संक्षिप्त उत्तर: गणगौर पर्व क्या है?
गणगौर—'गण' (भगवान शिव, जिन्हें लोकभाषा में ईसर जी कहा जाता है) और 'गौरी' (माता पार्वती)—चैत्र कृष्ण प्रतिपदा (होलिका दहन के अगले दिन धुलंडी) से लेकर चैत्र शुक्ल तृतीया (गौरी तृतीया / गणगौर तीज) तक चलने वाला 18-दिवसीय वसंतकालीन पर्व है। राजस्थान, मालवा, निमाड़ और गुजरात में मनाए जाने वाले इस उत्सव में होलिका की भस्म व मिट्टी से प्रतिमाएँ गढ़ी जाती हैं, गेहूँ-जौ के जवारे बोए जाते हैं, दूब व जल से सोलह बार पूजन और शुक्ल द्वितीया को 'सिंजारा' मनाया जाता है।
- चैत्र कृष्ण प्रतिपदा (होली के अगले दिन) से चैत्र शुक्ल तृतीया तक पूरे 18 दिनों का अखंड वसंतकालीन व्रत व पूजन चक्र।
- होलिका दहन की भस्म व तालाब की मिट्टी से कच्ची मूर्तियों का निर्माण, जवारे बोना तथा काष्ठ की चित्रित ईसर-गणगौर प्रतिमाओं का पूजन।
- चैत्र शुक्ल द्वितीया का 'सिंजारा', सोलह दूब-जल अर्पण, मीठे 'गुणे' व घेवर का भोग तथा जयपुर-उदयपुर की ऐतिहासिक शाही सवारी।
गण–गौरी का शास्त्रीय अर्थ, होलिका भस्म से चैत्र शुक्ल तृतीया तक का 18-दिवसीय चक्र और पीहर–ससुराल प्रसंग
'गणगौर' शब्द दो पवित्र संस्कृत नामों के संयोग से बना है: 'गण' अर्थात् देवगणों व भूतगणों के स्वामी भगवान शिव (जिन्हें राजस्थानी लोकसंस्कृति में स्नेहपूर्वक 'ईसर' या 'ईसरदास जी' कहा जाता है) और 'गौर' या 'गौरी' अर्थात् तपस्या से गौरवर्ण प्राप्त करने वाली माता पार्वती। यद्यपि इस पर्व का मुख्य समापन दिवस चैत्र शुक्ल तृतीया (गौरी तृतीया)—जो वसंतकालीन चैत्र नवरात्रि का तीसरा दिन भी है—को पड़ता है, तथापि राजस्थान की पारंपरिक गृहस्थ साधना में यह पूरे अठारह दिनों का उत्सव है जो फाल्गुन पूर्णिमा की होली (होलिका दहन और धुलंडी) के तुरंत अगले दिन, चैत्र कृष्ण प्रतिपदा की प्रातः से आरंभ हो जाता है। धुलंडी के दिन सुहागिन महिलाएँ और कुँवारी कन्याएँ होलिका दहन की ठंडी राख (भस्म) और सरोवर या नदी की शुद्ध मिट्टी मिलाकर ईसर जी, गौर माता, मालन, कन्हैया और रोवा-बोवा की छोटी कच्ची पिंडियाँ (प्रतिमाएँ) बनाती हैं। इसी भस्म-मिश्रित मिट्टी को बाँस की टोकरी या मिट्टी के कुंडे में भरकर उसमें गेहूँ या जौ के दाने ('जवारे') बोए जाते हैं, जो अठारह दिनों के नियमित जल-सिंचन से हरी-भरी कोंपलों के रूप में अंकुरित होकर वसंत के नवजीवन का प्रतीक बनते हैं।
शिव पुराण और लोककथाओं के समन्वित भाव में—जिसकी व्यापक दार्शनिक पृष्ठभूमि हमारे हिंदू धर्म में शिव उपासना के मार्ग लेख में दी गई है—माता गौरी ने कठोर तप से भगवान शिव को प्राप्त किया और चैत्र मास में वे अपने पितृगृह ('पीहर' / मायके) आती हैं; अठारहवें दिन चैत्र शुक्ल तृतीया को भगवान ईसर (शिव) उन्हें विदा कराकर पुनः ससुराल ले जाने आते हैं। इसी लोकभाव के कारण नवविवाहिता कन्याएँ विवाह के बाद अपनी पहली गणगौर मनाने अनिवार्य रूप से अपने पीहर (मायके) आती हैं, और अंतिम दिन का विसर्जन या समापन किसी बेटी की भावुक 'विदाई' के रूप में मनाया जाता है। चैत्र कृष्ण अष्टमी (शीतला अष्टमी) के बाद कुम्हार के यहाँ से छिद्रयुक्त मिट्टी का घड़ा लाया जाता है जिसे 'घड़ल्या' (घुड़लिया) कहते हैं; इसके भीतर दीपक जलाकर कन्याएँ शाम को सिर पर रखकर मोहल्ले के घर-घर जाती हैं और घड़ल्या के लोकगीत गाती हैं, जिस पर गृहस्वामी उन्हें पूजा के लिए गुड़, अनाज, घी और दक्षिणा भेंट करते हैं।
