ओणम: चिंगम मास का दस-दिवसीय उत्सव, तिरुवोणम नक्षत्र, महाबली कथा और परंपराएँ

केरल के दस-दिवसीय ओणम महापर्व की मार्गदर्शिका: चिंगम मास और अथम से तिरुवोणम नक्षत्र गणना, वामन-महाबली कथा, पूक्कलम, त्रिक्काकरा अप्पन और ओणसद्या।

ज्योतिष और हिंदू परंपरालेख · 12 मिनटRead in English ↗

संक्षिप्त उत्तर: ओणम क्या है?

ओणम केरल के सौर पंचांग (कोल्लवर्षम) के प्रथम मास चिंगम (सिंह संक्रांति, अगस्त–सितंबर) में मनाया जाने वाला दस-दिवसीय प्रमुख फसल और सांस्कृतिक महापर्व है। चंद्रमा के अथम (हस्त नक्षत्र) से आरंभ होकर दसवें दिन तिरुवोणम (श्रवण नक्षत्र) पर अपने शिखर पर पहुँचने वाला यह उत्सव नई धान की फसल के साथ-साथ प्रजावत्सल सम्राट महाबली के वार्षिक आगमन और भगवान वामन (त्रिक्काकरा अप्पन) की स्मृति में प्रतिदिन बढ़ते फूलों के कालीन (पूक्कलम), नौका-दौड़ (वल्लमकली) और केले के पत्ते पर परोसे जाने वाले शाकाहारी महाभोज ओणसद्या के साथ मनाया जाता है।

  • मलयालम सौर पंचांग के ‘चिंगम’ मास में चंद्रमा के अथम (हस्त) से तिरुवोणम (श्रवण नक्षत्र) तक के दस नक्षत्र-दिनों पर आधारित।
  • श्रीमद्भागवत पुराण की वामन-त्रिविक्रम कथा (कोच्चि के त्रिक्काकरा वामनमूर्ति मंदिर से संबद्ध) और न्यायप्रिय राजा महाबली के वार्षिक प्रजा-दर्शन का संगम।
  • दस घेरों वाले पूक्कलम पुष्प-मंडल, मिट्टी के त्रिक्काकरा अप्पन, कसावु (ओणक्कोडी) वस्त्र और केले के पत्ते पर 24–28 व्यंजनों के ओणसद्या भोज की विशिष्ट परंपरा।

मलयालम पंचांग (कोल्लवर्षम): चिंगम मास और अथम से तिरुवोणम तक की दस-नक्षत्र गणना

केरल के निरयण सौर पंचांग—जिसे कोल्लवर्षम (मलयालम संवत, 825 ईस्वी से प्रारंभ) कहा जाता है—में वर्ष का पहला महीना चिंगम है, जो सूर्य के सिंह राशि में प्रवेश (सिंह संक्रांति, प्रायः मध्य अगस्त) से शुरू होता है। चिंगम मास के भीतर ओणम की तिथियाँ चंद्रमा की दैनिक नक्षत्र-गति से तय होती हैं। जब चिंगम मास में चंद्रमा अथम (संस्कृत हस्त नक्षत्र) में प्रवेश करता है, तब दस-दिवसीय ओणम उत्सव का शुभारंभ होता है और दसवें नक्षत्र-दिन जब चंद्रमा भगवान विष्णु के जन्म-नक्षत्र तिरुवोणम (संस्कृत श्रवण नक्षत्र) में पहुँचता है, तब मुख्य ओणम मनाया जाता है। इस नक्षत्र के वैदिक और ज्योतिषीय स्वरूप को हमारे विस्तृत लेख श्रवण (तिरुवोणम) नक्षत्र मार्गदर्शिका में तथा पंचांग और ग्रेगोरियन तारीख़ों के संबंध को तिथि और कैलेंडर तारीख़ का अंतर में पढ़ा जा सकता है।

