफलता की संभावना या ग्रह के पूरे षड्बल और अपेक्षित कुल बल का अनुपात नहीं है।

घोषित कोणों पर सात ग्रह-अभ्यास

सात स्वतंत्र ग्रह-अभ्यास; एक वास्तविक जन्मपत्रिका नहीं
ग्रहग्रह-देशांतरन्यूनतम लक्ष्यछोटी दूरीविरूपरूप
सूर्य47°197°150°50.00000.833333
चंद्र107°17°90°30.00000.500000
मंगल197°197°0°0.00000.000000
बुध103°283°180°60.00001.000000
गुरु13°283°90°30.00000.500000
शुक्र347°17°30°10.00000.166667
शनि283°103°180°60.00001.000000

47° पर सूर्य के लिए न्यूनतम लक्ष्य IC = 197° है। छोटी दूरी 150° और दिग्बल 50 विरूप है। अधिकतम वाले सूत्र में MC = 17° से सूर्य 30° दूर है, इसलिए 60 − 30/3 से भी 50 मिलता है। एक उत्तर को दो दिशाओं से जाँचना उपयोगी है।

107° पर चंद्र का न्यूनतम MC = 17° है; दूरी 90° और मान 30 है। 197° पर मंगल ठीक अपने न्यूनतम IC पर है, इसलिए शून्य मिलता है। 103° पर बुध ठीक अधिकतम ASC पर है, इसलिए 60 मिलता है। इन पंक्तियों से स्पष्ट है कि एक ही कोण हर ग्रह के लिए एक ही भूमिका नहीं निभाता।

13° पर गुरु, DSC से छोटे चाप में 90° दूर है और 30 विरूप देता है। 347° पर शुक्र से MC = 17° तक 360° की सीमा पार करने वाली छोटी दूरी 30° है, इसलिए 10 विरूप मिलते हैं। 283° पर शनि अपने न्यूनतम ASC के विपरीत है, इसलिए 60 मिलता है।

ये अलग-अलग अभ्यास हैं जिनमें कोणों का एक ही सेट रखा गया है। इन्हें एक ही समय की खगोलीय रूप से संभव जन्मपत्रिका नहीं बताया गया। यह भेद रखने से हर पंक्ति विधि का अलग भाग जाँच सकती है, बिना कोई काल्पनिक ऐतिहासिक कुंडली प्रस्तुत किए।

पूर्ण-राशि भाव का नाम पर्याप्त क्यों नहीं?

कर्क लग्न होने पर पूर्ण-राशि पद्धति का चौथा भाव शून्य तुला, अर्थात 180°, से शुरू होता है। लेकिन यहाँ घोषित IC = 197° है। लग्न की राशि 90° से शुरू होती है, जबकि वास्तविक लग्न 103° पर है। इन कोणों की जगह राशि-आरंभ रख देने पर इनपुट बदल जाते हैं।

सही कोण और राशि के आरंभ को रखने पर अलग उत्तर
अभ्यासग्रह-देशांतरन्यूनतम लक्ष्यविरूप
सूर्य: वास्तविक IC47°197°50.0000
सूर्य: तुला का आरंभ47°180°44.3333
शनि: वास्तविक ASC283°103°60.0000
शनि: कर्क का आरंभ283°90°55.6667

सूर्य के उदाहरण में वास्तविक IC की जगह 180° रखने से 50 के बजाय 44.3333 विरूप मिलते हैं। शनि के लिए ASC की जगह 90° रखने से 60 के बजाय 55.6667 मिलता है। यह दशमलव की छोटी राउंडिंग नहीं है; अलग संदर्भ-बिंदु इस्तेमाल हुआ है।

किसी चित्र में राशियाँ दिखाई जा सकती हैं और रिपोर्ट का दूसरा भाग वास्तविक कोण इस्तेमाल कर सकता है। दोनों का साथ होना अपने आप विरोधाभास नहीं है। प्रश्न यह है कि संख्यात्मक कॉलम किस इनपुट को पढ़ता है। राशि और भाव चलित का लेख चित्र और भाव-स्थिति सारणी का अंतर समझाता है।