सिंजारा, गौरी तृतीया की 16-उपचार पूजा विधि, गुणे–घेवर का भोग और राजस्थान व मालवा की क्षेत्रीय परंपराएँ
अठारह दिवसीय व्रत के प्रत्येक प्रातःकाल में महिलाएँ और कन्याएँ बाग या सरोवर से हरी दूर्वा ('दूब'), ताजे फूल और लोटे में शुद्ध जल लेकर आती हैं। दूब की पूनी से कच्चा दूध, दही, जल, रोली और हल्दी के छींटे सोलह बार ईसर-गौरी की प्रतिमाओं पर देते हुए पारंपरिक राजस्थानी गीत ('गौर ए गणगौर माता खोल किवाड़ी, बाहर ऊभा थारा पूजण वाला') गाए जाते हैं। गणगौर की पूजा में 'सोलह' (16) की संख्या का विशेष शास्त्रीय व प्रतीकात्मक स्थान है: पूजा-स्थल की दीवार पर रोली, काजल, हल्दी और मेहंदी से सोलह-सोलह बिंदियाँ ('टिकियाँ') लगाई जाती हैं, जो चंद्रमा की सोलह कलाओं और सुहाग के सोलह श्रृंगार का प्रतिनिधित्व करती हैं। मुख्य पर्व से एक दिन पूर्व चैत्र शुक्ल द्वितीया को 'सिंजारा' (सिंधारा) मनाया जाता है—इस दिन विवाहित बेटियों और बहुओं के लिए मायके व ससुराल से लहरिया या बंधेज की ओढ़नी/साड़ी, हरी मेहंदी, चूड़ियाँ और केसरिया 'घेवर' भेजा जाता है, तथा सायंकाल में सजे हुए कलश लेकर महिलाएँ कुएँ या तालाब पर गणगौर को 'पानी पिलाने' (जोहरा) की रस्म निभाती हैं।
चैत्र शुक्ल तृतीया (गणगौर तीज) को काष्ठ या मिट्टी की ईसर-गौरी प्रतिमाओं को नई जरीदार पोशाक और आभूषण पहनाकर चौकी पर विराजमान किया जाता है। इस दिन के नैवेद्य में गेहूँ के आटे, घी और चाशनी से बने कंगन व आभूषणों के आकार के पारंपरिक पकवान 'गुणे' (मीठे और नमकीन छल्ले) तथा भाप में पके 'ढोकले' का विशेष महत्त्व है। चौकी पर सोलह गुणे, जवारे की हरी कोंपलें, ऋतुफल और सोलह श्रृंगार अर्पित कर गणगौर व्रत कथा (माली की पत्नी, गौरी माता द्वारा उँगली के नख से दी गई मेहंदी और रानी के अहंकार के त्याग की कथा) सुनी जाती है, और पूजा के बाद सास या घर की बड़ी महिलाओं को सोलह गुणे व दक्षिणा का 'बयाना' भेंट कर आशीर्वाद लिया जाता है। अपराह्न में ऐतिहासिक शोभायात्राएँ निकलती हैं: जयपुर में सिटी पैलेस के जनानी ड्योढ़ी (त्रिपोलिया गेट) से हाथी-घोड़ों, ऊँटों, कालबेलिया नृत्य और लवाजमे के साथ गणगौर माता की शाही सवारी तालकटोरा तक जाती है; उदयपुर में पिछोला झील के गणगौर घाट पर सुसज्जित नावों में ईसर-गौरी का नौका-विहार होता है; बीकानेर में 'मथेरन' कलाकारों द्वारा उस्ता व काष्ठ शैली में निर्मित प्राचीन मूर्तियाँ सजाई जाती हैं; नाथद्वारा में श्रीनाथजी की हवेली के सप्त-रंगों के अनुरूप सात दिनों की 'सप्तरंगी गणगौर' निकलती है; और मध्य प्रदेश के मालवा व निमाड़ अंचल में इसे 'रनुबाई' (गौरी) और 'धनियाराजा' (शिव) के रूप में सिर पर सुसज्जित रथ रखकर व भावपूर्ण विदाई गीत गाकर मनाया जाता है।
