भगवद्गीता 18.63 का अर्थ: पूरा विचार करके निर्णय और कर्म करें

गीता 18.63 का संस्कृत पाठ, विमृश्य और यथेच्छसि का अर्थ, शंकर-रामानुज भाष्य के संकेत तथा अर्जुन के उत्तर तक का प्रसंग सरल हिंदी में पढ़ें।

हिंदू संस्कृति और दर्शनलेख · 9 मिनटRead in English ↗

लेखन और प्रकाशन: Astrogyana

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भगवद्गीता 18.63 का अर्थ क्या है?

कृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि दिए हुए उपदेश पर पूरी तरह विचार करे, फिर अपनी इच्छा के अनुसार कर्म करे। यहाँ चुनने का निर्देश, मनन के निर्देश के बाद आता है। दोनों को साथ पढ़ने पर उपदेश के प्रति विचारपूर्ण उत्तर की बात सामने आती है; क्षणिक इच्छा को ही पर्याप्त मार्गदर्शन नहीं मान लिया जाता।

यह श्लोक अठारहवें अध्याय के अंत के पास, कर्म, ज्ञान, भक्ति और मुक्ति पर जारी संवाद में आता है। इसके अंतिम शब्द अकेले याद रह सकते हैं, लेकिन उनसे पहले के शब्द बताते हैं कि निर्णय से पहले कैसी सावधानी और समझ चाहिए।

संस्कृत श्लोक और सरल भाव-संकेत

इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्याद्गुह्यतरं मया । विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु ॥ १८-६३॥

iti te jñānam ākhyātaṃ guhyād guhyataraṃ mayā / vimṛśyaitad aśeṣeṇa yathecchasi tathā kuru.

सरल भाव-संकेत: कृष्ण कहते हैं कि उन्होंने अर्जुन को यह गहरा ज्ञान बताया है। अर्जुन उस पर पूरा विचार करके अपने समझे हुए निर्णय के अनुसार कर्म करे। यह लेख के लिए लिखा गया अर्थ-संकेत है, किसी आधुनिक अनुवादक का उद्धरण नहीं।

स्रोतों में दिए अध्याय से संस्कृत पाठ मिलाएँ। दूसरी पंक्ति पूरी पढ़ें: विमृश्यैतदशेषेण का संबंध यथेच्छसि तथा कुरु से है। पहला पद-समूह हटा देने पर वह मनन छूट जाता है जिसके बाद कर्म की बात आती है।

वाक्य को जोड़ने वाले पाँच पद-समूह

पाँच पद-समूहों से पढ़ने का अभ्यास; यह पूर्ण व्याकरणिक पदच्छेद नहीं है
पद-समूहसरल अर्थ-संकेतवाक्य में भूमिका
इति ते ज्ञानमाख्यातम्इस प्रकार तुम्हें ज्ञान बताया गयापहले दिए गए उपदेश से संबंध
गुह्याद्गुह्यतरम्गुह्य से भी अधिक गुह्यउपदेश की गहराई का वर्णन
विमृश्यविचार करकेकर्म से पहले मनन
एतदशेषेणइस पर पूरी तरहकेवल चुने हुए अंश पर नहीं, पूरे विषय पर विचार
यथेच्छसि तथा कुरुजैसा चाहते हो, वैसा करोमनन के बाद निर्णय और कर्म

व्याकरण का क्रम अर्थ समझने में मदद करता है। विमृश्य में विचार या परीक्षण कर लेने का भाव है, जिसके बाद कर्म का निर्देश आता है। अशेषेण इस विचार का क्षेत्र पूरे उपदेश तक फैलाता है। केवल पसंद आने वाली एक पंक्ति चुनकर उससे जुड़ी शर्तें छोड़ देना इस पूरेपन को नहीं निभाता।

गुह्य या गहरे ज्ञान की भाषा यहाँ धार्मिक पाठ में उपदेश का स्वरूप बताती है। इससे यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि श्लोक पढ़ने के लिए कोई खरीदा हुआ रहस्य, विशेष सदस्यता या अस्पष्ट तकनीक आवश्यक है। उपलब्ध मूल पाठ, उसका प्रसंग और स्पष्ट नाम वाले भाष्य से शुरुआत करें।

