हिंदू काल-गणना (समय की इकाइयाँ): त्रुटि, घटी, मुहूर्त और प्रहर से युग, मन्वंतर व कल्प तक

सूर्य सिद्धांत और भागवत पुराण के अनुसार हिंदू काल-गणना: त्रुटि, प्राण, पल, घटी, मुहूर्त, प्रहर, तिथि-मास तथा चतुर्युग, मन्वंतर और कल्प के सटीक मान समझें।

पंचांग और कैलेंडरलेख · 13 मिनटRead in English ↗

संक्षिप्त उत्तर: हिंदू काल-गणना की इकाइयाँ कैसे काम करती हैं?

शास्त्रीय हिंदू काल-गणना (काल-गणना)—जिसका सुव्यवस्थित प्रतिपादन सूर्य सिद्धांत, भास्कराचार्य के सिद्धांत शिरोमणि और श्रीमद्भागवत महापुराण (स्कंध 3, अध्याय 11) में मिलता है—समय को तीन अखंड स्तरों पर मापती है: श्वास और सूर्योदय पर आधारित दैनिक सूक्ष्म व व्यावहारिक इकाइयाँ (जहाँ 1 प्राण = 4 सेकंड, 1 पल/विनाड़ी = 24 सेकंड, 1 घटी/नाड़ी = 24 मिनट, 1 मुहूर्त = 2 घटी = 48 मिनट, तथा 1 अहोरात्र = 60 घटी = 30 मुहूर्त = 24 घंटे), पंचांग की चंद्र-सौर इकाइयाँ (तिथि, पक्ष, मास, ऋतु, अयन, संवत्सर), और ब्रह्मांडीय महाचक्र (43,20,000 मानव वर्षों का चतुर्युग/महायुग, मन्वंतर और 4.32 अरब वर्षों का कल्प)।

  • षष्ट्यात्मक (60-आधारित) दैनिक माप (सूर्य सिद्धांत 1.11–12): 6 प्राण (4 सेकंड प्रत्येक) = 1 पल/विनाड़ी (24 सेकंड); 60 पल = 1 घटी/नाड़ी (24 मिनट); 60 घटी = 1 अहोरात्र (24 घंटे)।
  • अनुष्ठानिक दिन-रात विभाजन: 1 मुहूर्त = 2 घटी (औसत 48 मिनट, अहोरात्र में 30); 1 प्रहर/याम = 7.5 घटी (औसत 3 घंटे, अहोरात्र में 8 प्रहर)।
  • ब्रह्मांडीय युग-चक्र: कलियुग (4,32,000 वर्ष), द्वापर (8,64,000 वर्ष), त्रेता (12,96,000 वर्ष) और सतयुग/कृतयुग (17,28,000 वर्ष) का योग = 1 महायुग (43,20,000 मानव वर्ष); 1,000 महायुग = 1 कल्प (4.32 अरब वर्ष)।

सूर्य सिद्धांत और पुराणों में सूक्ष्म काल तथा दैनिक घटी–मुहूर्त–प्रहर का गणित

आधुनिक घड़ी की समय-पद्धति जहाँ अर्धरात्रि (रात 12:00 बजे) से दिन का आरंभ मानती है और उसे 60-60 मिनट के 24 घंटों में बाँटती है, वहीं शास्त्रीय भारतीय ज्योतिष (ज्योतिष-सिद्धांत) सावन दिन (अहोरात्र) का आरंभ एक स्थानीय सूर्योदय से अगले सूर्योदय तक मानता है—जिसका विस्तृत नियम हमारे हिंदू पंचांग में सूर्योदय से वार और तिथि बदलने के सिद्धांत लेख में समझाया गया है—और उस 24 घंटे के चक्र को 60 बराबर भागों में बाँटता है जिन्हें ‘घटी’ (अथवा घटिका, नाड़ी, नाडिका या दण्ड) कहा जाता है। सूर्य सिद्धांत (1.10–12) और भास्कराचार्य के सिद्धांत शिरोमणि में यह षष्ट्यात्मक (60-आधारित) माप मानव श्वसन और अक्षर-उच्चारण से निर्मित होती है: संस्कृत के दस गुरु अक्षरों के उच्चारण अथवा एक स्वस्थ मनुष्य की एक श्वास-क्रिया में लगने वाला समय एक प्राण (असु) कहलाता है, जो आधुनिक घड़ी के ठीक 4 सेकंड के बराबर है। छह प्राणों से एक पल (विनाड़ी / विघटी = 24 सेकंड) बनता है; साठ पलों से एक घटी (नाड़ी = 24 मिनट) बनती है; और साठ घटियों से एक पूर्ण दिन-रात (अहोरात्र = 1,440 मिनट = 24 घंटे) पूर्ण होता है।