| पंचांग तिथि / चरण | स्थानीय रस्म का नाम | मुख्य पूजा सामग्री | भक्तिपूर्ण आचरण और आध्यात्मिक भाव |
|---|---|---|---|
| चैत्र कृष्ण प्रतिपदा (दिन 1) | भस्म स्थापना और जवारे बोना | होलिका दहन की भस्म, तालाब की मिट्टी, गेहूँ/जौ के बीज | होली की राख व मिट्टी से ईसर-गौरी गढ़ना और टोकरी में जवारे बोना। |
| चैत्र कृष्ण 2 से 7 तक | प्रातः दूब-जल पूजन | हरी दूब (दूर्वा), कच्चा दूध, जल, रोली, हल्दी, काजल | दूब से 16 बार जल-दूध के छींटे देना और दीवार पर 16-16 टिकियाँ लगाना। |
| चैत्र कृष्ण अष्टमी से द्वितीया | घड़ल्या (घुड़लिया) उत्सव | छिद्रयुक्त मिट्टी का घड़ा (घड़ल्या) और जलता दीपक | संध्या में सिर पर दीपयुक्त घड़ल्या रखकर लोकगीत गाना और पूजन सामग्री एकत्र करना। |
| चैत्र शुक्ल द्वितीया (दिन 17) | सिंजारा (सिंधारा) और पानी पिलाना | मेहंदी, लहरिया वस्त्र, घेवर और सुसज्जित जल-कलश | हाथों में मेहंदी रचाना, सिंजारे की भेंट पाना और सरोवर पर गणगौर को जल पिलाना। |
| चैत्र शुक्ल तृतीया (दिन 18) | गणगौर तीज पूजा, कथा और विदाई | नई पोशाक, 16 मीठे गुणे, जवारे और सोलह श्रृंगार | षोडशोपचार पूजन, गणगौर कथा श्रवण, बयाना भेंट और गोधूलि में भावपूर्ण विदाई। |
| क्षेत्र / ऐतिहासिक नगर | स्थानीय देवता नाम व प्रतिमा रूप | विशेष पकवान और कलात्मक पहचान | प्रमुख सार्वजनिक शोभायात्रा या विशिष्ट रीति |
|---|---|---|---|
| जयपुर (ढूँढाड़) | ईसर जी और गणगौर माता (शाही काष्ठ प्रतिमा) | मीठे गुणे और केसर-पिस्ता घेवर | चैत्र शुक्ल तृतीया व चतुर्थी को त्रिपोलिया गेट से तालकटोरा तक ऐतिहासिक शाही सवारी। |
| उदयपुर व जैसलमेर (मेवाड़ / मारवाड़) | ईसर-गौरी; जैसलमेर में बिना ईसर के केवल गौरी पूजन | भाप के ढोकले, मीठे गुणे और मेवाड़ी लोकगीत | उदयपुर के गणगौर घाट (पिछोला झील) पर शाही नौका-विहार; जैसलमेर में चतुर्थी को एकल गौरी सवारी। |
| बीकानेर और जोधपुर | मथेरन कलाकारों द्वारा निर्मित काष्ठ की गणगौर | घेवर, भुजिया और चाँदमल चड्ढा के खुले मेले | जीवंत नेत्रों वाली चित्रित काष्ठ प्रतिमाएँ और मारवाड़ी 'भँवर' व 'घड़ल्या' गीत। |
| नाथद्वारा (राजसमंद) | सप्तरंगी (सात रंगों वाली) गणगौर | पुष्टिमार्गीय हवेली भोग और पारंपरिक गुणे | सात दिनों तक प्रतिदिन अलग रंग (गुलाबी, हरा, पीला, लाल आदि) की पोशाक में सवारी। |
| मालवा और निमाड़ (मध्य प्रदेश) | रनुबाई (गौरी) और धनियाराजा (शिव) | गेहूँ के जवारे की टोकरियाँ और पूरनपोली / धानी | सिर पर सुसज्जित रथ रखकर नृत्य और निमाड़ी भाषा के मर्मस्पर्शी रनुबाई विदाई गीत। |
गौरी और ईसर: भक्ति-कथा
गणगौर नाम में गण, जिसे स्थानीय रूप से शिव से और गौर या गौरी को पार्वती से जोड़ा जाता है, शामिल है। एक लोकप्रिय कथा में गौरी अपने मायके आती हैं और शिव उन्हें वापस लेने पहुँचते हैं; परिवार उन्हें विदा करता है। दूसरी कथाओं में पार्वती की भक्ति और दिव्य दंपती के संबंध पर बल है। पूजा की मूर्तियों को सजाते समय परिवार लोकगीत गा सकते हैं और कथा सुना सकते हैं।
