संक्षिप्त उत्तर: लोहड़ी पर्व क्या है और इसकी तिथि कैसे तय होती है?
लोहड़ी उत्तर भारत और विशेष रूप से पंजाब की शीतकालीन ऋतु एवं रबी फसल से जुड़ा प्रमुख लोकपर्व है, जिसे सौर पौष (पोह) मास की अंतिम संध्या—अर्थात् मकर संक्रांति और माघी की पूर्व संध्या (सामान्यतः 13 जनवरी)—को मनाया जाता है। चंद्र तिथि के बजाय निरयण सौर पंचांग पर आधारित इस उत्सव में परिवार व पड़ोसी संध्याकाल में अलाव (अग्नि) जलाकर तिल, गुड़, गजक, रेवड़ी और मक्की के फुल्ले अर्पित करते हैं तथा दुल्ला भट्टी के लोकगीत गाते हैं।
- सौर पौष (पोह) मास की अंतिम शाम, मकर संक्रांति और पंजाबी 'माघी' से ठीक एक रात पहले (प्रायः 13 जनवरी) मनाई जाती है।
- कड़ाके की ठंड के मोड़ पर अग्नि और सूर्य के प्रति कृतज्ञता के रूप में पाँच शीतकालीन पदार्थ—तिल, गुड़, गजक, रेवड़ी और फुल्ले—अर्पित होते हैं।
- 16वीं सदी के लोकनायक दुल्ला भट्टी ('सुंदर मुंदरिये हो!') की स्मृति और बेटियों-बेटों के समान जन्मोत्सव से जुड़ी समावेशी परंपरा है।
निरयण सौर पौष-अंत की पंचांगीय गणना, मकर संक्रांति की पूर्व संध्या और रबी फसल का चक्र
जहाँ दीपावली, होली या रक्षाबंधन जैसे अधिकांश हिंदू पर्व चंद्रमा की कलाओं (तिथियों) से तय होते हैं और अंग्रेजी कैलेंडर में हर वर्ष दस-ग्यारह दिन आगे-पीछे खिसकते हैं—जिसका विस्तृत गणित हमारे तिथि बनाम कैलेंडर तारीख लेख में समझाया गया है—वहीं लोहड़ी पूरी तरह 'निरयण सौर पंचांग' (Sauramana) पर आधारित है। पंचांगीय दृष्टि से लोहड़ी सौर पौष मास (पंजाबी में 'पोह') के अंतिम दिन की संध्या है, जिसके अगले ही दिन सूर्य धनु राशि से निकलकर मकर राशि में प्रवेश करता है और सौर माघ मास ('माघी' / मकर संक्रांति) का आरंभ होता है। अयनचलन (Precession of the equinoxes) के कारण वर्तमान शताब्दी में मकर संक्रांति प्रायः 14 जनवरी (और कभी-कभी 15 जनवरी) को पड़ती है, इसलिए लोहड़ी लगभग निश्चित रूप से 13 जनवरी (या संक्रांति 15 को होने पर 14 जनवरी) की शाम को मनाई जाती है। यह सौर गणना लोहड़ी को भारत के विशाल शीतकालीन फसल-पर्व चक्र से जोड़ती है, जिसमें दक्षिण भारत का चार-दिवसीय पोंगल (भोगी और थाई पोंगल), असम का माघ बिहू (जिसकी पूर्व संध्या का अलाव और सहभोज 'उरुका' कहलाता है) तथा गुजरात का उत्तरायण शामिल हैं; साथ ही पंजाब के ही वसंतकालीन सौर नववर्ष व गेहूँ की कटाई के पर्व बैसाखी (मेष संक्रांति) के साथ यह ऋतु-चक्र का युग्म बनाती है।
पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, जम्मू और दिल्ली के कृषि-जीवन में पौष का महीना सबसे कड़ाके की सर्दी और कोहरे का समय होता है। इस समय अक्टूबर-नवंबर में बोई गई रबी की फसलें—गेहूँ (कनक), सरसों, चना और गन्ना—खेतों में लहलहा रही होती हैं, कोल्हुओं में ताजे गन्ने के रस से नया गुड़ व शक्कर पकती है और तिल की फसल घर आ चुकी होती है। 