भगवद्गीता 5.18 का मुख्य संदेश क्या है?
गीता 5.18 ज्ञानी जनों को समदर्शी कहती है: वे विद्या, सामाजिक स्थान और शरीर के बड़े भेदों के बीच सम दृष्टि रखते हैं। उदाहरण हैं विद्या-विनय से सम्पन्न ब्राह्मण, गाय, हाथी, कुत्ता और प्राचीन पाठ में श्वपाक कहलाया व्यक्ति। आसपास के श्लोक इस दृष्टि को ज्ञान और ब्रह्म से जोड़ते हैं।
यह समझना जरूरी है कि समता किस स्तर की कही जा रही है। श्लोक हर शरीर, कौशल, जरूरत या कर्म को एक जैसा नहीं बताता। यहाँ संस्कृत का कथन, शंकराचार्य की पारंपरिक व्याख्या और विचार के लिए दिए आधुनिक उदाहरण अलग-अलग पहचाने गए हैं।
इस श्लोक का विशेष प्रश्न है: ज्ञान होने पर प्राणियों को देखने की दृष्टि कैसे बदलती है? यह सबको बिल्कुल एक-सी वस्तु देने का नियम या हर मत को समान प्रमाणयुक्त मानने का दावा नहीं है।
संस्कृत पाठ, IAST और मौलिक हिंदी अर्थ
विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि ।
शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः ॥ ५-१८॥vidyāvinayasampanne brāhmaṇe gavi hastini | śuni caiva śvapāke ca paṇḍitāḥ samadarśinaḥ || 5.18 ||
Astrogyana का मौलिक अर्थ: ज्ञानी जन विद्या और विनय से सम्पन्न ब्राह्मण में, गाय में, हाथी में, कुत्ते में और प्राचीन शब्द श्वपाक से संबोधित व्यक्ति में सम दृष्टि रखते हैं।
अर्थ में श्वपाक शब्द रखा गया है ताकि उसका ऐतिहासिक आशय स्पष्ट किया जा सके और उसकी जगह आज के पाठक को अपमानित करने वाला संबोधन न रख दिया जाए। शब्द का शाब्दिक संबंध कुत्ते का मांस पकाने वाले व्यक्ति से है; यहाँ वह प्राचीन समाज की अवमानित श्रेणी बताता है। शब्द समझाना उस अवमानना का समर्थन नहीं है।
संस्कृत पाठ IIT Kanpur के Gita Supersite पर उपलब्ध है। वहाँ संपन्ने और यहाँ सम्पन्ने का लेखन इसी शब्द के रूप हैं। ऊपर दिया हिंदी अर्थ हमारा मौलिक प्रस्तुतीकरण है, किसी आधुनिक अनुवादक का उद्धरण नहीं।
सूक्ति बनाने से पहले वाक्य-संबंध समझें
| पद | अर्थ और संबंध |
|---|---|
| विद्याविनयसम्पन्ने | विद्या और विनय से सम्पन्न; अगले ब्राह्मणे का विशेषण |
| ब्राह्मणे | उस विद्या-विनययुक्त ब्राह्मण में |
| गवि | गाय में |
| हस्तिनि | हाथी में |
| शुनि | कुत्ते में |
| श्वपाके | श्वपाक में; प्राचीन सामाजिक अवमानना वाला पद |
| पण्डिताः | ज्ञानी जन; वाक्य का बहुवचन कर्ता |
| समदर्शिनः | सम देखने वाले; ज्ञानी जनों की दृष्टि का वर्णन |
बार-बार आए सप्तमी के रूप बताते हैं कि किन प्राणियों में या उनके प्रति सम दृष्टि कही गई है। विद्याविनयसम्पन्ने अगले ब्राह्मणे को विशेषित करता है। पहला उदाहरण केवल पद या जन्म-संज्ञा नहीं है; उसमें विद्या और विनय की विशेषताएँ भी स्पष्ट हैं।
पण्डिताः और समदर्शिनः दोनों बहुवचन रूप हैं और साथ पढ़े जाते हैं। वाक्य ज्ञानी की दृष्टि का वर्णन करता है। उसका व्याकरण यह वादा नहीं करता कि श्लोक बोलते ही पाठक ज्ञानी हो जाएगा। न ही वह सामान्य जीवन के हर व्यावहारिक भेद को तत्काल मिटाने का सीधा आदेश है।
चैव का पद-विभाग च एव है। संधि सहित पाठ और अलग किए शब्द दोनों देखकर पढ़ने से शब्द पहचानना आसान होता है। लिपि या संधि के छोटे अंतर को बिना कारण नया दार्शनिक सिद्धांत न मानें।
ये पाँच उदाहरण एक साथ क्यों आए हैं?