ग्रह स्थिर रखकर कोण बदलें

केवल चुना हुआ कोण बदलें; ये घड़ी के मिनट नहीं हैं
अभ्यासबदलता कोणन्यूनतम लक्ष्यविरूप
सूर्य L = 47°MC = 14°194°49.0000
सूर्य L = 47°MC = 17°197°50.0000
सूर्य L = 47°MC = 20°200°51.0000
बुध L = 103°ASC = 100°280°59.0000
बुध L = 103°ASC = 103°283°60.0000
बुध L = 103°ASC = 106°286°59.0000

सूर्य वाले अभ्यास में MC को 14°, 17° और 20° करने पर IC क्रमशः 194°, 197° और 200° होता है। ग्रह 47° पर स्थिर है। छोटी दूरी बढ़ती है और मान 49, 50, 51 विरूप हो जाता है। यहाँ एक-एक कदम का कारण सीधे इनपुट में दिखता है।

बुध का उदाहरण अलग व्यवहार दिखाता है क्योंकि बीच की पंक्ति अधिकतम है। बुध 103° पर स्थिर रखते हुए ASC को 100°, 103° और 106° करने पर 59, 60, 59 मिलता है। ठीक शिखर के किसी भी ओर हटने से मान घटता है। फलन सतत है, लेकिन चरम पर बढ़ने-घटने की दिशा बदलती है।

सारणी में कोणीय बदलाव को जन्म-समय के मिनट नहीं कहा गया है। घड़ी के बदलाव से ASC और MC कितना बदलेंगे, इसके लिए तारीख, स्थान और वास्तविक खगोलीय गणना चाहिए। हर कोण के लिए एक सार्वभौमिक गति मान लेने से ऐसी धारणा जुड़ जाएगी जो इस अभ्यास में घोषित नहीं है।

सभी देशांतरों में समान बदलाव पर मान क्यों नहीं बदलता?

सूर्य और सभी संदर्भ-देशांतर को समान कोण से घुमाने की जाँच
समान बदलावग्रह-देशांतरIC देशांतरविरूप
0°47°197°50.0000
24°71°221°50.0000
-24°23°173°50.0000
360°47°197°50.0000

ग्रह और उसके संदर्भ दोनों में समान स्थिर कोण जोड़ें और सामान्यीकृत करें। उनकी आपसी दूरी नहीं बदलती। दिग्बल यहाँ सापेक्ष देशांतर से निकाला जा रहा है, इसलिए यह उपयोगी आंतरिक संगति-जाँच है।

24° जोड़ने पर सूर्य का उदाहरण L = 47°, IC = 197° से L = 71°, IC = 221° हो जाता है। दोनों में दूरी 150° और मान 50 विरूप है। पूरा 360° जोड़ने पर सामान्यीकृत निर्देशांक भी पहले जैसे हो जाते हैं। सीमा पार करना दूरी बदलने का कारण नहीं बनता।

इससे दो पूरे कुंडली-तंत्रों की हर रिपोर्ट समान होना सिद्ध नहीं होता। उनकी अन्य सेटिंग या विधियाँ अलग हो सकती हैं। यह केवल दिखाता है कि देशांतर के आरंभ में समान बदलाव ग्रह और सभी संबंधित कोणों पर लागू किया जाए तो इस विशेष दूरी को अपने आप नहीं बदल सकता। केवल ग्रह को बदलना अलग क्रिया है।

दिग्बल और उच्च बल में प्रश्न अलग है

दोनों घटकों में छोटी दूरी और 0–60 विरूप का पैमाना दिखाई दे सकता है। उनके संदर्भ अलग हैं। उच्च बल किसी घोषित राशि-चक्र में ग्रह के स्थिर परमोच्च-परमनीच बिंदु लेता है। दिग्बल विशेष कुंडली के कोण लेता है।