'लोहड़ी' शब्द की व्युत्पत्ति को लेकर लोकपरंपरा में कई रोचक सूत्र मिलते हैं: एक मत के अनुसार 'तिल + रोड़ी' (तिल और गुड़ की डली) से 'तिलोहड़ी' शब्द बना जो धीरे-धीरे 'लोहड़ी' कहलाया; दूसरे मत में 'लोह' का अर्थ सामुदायिक रसोई की बड़ी लोहे की तवी या अग्नि की उष्मा व प्रकाश है; और तीसरी लोककथा में होलिका की बहन लोहड़ी का उल्लेख आता है। पंजाब की प्रसिद्ध कहावत 'पोह रिद्धी, माघ खाधी' (पौष की अंतिम रात को पकाया गया और माघ की पहली सुबह खाया गया—जैसे गन्ने के रस की खीर 'रौ दी खीर') इसी ऋतु-संधि को दर्शाती है, जब सबसे लंबी और ठंडी रातों को विदा कर बढ़ते हुए दिनमान और सूर्य की ऊष्मा का स्वागत किया जाता है।
संध्याकालीन अग्नि परिक्रमा, पाँच शीतकालीन अर्घ्य और दुल्ला भट्टी की ऐतिहासिक लोकगाथा
लोहड़ी की संध्या को सूर्यास्त के बाद घर के आँगन, चौपाल या सामुदायिक मैदान में स्वच्छ लकड़ियों और गोबर के उपलों से अलाव (अग्निदेव का प्रतीक) प्रज्वलित किया जाता है। परिवार के सदस्य, रिश्तेदार और पड़ोसी अग्नि की प्रदक्षिणा (परिक्रमा) करते हुए उसमें पाँच पारंपरिक शीतकालीन पदार्थों का अर्घ्य देते हैं और थालियों में बाँटते हैं: (1) काले व सफेद तिल, (2) ताजा गुड़ या शक्कर, (3) तिल-चीनी से बनी कुरकुरी रेवड़ी, (4) तिल-गुड़ की परतदार गजक, और (5) मक्की के भुने हुए सफेद फुल्ले (पॉपकॉर्न), जिनके साथ छिलके वाली भुनी मूँगफली और मुरमुरे भी रखे जाते हैं। आयुर्वेद और पोषण विज्ञान की दृष्टि से जनवरी की कड़ाके की ठंड में तिल, गुड़ और मूँगफली शरीर को आवश्यक कैल्शियम, लौह-तत्त्व (आयरन), स्वस्थ वसा और प्राकृतिक उष्मा प्रदान करते हैं। अग्नि में तिल अर्पित करते समय बुज़ुर्ग यह पारंपरिक पंजाबी आशीर्वचन बोलते हैं—'आदर आए, दलिदर जाए; दलिदर दी जड़ चूल्हे पाए!' (अर्थात् घर में सम्मान और खुशहाली आए, दरिद्रता व आलस्य दूर हो, और अभाव की जड़ चूल्हे की अग्नि में भस्म हो जाए) तथा 'ईशर आ, दलिदर जा' की कामना करते हैं।
लोहड़ी के लोकगीतों के केंद्र में सोलहवीं शताब्दी के ऐतिहासिक लोकनायक राय अब्दुल्ला खान भट्टी—जिन्हें पूरा पंजाब आदर से 'दुल्ला भट्टी' पुकारता है—की अमर गाथा गूँजती है। मुगल सम्राट अकबर के शासनकाल में सांदल बार क्षेत्र (पिंडी भट्टियाँ, पश्चिमी पंजाब) के दुल्ला भट्टी ने किसानों पर होने वाले अन्यायपूर्ण लगान का विरोध किया था और दो अनाथ ब्राह्मण कन्याओं—सुंदरी और मुंदरी—को अत्याचारी हाकिमों के चंगुल से छुड़ाया था। दुल्ला भट्टी ने उन दोनों कन्याओं को अपनी धर्म-पुत्री मानकर रात के समय जंगल में अलाव जलाकर योग्य वर के साथ उनका विवाह संपन्न कराया, और उस समय राजकोष या धन न होने के कारण कन्यादान में अपनी ओर से एक 'सेर' (लगभग एक किलो) शक्कर उनकी झोली में डाली। लोहड़ी का विश्व-प्रसिद्ध समूह-गीत—'सुंदर मुंदरिये हो! तेरा कौन विचारा हो! दुल्ला भट्टी वाला हो! दुल्ले दी धी व्याही हो! सेर शक्कर पाई हो! कुड़ी दा लाल पटाका हो, कुड़ी दा शालू पाटा हो!'—इसी मानवीय करुणा, सांप्रदायिक सौहार्द और बेटियों के सम्मान का जीवंत स्मारक है। आज के दौर में अनेक पंजाबी परिवार बेटों के समान ही बेटियों के जन्म पर 'धीयां दी लोहड़ी' (बेटियों की लोहड़ी) और नवविवाहित दंपती की पहली लोहड़ी पूरे उत्साह व समता के साथ मनाते हैं।
