संक्षिप्त उत्तर: चतुर्थ भाव (सुख भाव) में गुरु क्या संकेत देता है?
वैदिक ज्योतिष में चतुर्थ भाव (सुख / मातृ / बंधु / गृह भाव) में गुरु (बृहस्पति) कुंडली के आधारभूत पाताल केंद्र में स्थित होकर घर, माता, आंतरिक शांति, भूमि-भवन और औपचारिक शिक्षा को स्थिरता देता है। यहाँ से गुरु की पंचम, सप्तम और नवम दृष्टियाँ क्रमशः अष्टम भाव (आयु व शोध), दशम भाव (कर्म व आजीविका) और द्वादश भाव (मोक्ष व एकांत) पर पड़ती हैं—जो तीनों मोक्ष भावों (4, 8, 12) को दशम कर्म भाव से जोड़ती हैं।
- मोक्ष-त्रिकोण व कर्म-अक्ष का संगम: चतुर्थ भाव में बैठा गुरु 8वें (5वीं दृष्टि) और 12वें (9वीं दृष्टि) मोक्ष भावों के साथ-साथ 10वें कर्म भाव (7वीं दृष्टि) को भी आलोकित करता है।
- हंस महापुरुष योग के तीन लग्न: मेष लग्न (कर्क में उच्च), कन्या लग्न (धनु में स्वराशि) और धनु लग्न (मीन में स्वराशि) में चतुर्थस्थ गुरु हंस योग बनाता है।
- शास्त्रीय सुख-स्तंभ: बृहत् पाराशर होरा शास्त्र और फलदीपिका में इसे पारिवारिक सौहार्द, अध्ययनशील वातावरण और नैतिक सामाजिक प्रतिष्ठा का आधार माना गया है।
चतुर्थ भाव: घर, माता, शिक्षा, भावनात्मक जड़ें और आंतरिक सुरक्षा।
यह placement अर्थ, शिक्षा, नीति, विस्तार और व्यापक दृष्टि की खोज को घर, माता, आंतरिक सुख, जड़ें, संपत्ति और निजी जीवन के क्षेत्र में लाता है। इसे किसी निश्चित घटना के बजाय ध्यान और व्यवहार के पैटर्न की तरह पढ़ना अधिक उपयोगी है। देखें कि यह संकेत वास्तविक दिनचर्या, संबंधों और निर्णयों में कैसे दिखाई देता है। मुख्य सवाल है: कौन-सा घर, दिनचर्या और भावनात्मक आधार इस placement को अच्छे ढंग से काम करने में मदद करता है?
शास्त्रीय आधार: सुख, मातृ, विद्या और भूमि-वाहन भाव में बृहस्पति की भूमिका
संस्कृत होरा ग्रंथों—बृहत् पाराशर होरा शास्त्र (अध्याय 27), फलदीपिका (अध्याय 8, श्लोक 13), सारावली (अध्याय 30) और रामानुजाचार्य के भावार्थ रत्नाकर—में चतुर्थ भाव को सुख भाव (अंतःकरण की संतुष्टि), मातृ भाव (माता और पोषण), बंधु भाव (पारिवारिक जड़ें) तथा गृह/क्षेत्र भाव (आवास, भूमि व वाहन) कहा गया है। जब देवगुरु बृहस्पति इस पाताल केंद्र में अनुकूल गरिमा के साथ विराजमान होते हैं, तो बाहरी व्यावसायिक जीवन में उतार-चढ़ाव आने पर भी जातक के घर और मन में स्वाध्याय, संस्कार और वैचारिक स्थिरता का आश्रय बना रहता है।
दिग्बल की दृष्टि से चतुर्थ भाव की स्थिति को समझना भी आवश्यक है: चूँकि गुरु को प्रथम भाव में पूर्ण दिग्बल (60 विरूप) और सप्तम भाव में शून्य दिग्बल मिलता है, इसलिए प्रथम और सप्तम के ठीक मध्य स्थित चतुर्थ भाव में गुरु को मध्यम दिग्बल (लगभग 30 विरूप अर्थात् 50% दिशा-बल) प्राप्त होता है (चतुर्थ भाव में चंद्रमा और शुक्र पूर्ण दिग्बली होते हैं)। अतः चतुर्थ भाव में गुरु के फल की गुणवत्ता उसकी राशि-गरिमा और वैदिक ज्योतिष में 12 भाव के अनुसार उसके भावेशत्व पर निर्भर करती है।