सूर्य को 10° पर स्थिर रखें। पिछले लेख की पद्धति में उसका उच्च बल चयनित परमोच्च पर अधिकतम है। लेकिन उसका दिग्बल अभी भी कुंडली के MC और IC पर निर्भर करेगा। एक घटक में अधिकतम दे देने से दूसरा घटक निर्धारित नहीं होता।

इसी तरह दिग्बल का अधिकतम पाने वाला ग्रह जरूरी नहीं कि परमोच्च अंश पर हो। समान इकाई घोषित बल-पद्धति के भीतर संबंधित घटकों को जोड़ने देती है; परिभाषाएँ एक-दूसरे की जगह नहीं लेतीं। उपयोगी रिपोर्ट घटक का नाम और उसका संदर्भ दोनों सुरक्षित रखती है।

वास्तविक रिपोर्ट के लिए छह चरण

  1. ग्रह-देशांतर, ASC और MC एक ही निर्देशांक-पद्धति में लिखें।
  2. 180° जोड़कर तथा सामान्यीकृत करके DSC और IC निकालें।
  3. ग्रह का न्यूनतम लक्ष्य निर्धारण-सारणी से चुनें।
  4. उस लक्ष्य से छोटी कोणीय दूरी निकालें।
  5. तीन से भाग देकर विरूप लें; रूप चाहिए तो उत्तर को 60 से भाग दें।
  6. मान की सीमा और अधिकतम-बिंदु वाले दूसरे सूत्र से जाँच करें।

शुक्र की संक्षिप्त कार्य-पंक्ति होगी: L = 347°, न्यूनतम MC = 17°, सीधा अंतर 330°, छोटी दूरी 30°, दिग्बल 10 विरूप। अधिकतम IC = 197° से दूरी 150° है, इसलिए 60 − 150/3 = 10 भी मिलता है।

सीधा अंतर और छोटी दूरी दोनों लिखना राशि-चक्र की सीमा के पास विशेष उपयोगी है। अंतिम संख्या सुसज्जित दिख सकती है, फिर भी बड़ा चाप चुनने की गलती हुई हो सकती है। कार्य-पंक्ति उस गलती को पूरी कुंडली की व्याख्या किए बिना सामने लाती है।

कोण अनुपलब्ध होना शून्य दिग्बल नहीं है

जन्म-समय अज्ञात हो या कोणीय गणना उपलब्ध न हो, तो जरूरी इनपुट गायब हो सकते हैं। शून्य दिग्बल का अर्थ ज्ञात ग्रह-देशांतर का न्यूनतम लक्ष्य पर होना है। उसका अर्थ यह नहीं कि सॉफ़्टवेयर कोण प्राप्त नहीं कर पाया। इन दोनों स्थितियों को अलग दिखाना जरूरी है।

Astrogyana की पद्धति-टिप्पणियाँ जन्म-समय पर निर्भर अनुपलब्ध परिणामों और निकाले गए बलों को अलग रखती हैं। उसकी घोषित दिशात्मक-बल पद्धति में वास्तविक ASC और MC लिए जाते हैं, पूर्ण-राशि आरंभ नहीं। यह विधि का कथन है; हर ऐतिहासिक तारीख, असाधारण अक्षांश या बाहरी प्रदाता की पुष्टि नहीं।

दो रिपोर्टें अलग हों तो पहले जन्म-समय की प्रक्रिया, स्थान, समय-क्षेत्र, ग्रह-देशांतर और दोनों वास्तविक कोण मिलाएँ। अंतिम बल में अंतर किसी पहले से अलग इनपुट का परिणाम हो सकता है। गायब कोण की जगह राशि का आरंभ भरकर जबरन उत्तर न बनाएँ।

यह संख्या क्या स्थापित करती है?