| पारंपरिक लोहड़ी सामग्री | पंजाबी / हिंदी नाम | शीतकालीन कृषि स्रोत | ऋतुगत, पौष्टिक और सांस्कृतिक महत्त्व |
|---|---|---|---|
| तिल के दाने | तिल (काले व सफेद तिल) | शरद-शीत ऋतु की प्रमुख तिलहन फसल | अग्नि परिक्रमा में आहुति का मुख्य द्रव्य; स्नेह, उष्मा और समृद्धि का प्रतीक। |
| गन्ने का गुड़ व शक्कर | गुड़ / शक्कर | गाँव के कोल्हुओं में ताजे गन्ने के रस से निर्मित | दुल्ला भट्टी द्वारा सुंदरी-मुंदरी के विवाह में भेंट की गई 'सेर शक्कर' की स्मृति। |
| तिल-चाशनी की रेवड़ी | रेवड़ी | भुने तिल और गुड़/शर्करा की खींची हुई चाशनी से निर्मित | पड़ोसियों और बच्चों को लोहड़ी की बधाई थाल में बाँटी जाने वाली प्रमुख मिठाई। |
| तिल-गुड़ की गजक | गजक | कुटे हुए तिल और गुड़ की खस्ता परतदार पट्टी | पौष की ठिठुरती रातों में आयरन, कैल्शियम और ऊर्जा का सर्वोत्तम प्राकृतिक स्रोत। |
| मक्की के फुल्ले और मूँगफली | फुल्ले व मूँगफली | भुनी हुई मक्का (पॉपकॉर्न) और छिलके वाली मूँगफली | अग्निदेव को अर्पित कर सरसों के साग व मक्की की रोटी के भोज के साथ साझा किए जाते हैं। |
| पर्व का नाम | पंचांग नियम और समय | प्रमुख क्षेत्र | मुख्य अनुष्ठान और पारंपरिक व्यंजन |
|---|---|---|---|
| लोहड़ी | सौर पौष (पोह) की अंतिम संध्या, मकर संक्रांति की पूर्व संध्या (~13 जनवरी) | पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, हिमाचल, जम्मू | संध्याकालीन अलाव परिक्रमा, तिल-गुड़-रेवड़ी-फुल्ले अर्घ्य, भांगड़ा-गिद्दा और दुल्ला भट्टी गीत। |
| माघी | सौर माघ मास का प्रथम दिन (मकर संक्रांति प्रातः, ~14 जनवरी) | पंजाब, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा | प्रातः स्नान, गुरुद्वारा/मंदिर दर्शन, गन्ने के रस की खीर ('रौ दी खीर') और खिचड़ी दान। |
| भोगी व थाई पोंगल | पौष/मार्गाझी अंत एवं मकर/थाई संक्रांति (13–16 जनवरी) | तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना | पूर्व संध्या/प्रातः भोगी मंटालु अलाव, तथा अगले दिन नए चावल-दूध से सूर्यदेव को पोंगल अर्पण। |
| बैसाखी (वैसाखी) | सौर वैशाख का प्रथम दिन (मेष संक्रांति, ~13/14 अप्रैल) | पंजाब और उत्तर भारत | वसंतकालीन सौर नववर्ष, पकी हुई गेहूँ की फसल की कटाई और खालसा सजना दिवस। |
लोहड़ी की तिथि और माघी से संबंध
कई पंजाबी कैलेंडर 13 जनवरी की शाम लोहड़ी मनाते हैं। आम ग्रेगोरियन क्रम में यह मकर संक्रांति से एक दिन पहले आती है, जबकि माघी अगले दिन मनाई जाती है। ये ऋतु से जुड़ी पास-पास की तिथियाँ हैं, लेकिन अलग पर्व और अलग रीति हैं। लोहड़ी को मकर संक्रांति या माघी का दूसरा नाम न कहें।