| चतुर्थ भाव का क्षेत्र | शास्त्रीय ज्योतिष सिद्धांत | गुरु की उपस्थिति का संरचनात्मक प्रभाव | कुंडली ऑडिट का व्यावहारिक नियम |
|---|---|---|---|
| अंतःकरण सुख व मानसिक शांति | चतुर्थ केंद्र में नैसर्गिक शुभ ग्रह मन और घरेलू वातावरण को स्थिर करता है | घर में पुस्तकालय, पूजा-स्थल या अध्ययनशील व शांत पारिवारिक संवाद को बढ़ावा | चतुर्थ के नैसर्गिक कारक चंद्रमा और चतुर्थेश की स्थिति गुरु के साथ मिलाकर देखें |
| गृह, भूमि और वाहन सुख | आवास के विस्तार, पैतृक संपत्ति या संस्थागत निवास से संबंध | विद्यालय, मंदिर, उद्यान या शांत शैक्षणिक क्षेत्र के निकट हवादार आवास की प्रवृत्ति | संपत्ति के वास्तविक योग के लिए चतुर्थेश और भूमि कारक मंगल का बल भी परखें |
| औपचारिक शिक्षा व विद्यापीठ | चतुर्थ भाव प्रारंभिक से स्नातक स्तर की संस्थागत शिक्षा और उपाधि दर्शाता है | नियमित अध्ययन, शास्त्रीय या अकादमिक डिग्री और शिक्षण-संस्थानों में सम्मान | बौद्धिक सृजन (पंचम भाव) और औपचारिक प्रमाणपत्र (चतुर्थ भाव) में बुध व पंचमेश का भेद रखें |
| पंच महापुरुष (हंस) योग | चतुर्थ केंद्र में कर्क, धनु या मीन राशि का गुरु हंस महापुरुष योग बनाता है | मेष लग्न (कर्क), कन्या लग्न (धनु) और धनु लग्न (मीन) में पूर्ण केंद्र बल देता है | भाव चलित में पुष्टि करें कि गुरु चतुर्थ भाव की संधि के भीतर ही स्थित है |
चतुर्थ भाव घर, शिक्षा और भावनात्मक आधार से जुड़ा है। गुरु यहाँ अर्थ और मार्गदर्शन की खोज जोड़ सकता है; पूरी कुंडली देखना आवश्यक है।
ज्ञान और उदारता उपयोगी हो सकते हैं, पर अति-आशावाद या बिना जाँच भरोसा भी देखा जाना चाहिए।
गुरु की स्थिति को नवांश या अन्य विभाजन-पद्धति में पढ़ते समय अपनी पद्धति का नाम स्पष्ट रखें।
अष्टम, दशम और द्वादश भाव पर 5–7–9 दृष्टि: मोक्ष-त्रिकोण और कर्म-अक्ष का समन्वय
चतुर्थ भाव में बैठे गुरु से समावेशी गणना करने पर उसकी तीन पूर्ण दृष्टियाँ अत्यंत महत्वपूर्ण भावों पर पड़ती हैं: पंचम दृष्टि अष्टम भाव (`4 + 4 = 8`) पर, सप्तम दृष्टि दशम भाव (`4 + 6 = 10`) पर, और नवम दृष्टि द्वादश भाव (`4 + 8 = 12`) पर। पुरुषार्थ चतुष्टय के अनुसार कुंडली के 4, 8 और 12वें भाव मोक्ष-त्रिकोण कहलाते हैं। चतुर्थ भाव में बैठकर अपनी पंचम और नवम त्रिकोणीय दृष्टियों से अष्टम (आयु, अनुसंधान, गुप्त ज्ञान) और द्वादश (त्याग, ध्यान, मोक्ष) को देखने के कारण बृहस्पति संपूर्ण मोक्ष-त्रिकोण (4–8–12) को एक सूत्र में पिरो देता है।
