ग्रह दृष्टि की गिनती कहाँ से शुरू होती है?
सात पारंपरिक ग्रहों की सामान्य पाराशरी पूर्ण-दृष्टि पद्धति में ग्रह की अपनी राशि को एक गिनकर राशिचक्र में आगे बढ़ते हैं। सभी सात ग्रह सातवीं राशि को देखते हैं। मंगल की अतिरिक्त दृष्टियाँ चौथी और आठवीं, गुरु की पाँचवीं और नौवीं तथा शनि की तीसरी और दसवीं हैं। आरंभ ग्रह से होता है, इसलिए “चौथी दृष्टि” का अर्थ अपने आप कुंडली का चौथा भाव नहीं है।
यह लेख राशि के आधार पर गिनती सिखाता है। इसमें आंशिक दृष्टि-बल या किसी घटना का फलादेश नहीं निकाला गया है। सूर्य और चंद्र पारंपरिक ग्रहों में आते हैं, जबकि खगोल विज्ञान में वे क्रमशः तारा और प्राकृतिक उपग्रह हैं।
पूर्ण दृष्टियों की छोटी सूची
- सूर्य, चंद्र, बुध और शुक्र: सातवीं।
- मंगल: चौथी, सातवीं और आठवीं।
- गुरु: पाँचवीं, सातवीं और नौवीं।
- शनि: तीसरी, सातवीं और दसवीं।
पी. वी. आर. नरसिंह राव की पुस्तक के खंड 10.2 में ये गिनती के नियम दिए हैं। यहाँ “पूर्ण” पारंपरिक दृष्टियों का यह समूह बताता है; इससे हर दृष्ट ग्रह का बल या परिणाम बराबर नहीं हो जाता। गणना का नियम और बाद में की जाने वाली व्याख्या अलग रखें।
राहु-केतु के लिए पद्धति स्पष्ट होनी चाहिए। Astrogyana की वर्तमान मूल गणना में उनकी अपनी कोई outgoing ग्रह दृष्टि नहीं रखी गई है। सॉफ्टवेयर का यह चुनाव परंपराओं के मतभेद का अंतिम निर्णय नहीं है। दूसरे ग्रह की दृष्टि का लक्ष्य राहु या केतु फिर भी हो सकते हैं।
अपनी राशि को एक गिनना क्यों जरूरी है?
काल्पनिक मंगल मिथुन में रखें। बोलकर गिनें: मिथुन एक, कर्क दो, सिंह तीन, कन्या चार। इसलिए मंगल की चौथी दृष्टि कन्या पर है। आगे धनु सात और मकर आठ आते हैं। कर्क को एक से शुरू करेंगे तो प्रत्येक उत्तर एक राशि आगे खिसक जाएगा।
अंकगणित में मेष को 1 और मीन को 12 मानें। सूत्र है: लक्ष्य = ((आरंभ राशि + दृष्टि की गिनती − 2) mod 12) + 1। यहाँ “mod 12” का अर्थ 12 से भाग देने के बाद बचा शेष है। घटाया गया 2 समावेशी गिनती और एक से शुरू होने वाले क्रमांक, दोनों का ध्यान रखता है।
कुंभ के शनि का दसवाँ लक्ष्य ((11 + 10 − 2) mod 12) + 1 = 8, यानी वृश्चिक है। मीन के बाद फिर मेष से चलें। स्क्रीन पर घड़ी की दिशा देखकर अनुमान न लगाएँ; अलग कुंडली शैलियों में राशियों का स्थान अलग तरह से दिखाया जाता है।
दस लक्ष्य जिनकी गिनती आप स्वयं जाँच सकते हैं
| ग्रह | आरंभ राशि क्रमांक | समावेशी गिनती | लक्ष्य क्रमांक | लक्ष्य राशि |
|---|---|---|---|---|
| मंगल | 3 | 4 | 6 | कन्या |
| मंगल | 3 | 7 | 9 | धनु |
| मंगल | 3 | 8 | 10 | मकर |