अथम से तिरुवोणम तक के दसों नक्षत्रों का केरल के सामाजिक और घरेलू जीवन में अलग-अलग विधान है। पहले दिन अथम पर कोच्चि के निकट त्रिप्पुनिथुरा में ऐतिहासिक अथाचमयम शोभायात्रा निकलती है और घरों के आँगन में गोबर से लीपे स्थान पर सफेद थुम्बा और पीले मुक्कुट्टी फूलों से पूक्कलम का पहला घेरा बनाया जाता है। इसके बाद चित्तिरा, चोडी, विशाखम, अनिझम (जब पम्पा नदी में अरनमुला नौका-दौड़ की तैयारियाँ शुरू होती हैं), त्रिकेटा और मूलम (जब मंदिरों में नेंद्रन केले के गुच्छे अर्पित होते हैं और पुलिकली व कुम्मट्टिकली नृत्य सजते हैं) के दौरान प्रतिदिन पूक्कलम में फूलों का एक नया वृत्ताकार घेरा जोड़ा जाता है। आठवें दिन पूरादम को पूक्कलम के मध्य में लाल मिट्टी से बने पिरामिड आकार के त्रिक्काकरा अप्पन (ओणथप्पन) स्थापित किए जाते हैं। नौवें दिन उत्रादम को ‘प्रथम ओणम’ और अंतिम बाज़ार-खरीदारी (उत्रादप्पाच्चिल) के रूप में मनाया जाता है, जिसके बाद दसवें दिन तिरुवोणम (मुख्य/द्वितीय ओणम) और फिर अविट्टम (तृतीय ओणम) व चतयम (चतुर्थ ओणम) आते हैं।

चिंगम मास में अथम से तिरुवोणम तक ओणम का दस-दिवसीय नक्षत्र क्रमदिन 1–3: अथम, चित्तिरा, चोडीचिंगम मास में हस्त, चित्रा और स्वाति नक्षत्रत्रिप्पुनिथुरा अथाचमयम जुलूस; थुम्बा फूलों से पूक्कलम के प्रथम 1–3 घेरेदिन 4–7: विशाखम से मूलमविशाखा, अनुराधा, ज्येष्ठा और मूल नक्षत्रप्रतिदिन पूक्कलम का विस्तार; ओणक्कोडी वस्त्र खरीदारी और वल्लमकली नौका सज्जादिन 8: पूरादमपूर्वाषाढ़ा नक्षत्र का अनुष्ठानिक चरणपूक्कलम के केंद्र में मिट्टी के शंक्वाकार ‘त्रिक्काकरा अप्पन’ (ओणथप्पन) की स्थापनादिन 9: उत्रादम (प्रथम ओणम)उत्तराषाढ़ा नक्षत्र व महाबली आगमन की पूर्वसंध्याउत्रादप्पाच्चिल बाज़ार का उत्साह; चिप्स, अचार, इंजि-पुली और कालन की तैयारीदिन 10: तिरुवोणम (मुख्य ओणम)श्रवण नक्षत्र का शिखर एवं अविट्टम-चतयम समापनदस घेरों का पूक्कलम, ओणथप्पन पूजा और केले के पत्ते पर भव्य ओणसद्या भोज
मलयालम सौर मास चिंगम में अथम (दिन 1) से तिरुवोणम (दिन 10) तक ओणम का नक्षत्र-आधारित उत्सव क्रम।