इसके साथ ही, पाताल केंद्र (चतुर्थ भाव) से गुरु की सीधी सप्तम दृष्टि आकाश के मध्य शिखर—दशम भाव (कर्म व राज्य भाव)—पर पड़ती है। यह 4–10 का ऊर्ध्वाधर अक्ष ठीक वैसा ही पारस्परिक संबंध बनाता है जैसा दशम भाव में गुरु के अध्ययन में दिखाई देता है: व्यक्ति का निजी अध्ययन, पारिवारिक संस्कार और आंतरिक ईमानदारी (चतुर्थ भाव) सीधे उसके सार्वजनिक करियर, प्रशासनिक निर्णयों और संस्थागत प्रतिष्ठा (दशम भाव) को निर्देशित करती है।
गोचर को जन्म-कुंडली और दशा के साथ जोड़ें; अलग स्कूलों के नियमों को बिना नाम दिए न मिलाएँ।
सभी 12 लग्नों में चतुर्थ भावस्थ गुरु: हंस योग, केंद्राधिपति नियम और नीचत्व का प्रभाव
प्रत्येक लग्न में चतुर्थ भाव की राशि और गुरु के स्वामित्व वाले भाव बदल जाते हैं। तीन लग्नों—मेष, कन्या और धनु—में चतुर्थ भाव का गुरु उच्च या स्वराशि का होकर हंस महापुरुष योग बनाता है। इसके विपरीत, तुला लग्न में चतुर्थ भाव में मकर राशि पड़ने से गुरु तृतीयेश और षष्ठेश होकर नीच राशि में स्थित होता है।
| उदय लग्न (Ascendant) | चतुर्थ भाव की राशि व गरिमा | गुरु का भावेशत्व (स्वामित्व) | कार्यात्मक भूमिका और प्रमुख ज्योतिषीय योग |
|---|---|---|---|
| मेष (Aries) लग्न | कर्क — उच्च राशि (5° पर परमोच्च) | नवमेश (धनु) एवं द्वादशेश (मीन) | भाग्येश होकर चतुर्थ में उच्च का हंस महापुरुष योग: श्रेष्ठ पारिवारिक सुख, भूमि-भवन, उच्च शिक्षा और दशम भाव पर दृष्टि से प्रशासनिक सम्मान |
| वृषभ (Taurus) लग्न | सिंह — मित्र राशि (सूर्य की राशि) | अष्टमेश (धनु) एवं लाभेश (मीन) | अष्टमेश व लाभेश चतुर्थ में: पैतृक संपत्ति, शोध या दीर्घकालीन निवेश से गृह-लाभ; कुंभ (10वें भाव) पर दृष्टि से संस्थागत सलाहकार भूमिका |
| मिथुन (Gemini) लग्न | कन्या — शत्रु राशि (बुध की राशि) | सप्तमेश (धनु) एवं दशमेश (मीन) | सप्तमेश व दशमेश चतुर्थ में (केंद्राधिपति दोष): घर से कार्य या बौद्धिक पेशा; सप्तम दृष्टि अपनी ही मीन राशि (दशम भाव) को बल देती है |
| कर्क (Cancer) लग्न | तुला — शत्रु राशि (शुक्र की राशि) | षष्ठेश (धनु) एवं नवमेश (मीन) | भाग्येश (एवं षष्ठेश) चतुर्थ केंद्र में: पारिवारिक परंपरा व शिक्षा से उत्थान, तथा मेष राशि (दशम भाव) पर मित्र दृष्टि से करियर में सहयोग |
| सिंह (Leo) लग्न | वृश्चिक — मित्र राशि (मंगल की राशि) | पंचमेश (धनु) एवं अष्टमेश (मीन) | पंचमेश त्रिकोण स्वामी का चतुर्थ केंद्र में बैठना श्रेष्ठ राजयोग है; पंचम दृष्टि अपनी ही मीन राशि (अष्टम भाव) पर पड़कर शोध व आयु की रक्षा करती है |
| कन्या (Virgo) लग्न | धनु — स्वराशि एवं मूलत्रिकोण | चतुर्थेश (धनु) एवं सप्तमेश (मीन) | चतुर्थ में स्वराशि का हंस महापुरुष योग: सुदृढ़ भूमि-भवन व शैक्षणिक आधार, किंतु केंद्राधिपति व बाधकेश नियमों से साझेदारी में स्पष्टता आवश्यक |
| तुला (Libra) लग्न | मकर — नीच राशि (5° पर परम नीच) | तृतीयेश (धनु) एवं षष्ठेश (मीन) | 3रे व 6ठे का स्वामी चतुर्थ में नीचस्थ: संपत्ति के कागज़ात व पारिवारिक विवादों में सतर्कता रखें; शनि बली होने पर नीचभंग और दशम (कर्क) पर उच्च दृष्टि |