सार्वजनिक कार्यक्रम, स्कूल और प्रवासी समुदाय सुविधा के लिए पास के सप्ताहांत में मिल सकते हैं। सांस्कृतिक संस्था या गुरुद्वारा कार्यक्रम में शामिल हों तो पूछें कि सूचना पारंपरिक पर्व-संध्या की है या सामुदायिक सभा का सुविधाजनक दिन। नियमित कैलेंडर पर प्रचलित तारीख़ मिलती है; चालू आयोजन स्थानीय स्रोत से पक्का करें।
अलाव, गीत और लोहड़ी का मिलन
अनेक लोहड़ी आयोजनों में अलाव केंद्र में होता है। परिवार और पड़ोसी बाहर मिलकर मौसमी गीत गाते हैं, ढोल पर नाचते हैं और रेवड़ी, गजक, मूँगफली, पॉपकॉर्न तथा तिल-गुड़ की चीज़ें बाँटते हैं। सार्वजनिक कार्यक्रम में भांगड़ा या गिद्धा हो सकता है, पर हर परिवार नृत्य करे यह जरूरी नहीं। भोजन और संगीत पंजाबी भाषी क्षेत्रों में अलग-अलग हैं।
कुछ समुदाय अग्नि को भेंट देते या उसके चारों ओर घूमते हैं। एक समान पूजा-क्रम मानने के बजाय मेजबान परिवार या आयोजक की रीति पूछें। लोगों का साथ मिलना, पड़ोसियों से मिलना और ऋतु का भोजन साझा करना अनेक परिवारों के लिए पर्व का मुख्य अनुभव है।
कुछ घर नवजात बच्चे या नवविवाहित जोड़े की पहली लोहड़ी उपहार और गीतों से मनाते हैं। यह सामाजिक रीति है, परिवार की हैसियत की शर्त नहीं।
दुल्ला भट्टी: लोककथा, एकमात्र प्रमाणित उद्गम नहीं
लोहड़ी के कई गीतों में दुल्ला भट्टी का स्मरण आता है। पंजाबी लोक-स्मृति में वे ऐसे नायक हैं जो संकट में पड़ी या जबरन विवाह के लिए दबाव झेल रही लड़कियों की मदद करते हैं। गीतों के कुछ रूपों में सुंदरी और मुंदरी के नाम आते हैं। घर-घर जाकर या सामुदायिक अलाव के पास बच्चे और बड़े उनके बारे में मुखड़ा गा सकते हैं।
यह मौखिक लोककथा है और इसके रूप अलग-अलग हैं। इसे प्रिय सांस्कृतिक व्याख्या और लोहड़ी-गीतों के विषय के रूप में बताना बेहतर है, पर्व का अकेला प्रमाणित उद्गम या एकसमान ऐतिहासिक वृत्तांत नहीं। लोहड़ी के मौसमी और सामुदायिक अर्थ भी हैं; हर परिवार दुल्ला भट्टी को केंद्र में नहीं रखता।
गीत सिखाते समय उसे पंजाबी लोक-परंपरा का हिस्सा कहें और भाषा तथा स्थानीय रूप समझाएँ। किसी एक मुखड़े को एकमात्र प्रामाणिक रूप न बताएं।
फसल और ऋतु का भाव
लोहड़ी को अक्सर पंजाब की रबी फसल और शीतकालीन जीवन से जोड़ा जाता है। खेती करने वाले परिवारों के लिए सामूहिक मिलन आने वाले मौसम की आशा और समुदाय के प्रति आभार व्यक्त कर सकता है। शहरों में रहने वाले पंजाबी परिवार इसे ठंड के मौसम में भाषा, संगीत और रिश्तों को जीवित रखने का अवसर मान सकते हैं।
नाम और हर रीति की एक ही ऐतिहासिक व्याख्या नहीं है। ऋतु, खेती और लोककथा के अर्थ साथ-साथ चलते हैं। पर्व को एक उद्गम-कथा, खगोलीय घटना या धार्मिक सिद्धांत तक सीमित न करें। इसका अर्थ उन खास समुदायों के काम और स्मृति में रहता है जो इसे मनाते हैं।
अलग आस्थाओं के पंजाबी परिवार लोहड़ी मना सकते हैं और अपनी धार्मिक रीति अपने अनुसार निभाते हैं। अलाव में भागीदारी हर सिख या हिंदू व्यक्ति पर धार्मिक कर्तव्य नहीं है।
घर पर लोहड़ी कैसे मनाएँ?