सम्राट महाबली और वामन (त्रिक्काकरा अप्पन) की कथा, पूक्कलम और ओणसद्या महाभोज

ओणम की पौराणिक और सांस्कृतिक आत्मा श्रीमद्भागवत पुराण के अष्टम स्कंध की वामन-अवतार कथा और केरल की लोक-परंपरा के अद्भुत समन्वय में बसती है। भगवान विष्णु के पाँचवें अवतार की इस कथा—जिसे आप हमारे विस्तृत लेख भगवान विष्णु के दशावतार में भी पढ़ सकते हैं—के अनुसार भक्त प्रह्लाद के पौत्र और विरोचन के पुत्र दैत्यराज महाबली अत्यंत न्यायप्रिय, दानी और सत्यव्रती शासक थे, जिनके राज्य में कहीं दरिद्रता, कपट या अन्याय नहीं था। जब महाबली ने विश्वजित यज्ञ किया, तब भगवान विष्णु वामन (बौने ब्रह्मचारी) के रूप में पधारे और अपने पैरों से तीन पग भूमि दान में माँगी। गुरु शुक्राचार्य की चेतावनी के बावजूद महाबली अपने सत्य-संकल्प से डिगे नहीं। विराट त्रिविक्रम रूप धारण कर भगवान ने एक पग में पृथ्वी और दूसरे पग में स्वर्ग नाप लिया; तीसरे पग के लिए महाबली ने विनम्रता से अपना मस्तक आगे कर दिया। महाबली की इस निश्छल शरणागति से प्रसन्न होकर भगवान ने उन्हें सुतल लोक का राज्य और सावर्णि मन्वंतर में भावी इंद्र पद प्रदान किया, तथा केरल की प्राचीन परंपरा (जिसका केंद्र कोच्चि का त्रिक्काकरा वामनमूर्ति मंदिर है) के अनुसार उन्हें वरदान दिया कि वे वर्ष में एक बार चिंगम मास के तिरुवोणम नक्षत्र पर अपनी प्रिय प्रजा से मिलने केरल पधारेंगे। प्रसिद्ध मलयालम लोकगीत “मावेली नाडु वानीडुम कालम” इसी समतामूलक स्वर्णयुग का गान करता है।

तिरुवोणम के प्रातःकाल स्नान के बाद परिवार सुनहरी किनारी वाले पारंपरिक ऑफ-व्हाइट हथकरघा वस्त्र (कसावु / ओणक्कोडी) धारण करते हैं, दस घेरों वाले पूक्कलम को पूर्ण करते हैं और उसके केंद्र में केले के पत्ते पर चावल के घोल से अलंकृत मिट्टी के पिरामिड रूपी त्रिक्काकरा अप्पन (जो वामन और महाबली दोनों की संयुक्त उपस्थिति के प्रतीक हैं) की पूजा कर उबले हुए पूवडा (केले व नारियल-गुड़ के चावल के पकवान) का भोग लगाते हैं।

दोपहर में केले के ताज़े हरे पत्ते (थूकिला)—जिसका संकरा सिरा हमेशा भोजन करने वाले के बाईं ओर रखा जाता है—पर भव्य शाकाहारी ओणसद्या परोसा जाता है। आयुर्वेद के षड्रस सिद्धांत पर आधारित इस भोज में पत्ते के ऊपरी बाएँ कोने पर नमक, केले के चिप्स, गुड़-सोंठ लिपटे शर्करा वरट्टी, इंजि-पुली (अदरक-इमली-गुड़ की चटनी), आम व नींबू का अचार, और ऊपरी मध्य व दाएँ भाग में पचड़ी, खिचड़ी, ओलन, अवियल, थोरन, एरिश्शेरी तथा कूटुकरी परोसे जाते हैं। पत्ते के निचले मध्य भाग में लाल मट्टा चावल (चोर) पर क्रमशः मूँग दाल (परिप्पु) व घी, सांभर, कालन/पुलिश्शेरी और रसम परोसा जाता है, जिसके बाद अडा प्रधमन और पालाडा पायसम जैसे स्वादिष्ट मिष्ठान्न छोटे पूवन केले और कुरकुरे पापड़म के साथ खाए जाते हैं तथा अंत में मसालेदार छाछ (संभारम) से भोज पूर्ण होता है।