सूची परिचित सीमाओं को पार करती है: एक विद्वान मानव, अलग प्रकार के पशु और प्राचीन सामाजिक क्रम के हाशिए पर रखा व्यक्ति। यह विविधता श्लोक की बात को तीखा करती है। यदि अर्थ केवल सम्मानित विद्वानों से शिष्टता बरतना हो तो बाकी अधिकांश वाक्य का प्रयोजन छूट जाएगा।
साथ ही पाठ यह नहीं कहता कि इन सबके शरीर या क्षमताएँ समान हैं। गाय और हाथी का अलग नाम लेना ही उनके पहचानने योग्य भेद को बनाए रखता है। समता उन भेदों के पार ज्ञानी की दृष्टि से संबंधित है।
आज का पाठक प्रतिष्ठित व्यक्ति से अवमानित व्यक्ति तक जाती सूची से सामाजिक पद के कारण उठने वाले तिरस्कार की जाँच कर सकता है। यह नैतिक प्रयोग उपयोगी है, पर उसे प्रयोग के रूप में ही कहना चाहिए। श्लोक ज्ञान और मुक्ति की चर्चा में है; वह किसी आधुनिक संस्था की पूरी नीति-पुस्तिका नहीं है।
पुराने अनुवादों की शब्दावली भी सावधानी से पढ़ें। कोई अनुवाद ऐतिहासिक श्रेणी बचाए रख सकता है, पर पाठक को उसे किसी व्यक्ति के मूल्य पर फैसला मानने की जरूरत नहीं। जन्म, काम और विरासत में मिले नाम किसी को नीचा दिखाने का कारण नहीं हैं।
ज्ञान और स्थिरता के बीच 5.18 को पढ़ें
| श्लोक | यहाँ प्रासंगिक विचार |
|---|---|
| 5.15 | अज्ञान से ज्ञान ढकने और मोह की चर्चा |
| 5.16 | ज्ञान द्वारा अज्ञान हटने पर सूर्य जैसी प्रकाशक उपमा |
| 5.17 | उस परम तत्त्व में बुद्धि, निष्ठा और लक्ष्य का केंद्रित होना |
| 5.18 | ज्ञानी की समदृष्टि के पाँच भिन्न उदाहरण |
| 5.19 | समता में स्थित मन और निर्दोष सम ब्रह्म |
| 5.20 | प्रिय-अप्रिय में स्थिर बुद्धि का प्रसंग |
5.16 में ज्ञान, अज्ञान से ढके तत्त्व को सूर्य की तरह प्रकाशित करने की उपमा के साथ आता है। 5.17 में उसी परम तत्त्व की ओर बुद्धि और निष्ठा का केंद्रित होना बताया जाता है। फिर 5.18 में समदृष्टि ज्ञानी की विशेषता बनकर आती है और 5.19 उसे स्पष्ट रूप से ब्रह्म से जोड़ता है।
इस क्रम से दो अधूरे अर्थ छूटते हैं। बात केवल बाहर से सीखी हुई शिष्टता की नहीं रह जाती और न केवल अलग-अलग पशुओं की सूची रह जाती है। यह समझ, मुक्ति और उस समझ में स्थित व्यक्ति की स्थिरता वाली अध्याय-चर्चा का हिस्सा है।
5.20 प्रिय और अप्रिय प्राप्त होने पर बुद्धि की स्थिरता की ओर बढ़ता है। इससे दूसरों को देखने की दृष्टि और अनुभवों से मन के प्रभावित होने का संबंध बनता है। इसका अर्थ यह दिखावा करना नहीं कि सुख, पीड़ा, गलत व्यवहार या व्यावहारिक कठिनाई अब मौजूद ही नहीं हैं।
शंकर भाष्य: एक अविकारी ब्रह्म का दर्शन
Sanskrit Documents में उपलब्ध संस्कृत भाष्य में शंकराचार्य विनय को उपशम से समझाते हैं, अर्थात शांत होने या संयत होने की दिशा। समदृष्टि का केंद्र सम, एक और अविकारी ब्रह्म है, जिसे गुण तथा उनसे बने संस्कार स्पर्श नहीं करते।