इस खगोलीय षष्ट्यात्मक सोपान के साथ-साथ श्रीमद्भागवत महापुराण (3.11.5–10) और कौटिल्य के अर्थशास्त्र (2.20) में परमाणु और त्रुटि (कमल की कोमल पंखुड़ी को सूक्ष्म सुई से बेधने का समय) से आरंभ होने वाली सूक्ष्म-भौतिक शृंखला मिलती है, जो वेध, लव, निमेष (आँख की पलक झपकने का समय), काष्ठा और कला से होती हुई मुहूर्त (2 घटी = 48 मिनट; अहोरात्र में 30 मुहूर्त) तथा प्रहर / याम (7.5 घटी = 3 घंटे; दिन के 4 और रात्रि के 4 प्रहर) तक पहुँचती है।

हिंदू काल-गणना (समय की इकाइयाँ) के चार अखंड स्तर1. सूक्ष्म एवं श्वास-आधारित कालत्रुटि व निमेष (पलक) -> प्राण (4 सेकंड) -> पल / विनाड़ी (24 सेकंड)परमाणु-क्षण और मानव श्वास-लय को मंत्र-उच्चारण से जोड़ने वाली इकाई2. दैनिक अहोरात्र (घटी-मुहूर्त)1 घटी = 24 मिनट | 1 मुहूर्त = 2 घटी (48 मिनट) | 1 प्रहर = 7.5 घटी (3 घंटे)सूर्योदय से अगले सूर्योदय तक: 60 घटी = 30 मुहूर्त = 8 प्रहर (24 घंटे)3. पंचांग का चंद्र-सौर संवत्सरतिथि (12° चंद्र-सूर्य अंतर) -> पक्ष (15) -> मास -> ऋतु (6) -> अयन (2) -> संवत्सरअधिक मास के माध्यम से चंद्र मास और सौर संक्रांति का खगोलीय समन्वय4. युग, मन्वंतर एवं कल्प चक्रमहायुग (43.2 लाख वर्ष) -> मन्वंतर (71 महायुग) -> कल्प (1,000 महायुग = 4.32 अरब वर्ष)सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग का 4:3:2:1 अनुपात में विराट कालचक्र
शास्त्रीय भारतीय खगोल-विज्ञान 4 सेकंड के ‘प्राण’ और 24 मिनट की ‘घटी’ को 4.32 अरब वर्ष के ‘कल्प’ से एक ही गणितीय सूत्र में पिरोता है।
सूक्ष्म एवं दैनिक हिंदू समय-इकाइयाँ: शास्त्रीय सूत्र, ग्रंथ-संदर्भ और आधुनिक घड़ी में सटीक मान
संस्कृत काल-इकाईशास्त्रीय परिभाषा एवं अनुपातप्रमुख ग्रंथ-संदर्भआधुनिक घड़ी में सटीक मान
त्रुटिकमल की कोमल पंखुड़ी को सूक्ष्म सुई से बेधने में लगने वाला समयश्रीमद्भागवत 3.11.5–6 एवं सूर्य सिद्धांतलगभग 29.6 से 474 माइक्रोसेकंड (ग्रंथ-परंपरा के अनुसार)
निमेषमनुष्य की पलक एक बार स्वाभाविक रूप से झपकने का समय (3 लव)भागवत पुराण 3.11.7, मनुस्मृति 1.64लगभग 0.21 से 0.88 सेकंड
प्राण / असु10 गुरु अक्षरों का उच्चारण काल अथवा 1 सामान्य श्वास-चक्रसूर्य सिद्धांत 1.11, सिद्धांत शिरोमणिठीक 4 सेकंड (15 प्राण = 1 मिनट)
पल / विनाड़ी / विघटी6 प्राण (अथवा 60 विपल, जहाँ 1 विपल = 0.4 सेकंड)सूर्य सिद्धांत 1.11–12ठीक 24 सेकंड (2.5 पल = 1 मिनट)
घटी / नाड़ी / दण्ड60 पल (विनाड़ी); एक अहोरात्र का 1/60वाँ भागसूर्य सिद्धांत 1.12, वेदांग ज्योतिषठीक 24 मिनट (2.5 घटी = 1 घंटा)
मुहूर्त / क्षण2 घटी (120 पल); अहोरात्र का 1/30वाँ भाग (15 दिन + 15 रात्रि)ऋग्वेद 3.33.5, शतपथ ब्राह्मण, अथर्ववेदीय ज्योतिषऔसत 48 मिनट (सूर्योदय-सूर्यास्त के अनुसार दिनमान में परिवर्तनशील)
प्रहर / याम7.5 घटी (3.75 मुहूर्त); अहोरात्र का 1/8वाँ भाग (4 दिन + 4 रात्रि प्रहर)अर्थशास्त्र 1.19, धर्मसिंधु (महाशिवरात्रि चतुष्प्रहर पूजा)औसत 3 घंटे (180 मिनट)
अहोरात्र (सावन दिन)60 घटी = 30 मुहूर्त = 8 प्रहर = 21,600 प्राण (सूर्योदय से अगले सूर्योदय तक)सूर्य सिद्धांत 1.12, मनुस्मृति 1.6424 घंटे (1,440 मिनट / 86,400 सेकंड)