18.63 के बाद भी कृष्ण बोलते हैं

अध्याय 18 के चार पड़ाव; बीच के श्लोक भी मूल पाठ में पढ़ें
श्लोकप्रसंग का संक्षिप्त सार18.63 पढ़ने में उपयोग
18.62कृष्ण अर्जुन को पूरे भाव से ईश्वर की शरण का निर्देश देते हैं।पिछला प्रसंग शरण और आध्यात्मिक साधना का है।
18.63दिए हुए उपदेश पर पूरा विचार करके कर्म करने को कहते हैं।विचार और निर्णय दोनों वाक्य में हैं।
18.64कृष्ण अर्जुन के हित के लिए अपना आगे का वचन सुनने को कहते हैं।संवाद और उपदेश अभी जारी हैं।
18.73अर्जुन अपना मोह और संदेह दूर होने तथा कृष्ण के वचन के अनुसार कर्म करने की बात कहता है।अंत में अर्जुन अपना उत्तर व्यक्त करता है।

इसलिए 18.63 गीता का अंतिम श्लोक नहीं है। यह बातचीत को उदासीन ढंग से समाप्त भी नहीं करता। इसके बाद का उपदेश उसी संवाद का हिस्सा है। अर्जुन का आगे का उत्तर भी महत्वपूर्ण है: वह अपनी बदली हुई समझ बताता है और कर्म का संकल्प व्यक्त करता है।

क्रम से पढ़ने पर दो जल्दबाज निष्कर्षों से बचते हैं। एक केवल चुनने की बात उद्धृत करके पहले का उपदेश छोड़ देता है। दूसरा केवल बाद की आज्ञापालन वाली बात लेकर विचार करने का आमंत्रण भूल जाता है। पाठक दोनों पहलुओं पर ध्यान दे सकता है, बिना यह दावा किए कि एक वाक्य स्वतंत्रता के हर दार्शनिक प्रश्न का अंतिम समाधान है।

मनन के विषय पर दो नामित भाष्य-संकेत

IIT Kanpur पर प्रस्तुत स्वामी गंभीरानंद के अनुवाद में शंकर भाष्य का संकेत दिए हुए शास्त्र और उसके सभी विषयों पर विचार की ओर है। स्वामी आदिदेवानंद के अनुवाद में रामानुज भाष्य कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग के उपदेश तथा साधक की योग्यता से चयन को जोड़ता है।

ये पहचानी हुई व्याख्या-परंपराएँ हैं। तुलना करें कि प्रत्येक में विचार का विषय क्या है। दोनों को मिलाकर ऐसा अनाम दावा न बनाएँ कि हर संप्रदाय श्लोक को बिल्कुल एक तरह समझता है। इनका धार्मिक उद्देश्य भी इन्हें केवल काम जल्दी पूरा करने के सूत्र से अलग संदर्भ देता है।

पसंद, मनन और निर्णय की जिम्मेदारी

पसंद पूछती है, “मुझे क्या आकर्षित करता है?” मनन यह भी पूछ सकता है, “मैंने क्या समझा, क्या छोड़ दिया और इस निर्णय के क्या परिणाम हो सकते हैं?” दूसरे प्रकार के प्रश्न पहले उत्तर की पुष्टि कर सकते हैं, उसे बदल सकते हैं या दिखा सकते हैं कि अभी कोई तथ्य जानना बाकी है।

पाठ-अभ्यास में अपनी प्रतिक्रिया देने की जगह और हर परिणाम की अनदेखी करने की छूट अलग समझें। श्लोक लंबे उपदेश के बाद अर्जुन को संबोधित करता है। वह व्यक्ति की हर इच्छा से निकले हर कर्म को सार्वभौम स्वीकृति नहीं देता। इसी तरह इसे यह कहने के लिए भी न इस्तेमाल करें कि असहमत व्यक्ति ने विचार ही नहीं किया।

दूसरे से सीखने के व्यापक प्रश्न के लिए गीता 4.34 का प्रश्न और अध्ययन वाला लेख पढ़ें। उपदेश ग्रहण करना और उसका अर्थ जाँचना एक ही सीखने की प्रक्रिया के अंग हो सकते हैं।