यह अद्वैत की व्याख्या है। यहाँ समता का अर्थ यह प्रत्यक्ष दावा नहीं कि विद्वान, गाय और हाथी के अनुभव में दिखने वाले गुण बिल्कुल एक हैं। अर्थ उस ब्रह्म की पहचान है जो शरीरों के अलग-अलग गुणों से बदल नहीं जाता।
भाष्य अपनी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के गुण-वर्गीकरण और सामाजिक वर्णनों का उपयोग भी करता है। आधुनिक व्याख्या को यह संदर्भ छिपाना नहीं चाहिए, लेकिन उसका दार्शनिक निष्कर्ष स्पष्ट रखना चाहिए। पुराने वर्गीकरण को आज विभिन्न समूहों के बारे में वैज्ञानिक तथ्य बनाकर दोहराना पाठ-इतिहास और प्रमाण को मिला देना होगा।
5.19 की व्याख्या में समता में स्थित मन का संबंध ब्रह्म और मुक्ति से आगे स्पष्ट होता है। इसलिए इसे केवल शिष्ट बोलने की सामान्य सलाह तक सीमित कर देना पर्याप्त नहीं है। शिष्टता एक उपयोगी व्यावहारिक अभिव्यक्ति हो सकती है; वह संपूर्ण तत्त्वमीमांसा नहीं है।
दूसरी परंपराएँ आत्मा, ईश्वर और प्राणियों का संबंध अलग ढंग से समझा सकती हैं। इस लेख में जिस भाष्यकार की दृष्टि प्रस्तुत है उसका नाम स्पष्ट रखा गया है। अलग दार्शनिक मतों को मिलाकर सभी का एक जैसा सिद्धांत घोषित नहीं किया गया है।
सम सम्मान के साथ निर्णय अलग हो सकते हैं
| स्थिति | सम्मान का आधार | व्यावहारिक भेद |
|---|---|---|
| विशेषज्ञ और नया विद्यार्थी | दोनों की बात बिना अपमान सुनना | तकनीकी निर्णय में प्रमाण और अनुभव देखना |
| दो अलग जरूरत वाले सहभागी | दोनों को सहभागिता का अवसर | जरूरत के अनुसार अलग सहायता देना |
| असहमति या गलती | व्यक्ति को नीचा न दिखाना | दावे की जाँच और गलती सुधारना |
| हानिकारक व्यवहार | मानवीय गरिमा बनाए रखना | सीमा तय करना और व्यवहार रोकना |
इस तालिका के भेद आधुनिक प्रयोग हैं; वे संस्कृत वाक्य में छिपे अतिरिक्त नियम नहीं हैं। इनसे एक सामान्य भ्रम जाँचा जा सकता है: व्यक्ति का सम्मान करना किसी अप्रमाणित दावे को मान लेना या योग्यता देखे बिना काम सौंप देना नहीं है।
कल्पना करें कि एक ही प्रश्न दो लोग पूछते हैं, एक प्रतिष्ठित पद पर है और दूसरा नहीं। दूसरे को निष्पक्ष अवसर देने से पहले व्यक्ति का अनुभव बेकार नहीं हो जाता। बात यह है कि केवल पद यह तय न करे कि किसकी बात सुनने लायक है।
अलग जरूरतों के लिए सहायता भी अलग हो सकती है। जिसे बड़े अक्षरों की जरूरत है उसे वैसा चार्ट देना सहभागिता को बेहतर बना सकता है। सबको बिल्कुल समान आकार का कागज देना ही हर परिस्थिति में उचित व्यवहार नहीं है। सम्मान की समानता वस्तुओं की पूरी भौतिक समानता से नहीं मापी जाती।
हानिकारक व्यवहार होने पर सीमा आवश्यक हो सकती है। शांत ढंग से अपमान रोकना सहभागिता की रक्षा कर सकता है और बोलने वाले को अमानवीय बनाने की भी जरूरत नहीं पड़ती। श्लोक का उपयोग किसी अपमानित व्यक्ति से सब सहते रहने को कहने या जवाबदेही को आध्यात्मिक कमी घोषित करने के लिए नहीं करना चाहिए।
यह 2.48 और 6.32 से कैसे जुड़ता है?