पंचांग की चंद्र-सौर इकाइयाँ, चतुर्युग–मन्वंतर–कल्प और घटी-पल से घड़ी का रूपांतरण

24 घंटे के अहोरात्र से ऊपर उठकर भारतीय काल-गणना सूर्य सिद्धांत के चौदहवें अध्याय (मानाध्याय) के अनुसार समय के चार पूरक मानों (मान) का उपयोग करती है: सावन मान (सूर्योदय से सूर्योदय तक का सिविल दिन), चान्द्र मान (सूर्य और चंद्रमा के भोगांश में प्रत्येक 12 अंश के अंतर से बनने वाली तिथि—जिसका अंग्रेजी तारीख से अंतर हमारे तिथि और कैलेंडर तारीख के अंतर लेख में स्पष्ट किया गया है), सौर मान (सूर्य के प्रत्येक राशि में प्रवेश अर्थात् संक्रांति से मापा जाने वाला सौर मास व वर्ष), और नाक्षत्र मान (नक्षत्र-भ्रमण काल)। पंद्रह तिथियों का एक पक्ष (शुक्ल या कृष्ण), दो पक्षों का एक मास, दो मासों की एक ऋतु (वसंत, ग्रीष्म, वर्षा, शरद, हेमंत, शिशिर), तीन ऋतुओं (छह सौर मास) का एक अयन (उत्तरायण एवं दक्षिणायन), और दो अयनों का एक पूर्ण संवत्सर (वर्ष) होता है, जिसमें चंद्र और सौर वर्षों के अंतर को हमारे अधिक मास (पुरुषोत्तम मास) की गणना और महत्व लेख में वर्णित सिद्धांत से संतुलित किया जाता है। यहाँ खगोलीय सेतु यह है कि मनुष्यों का 1 संवत्सर (1 वर्ष) देवताओं का 1 अहोरात्र (दिन-रात) होता है—जिसमें उत्तरायण देवताओं का दिन और दक्षिणायन उनकी रात्रि है।

देवताओं के 360 अहोरात्र (अर्थात् 360 मानव वर्ष) का एक दिव्य वर्ष होता है, और इसी दिव्य वर्ष के आधार पर 4:3:2:1 के ह्रासमान अनुपात में (प्रत्येक युग की संध्या और संध्यांश सहित) विराट चतुर्युग (महायुग) की गणना होती है: सतयुग (कृतयुग) 4,800 दिव्य वर्ष (17,28,000 मानव वर्ष), त्रेता युग 3,600 दिव्य वर्ष (12,96,000 मानव वर्ष), द्वापर युग 2,400 दिव्य वर्ष (8,64,000 मानव वर्ष) और कलियुग 1,200 दिव्य वर्ष (4,32,000 मानव वर्ष)—जिनका कुल योग 12,000 दिव्य वर्ष अर्थात् एक महायुग में 43,20,000 (43.2 लाख) मानव वर्ष होता है। इकहत्तर (71) महायुगों का एक मन्वंतर (संधिकाल के बिना 30,67,20,000 वर्ष; सतयुग-तुल्य संधिकाल सहित 30,84,48,000 वर्ष) होता है। चौदह मन्वंतर और पंद्रह संधिकाल मिलकर ठीक 1,000 महायुग = 1 कल्प (4,32,00,00,000 मानव वर्ष = 4.32 अरब वर्ष) बनाते हैं, जो ब्रह्मा का केवल एक दिन है, और इतनी ही अवधि की उनकी रात्रि (नैमित्तिक प्रलय) होती है। व्यावहारिक पंचांग-पठन में जब किसी तिथि की समाप्ति या जन्म का इष्टकाल सूर्योदय के बाद ‘घटी–पल’ में दिया हो—उदाहरणार्थ, प्रातः 06:12 सूर्योदय के बाद 14 घटी 30 पल—तो घटी को 24 मिनट से गुणा करें (`14 × 24 = 336 मिनट`) और पल को 0.4 मिनट से गुणा करें (`30 × 0.4 = 12 मिनट`); कुल `348 मिनट = 5 घंटे 48 मिनट` को सूर्योदय 06:12 में जोड़ने पर घड़ी का सटीक समय दोपहर 12:00 बजे प्राप्त होता है।