| वृश्चिक (Scorpio) लग्न | कुंभ — सम राशि (शनि की राशि) | धनेश (धनु) एवं पंचमेश (मीन) | धनेश व पंचमेश चतुर्थ केंद्र में: संचित धन, प्रज्ञा और पारिवारिक सुख का सुंदर समन्वय; दशम भाव (सिंह) पर मित्र दृष्टि से नेतृत्व बल |
| धनु (Sagittarius) लग्न | मीन — स्वराशि (Swakshetra) | लग्नेश (धनु) एवं चतुर्थेश (मीन) | लग्नेश व सुखेश के रूप में चतुर्थ में हंस महापुरुष योग: गहरा मानसिक संतोष, शैक्षणिक प्रतिष्ठा और अष्टम (कर्क) पर उच्च राशि की रक्षक दृष्टि |
| मकर (Capricorn) लग्न | मेष — मित्र राशि (मंगल की राशि) | द्वादशेश (धनु) एवं तृतीयेश (मीन) | 3रे व 12वें का स्वामी चतुर्थ में: जन्मस्थान से दूर निवास, विदेश में संपत्ति या स्वाध्याय केंद्र; नवम दृष्टि स्वराशि धनु (12वें भाव) को पुष्ट करती है |
| कुंभ (Aquarius) लग्न | वृषभ — शत्रु राशि (शुक्र की राशि) | लाभेश (धनु) एवं धनेश (मीन) | धनेश व लाभेश चतुर्थ केंद्र में: अचल संपत्ति, पारिवारिक कोष और आर्थिक स्थिरता का केंद्र; वृश्चिक (दशम भाव) पर मित्र दृष्टि से आजीविका को बल |
| मीन (Pisces) लग्न | मिथुन — शत्रु राशि (बुध की राशि) | दशमेश (धनु) एवं लग्नेश (मीन) | लग्नेश व कर्मेश चतुर्थ में: व्यक्ति का आत्म-विकास, घर और करियर एक ही धुरी से जुड़ते हैं, तथा सप्तम दृष्टि स्वराशि धनु (दशम भाव) की रक्षा करती है |
कुंडली उदाहरण: मेष लग्न का उच्च चतुर्थ गुरु बनाम तुला लग्न का नीच चतुर्थ गुरु
चतुर्थ भाव में बृहस्पति का फल लग्न और राशि-बल के अनुसार कैसे बदलता है, इसे दो स्पष्ट कुंडली उदाहरणों से परखें।
उदाहरण 1 — मेष लग्न में 4°15' कर्क राशि (चतुर्थ भाव) का उच्च गुरु: यहाँ मेष लग्न (राशि 1) में चतुर्थ भाव में कर्क राशि पड़ती है। गुरु 4°15' कर्क पर उच्च का होकर केंद्र में हंस महापुरुष योग बनाता है। मेष लग्न के लिए गुरु नवमेश (भाग्येश) और द्वादशेश है; अतः भाग्येश का चतुर्थ केंद्र में उच्च होना सुख, भूमि-भवन, माता के आशीर्वाद और उच्च शिक्षा के लिए प्रथम श्रेणी का राजयोग बनाता है। यदि चतुर्थेश चंद्रमा भी कर्क (चतुर्थ) या वृषभ (द्वितीय भाव, उच्च) में हो, तो हंस योग के साथ गजकेसरी योग की शक्ति भी जुड़ जाती है। कर्क से गुरु की पंचम दृष्टि वृश्चिक (अष्टम भाव), सप्तम दृष्टि मकर (दशम भाव) और नवम दृष्टि अपनी ही मीन राशि (द्वादश भाव) पर पड़कर मोक्ष-त्रिकोण और करियर दोनों को संभालती है।