गीता 2.48 कर्म करते हुए सिद्धि-असिद्धि के प्रति स्थिरता का प्रसंग रखता है। गीता 6.32 दूसरे के सुख-दुःख को अपने साथ तुलना करके देखने की बात करता है। 5.18 अलग प्राणियों के बीच ज्ञानी की समदृष्टि को सामने रखता है।
इन श्लोकों से एक-दूसरे की समझ गहरी हो सकती है, लेकिन इनके तत्काल विषय अलग हैं: कर्म के परिणाम, दूसरे का अनुभव और प्राणियों को देखने की दृष्टि। सबको “कुछ महसूस मत करो” में बदल देने से उनकी विशेष बात खो जाती है।
इसी तरह गीता 13.8 में ज्ञान के लिए सहायक गुणों में अमानित्व आता है। 5.18 में विद्या और विनय सूची के पहले व्यक्ति को विशेषित करते हैं। संबंध उपयोगी है, लेकिन दोनों का व्याकरण और अध्याय-संदर्भ अलग बना रहता है।
एक काल्पनिक सामुदायिक खगोल-संध्या
मान लें कि मोहल्ले का समूह दूरबीन से आकाश दिखाने का कार्यक्रम करता है। यह काल्पनिक शिक्षण उदाहरण है, वास्तविक घटना की रिपोर्ट या मापे गए आध्यात्मिक परिवर्तन का दावा नहीं। आयोजकों में अनुभवी निरीक्षक, नया स्वयंसेवक, परिसर का देखभालकर्ता और अलग जरूरतों वाले आगंतुक हैं।
| घटना | बदलने योग्य प्रतिक्रिया |
|---|---|
| एक नया सहभागी प्रश्न पूछता है | पदवी न होने के कारण प्रश्न को अनसुना करना |
| अनुभवी वक्ता गलत संख्या कहता है | प्रतिष्ठा के कारण जाँच छोड़ देना |
| एक सहभागी को बड़े अक्षरों का चार्ट चाहिए | सभी को एक-सी प्रति देना ही निष्पक्षता मानना |
| कोई व्यक्ति दूसरे के जन्म-समूह पर व्यंग्य करता है | समता के नाम पर अपमान को सह लेना |
नए व्यक्ति का प्रश्न सुनकर उसके स्तर के अनुसार उत्तर दिया जा सकता है। अनुभवी वक्ता की संख्या गलत हो तो सम्मान सहित जाँच की जा सकती है। बड़े अक्षरों का चार्ट पाने वाले को अपनी गरिमा का औचित्य सिद्ध करने की जरूरत नहीं होनी चाहिए। जन्म-समूह पर किए अपमान को स्पष्ट रूप से रोका जा सकता है।
काम फिर भी अलग रहेंगे। दूरबीन जानने वाला उसका संचालन समझा सकता है, स्वयंसेवक कतार संभाल सकता है और कोई दूसरा व्याख्या का अनुवाद कर सकता है। सबका एक ही काम करना सम्मान की शर्त नहीं, और उपयोगी कौशल किसी को तिरस्कार की अनुमति नहीं देता।
यह उदाहरण सम सम्मान की भावना का प्रयोग करता है। इससे यह सिद्ध नहीं होता कि आयोजकों ने शंकराचार्य के वर्णित ब्रह्मज्ञान को प्राप्त कर लिया। यह अंतर बनाए रखने से सामान्य अभ्यास को मुक्ति के प्रमाण की तरह बेचने की गलती नहीं होती।
ध्यान से पढ़ने के लिए चार प्रश्न
- श्लोक किसका वर्णन कर रहा है: शरीरों का, क्षमताओं का, सामाजिक नामों का या ज्ञानी की दृष्टि का?
