ईशावास्यमिदं सर्वम् का अर्थ क्या है?
ईशोपनिषद् का पहला मंत्र समस्त जगत् को ईश्वर के संबंध में देखने, जीवन या भोग को त्याग से जोड़ने और धन की लालसा से बचने की शिक्षा देता है। “तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा” की एक से अधिक व्याख्याएँ मिलती हैं। उसे केवल जीवन का आनंद लेने का छोटा नारा बनाने से पहले पूरा मंत्र और अनुवादक का चुना अर्थ पढ़ें।
आरंभ को अक्सर ईश्वर से आवृत या व्याप्त जगत् की दृष्टि के रूप में समझाया जाता है। प्रश्न केवल किसी व्यक्ति की वस्तुओं की संख्या का नहीं है। यह जगत्, उपयोग, स्वामित्व और इच्छा से हमारे संबंध पर विचार कराता है।
पहला मंत्र: संस्कृत और लिप्यंतरण
ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत् ।
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्य स्विद्धनम् ॥१॥īśāvāsyam idaṃ sarvaṃ yat kiñca jagatyāṃ jagat
tena tyaktena bhuñjīthā mā gṛdhaḥ kasya svid dhanam
हमारा एक परिचयात्मक भावार्थ: इस गतिशील जगत् में सबको ईश्वर के भीतर स्थित समझो; अधिकार की आसक्ति छोड़ते हुए जीवन को ग्रहण करो और उपयोग में लाओ; दूसरे के धन के लिए लालायित मत हो। यह अर्थ तक पहुँचने का परिचयात्मक प्रयास है, किसी पारंपरिक भाष्य का शब्दशः विकल्प नहीं।
यह ईश या ईशावास्य उपनिषद् का मंत्र 1 है। पूर्णमदः प्रार्थना अक्सर आरंभ में शांति-पाठ के रूप में मिलती है। उसे इस पहले क्रमांकित मंत्र की जगह न रखें। पूर्णमदः का लेख उस प्रार्थना को अलग समझाता है।
ऊपर का संस्कृत पाठ जुड़े मंत्र-पृष्ठ की शब्दावली के अनुसार है, सामान्य शब्द-अंतर और मंत्र संख्या सहित। रोमन पंक्ति विशेष चिह्नों वाला पठन-सहायक लिप्यंतरण है। वह वैदिक मौखिक परंपरा के पूरे पाठ-स्वर नहीं दिखाती।
वाक्यांशों को जोड़कर पढ़ें
| संस्कृत | लिप्यंतरण | पढ़ने का संकेत |
|---|---|---|
| ईशावास्यम् | īśāvāsyam | ईश्वर से आवृत या व्याप्त होने की दृष्टि |
| इदं सर्वम् | idaṃ sarvam | यह सब |
| यत्किञ्च जगत्यां जगत् | yat kiñca jagatyāṃ jagat | जगत् में जो कुछ भी गतिशील है |
| तेन त्यक्तेन | tena tyaktena | उस त्याग के द्वारा या उस त्याग के साथ; अर्थ व्याख्या के साथ पढ़ें |
| भुञ्जीथा | bhuñjīthā | भोग या उपयोग; कुछ भाष्य-व्याख्याओं में अपनी रक्षा का अर्थ |
| मा गृधः कस्य स्विद्धनम् | mā gṛdhaḥ kasya svid dhanam | किसी के धन की लालसा न करो; स्वामित्व पर भी विचार का संकेत |
पहली पंक्ति दूसरी की पृष्ठभूमि देती है। सब कुछ ईश्वर के संबंध में देखा जाए तो यह अनियंत्रित दावा कठिन पड़ता है कि हर वस्तु केवल मेरी प्राप्ति के लिए है। यह दोनों पंक्तियों के संबंध का एक पाठ है; संस्कृत में कोई अतिरिक्त आदेश जोड़ना नहीं।
इसी तरह लालसा से बचने वाली अंतिम बात भोग का अर्थ पढ़ने में दिशा देती है। केवल आनंद से जुड़े शब्द को लेना और त्याग तथा अलोभ को छोड़ देना पूरे मंत्र का संतुलन बदल देता है। शब्दों की सूची के साथ वाक्य का संबंध भी बचाएँ।
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा के अनुवाद अलग क्यों हैं?