तिथि और संवत्सर से लेकर महायुग, मन्वंतर और कल्प तक की पंचांग व ब्रह्मांडीय काल-तालिका
पंचांग / ब्रह्मांडीय इकाईआंतरिक संरचना एवं अनुपातदिव्य वर्ष (देव-मान) में अवधिमानव वर्ष / खगोलीय अवधि
तिथि एवं पक्ष1 तिथि = 12° चंद्र-सूर्य अंतर; 15 तिथि = 1 पक्ष (शुक्ल व कृष्ण)1 पूर्ण चंद्र मास = पितरों का 1 अहोरात्र (दिन-रात)औसत 1 तिथि ≈ 23 घंटे 37 मिनट; 1 चंद्र मास ≈ 29.53 दिन
ऋतु, अयन एवं संवत्सर2 मास = 1 ऋतु; 3 ऋतु = 1 अयन (उत्तरायण/दक्षिणायन); 2 अयन = 1 संवत्सर1 मानव संवत्सर = देवताओं का 1 अहोरात्र1 सौर वर्ष (लगभग 365.256 दिन; 360 सौर अंश)
कलियुग1,000 मूल दिव्य वर्ष + 100 संध्या + 100 संध्यांश (अनुपात 1)1,200 दिव्य वर्ष (× 360)4,32,000 मानव वर्ष
द्वापर युग2,000 मूल दिव्य वर्ष + 200 संध्या + 200 संध्यांश (अनुपात 2)2,400 दिव्य वर्ष (× 360)8,64,000 मानव वर्ष
त्रेता युग3,000 मूल दिव्य वर्ष + 300 संध्या + 300 संध्यांश (अनुपात 3)3,600 दिव्य वर्ष (× 360)12,96,000 मानव वर्ष
सतयुग / कृतयुग4,000 मूल दिव्य वर्ष + 400 संध्या + 400 संध्यांश (अनुपात 4)4,800 दिव्य वर्ष (× 360)17,28,000 मानव वर्ष
चतुर्युग / महायुगसतयुग + त्रेता + द्वापर + कलियुग (4 + 3 + 2 + 1 = 10 × कलियुग)12,000 दिव्य वर्ष43,20,000 मानव वर्ष (43.2 लाख वर्ष)
मन्वंतर71 महायुग (+ 1 कृतयुग-तुल्य संधिकाल = 17,28,000 वर्ष)8,52,000 दिव्य वर्ष (संधि रहित)30,67,20,000 मानव वर्ष (संधि सहित 30,84,48,000 वर्ष)
कल्प (ब्रह्मा का 1 दिन)14 मन्वंतर + 15 कृतयुग-तुल्य संधिकाल = 1,000 महायुग1,20,00,000 दिव्य वर्ष4,32,00,00,000 मानव वर्ष (4.32 अरब वर्ष; रात्रि सहित 8.64 अरब वर्ष)

मुहूर्त और बदलता दिन

स्थिर 30-मुहूर्त मॉडल में एक मुहूर्त 48 मिनट का है। लेकिन मुहूर्त-गणना में दिन के मुहूर्त सूर्योदय से सूर्यास्त और रात के मुहूर्त सूर्यास्त से अगले सूर्योदय के बीच बाँटे जा सकते हैं। मौसम के अनुसार वास्तविक अवधि बदलती है। पंचांग के शीर्षक के साथ उसकी गणना-पद्धति पढ़ें।