ओणम के दस मुख्य दिन (अथम से तिरुवोणम) तथा अविट्टम व चतयम का पंचांगीय विवरण
उत्सव का दिनमलयालम नक्षत्र (संस्कृत नाम)पूक्कलम एवं अनुष्ठानिक विशेषताप्रमुख घरेलू और सामुदायिक गतिविधि
दिन 1: अथमअथम (हस्त)गोबर से लीपे स्थान पर सफेद/पीले थुम्बा फूलों का प्रथम घेरात्रिप्पुनिथुरा का ऐतिहासिक ‘अथाचमयम’ सांस्कृतिक जुलूस ओणम का आरंभ करता है
दिन 2–3: चित्तिरा व चोडीचित्तिरा (चित्रा) व चोडी (स्वाति)पूक्कलम में नारंगी और लाल फूलों का दूसरा व तीसरा वृत्तघर-आँगन की सज्जा और परिवार के लिए नए कसावु ‘ओणक्कोडी’ वस्त्रों की खरीदारी
दिन 4–5: विशाखम व अनिझमविशाखम (विशाखा) व अनिझम (अनुराधा)चौथे और पाँचवें ज्यामितीय पुष्प-चक्र का विस्तारफसल बाज़ारों में नेंद्रन केले व कंदों की आवक; पम्पा नदी में चुंडन वल्लम नौकाओं की तैयारी
दिन 6–7: त्रिकेटा व मूलमत्रिकेटा (ज्येष्ठा) व मूलम (मूल)छठा और सातवाँ घेरा; कई घरों में चौकोर ‘मूलम पूक्कलम’मंदिरों में केले के गुच्छों (कझचाकुला) का अर्पण और पारंपरिक लोक-नृत्यों का आरंभ
दिन 8: पूरादमपूरादम (पूर्वाषाढ़ा)आठवाँ घेरा; मिट्टी के शंक्वाकार ‘त्रिक्काकरा अप्पन’ की स्थापनाचावल के घोल (अनिंजु) और थुम्बा फूलों से ओणथप्पन मूर्तियों का अभिषेक व पूजन
दिन 9: उत्रादम (प्रथम ओणम)उत्रादम (उत्तराषाढ़ा)नौवाँ पुष्प-घेरा पूर्ण; महाबली के स्वागत में दीप-प्रज्वलनउत्रादप्पाच्चिल की खरीदारी; सद्या के लिए इंजि-पुली, कालन और चिप्स का निर्माण
दिन 10: तिरुवोणम (मुख्य ओणम)तिरुवोणम (श्रवण)दस घेरों का पूर्ण पूक्कलम, ओणथप्पन पूजा और पूवडा नैवेद्यकेले के पत्ते पर 26 व्यंजनों का ओणसद्या भोज, तिरुवातिराकली नृत्य और वल्लमकली
दिन 11–12: अविट्टम व चतयमअविट्टम (धनिष्ठा) व चतयम (शतभिषा)त्रिक्काकरा अप्पन की मिट्टी की आकृतियों का श्रद्धापूर्वक विसर्जनतृतीय और चतुर्थ ओणम: त्रिशूर का प्रसिद्ध पुलिकली (बाघ नृत्य) और नौका-दौड़ समापन
पारंपरिक ओणसद्या केले के पत्ते का विन्यास: व्यंजन क्रम, मुख्य सामग्री और पाचन भूमिका
पत्ते का स्थान / भोज का चरणप्रमुख मलयालम व्यंजनमुख्य सामग्रीपरोसने का क्रम और आयुर्वेदिक महत्त्व
ऊपरी बायाँ कोना (कुरकुरे व नमकीन)उप्पु (नमक), काया वरुत्ततु (चिप्स), शर्करा वरट्टी, पापड़म, पझमनेंद्रन केला, नारियल तेल, गुड़, सोंठ, उड़द पापड़सबसे पहले बाईं ओर परोसे जाते हैं जो लवण व मधुर स्वाद से रुचि जाग्रत करते हैं
ऊपरी बायाँ भाग (अचार व चटनी)पुली इंजि (इंजि-पुली), कडुकु मांगा, नारंगा अचारअदरक, इमली, हरी मिर्च, गुड़, कच्चा आम, नींबूतीखे, खट्टे और मीठे रस के समन्वय से जठराग्नि को प्रदीप्त करते हैं
ऊपरी मध्य भाग (दही व सौम्य व्यंजन)अनानास/चुकंदर पचड़ी, ककड़ी खिचड़ी, ओलनदही, कसा नारियल, राई, पेठा (कुम्हाड़ा), लोबिया, नारियल दूधप्रोबायोटिक दही और नारियल के दूध से बने शीतल व पाचक व्यंजन
ऊपरी दायाँ भाग (सब्जियों का संगम)अवियल, पत्तागोभी/बीन्स थोरन, मथंगा एरिश्शेरी, कूटुकरीदेसी मौसमी सब्जियाँ, सहजन, कच्चा केला, कद्दू, काला चना, नारियलकरी पत्ते और नारियल तेल से छौंके गए रेशेदार (फाइबर-युक्त) कृषि व्यंजन
निचला मध्य भाग (चावल व रसेदार क्रम)मट्टा चोर (लाल चावल), परिप्पु व घी, सांभर, कालन/पुलिश्शेरी, रसमकेरल का उबला लाल चावल, मूँग दाल, अरहर दाल, जिमीकंद, दही, काली मिर्चचावल पर क्रमशः प्रोटीन-युक्त दाल-घी से लेकर खट्टे सांभर और पाचक रसम तक का क्रम
मधुर समापन एवं पाचक छाछअडा प्रधमन, पालाडा पायसम, परिप्पु प्रधमन और अंत में संभारमचावल के अडा फ्लेक्स, गुड़, नारियल दूध/गाढ़ा दूध, अदरक-मिर्च युक्त छाछउत्सवी मिठास के बाद अंत में अदरक-करी पत्ते वाली छाछ से भोजन का संतुलित समापन