दिग्बल छह प्रकार के बल वाले ढाँचे का एक घटक है। कम मान अन्य घटक मिटा नहीं देता। अधिक मान ग्रह के हर व्याख्यात्मक प्रश्न का उत्तर नहीं देता। षड्बल की इकाइयों वाला लेख इसे पूरी रिपोर्ट में रखकर समझाता है।

इस गणना से यह प्रमाण नहीं मिलता कि व्यक्ति किसी कंपास-दिशा में जाए, विशेष पेशा चुने या निश्चित परिणाम की अपेक्षा रखे। यहाँ पारंपरिक अंकगणित और उसके इनपुट सिखाए गए हैं। एक संख्या दोहराकर निकाल पाना और भविष्यवाणी के लिए अनुभवजन्य समर्थन मिलना अलग बातें हैं।

सात ग्रहों की इस निर्धारण-सारणी में राहु और केतु नहीं जोड़े गए हैं। उनके लिए कोई तंत्र बल देता हो तो उसकी अपनी घोषित पद्धति चाहिए। चुपचाप किसी ग्रह की पंक्ति बढ़ा देने से सारणी पूरी दिखेगी, पर पद्धति का अप्रमाणित चुनाव छिप जाएगा।

स्रोत-पद्धति और आगे पढ़ना

कोणों का निर्धारण Maitreya के दिग्बल दस्तावेज़ की नियम-सारणी के अनुसार है और Astrogyana की घोषित पद्धति से मेल खाता है। उसी Maitreya पृष्ठ पर सूर्य और Descendant वाला एक उदाहरण उसकी अपनी सारणी से असंगत है; यहाँ वह उदाहरण इस्तेमाल नहीं किया गया। ऊपर के सारे संख्यात्मक अभ्यास नए बनाए गए हैं और स्पष्ट निर्धारण से जाँचे गए हैं।

संदर्भ पढ़ते समय यह अंतर उपयोगी है: किसी पृष्ठ की मुख्य सारणी स्पष्ट होने पर भी उसके उदाहरण में असंगति रह सकती है। इस लेख में चुना हुआ नियम सामने रखा गया है, ताकि हर पंक्ति दोबारा निकाली जा सके।

कुंडली पृष्ठ पर जानकारी देखें और तुलना के साथ देशांतर, इकाई तथा सेटिंग भी रखें। केवल भाव का नाम सटीक-अंश वाले दिग्बल की जाँच के लिए पर्याप्त नहीं है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

किस ग्रह को किस कोण पर अधिकतम दिग्बल मिलता है?

सूर्य-मंगल को MC, बुध-गुरु को ASC, चंद्र-शुक्र को IC और शनि को DSC पर अधिकतम मिलता है। विपरीत कोण उनके न्यूनतम लक्ष्य हैं।

दसवें भाव में सूर्य होने पर हमेशा 60 विरूप मिलेंगे?

सटीक-अंश पद्धति में अधिकतम वास्तविक MC देशांतर पर मिलता है। केवल पूर्ण-राशि दसवें भाव का नाम उस सटीक स्थिति को स्थापित नहीं करता।

दिग्बल और उच्च बल एक ही हैं?

नहीं। दिग्बल विशेष कुंडली के कोण लेता है। उच्च बल घोषित राशि-चक्र में स्थिर परमोच्च-परमनीच बिंदु लेता है, भले दोनों का पैमाना 0–60 विरूप हो।

लग्न के वास्तविक अंश की जगह राशि का आरंभ ले सकते हैं?

वह अलग बिंदु होगा और मान बदल सकता है। यहाँ वास्तविक लग्न और MC के देशांतर इस्तेमाल करने की विधि समझाई गई है।

जन्म-समय न हो तो क्या होगा?

जरूरी कुंडली-कोण उपलब्ध नहीं हो सकते। गायब इनपुट को शून्य दिग्बल न कहें, क्योंकि शून्य एक विशेष गणितीय न्यूनतम है।

सभी देशांतरों में समान बदलाव से दिग्बल बदलता है?

ग्रह और संदर्भ दोनों में समान बदलाव उनकी छोटी दूरी को नहीं बदलता। यह इस घटक की जाँच है, दो पूरे कुंडली-तंत्रों के हर भाग की समानता का प्रमाण नहीं।

स्रोत और संदर्भ

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