मान लें किसी शहर में सूर्योदय 06:00 और सूर्यास्त 18:00 है। 12 घंटे के दिन-प्रकाश को 15 बराबर दिन-मुहूर्त में बाँटें तो हर एक 48 मिनट का होगा। यदि प्रकाश 13 घंटे हो, तो 15 भागों में प्रत्येक 52 मिनट का होगा। नाम वही है, घड़ी की अवधि बदल गई।

सूर्योदय दिनमान और घटी-पल से घड़ी के समय में रूपांतरण के उदाहरण

पारंपरिक समय-इकाइयों को आधुनिक घड़ी के घंटों में बदलते समय दो पद्धतियों का अंतर स्पष्ट रखना चाहिए: स्थिर 24-घंटे की सावन पद्धति (जहाँ 1 घटी हमेशा 24 मिनट और 1 मुहूर्त 48 मिनट का होता है) तथा ऋतु-आधारित दिनमान–रात्रिमान पद्धति (जहाँ सूर्योदय से सूर्यास्त तक के वास्तविक प्रकाश-काल को 15 दिन-मुहूर्तों में बाँटा जाता है)। उदाहरण के लिए, यदि किसी नगर में सूर्योदय प्रातः 05:45 और सूर्यास्त सायं 18:15 पर हो, तो दिनमान 12 घंटे 30 मिनट (750 मिनट) होगा। इसे 15 बराबर दिन-मुहूर्तों में बाँटने पर प्रत्येक दिन-मुहूर्त 50 मिनट का होगा—प्रथम मुहूर्त 05:45–06:35, द्वितीय 06:35–07:25 और मध्याह्न का आठवाँ अभिजित मुहूर्त 11:35–12:25 तक रहेगा। इसके विपरीत, 11 घंटे 30 मिनट (690 मिनट) की रात्रि के 15 रात्रि-मुहूर्तों में प्रत्येक 46 मिनट का होगा, जिससे सूर्योदय से दो मुहूर्त पूर्व का ब्राह्म मुहूर्त (रात्रि का 14वाँ मुहूर्त) 92 मिनट पहले अर्थात् प्रातः 04:13 बजे आरंभ होगा।

दूसरी ओर, जब पंचांग में किसी तिथि की समाप्ति या जन्म का इष्टकाल स्थिर 60-घटी पद्धति में दिया जाता है—मान लीजिए प्रातः 06:00 सूर्योदय के बाद 21 घटी 15 पल—तब स्थिर सूत्र (`1 घटी = 24 मिनट`, `1 पल = 24 सेकंड = 0.4 मिनट`) लागू होता है। यहाँ `21 × 24 = 504 मिनट` (8 घंटे 24 मिनट) और `15 पल × 0.4 = 6 मिनट` का योग 8 घंटे 30 मिनट बनता है, जिसे 06:00 बजे में जोड़ने पर घड़ी का सटीक समय दोपहर 02:30 बजे (14:30) प्राप्त होता है।

इन इकाइयों का उपयोग

ये इकाइयाँ पुराने पंचांग, मंदिर समय-सारणी, व्रत-विधि और अनुवाद समझने में मदद करती हैं। “सूर्योदय से तीन मुहूर्त पहले” को सही घड़ी में बदलने के लिए यह जानना जरूरी है कि स्रोत किस इकाई-पद्धति की बात कर रहा है।

आधुनिक पंचांग पढ़ते समय उसका शब्दकोश अपनाएँ। ऐतिहासिक पाठ का अनुवाद करते हुए संस्कृत इकाई रखें और कोष्ठक में लगभग आधुनिक मान दें। इससे अनुमान को मूल लेखक की घड़ी समझने की गलती नहीं होगी।

समय-इकाइयाँ सांस्कृतिक और खगोलीय शब्दावली हैं। उनसे अपने-आप किसी अनुष्ठान के परिणाम सिद्ध नहीं होते। उनका उपयोग समय समझने के लिए करें और संबंधित स्थानीय परंपरा का पालन करें।

प्राचीन घटिका-यंत्र (जल-घड़ी) और मंदिर के प्रहर-घंटों द्वारा समय का मापन

24 मिनट की समय-इकाई को ‘घटी’ या ‘घटिका’ (जिसका शाब्दिक अर्थ ‘छोटा पात्र या कुंभ’ है) क्यों कहा जाता है? सूर्य सिद्धांत (अध्याय 13, ज्योतिषोपनिषद) और वराहमिहिर की पंचसिद्धांतिका के अनुसार प्राचीन वेधशालाओं, राजदरबारों और प्रमुख मंदिरों में सूर्योदय के बाद का समय मापने के लिए घटिका-यंत्र (या कपाल-यंत्र) का प्रयोग होता था। यह निश्चित भार और आकार की तांबे की अर्धगोलाकार कटोरी होती थी जिसके तल में सोने की सूक्ष्म शलाका से एक छोटा छिद्र किया जाता था। शांत जल के कुंड में तैरती हुई यह कटोरी ठीक उतने समय में जल से भरकर डूब जाती थी जितना एक अहोरात्र का 1/60वाँ भाग होता है—अर्थात् 24 मिनट (1 घटी)।