ओणसद्या, पूक्कलम और परिवार की रीति

ओणसद्या केरल के कई घरों और सामुदायिक भोज में केले के पत्ते पर परोसा जाने वाला उत्सवी भोजन है। पकवान परिवार और क्षेत्र के अनुसार बदलते हैं; अतिथि की ज़रूरत के अनुसार भोजन बदला जा सकता है। पूक्कलम में फूल या अन्य सामग्री से सजावटी आकृति बनाई जाती है। परिवार नए वस्त्र पहन सकते हैं, शुभकामनाएँ देते हैं, मंदिर जाते हैं या रिश्तेदारों के साथ समय बिताते हैं।

साझा भोजन से पहले एलर्जी और भोजन-पसंद पूछें। उत्सव में भाग लेने के लिए नए वस्त्र, दुर्लभ फूल या बहुत लंबा मेनू आवश्यक नहीं। छोटा भोज, फूलों की आकृति या आत्मीय शुभकामना भी स्वागत का भाव व्यक्त कर सकती है।

क्षेत्रीय उत्सव और विदेश में ओणम

केरल के ज़िलों में ओणम के सार्वजनिक रूप अलग हैं। त्रिप्पुनिथुरा अथा-चमयम के लिए जाना जाता है, जबकि नौका-दौड़ और लोक-प्रदर्शन खास जगह तथा तारीख़ से जुड़े हैं। हिंदू, ईसाई और मुस्लिम मलयाली परिवारों में घरेलू रीति बदल सकती है; हर घर को परिभाषित करने वाली एक ही पूजा-सूची नहीं है।

खाड़ी देशों, यूरोप, उत्तर अमेरिका, सिंगापुर और अन्य जगहों की मलयाली संस्थाएँ तथा मंदिर सप्ताहांत में ओणम-सद्या या कला-कार्यक्रम रखते हैं। ऐसा कार्यक्रम तिरुवोणम की तारीख़ से अलग हो सकता है। अपने शहर का आयोजक, कार्यक्रम-दिन, भोजन और पहुँच-सुविधा देखें। किसी रीति का वर्णन करते समय एक आयोजन को पूरे समुदाय का नियम न बनाएं।

ओणम की तैयारी समझदारी से करें

केरल यात्रा में लोकप्रिय आयोजन के लिए स्थानीय यातायात पहले तय करें और जिस कस्बे में जाना है वहाँ नौका-दौड़ या जुलूस की तारीख़ पक्की करें। घर पर भोजन का मेनू मेहमानों के अनुकूल बनाएं और तय करें कि पूक्कलम सरल होगा या विस्तृत। सार्वजनिक कार्यक्रम में टिकट या भीड़-व्यवस्था हो सकती है; आयोजक से सीधे पुष्टि करें।

  1. केरल पंचांग में वर्ष का तिरुवोणम दिन देखें।
  2. पर्व की तारीख़ और सप्ताहांत कार्यक्रम अलग रखें।
  3. आमंत्रण से पहले भोजन, चलने-फिरने और पहुँच की ज़रूरत पूछें।
  4. जिस कार्यक्रम में जाएँ उसका स्थानीय नाम जानें।
  5. परिवार के लिए सहज तरीके से भाग लें।

ओणम भोज या फूलों की सजावट के आकार की प्रतियोगिता नहीं। सामूहिक स्वागत और सहभागिता महत्त्वपूर्ण हैं।