पर्व के अर्थ अनेक हैं: गौरी की भक्ति, ऋतु का नवीनीकरण, घर का सौहार्द, जीवन-साथियों के बीच देखभाल और आने वाली फसल के लिए कृतज्ञता। इसे केवल इस दावे तक सीमित न करें कि हर महिला विवाह की कामना या पति की लंबी आयु के लिए ही पूजा करती है। अविवाहित लड़कियाँ, विवाहित महिलाएँ और परिवार के दूसरे सदस्य अलग भाव से शामिल हो सकते हैं; अनेक समुदाय घर और समाज के व्यापक कल्याण की भी प्रार्थना करते हैं।
आगंतुक हों तो मानने के बजाय परिवार से पूछें कि वे कौन-सी स्थानीय कथा और पूजा-रीति अपनाते हैं।
पर्व-क्रम और कई दिनों की पूजा
राजस्थान की कुछ रीति में गणगौर होली के बाद चैत्र के पहले दिन शुरू होती है और मूर्ति-पूजा दो सप्ताह से अधिक चल सकती है। समापन की शोभायात्रा अक्सर चैत्र शुक्ल पक्ष की तिथि पर होती है, पर पंचांग और क्षेत्र के अनुसार विवरण बदलते हैं। कुछ परिचय अठारह दिनों का उत्सव बताते हैं; कुछ अंतिम सार्वजनिक दिनों पर ध्यान देते हैं। घर की पूजा और नगर का कार्यक्रम दोनों महत्त्व रखते हैं।
तारीख़ के लिए अपने शहर का पंचांग देखें और शोभायात्रा का समय स्थानीय समिति से पक्का करें। पिछले वर्ष का समय इस वर्ष पर लागू न करें।
जयपुर, उदयपुर और दूसरे क्षेत्रों में गणगौर
जयपुर की सार्वजनिक गणगौर शोभायात्रा ऐतिहासिक मार्ग और पारंपरिक सज्जा के लिए जानी जाती है। उदयपुर में मेवाड़ उत्सव गणगौर से जुड़ा है; इसमें ईसर-गौरी की प्रतिमाओं की शोभायात्रा, लोकसंगीत और पिछोला झील के पास आयोजन हो सकता है। ये सार्वजनिक कार्यक्रम पूरा पर्व नहीं हैं। राजस्थान और पड़ोसी क्षेत्रों के परिवार अपनी घरेलू पूजा करते हैं और नगर के अनुसार उत्सव का आकार बदलता है।
राजस्थान के प्रसिद्ध पर्यटन नगरों के अलावा भी कई जगह गणगौर की स्थानीय रीति मिलती है। आगंतुक मेला, सजी मूर्तियाँ, गीत, मेहंदी और पारिवारिक भोजन देख सकते हैं। निजी पूजा की तस्वीर लेने से पहले अनुमति लें, भीड़ और यातायात के निर्देश मानें और देखें कि कार्यक्रम में टिकट या पहुँच की व्यवस्था है या नहीं। जुलूस का समय हर साल बदल सकता है।
प्रवासी समुदाय भी गणगौर मना सकते हैं। स्थानीय समूह सप्ताहांत में सभा रखे, जबकि घर परिवार के पंचांग से पूजा करें—दोनों अर्थपूर्ण हो सकते हैं।
मूर्तियाँ, गीत, मेहंदी और सिंजारा
परिवार पूजा की अवधि में गौरी और ईसर की छोटी मिट्टी या लकड़ी की प्रतिमाएँ रख सकते हैं। कुछ समुदायों में महिलाएँ और लड़कियाँ मूर्तियाँ सजाती हैं, ऋतु-गीत गाती हैं, मेहंदी लगाती हैं या उपहार बाँटती हैं। राजस्थान के कुछ हिस्सों में सिंजारा पर्व से पहले का अवसर है, जब महिला को परिवार की ओर से भेंट मिल सकती है। ये क्षेत्रीय उदाहरण हैं, हर घर के लिए नियम नहीं।
लोकगीत स्थानीय भाषा, हास्य और कथा को पीढ़ियों तक पहुँचा सकते हैं। गीत या विधि सीखते समय स्थानीय जानकार से उसका प्रसंग पूछें। किसी उपहार, व्रत या आभूषण को अनिवार्य न मानें; आर्थिक स्थिति और व्यक्तिगत चुनाव अलग होते हैं।