- पहले उदाहरण में विद्या और विनय दोनों विशेषण क्यों जरूरी हैं?
- 5.19 समता का दार्शनिक संदर्भ कैसे स्पष्ट करता है?
- मेरे अर्थ का कौन-सा भाग मूल पाठ से, कौन-सा नामित भाष्य से और कौन-सा अपने प्रयोग से आया है?
केवल याद की हुई छोटी सूक्ति के बजाय सामने पाठ रखकर उत्तर खोजें। यदि कोई अर्थ पशुओं और सामाजिक रूप से अवमानित व्यक्ति की उपस्थिति समझा ही नहीं पाता तो शायद उसने श्लोक का दायरा बहुत संकरा कर दिया है। यदि कोई अर्थ हर कर्म को समान रूप से स्वीकार्य बताता है तो देखें कि वाक्य में यह दावा कहाँ किया गया है।
व्यक्तिगत चिंतन में ऐसी एक परिस्थिति पहचानें जहाँ किसी का पद आपकी सुनने की धैर्य-क्षमता बदल देता है। फिर ऐसा ठोस व्यवहार सोचें जो सम्मान बनाए और कौशल, प्रमाण तथा आचरण के विषय में सत्य भी रखे। यह पढ़ने और विचार करने का अभ्यास है, निश्चित दिनों में भीतर परिवर्तन का वादा नहीं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
गीता 5.18 में समदर्शिनः का अर्थ क्या है?
यह सम देखने वालों का वर्णन है। यहाँ सूची के अलग प्राणियों के बीच ज्ञानी की दृष्टि की विशेषता है; अगला श्लोक समता को ब्रह्म से जोड़ता है।
विद्या और विनय साथ क्यों कहे गए हैं?
विद्याविनयसम्पन्ने पहले उदाहरण के ब्राह्मण को दोनों से सम्पन्न बताता है। केवल सामाजिक पद उस व्यक्ति का पूरा वर्णन नहीं रखा गया है।
श्वपाक शब्द का क्या अर्थ है?
शाब्दिक अर्थ कुत्ते का मांस पकाने वाला है और यहाँ यह प्राचीन सामाजिक अवमानना वाली श्रेणी का शब्द है। उसका अर्थ समझाना तिरस्कार या भेदभाव का समर्थन नहीं है।
क्या समदृष्टि का अर्थ हर स्थिति में बिल्कुल समान व्यवहार है?
श्लोक दृष्टि का वर्णन करता है, एक-जैसे कार्यों की पूरी नियमावली नहीं। आधुनिक प्रयोग में समान सम्मान रखते हुए जरूरत, अनुभव और आचरण के अनुसार निर्णय अलग हो सकते हैं।
शंकराचार्य समता को कैसे समझाते हैं?
उनकी अद्वैत व्याख्या का केंद्र एक सम, अविकारी ब्रह्म का दर्शन है, जो शरीरधारी प्राणियों से जुड़े अलग गुणों से प्रभावित नहीं होता।
क्या यह श्लोक हानिकारक व्यवहार स्वीकार करने को कहता है?
यह हर हानिकारक कर्म को समान रूप से स्वीकार्य नहीं बताता। आधुनिक प्रयोग में गरिमा बनाए रखते हुए सीमा तय करना, गलती सुधारना और अपमान रोकना संभव है।