आम गलतफहमियाँ

  • “ओणम की अंग्रेज़ी तारीख़ हमेशा एक है।” तिरुवोणम मलयालम पंचांग और नक्षत्र से चलता है।
  • “हर मलयाली परिवार की पूजा एक जैसी है।” रीति परिवार, धर्म और ज़िले से बदलती है।
  • “महाबली की कथा ऐतिहासिक अभिलेख है।” यह पारंपरिक कथा है जिसके अनेक रूप हैं।
  • “ओणम केवल धार्मिक अनुष्ठान है।” यह केरल का साझा सांस्कृतिक और फसल-पर्व भी है।
  • “कार्यक्रम का सप्ताहांत ही तिरुवोणम है।” सामुदायिक आयोजन अलग दिन रखा जा सकता है।

तारीख़ का उपयोगी उत्तर देने के लिए वर्ष, मलयालम पंचांग, तिरुवोणम और जिस शहर का कार्यक्रम चाहिए—ये चारों बताएँ।

संबंधित पर्व और पंचांग मार्गदर्शिकाएँ

श्रवण (तिरुवोणम) नक्षत्र, वामन अवतार सहित भगवान विष्णु के दशावतार और नक्षत्र व तिथि गणना को समझने के लिए नीचे दिए गए लेख पढ़ें।

सामान्य प्रश्न

पाठकों के सामान्य प्रश्नों के संक्षिप्त उत्तर।

मलयालम पंचांग में तिरुवोणम की तारीख़ कैसे तय की जाती है?

ओणम मलयालम सौर कैलेंडर (कोल्लवर्षम) के पहले महीने ‘चिंगम’ (अगस्त–सितंबर) में आता है; इसका दस-दिवसीय क्रम अथम (हस्त नक्षत्र) से शुरू होकर उस दिन पूर्ण होता है जब चंद्रमा तिरुवोणम (श्रवण नक्षत्र) में संचरण करता है।

ओणम पर भगवान वामन के साथ राजा महाबली का स्वागत क्यों किया जाता है?

भागवत पुराण और कोच्चि के त्रिक्काकरा मंदिर की परंपरा के अनुसार सत्यव्रती और प्रजावत्सल राजा महाबली ने वामन के तीसरे पग के लिए अपना सिर अर्पित किया था, जिससे प्रसन्न होकर भगवान ने उन्हें प्रतिवर्ष तिरुवोणम पर अपनी प्रजा से मिलने का वरदान दिया।

पूक्कलम के बीच में रखे जाने वाले मिट्टी के पिरामिड क्या कहलाते हैं?

उन्हें ‘त्रिक्काकरा अप्पन’ या ‘ओणथप्पन’ कहा जाता है; लाल मिट्टी से बने ये चपटे शिखर वाले शंकु पूरादम या उत्रादम के दिन पूक्कलम के केंद्र में भगवान वामन और महाबली के प्रतीक के रूप में स्थापित किए जाते हैं।

ओणसद्या परोसते समय केले के पत्ते का नुकीला सिरा किस दिशा में होना चाहिए?

परंपरानुसार केले के पत्ते (थूकिला) का संकरा नुकीला सिरा हमेशा भोजन करने वाले व्यक्ति के बाईं ओर और चौड़ा डंठल वाला भाग दाईं ओर रखा जाता है, तथा भोजन के बाद पत्ते को अपनी ओर मोड़ा जाता है।

पूक्कलम में प्रतिदिन फूलों का एक नया घेरा क्यों जोड़ा जाता है?

अथम के दिन सफेद थुम्बा फूलों के एक वृत्त से शुरुआत कर तिरुवोणम तक दसों नक्षत्र-दिनों के प्रतीक के रूप में रोज़ एक नया रंगीन घेरा जोड़ा जाता है, जिससे दसवें दिन दस घेरों वाला भव्य पूक्कलम पूर्ण होता है।

क्या केरल में सभी धर्मों के लोग ओणम मनाते हैं?

हाँ; यद्यपि इसकी पौराणिक कथा वामन और महाबली से जुड़ी है, तथापि केरल और विश्व भर के मलयाली समाज में हिंदू, ईसाई और मुस्लिम परिवार समान उत्साह से ओणसद्या, पूक्कलम और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के साथ इसे साझा राज्य-पर्व के रूप में मनाते हैं।

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