| गुरु | 8 | 5 | 12 | मीन |
| गुरु | 8 | 7 | 2 | वृषभ |
| गुरु | 8 | 9 | 4 | कर्क |
| शनि | 11 | 3 | 1 | मेष |
| शनि | 11 | 7 | 5 | सिंह |
| शनि | 11 | 10 | 8 | वृश्चिक |
| बुध | 5 | 7 | 11 | कुंभ |
आरंभिक स्थितियाँ मिथुन में मंगल, वृश्चिक में गुरु, कुंभ में शनि और सिंह में बुध हैं। ये अलग-अलग शिक्षण उदाहरण हैं, किसी एक व्यक्ति की कुंडली नहीं। लक्ष्य राशि खाली भी हो सकती है: राशि की गिनती बनी रहती है, लेकिन वहाँ दृष्ट ग्रह के रूप में लिखने के लिए कोई ग्रह नहीं होगा।
अंतिम दो स्तंभ ढककर पहले लक्ष्य क्रमांक निकालें, फिर राशि का नाम मिलाएँ। इस तरह दो अलग गलतियाँ पकड़ सकते हैं: दृष्टि की गलत संख्या लगाना और सही क्रमांक को गलत राशि का नाम देना।
दृष्टि की गिनती और भाव संख्या अलग प्रश्न हैं
मेष लग्न और पूरी राशि को एक भाव मानने वाली कुंडली लें। मिथुन तीसरा भाव और कन्या छठा भाव है। मिथुन का मंगल चौथी दृष्टि से कन्या पहुँचता है, इसलिए इस उदाहरण में वह छठे भाव को देखता है। उसे चौथा भाव कहना ग्रह से की गिनती और लग्न से की गिनती को मिला देगा।
अब मंगल मिथुन में ही रखें, लेकिन लग्न कर्क कर दें। मिथुन बारहवाँ भाव और कन्या तीसरा भाव हो गया। लक्ष्य राशि कन्या ही है, उसका भाव क्रमांक बदल गया। इसलिए अकेली दृष्टि संख्या देखकर प्राप्त करने वाला भाव नहीं जान सकते।
ये भाव-संबंध पूरी राशि वाले भावों पर आधारित हैं। भाव चलित पढ़ते समय मूल राशि-स्थितियाँ और रिपोर्ट की बताई दृष्टि पद्धति साथ रखें। राशि और भाव चलित का लेख समझाता है कि भाव बदलकर दिखने से ग्रह की राशि बदलना जरूरी क्यों नहीं है।
चौथी राशि की दृष्टि हमेशा 90° दूरी नहीं होती
चार की समावेशी गिनती तीन राशि-चरण बताती है, लेकिन दोनों ग्रह अपनी राशियों के अलग अंशों पर हो सकते हैं। ये काल्पनिक निरयण देशांतर उसी फर्क को दिखाते हैं:
| उदाहरण | मंगल देशांतर | कन्या के ग्रह का देशांतर | आगे की कोणीय दूरी |
|---|---|---|---|
| 1 | 61 | 179 | 118 |
| 2 | 89 | 151 | 62 |
| 3 | 75 | 165 | 90 |
पहली पंक्ति में मंगल मिथुन 1° और दूसरा ग्रह कन्या 29° पर है। दूसरी में वे मिथुन 29° और कन्या 1° पर हैं। दोनों इस पूरी-राशि वाली चौथी दृष्टि के नियम में आते हैं, जबकि अंशों की दूरी अलग है। केवल तीसरी पंक्ति में दोनों का राशि के भीतर अंश बराबर, 15°, है।
Astrogyana का वर्तमान दृष्टि परिणाम आगे की कोणीय दूरी को वर्णनात्मक संख्या के रूप में रखता है; वह दृष्टि-बल का अंक नहीं है। अंशों से बल निकालने की विधियाँ दूसरा प्रश्न पूछती हैं। तुलना से पहले निर्देशांक पढ़ने के लिए ग्रहों के अंशों का लेख उपयोगी है।