घर में अतिथियों के लिए मिठाई या भोजन भी बन सकता है। मिट्टी की मूर्ति न हो या जुलूस में जाना संभव न हो तो घर की सरल प्रार्थना पर्याप्त है। बच्चों को प्रतिमा और विदाई की रीति समझाते समय आस्था के साथ स्थानीय पर्यावरण-नियम भी बताएं।
घर पर सम्मानपूर्वक पूजा
- स्थानीय चैत्र-पंचांग देखें और परिवार के पूजा-दिन पर सहमति करें।
- उपलब्ध सामग्री से मूर्ति या पूजा-स्थान तैयार करें।
- परिवार की रीति के अनुसार गीत, पुष्प, प्रार्थना या कथा अर्पित करें।
- व्रत रखना चाहें तो स्वास्थ्य के अनुकूल और स्वेच्छा से रखें।
- शोभायात्रा में जाने पर रास्ता, भीड़ और मिलने का स्थान तय करें।
- समापन या विसर्जन में स्थानीय निर्देशों का पालन करें।
व्रत भक्ति की परीक्षा नहीं है। जिनके लिए उपवास ठीक न हो वे प्रार्थना, गीत, सजावट में मदद या भोजन साझा करके शामिल हो सकते हैं। दवा बंद न करें और बच्चों पर भोजन रोकने का दबाव न डालें। कोई खास विधि जरूरी हो तो परिवार के बुज़ुर्ग, मंदिर या स्थानीय आयोजक से पूछें।
चैत्र प्रतिपदा के आसपास मनाए जाने वाले गुड़ी पड़वा और वसंत नवरात्रि के परिचय के लिए चैत्र नवरात्रि की मार्गदर्शिका भी पढ़ें।
राजस्थान से बाहर गणगौर
गणगौर की सबसे मजबूत पहचान राजस्थान से है, पर आसपास के क्षेत्रों में गौरी-पूजा और वसंत की रीति से जुड़े रूप भी दिख सकते हैं। मेवाड़, शेखावाटी, मारवाड़ और पड़ोसी राज्यों के समुदायों में नाम, प्रतिमाओं का रूप और जुलूस बदल सकता है। हर जगह अठारह दिन का क्रम या एक ही अंतिम तिथि नहीं। किसी नगर की सही जानकारी के लिए देश-भर की सामान्य सूची से बेहतर स्थानीय पंचांग या मंदिर है।
विदेश में रहने वाले परिवार प्रतिमाएँ बना सकते हैं, गीत गा सकते हैं, भोजन साझा कर सकते हैं और बच्चों को ईसर-गौरी की कथा बता सकते हैं। सार्वजनिक स्थान पर विसर्जन संभव न हो तो आयोजक स्थानीय पर्यावरण और सुरक्षा के नियमों के अनुरूप सम्मानजनक विकल्प चुन सकते हैं। सप्ताहांत की सभा समुदाय को जोड़ सकती है, भले ही घर की पूजा अलग तिथि पर हो।
बड़े पाठक-वर्ग के लिए लिखते समय राजस्थान या संबंधित समुदाय का संदर्भ बताएं और रीति को कुछ परिवारों की प्रथा के रूप में रखें, सार्वभौमिक नियम न कहें।
किन गलतियों से बचें
- गणगौर को एक ही विधि से मनाया जाने वाला निश्चित पर्व बताना।
- महिलाओं की भागीदारी को केवल विवाह या पति की आयु तक सीमित करना।
- मानना कि हर घर उपवास या अठारह दिन की पूजा करता है।
- जयपुर की शोभायात्रा का समय उदयपुर या दूसरे नगर पर लागू करना।
- अनुमति के बिना निजी पूजा या बच्चों की तस्वीर लेना।
- स्थानीय पर्यावरण-मार्गदर्शन के बिना मूर्ति विसर्जित करना।
गणगौर को वही लोग और स्थान बेहतर समझाते हैं जहाँ यह मनाई जाती है। स्थानीय परिवारों को गीत, प्रतिमा और पंचांग समझाने दें और उनकी रीति का आदर करें।
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सामान्य प्रश्न
पाठकों के सामान्य प्रश्नों के संक्षिप्त उत्तर।
'गणगौर' शब्द का क्या अर्थ है और इसमें किन देवी-देवताओं की पूजा होती है?