उदाहरण 2 — तुला लग्न में 5°40' मकर राशि (चतुर्थ भाव) का नीच गुरु: अब तुला लग्न (राशि 7) की कुंडली देखें, जहाँ चतुर्थ भाव में मकर राशि पड़ती है। यहाँ गुरु तृतीयेश (धनु) और षष्ठेश (मीन—ऋण, रोग व विवाद भाव) होकर चतुर्थ भाव में 5°40' मकर पर नीचस्थ है। यदि कोई सहायक योग न हो, तो यह घरेलू अशांति या भूमि-ऋण के मामलों में उलझन दे सकता है। किंतु सूक्ष्म पाराशरी ऑडिट दो विशेष बिंदु दिखाता है: (1) यदि तुला लग्न का योगकारक ग्रह शनि (चतुर्थेश व पंचमेश) तुला (लग्न में उच्च) या मकर (चतुर्थ में स्वराशि) में बैठा हो, तो गुरु का नीचभंग हो जाता है; और (2) मकर से गुरु की सप्तम दृष्टि कर्क राशि (दशम भाव) पर पड़ती है जो गुरु की उच्च राशि है, जिससे कार्यक्षेत्र में व्यक्ति कानूनी या प्रशासनिक समाधान निकालने में कुशल बनता है।
पाताल संधि (भाव चलित), चतुर्थांश (D4) और विंशोत्तरी दशा समय
श्रीपति पद्धति में चतुर्थ भाव का मध्य बिंदु पाताल लग्न (Imum Coeli / IC) कहलाता है, जिसकी स्थिति जन्म-समय के साथ-साथ भौगोलिक अक्षांश पर भी निर्भर करती है। इसलिए राशि चार्ट बनाम भाव चलित की तुलना करके यह सुनिश्चित करें कि गुरु चतुर्थ भाव की संधि में ही है या तृतीय/पंचम भाव में खिसक गया है। साथ ही, अचल संपत्ति और गृह-सुख के सूक्ष्म परीक्षण के लिए जन्म-कुंडली (D1) और नवांश (D9) के साथ चतुर्थांश (D4) वर्ग-कुंडली में भी गुरु और चतुर्थेश का बल देखना उपयोगी रहता है।
भूमि-भवन क्रय, शैक्षणिक उपलब्धि या दशम दृष्टि से प्रेरित करियर परिवर्तन का समय जानने के लिए विंशोत्तरी दशा संतुलन गणना से गुरु और चतुर्थेश की महादशा-अंतर्दशा निकालें तथा गोचर में चतुर्थ-दशम अक्ष पर गुरु-शनि के प्रभाव से मिलान करें।
विकसित करने योग्य ताकत
जब कुंडली सहयोग देती है, तो गुरु उदारता, विवेक, मार्गदर्शन और दीर्घकालीन दिशा में विश्वास दिखा सकता है। चतुर्थ भाव में यह ताकत तब उपयोगी बनती है जब इसे दोहराई जा सकने वाली आदत से जोड़ा जाए: अध्ययन-समय, स्पष्ट समझौता, बजट, रचनात्मक अभ्यास या ऐसी जिम्मेदारी जिसकी समीक्षा हो सके।
विकास की चुनौती
काम, अध्ययन और संबंध
कुंडली पढ़ने का व्यावहारिक क्रम और व्याख्या की सीमाएँ
चतुर्थ भाव में गुरु का संतुलित मूल्यांकन करने के लिए नीचे दिए गए चरणों को अपनाएँ और केवल एक ग्रह-स्थिति को अचल संपत्ति या सुख की निश्चित गारंटी न मानें।
- लग्न, भाव-पद्धति, राशि-पद्धति और अयनांश स्पष्ट करें।
- गुरु को विशेष नियमों से पहले राशि और भाव से पढ़ें।
- भावेश, नक्षत्र-स्वामी, ग्रह-बल और निकट संपर्क देखें।
- दशा और गोचर को वास्तविक तारीखों तथा दिखाई देने वाली परिस्थितियों से मिलाएँ।
- दो या तीन संभावनाएँ लिखें और हर संभावना को अलग करने वाले प्रमाण पहचानें।
इस क्रम से एक placement को पूरे व्यक्तित्व का label या निश्चित भविष्यवाणी बनाने से बचा जा सकता है।
- कौन-सी घटनाएँ या आदतें इस भाव को सहारा देती हैं?
- अर्थ, शिक्षा, नीति, विस्तार और व्यापक दृष्टि की खोज कहाँ उपयोगी है और कहाँ अति बन जाता है?
- मेरी पहली व्याख्या को चुनौती देने वाला प्रमाण क्या हो सकता है?