अलग ग्रह-बल रिपोर्ट समझने के लिए षड्बल के रूप, विरूप और अनुपात का लेख पढ़ें। उसकी जोड़-बही दिखाती है कि दृष्टि-बल का योगदान कुल में कैसे आता है और वह राशि गिनने के नियम से अलग क्यों है।
दृष्टि की दिशा और उसका प्रकार दोनों जाँचें
विशेष ग्रह दृष्टि का लौटकर मिलना जरूरी नहीं। मिथुन का मंगल कन्या के बुध को चौथी दृष्टि से देखता है। कन्या के बुध की सातवीं दृष्टि मीन पहुँचती है; इसलिए ग्रह दृष्टि का यह संबंध एकतरफा है। इसके विपरीत आमने-सामने की राशियाँ एक-दूसरे से सातवीं होती हैं।
राशि दृष्टि एक अलग राशि-आधारित योजना है, जिसका वर्णन उसी स्रोत के खंड 10.3 में है। उसमें द्विस्वभाव मिथुन दूसरी द्विस्वभाव राशियों को देखता है। उस सूची और मंगल की ग्रह-दृष्टि सूची को जोड़कर एक बिना नाम वाली सूची न बना दें।
दो रिपोर्ट मिलाते समय दृष्टि देने वाला ग्रह, उसकी राशि, लक्ष्य राशि, दृष्टि प्रणाली, राहु-केतु का विकल्प और राशि या अंश वाला नियम लिखें। फिर अपनी कुंडली जाँचें। इन सेटिंग का अंतर गणना से जुड़ा उपयोगी प्रश्न है; डराने वाली व्याख्या उसका समाधान नहीं करती।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
क्या हर ग्रह की सातवीं दृष्टि होती है?
यहाँ की पद्धति सूर्य से शनि तक सात पारंपरिक ग्रहों को सातवीं दृष्टि देती है। राहु-केतु का नियम अलग बताना चाहिए; Astrogyana की वर्तमान मूल पद्धति में उनकी अपनी outgoing ग्रह दृष्टियाँ नहीं हैं।
क्या मंगल की चौथी दृष्टि हमेशा चौथे भाव पर होती है?
नहीं। मंगल की राशि को एक गिनकर चौथी राशि लक्ष्य होती है। प्राप्त करने वाला भाव लग्न और भाव-पद्धति पर निर्भर है।
कुंभ का शनि किन राशियों को देखता है?
इस पूर्ण-दृष्टि पद्धति में तीसरी, सातवीं और दसवीं गिनती क्रमशः मेष, सिंह और वृश्चिक तक जाती है। राशिचक्र में आगे गिनें और मीन के बाद मेष पर लौटें।
क्या खाली राशि पर दृष्टि हो सकती है?
इस राशि-आधारित पद्धति में हाँ। खाली लक्ष्य में ग्रह-से-ग्रह सूची में लिखने के लिए ग्रह नहीं होता, लेकिन लक्ष्य राशि रहती है। भाव की व्याख्या के लिए बाकी कुंडली चाहिए।
क्या चौथी राशि की दृष्टि में हमेशा ठीक 90 अंश होते हैं?
नहीं। दोनों ग्रह अपनी राशियों के अलग अंशों पर हो सकते हैं। राशि से मिला दृष्टि-नाम और मापी गई कोणीय दूरी दो अलग जानकारियाँ हैं।
क्या ग्रह दृष्टि और राशि दृष्टि एक ही हैं?
नहीं। ग्रह दृष्टि दृष्टि देने वाले ग्रह का नियम लेती है, जबकि राशि दृष्टि राशियों की अलग योजना है। दोनों परिणाम स्पष्ट नामों के साथ रखें; किसी भी नाम से जीवन की घटना निश्चित नहीं होती।