गणगौर शब्द 'गण' (भगवान शिव, जिन्हें लोकभाषा में ईसर जी कहा जाता है) और 'गौरी' (माता पार्वती) के मिलन से बना है। यह पर्व शिव और पार्वती के आदर्श दांपत्य, परस्पर सम्मान, वसंत के नवजीवन और पारिवारिक सौहार्द की उपासना है।
गणगौर का 18-दिवसीय व्रत होली के तुरंत अगले दिन होलिका की भस्म से क्यों शुरू होता है?
राजस्थानी पंचांग परंपरा में चैत्र कृष्ण प्रतिपदा (धुलंडी) की सुबह होलिका दहन की पवित्र भस्म और तालाब की मिट्टी मिलाकर ईसर-गौरी की कच्ची प्रतिमाएँ बनाई जाती हैं और गेहूँ-जौ के जवारे बोए जाते हैं। यह होली की पावक अग्नि से वसंत के नव-अंकुरण के जुड़ने का प्रतीक है।
गणगौर में 'सिंजारा' (सिंधारा) क्या होता है और यह कब मनाया जाता है?
मुख्य गणगौर तीज (चैत्र शुक्ल तृतीया) से एक दिन पहले, चैत्र शुक्ल द्वितीया को 'सिंजारा' मनाया जाता है। इस दिन बेटियों और बहुओं को मायके व ससुराल से लहरिया वस्त्र, चूड़ियाँ, मेहंदी और घेवर भेंट किए जाते हैं तथा सायंकाल में सरोवर पर 'गणगौर को पानी पिलाने' की रस्म होती है।
'गुणे' क्या होते हैं और गणगौर पूजा में 16 गुणे क्यों चढ़ाए जाते हैं?
गुणे गेहूँ के आटे और घी से बने कंगन या आभूषण के आकार के तले हुए छल्ले होते हैं जिन्हें शक्कर की चाशनी में पिरोया जाता है। 16 दिनों की पूजा और सोलह श्रृंगार के प्रतीक के रूप में चौकी पर 16 गुणे चढ़ाए जाते हैं और कथा के बाद सास या बड़ों को 'बयाना' रूप में भेंट किए जाते हैं।
जैसलमेर में गणगौर पर ईसर जी के बिना केवल गौरी माता की सवारी क्यों निकलती है?
जैसलमेर की ऐतिहासिक लोकगाथा के अनुसार प्राचीन काल में पड़ोसी राज्य का एक दल उत्सव के दौरान ईसर जी की प्रतिमा अपने साथ ले गया था और गौरी माता की प्रतिमा वहीं रह गई। तभी से जैसलमेर में चैत्र शुक्ल चतुर्थी को बिना ईसर के केवल गौर माता की पूजा और सवारी की अनूठी परंपरा चली आ रही है।
घर पर पर्यावरण-अनुकूल (Eco-friendly) तरीके से गणगौर की विदाई और विसर्जन कैसे करें?
लकड़ी की स्थायी चित्रित ईसर-गणगौर प्रतिमाओं का कभी जल में विसर्जन नहीं किया जाता; उन्हें केवल प्रतीकात्मक जल आचमन कराकर पुनः घर में सहेज लिया जाता है। वहीं मिट्टी की कच्ची पिंडियों और जवारों को घर के साफ पात्र में विसर्जित कर वह जल और मिट्टी गमलों या बगीचे के पौधों में अर्पित कर देनी चाहिए।