घर का मिलन सहज हो सकता है: रिश्तेदारों या पड़ोसियों को बुलाएँ, मौसमी भोजन साझा करें, परिचित गीत सुनें या बच्चों को स्थानीय परंपरा बताएँ। कुछ परिवार छोटा और देखरेख वाला अलाव जलाते हैं या सामुदायिक कार्यक्रम में जाते हैं। मौसम, इमारत के नियम या सुरक्षा के कारण दूसरे परिवार घर के भीतर भोजन और संगीत रखते हैं।
- परिवार या समुदाय के कार्यक्रम का समय देखें।
- मेहमानों के भोजन और परहेज़ का ध्यान रखें।
- बड़ों से पूछें कि उन्हें कौन-से गीत और रीति याद हैं।
- घर में आग हो तो छोटी, स्थिर और लगातार देखरेख वाली रखें।
- बच्चों और आग के पास न जाने वाले मेहमानों के लिए जगह रखें।
बिना अलाव के उत्सव मनाना भी ठीक है। गीत, बातचीत, साझा भोजन या विदेश में रह रहे परिवार को फोन करना साथ होने का भाव बनाए रख सकता है।
अग्नि-सुरक्षा और पर्यावरण
अलाव सोच-समझकर जलाएँ। इमारत, सूखी घास, वाहन, बिजली की तार और पेड़ों से दूर अनुमति वाली खुली जगह चुनें। जिम्मेदार वयस्क आग पर लगातार नजर रखे, बच्चों और ढीले कपड़ों के लिए दूरी हो तथा पानी या उपयुक्त अग्नि-नियंत्रक पास हो। स्थानीय प्रतिबंध और आयोजकों के निर्देश मानें; तेज़ हवा या खराब वायु-गुणवत्ता में आग न जलाएँ।
केवल स्वीकृत साफ ईंधन जलाएँ। प्लास्टिक, रंगा या रसायन लगा लकड़ी का सामान और घर का कचरा हानिकारक धुआँ दे सकता है। पैकेट, कृत्रिम सजावट या खाद्य-पैकेट आग में न डालें। खुले दीप या अलाव की अनुमति न हो तो बिजली का या प्रतीकात्मक प्रकाश लें।
सार्वजनिक मिलन में रास्ता और आपात पहुँच खुली रखें। कूड़ा तय डिब्बों में डालें और धुएँ या शोर से पड़ोसियों को होने वाली परेशानी का ध्यान रखें।
भारत और प्रवासी समुदाय में लोहड़ी
लोहड़ी का खास संबंध पंजाब से है, पर हरियाणा, दिल्ली, हिमाचल प्रदेश, जम्मू और अन्य जगहों पर भी उत्सव होते हैं। स्थानीय रूप में पड़ोस का अलाव, सांस्कृतिक कार्यक्रम, स्कूल का आयोजन या परिवार का भोजन हो सकता है। विदेश में पंजाबी समुदाय संगीत और भोजन से परंपरा बनाए रखते हैं और आग के नियम तथा मौसम के अनुसार जगह चुनते हैं।
मंदिर, गुरुद्वारा, सांस्कृतिक संस्था या नगर कार्यक्रम सुविधाजनक तिथि चुन सकते हैं। आयोजन की सूचना हर परिवार की पारंपरिक कैलेंडर तिथि नहीं बदलती। मेजबान से उनकी रीति पूछें और यह न मानें कि सभी पंजाबी समुदाय एक जैसे मनाते हैं।
बड़ों से गीत, पकवान या परिवार की स्मृति सीखें और पंजाबी संस्कृति में अलग-अलग धार्मिक व क्षेत्रीय पहचानों के लिए जगह रखें।
आम गलतफहमियाँ
- “लोहड़ी और मकर संक्रांति एक ही पर्व हैं।” कैलेंडर में पास हैं, पर नाम और रीति अलग हैं।
- “हर लोहड़ी में बड़ा अलाव जरूरी है।” कई घर बिना खुली आग के सुरक्षित उत्सव करते हैं।
- “दुल्ला भट्टी से पूरा उद्गम सिद्ध होता है।” उनकी कथा लोकगीतों का महत्त्वपूर्ण विषय है, पर लोहड़ी के ऋतु-संबंधी अर्थ व्यापक हैं।
- “हर पंजाबी एक ही पूजा करता है।” रीति क्षेत्र, परिवार और आस्था से बदलती है।
- “आग में कोई भी भेंट डाल सकते हैं।” सुरक्षा नियम मानें; प्लास्टिक और कचरा न जलाएँ।
सम्मानजनक उत्सव पंजाबी सामुदायिक परंपरा का आदर करता है और स्थानीय विविधता तथा सुरक्षा के लिए जगह रखता है।
संबंधित पर्व और उपासना मार्गदर्शिकाएँ
भारत के सौर फसल-पर्व चक्र को गहराई से जानने के लिए पोंगल, बैसाखी और तिथि बनाम कैलेंडर तारीख पर हमारे संबंधित लेख पढ़ें।
सामान्य प्रश्न
पाठकों के सामान्य प्रश्नों के संक्षिप्त उत्तर।
दीपावली या होली की तरह लोहड़ी की तारीख हर साल बहुत अधिक क्यों नहीं बदलती?