प्रत्येक बार पात्र के डूबने पर नियुक्त समय-पालक (घटिका-पाल) उसे निकालकर पुनः तैराता था और घंटे पर चोट कर बीती हुई घटियों की सूचना देता था। साढ़े सात घटी (3 घंटे) पूर्ण होने पर विशेष नाद से एक प्रहर (प्र + हृ = घंटे पर प्रहार करना) की घोषणा होती थी; इसी कारण भारतीय शास्त्रीय संगीत के रागों का गायन-समय और महाशिवरात्रि की रात्रि-पूजा आज भी चार प्रहरों के क्रम से ही निर्धारित होती है।

आगे पढ़ें

नीचे दिए गए संबंधित शास्त्र, दर्शन, अनुष्ठान और पंचांग मार्गदर्शकों से आगे अध्ययन करें। प्रत्येक लेख एक विशिष्ट विषय को उसके मूल शास्त्रीय संदर्भ में स्पष्ट करता है।

सामान्य प्रश्न

पाठकों के सामान्य प्रश्नों के संक्षिप्त उत्तर।

एक घटी और एक मुहूर्त में कितने मिनट होते हैं?

24 घंटे के अहोरात्र के 60-घटी विभाजन में 1 घटी (नाड़ी) ठीक 24 आधुनिक मिनट की होती है, और 1 मुहूर्त में 2 घटी अर्थात् औसत 48 मिनट होते हैं (पूरे दिन-रात में 30 मुहूर्त)।

हिंदू काल-गणना में ‘प्राण’ और ‘पल’ कितने सेकंड के बराबर हैं?

सूर्य सिद्धांत के अनुसार 1 प्राण (दस गुरु अक्षरों का उच्चारण या एक सामान्य श्वास) ठीक 4 सेकंड का होता है, और 6 प्राणों से 1 पल (विनाड़ी) बनता है जो 24 सेकंड के बराबर है।

पंचांग में दिए गए ‘घटी–पल’ (इष्टकाल) को आधुनिक घड़ी के समय में कैसे बदलें?

घटी की संख्या को 24 से गुणा कर मिनट निकालें और पल को 0.4 से गुणा कर (या 2.5 से भाग देकर) मिनट जोड़ें; फिर इस कुल अवधि को उस दिन के स्थानीय सूर्योदय समय में जोड़ दें।

ऋतुओं के अनुसार दिन के मुहूर्त की घड़ी-अवधि कम या अधिक क्यों होती है?

यद्यपि औसत मुहूर्त 48 मिनट का होता है, किंतु जब स्थानीय सूर्योदय से सूर्यास्त तक के वास्तविक ‘दिनमान’ को 15 बराबर दिन-मुहूर्तों में बाँटा जाता है, तब ग्रीष्म ऋतु में दिन बड़ा होने से प्रत्येक दिन-मुहूर्त 48 मिनट से बड़ा और शीत ऋतु में छोटा हो जाता है।

सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग की मानव वर्षों में सटीक अवधि क्या है?

4:3:2:1 के शास्त्रीय अनुपात (जहाँ 1 दिव्य वर्ष = 360 मानव वर्ष) के अनुसार कलियुग 4,32,000 वर्ष, द्वापर युग 8,64,000 वर्ष, त्रेता युग 12,96,000 वर्ष और सतयुग (कृतयुग) 17,28,000 वर्ष का होता है; चारों का योग 1 महायुग = 43,20,000 मानव वर्ष है।

एक मन्वंतर और एक कल्प में कितने वर्ष होते हैं?

एक मन्वंतर में 71 महायुग (संधि रहित 30,67,20,000 मानव वर्ष; संधि सहित 30,84,48,000 वर्ष) होते हैं, और 14 मन्वंतर तथा 15 संधिकाल मिलकर 1,000 महायुग अर्थात् 1 कल्प (4.32 अरब मानव वर्ष = ब्रह्मा का एक दिन) बनाते हैं।

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