- निष्कर्ष से पहले चार सप्ताह कौन-सा व्यावहारिक कदम जाँचा जा सकता है?
आगे पढ़ें
अपनी कुंडली में भाव वर्गीकरण, पंच महापुरुष योग, विशेष ग्रह दृष्टियाँ, चलित संधि और विंशोत्तरी दशा समय की प्रामाणिक जाँच के लिए नीचे दिए गए संबंधित लेख पढ़ें।
- हंस महापुरुष योग: केंद्र नियम, राशि बल और कुंडली उदाहरण
- वैदिक ज्योतिष में 12 भाव: अर्थ, वर्गीकरण और कारकत्व
- दशम भाव में गुरु: करियर, कर्म भाव, दृष्टियाँ और 12 लग्नों में फल
- कुंडली में गजकेसरी योग: चंद्र-गुरु केंद्र नियम और भंग शर्तें
- राशि चार्ट बनाम भाव चलित: राशि गरिमा और भाव संधि का अंतर
- विंशोत्तरी दशा संतुलन गणना: नक्षत्र सूत्र और समय निर्धारण
सामान्य प्रश्न
पाठकों के सामान्य प्रश्नों के संक्षिप्त उत्तर।
चतुर्थ भाव में बैठा गुरु किन-किन भावों पर दृष्टि डालता है?
चतुर्थ भाव में स्थित गुरु अपनी पंचम दृष्टि से अष्टम भाव (आयु, शोध व गुप्त विद्या), सप्तम दृष्टि से दशम भाव (कर्म, करियर व राज्य-सम्मान) और नवम दृष्टि से द्वादश भाव (मोक्ष, ध्यान व दूरस्थ निवास) को देखता है।
चतुर्थ भाव का गुरु तीनों मोक्ष भावों (4, 8, 12) को कैसे जोड़ता है?
वैदिक ज्योतिष में 4था, 8वाँ और 12वाँ भाव मोक्ष-त्रिकोण कहलाते हैं। चतुर्थ भाव में स्वयं बैठकर गुरु अपनी 5वीं और 9वीं त्रिकोण दृष्टियों से अष्टम और द्वादश भाव को देखता है, जिससे पूरा 4–8–12 मोक्ष-त्रिकोण सक्रिय हो जाता है।
चतुर्थ भाव में गुरु किन लग्नों में हंस महापुरुष योग बनाता है?
चतुर्थ भाव में गुरु तीन लग्नों में हंस महापुरुष योग बनाता है: मेष लग्न (चतुर्थ भाव में कर्क राशि में उच्च), कन्या लग्न (धनु राशि में स्वराशि/मूलत्रिकोण) और धनु लग्न (मीन राशि में स्वराशि)।
चतुर्थ भाव में गुरु करियर और दशम भाव को कैसे प्रभावित करता है?
चतुर्थ भाव से गुरु की सीधी सप्तम दृष्टि दशम भाव (कर्म स्थान) पर पड़ती है। विशेषकर मिथुन, धनु और मीन लग्नों में—जहाँ गुरु स्वयं चतुर्थ या दशम भाव का स्वामी भी है—यह दृष्टि व्यक्ति के घरेलू संस्कार और शैक्षणिक ज्ञान को सम्मानजनक आजीविका से जोड़ती है।
तुला लग्न में चतुर्थ भाव में नीच के गुरु का क्या प्रभाव होता है?
तुला लग्न में गुरु तृतीयेश व षष्ठेश होकर चतुर्थ भाव में मकर राशि में नीच का होता है। इसमें संपत्ति के दस्तावेजों और पारिवारिक ऋण/विवाद में सावधानी रखनी चाहिए, किंतु योगकारक शनि (चतुर्थेश-पंचमेश) के बलवान होने पर नीचभंग होकर स्थायित्व मिलता है।
क्या चतुर्थ भाव में गुरु को दिग्बल प्राप्त होता है?
गुरु को प्रथम भाव में पूर्ण दिग्बल (60 विरूप) और सप्तम भाव में शून्य दिग्बल मिलता है। चतुर्थ भाव इन दोनों के ठीक मध्य होने के कारण यहाँ गुरु को मध्यम दिग्बल (लगभग 30 विरूप या 50%) प्राप्त होता है, अतः राशि-बल और भावेश-बल अधिक निर्णायक होते हैं।