दीपावली और होली चंद्र तिथियों पर आधारित हैं जो अंग्रेजी कैलेंडर में हर वर्ष 10–11 दिन खिसकती हैं। इसके विपरीत लोहड़ी 'निरयण सौर पंचांग' पर आधारित है और सौर पौष (पोह) मास की अंतिम शाम—अर्थात् मकर संक्रांति (माघी) से ठीक एक दिन पहले—मनाई जाती है, इसलिए यह प्रायः 13 जनवरी (या संक्रांति 15 को होने पर 14 जनवरी) को ही आती है।
लोहड़ी, मकर संक्रांति और माघी का आपस में क्या पंचांगीय संबंध है?
लोहड़ी सौर पौष मास की अंतिम शीतकालीन संध्या है। इसके ठीक अगली सुबह जब सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है, तो उसे पूरे भारत में 'मकर संक्रांति' और पंजाब व हिमाचल में सौर माघ मास के पहले दिन के रूप में 'माघी' कहा जाता है।
दुल्ला भट्टी कौन थे और लोहड़ी के गीतों में सुंदरी-मुंदरी का नाम क्यों गाया जाता है?
राय अब्दुल्ला खान भट्टी (दुल्ला भट्टी) 16वीं शताब्दी में सम्राट अकबर के समय पंजाब के सांदल बार (पिंडी भट्टियाँ) के वीर लोकनायक थे। लोकगाथा के अनुसार उन्होंने सुंदरी और मुंदरी नामक दो अनाथ कन्याओं को अत्याचारियों से बचाकर अपनी बेटी माना, जंगल में अग्नि जलाकर उनका विवाह कराया और कन्यादान में एक सेर शक्कर भेंट की—जिसका स्मरण 'सुंदर मुंदरिये हो!' गीत में किया जाता है।
लोहड़ी की अग्नि में कौन-सी पाँच पारंपरिक वस्तुएँ अर्पित की जाती हैं?
लोहड़ी के अलाव की परिक्रमा करते समय तिल, गुड़, रेवड़ी, गजक और मक्की के सफेद फुल्ले (पॉपकॉर्न)—इन पाँच शीतकालीन पदार्थों का अर्घ्य दिया जाता है और साथ में भुनी हुई मूँगफली बाँटी जाती है।
लोहड़ी पर बोले जाने वाले 'आदर आए, दलिदर जाए' वचन का क्या अर्थ है?
अग्नि में तिल डालते समय बोला जाने वाला यह पारंपरिक आशीर्वचन—'आदर आए, दलिदर जाए; दलिदर दी जड़ चूल्हे पाए'—यह कामना करता है कि घर-परिवार में आदर व समृद्धि का आगमन हो, दरिद्रता और आलस्य दूर हो, और कष्टों की जड़ अग्नि में भस्म हो जाए।
क्या बिना बड़े अलाव (बोनफायर) के भी फ्लैट या घर के भीतर लोहड़ी मनाई जा सकती है?
हाँ। अपार्टमेंट, वायु-प्रदूषण नियमों वाले शहरों या विदेश में रहने वाले परिवार घर में मिट्टी या पीतल का दीपक जलाकर, तिल-गुड़-रेवड़ी-गजक बाँटकर, दुल्ला भट्टी के लोकगीत गाकर और सरसों का साग, मक्की की रोटी व गन्ने के रस की खीर बनाकर सुरक्षित रूप से लोहड़ी मनाते हैं।