विचार के बाद कर्म के तीन आधुनिक अभ्यास

Astrogyana के स्वतंत्र अभ्यास; ये श्लोक के ऐतिहासिक प्रसंग या भाष्य के उदाहरण नहीं हैं
आज का काल्पनिक प्रसंगमनन का प्रश्नठोस अगला कदम
सम्मानित व्यक्ति से कोई दावा सुननाकौन-सा प्रमाण दिया है, और कौन-सी बात अभी केवल मान ली गई है?मूल स्रोत पढ़कर अपनी समझ और बचा प्रश्न लिखें।
पढ़ाई का कोई पाठ्यक्रम चुननामेरी रुचि, समय और जरूरी तैयारी में क्या मेल है?पाठ्यक्रम तथा समय-सारणी देखकर चयन का कारण लिखें।
टीम में काम के तरीके पर मतभेदकिन तथ्यों पर सहमति है और कौन-सी धारणा जाँची जा सकती है?छोटा परीक्षण, जिम्मेदार व्यक्ति और समीक्षा का समय तय करें।

इन अभ्यासों में ध्यान से समझने और फिर कर्म करने का क्रम लिया गया है। ये श्लोक के आध्यात्मिक प्रसंग की जगह नहीं लेते और यह गारंटी भी नहीं देते कि विचार करने वाला व्यक्ति हमेशा सफल होगा। सावधानी से किए निर्णय में भी अनिश्चितता रह सकती है।

ध्यान दें कि हर उदाहरण किसी देखे जा सकने वाले कदम पर समाप्त होता है: स्रोत पढ़ना, समय-सारणी जाँचना या परीक्षण तय करना। “मैंने विचार किया” अधिक उपयोगी तब बनता है जब आप बता सकें कि कौन-सी जानकारी देखी और समझ में क्या बदला।

अनंत टालमटोल के बिना छोटा पाठ-अभ्यास

  1. 18.63 पूरा पढ़ें और एक वाक्य में लिखें कि वह किस उपदेश की ओर लौटता है।
  2. 18.62 और 18.64 पढ़ें; देखें कि दोनों ओर संवाद कैसे चलता है।
  3. किसी एक नामित भाष्य को अपनी पहली समझ से मिलाएँ; सहमति और अनिश्चितता अलग लिखें।
  4. आज के किसी निर्णय में वह बाकी जानकारी पहचानें जो उत्तर को वास्तव में बदल सकती है।
  5. एक उचित अगला कदम और उसकी समीक्षा का समय चुनें; वही प्रश्न बिना बदलाव के दोहराते न रहें।

अंतिम दो चरण आज के लिए अभ्यास हैं, संस्कृत का अनुवाद नहीं। मनन का अर्थ असंभव निश्चितता आने तक प्रतीक्षा करना जरूरी नहीं, और कर्म का अर्थ अपना निर्णय कभी न सुधारना भी नहीं है।

आगे कर्म और फल पर गीता 2.47, समत्व पर 2.48 या गीता का पाठ-संग्रह पढ़ें। तुलना करते समय हर श्लोक का अपना प्रश्न भी सामने रखें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

गीता 18.63 का मुख्य संदेश क्या है?

कृष्ण अर्जुन से उपदेश पर पूरी तरह विचार करके अपनी इच्छा के अनुसार कर्म करने को कहते हैं। क्रम मनन को कर्म से जोड़ता है।

यहाँ विमृश्य का क्या अर्थ है?

विमृश्य का अर्थ विचार या परीक्षण करके है। वाक्य में यह कर्म के निर्देश से पहले उपदेश पर मनन रखता है।

क्या यथेच्छसि तथा कुरु हर आवेग को स्वीकृति देता है?

पूरे श्लोक में यह उपदेश पर पूरा विचार करने के बाद आता है। इसे अलग करके मन में आने वाली हर इच्छा की बिना शर्त स्वीकृति नहीं मानना चाहिए।

क्या 18.63 पर कृष्ण का उपदेश समाप्त हो जाता है?

नहीं। 18.64 में वे अर्जुन के हित के लिए आगे का वचन सुनने को कहते हैं, और अध्याय उसके बाद भी चलता है।

अर्जुन बाद में क्या उत्तर देता है?

18.73 में अर्जुन अपना मोह और संदेह दूर होने तथा कृष्ण के वचन के अनुसार कर्म करने की बात कहता है। उस उत्तर को बीच के संवाद सहित पढ़ें।

क्या निर्णय के ये अभ्यास पारंपरिक अनुवाद हैं?

नहीं। ये मनन के बाद कर्म समझाने वाले स्वतंत्र आधुनिक अभ्यास हैं। मूल संस्कृत, नामित भाष्य और आज के प्रयोग को अलग पहचान के साथ दिया गया है।

स्रोत और संदर्भ

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