किसी एक परिचित शब्द को संपूर्ण अर्थ मान लेने से प्रश्न हल नहीं होता। शुकवाक दास का अनुवाद त्याग के साथ भोग वाला अर्थ लेता है। उसकी टिप्पणी शंकराचार्य से संबंधित त्याग द्वारा अपनी रक्षा वाले अर्थ को भी दर्ज करती है। टिप्पणी इन अंग्रेजी चुनावों को एक जैसा कहने के बजाय उनका अंतर दिखाती है।
स्वामी कृष्णानंद का मंत्र-विवेचन भी स्पष्ट रूप से अलग दृष्टियों की चर्चा करता है। एक व्याख्या में जो मिला है उसे ग्रहण करना और पूर्ण निजी स्वामित्व का आग्रह छोड़ना सामने आता है। इसे लेखक की पहचानी हुई व्याख्या की तरह मूल पाठ के साथ पढ़ें; सभी वेदांत परंपराओं की एक ही दलील मानकर नहीं।
अध्ययन की उपयोगी टिप्पणी में तीन पंक्तियाँ रखें: संस्कृत वाक्यांश, चुना अनुवाद और उसके पीछे दी व्याख्या। दो पुस्तकें मिलाते समय हर अनुवाद को उसकी टिप्पणी के साथ रखें। एक जगह का शब्द और दूसरी जगह का निष्कर्ष मिलाने से ऐसा कथन बन सकता है जो किसी लेखक ने नहीं किया।
हमारा “अधिकार की आसक्ति छोड़ना” वाला भावार्थ अभ्यास की ओर जाने वाला परिचय है। किसी भाष्य में त्याग का पूरा सिद्धांत, या ज्ञान और कर्म के मार्गों में उसका स्थान, इससे अंतिम रूप से तय नहीं होता। आगे के अध्ययन के लिए उस भाष्य का अपना संदर्भ चाहिए।
अगला मंत्र क्या जोड़ता है?
मंत्र 2 “कुर्वन्नेवेह कर्माणि” से शुरू होकर इस संसार में कर्म और कर्म करते हुए सौ वर्ष जीने की इच्छा का उल्लेख करता है। इसलिए पहले मंत्र से यह निष्कर्ष निकालने से पहले उसे पढ़ें कि हर व्यक्ति को सभी जिम्मेदारियाँ छोड़ देनी चाहिए। दोनों निर्देशों का संबंध भाष्य का गंभीर विषय है।
सौ वर्ष की बात शिक्षण में पूर्ण जीवन की पारंपरिक अभिव्यक्ति है। मंत्र पढ़ने से उतनी आयु मिलने की गारंटी नहीं है। इसी तरह किसी गतिविधि को “अनासक्त” कह देने से वह गतिविधि अपने आप उचित कर्म नहीं हो जाती।
यह लेख पहले मंत्र और उसके निकटवर्ती संदर्भ का परिचय है। आगे ज्ञान, आत्मा और मृत्यु पर आए सभी मंत्रों को एक प्रेरक वाक्य में नहीं समेटता। ईशोपनिषद् का परिचय पूरे पाठ को पढ़ने का व्यापक क्रम देता है।
अधिकार की आसक्ति देखने के चार दैनिक उदाहरण
| स्थिति | जाँचने योग्य प्रवृत्ति | एक संभावित अभ्यास |
|---|---|---|
| उधार की पुस्तक | उसे अपनी वस्तु जैसा स्थायी अधिकार मान लेना। | ध्यान से इस्तेमाल करके तय समय पर लौटाना। |
| साझा काम | पूरे परिणाम का श्रेय केवल अपने नाम लेना। | अपने और दूसरों के योगदान को सही तरह पहचानना। |
| भोजन | अधिक मिलना ही संतोष का प्रमाण मानना। | जो मिला उसका आदर करना और अनावश्यक बर्बादी देखना। |
| नई वस्तु की चाह | किसी और के पास होने को ही अपनी जरूरत मान लेना। | ठहरकर पूछना कि जरूरत है या तुलना से इच्छा बनी है। |
ये चिंतन के लिए हमारे अपने उदाहरण हैं। मूल मंत्र उधार की पुस्तक, टीम के काम या खरीदारी का उल्लेख नहीं करता। उनसे उपयोग और इस मान्यता का अंतर देख सकते हैं कि पहुँच मिलते ही असीम अधिकार भी मिल गया।
पुस्तक वाले उदाहरण में त्याग का अर्थ उसे पढ़ने से ही मना करना जरूरी नहीं। ध्यान से उपयोग करना और जिन शर्तों पर मिली थी उन्हें याद रखना अभ्यास हो सकता है। साझा काम में दूसरों को श्रेय देने के लिए अपना योगदान शून्य बताना भी जरूरी नहीं। सही पहचान और सारा श्रेय अपने नाम करना अलग हैं।
इन उदाहरणों की सीमाएँ भी हैं। सबमें ईश्वर की उपस्थिति की शिक्षा किसी को दूसरे की वस्तु लेने या उसकी जरूरत अनदेखी करने की अनुमति नहीं देती। अनासक्ति का नाम लेकर उधार लौटाने से बचना या उचित अनुरोध को चुप करा देना इस अभ्यास का उद्देश्य नहीं है।
अध्ययन का छोटा अभ्यास
- किसी वाक्यांश को चुनने से पहले पूरा संस्कृत मंत्र या उसका लिप्यंतरण पढ़ें।
- जगत् की आरंभिक दृष्टि, त्याग वाला भाग और अलोभ की बात अलग पहचानें।
- दो पहचाने हुए अनुवाद मिलाएँ और शब्दों का अंतर लिखें।
- एक साधारण स्थिति में जरूरी काम और सब नियंत्रित करने की इच्छा अलग देखें।
- मूल पाठ पर लौटें और अपने प्रयोग को अनुवाद से अलग रखें।
उदाहरण के लिए साझा काम पूरा करने में स्पष्ट भूमिकाएँ, समय-सीमा और सावधानी चाहिए। श्रेय पर अकेला दावा छोड़ने से ये व्यावहारिक जिम्मेदारियाँ नहीं हटतीं। चिंतन काम के उद्देश्य को धुंधला किए बिना व्यवहार को अधिक विचारपूर्ण बना सकता है।
वेद और उपनिषद् संग्रह में आगे पढ़ते समय लेखक और परंपरा से पहचाने जा सकने वाले भाष्य का साथ लें। स्रोत, व्याख्या और प्रयोग को साफ रखने से मंत्र गंभीर आध्यात्मिक शिक्षा भी बना रहता है और हमारा अध्ययन भी अधिक सटीक होता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
ईशावास्यमिदं सर्वम् किस ग्रंथ में है?
यह ईशोपनिषद् या ईशावास्य उपनिषद् के पहले मंत्र का आरंभ है। पाठ से पहले प्रायः मिलने वाला पूर्णमदः शांति-पाठ इससे अलग है।
क्या तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा का अर्थ बस सब भोगना है?
ऐसा करने से त्याग और अलोभ का जुड़ा प्रसंग छूट जाता है। उद्धृत स्रोतों में त्याग के साथ भोग और त्याग से अपनी रक्षा जैसे अलग अर्थों की चर्चा भी मिलती है।
एक अनुवाद भोग और दूसरा रक्षा क्यों कहता है?
अनुवादक और भाष्यकार वाक्यांश की व्याख्या का चुनाव कर रहे हैं। हर शब्द को उसकी पहचानी हुई टिप्पणी के साथ पढ़ें। सभी शब्दों को परस्पर समान या सभी परंपराओं को एकमत न मानें।
क्या त्याग का अर्थ रोज की जिम्मेदारियाँ छोड़ना है?
ऐसा सामान्य निष्कर्ष अगले मंत्र के कर्म-संबंधी प्रसंग को छोड़ देता है। त्याग, ज्ञान और कर्म का संबंध आसपास के पाठ और स्पष्ट पहचाने भाष्य के साथ पढ़ना चाहिए।
क्या सौ वर्ष वाली बात लंबी आयु की गारंटी है?
नहीं। मंत्र 2 में यह जीने और कर्म करने की पारंपरिक शिक्षा के भीतर है। इसे पाठ से सुनिश्चित होने वाली आयु या मापे गए परिणाम का वादा न समझें।
क्या साझा उपयोग और कृतज्ञता पर इसे लागू कर सकते हैं?
हाँ, यदि उसे आधुनिक चिंतन-प्रयोग कहा जाए। मूल आध्यात्मिक संदर्भ और अनुवादक का अर्थ साफ रखें। आधुनिक उदाहरण को संस्कृत में स्पष्ट बताई घटना न कहें।