गीता 12.15 का अर्थ: अनुद्वेग, स्थिरता और दूसरों के प्रति संवेदनशीलता

गीता 12.15 का संस्कृत पाठ, IAST, पद-अर्थ, अध्याय का संदर्भ और शंकर भाष्य पढ़ें। हर्ष-अमर्ष-भय-उद्वेग तथा व्यवहार के स्पष्ट उदाहरण समझें।

ज्योतिष और हिंदू परंपरालेख · 14 मिनटRead in English ↗

लेखन और प्रकाशन: Astrogyana

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भगवद्गीता 12.15 किस गुण का वर्णन करती है?

गीता 12.15 ऐसे भक्त का वर्णन करती है जिससे लोक उद्विग्न नहीं होता, जो लोक से उद्विग्न नहीं होता और जो हर्ष, अमर्ष, भय तथा उद्वेग से मुक्त है। इसमें दूसरों के प्रति संवेदनशीलता और भीतर की स्थिरता साथ हैं। अंत का मुझे प्रिय है वाला कथन इन गुणों को कृष्ण की भक्ति-शिक्षा के भीतर रखता है।

दोनों दिशाएँ साथ पढ़नी चाहिए। केवल अपनी शांति देखने से अपने द्वारा उत्पन्न कष्ट छूट सकता है। केवल सबको खुश करने की कोशिश से व्यवहार हर प्रतिक्रिया पर निर्भर हो सकता है। श्लोक जिस चरित्र का आदर्श रखता है, वह अकेले अलग रहना या सबकी स्वीकृति पाना भर नहीं है।

यह लेख संस्कृत पदों और स्पष्ट रूप से बताए शंकर भाष्य का अनुसरण करता है। उसके बाद सीमित आधुनिक उदाहरण हैं। वे व्यवहार की जाँच में मदद करते हैं; किसी व्यक्ति ने श्लोक की पूर्ण अवस्था पा ली है, इसका प्रमाण नहीं हैं।

संस्कृत पाठ, IAST और मौलिक हिंदी अर्थ

यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः ।
हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स च मे प्रियः ॥ १२-१५॥

yasmān nodvijate loko lokān nodvijate ca yaḥ | harṣāmarṣabhayodvegair mukto yaḥ sa ca me priyaḥ || 12.15 ||

मौलिक अर्थ: जिससे लोक उद्वेग को नहीं पहुँचता, जो लोक से उद्वेग को नहीं पहुँचता और जो हर्ष, अमर्ष, भय तथा उद्विग्नता से मुक्त है—वह भी मुझे प्रिय है।

पाठ की तुलना आईआईटी कानपुर के गीता सुपरसाइट से करें। ऊपर का अर्थ इस लेख के लिए लिखा गया है। व्यक्ति और लोक की दोनों दिशाओं को स्पष्ट रखा गया है; पहले चरण को केवल आराम करने की सामान्य सलाह में नहीं बदला गया।

मुझे का संकेत वक्ता कृष्ण की ओर है। उसे पूरी तरह हटा देने से प्रिय भक्त का यह वर्णन दूसरा कथन बन जाएगा। व्यवहार में रुचि रखने वाला पाठक भी भक्ति का यह संदर्भ पहचान सकता है; उसे केवल सजावट समझकर छोड़ना जरूरी नहीं।

सरलीकरण से पहले पदों का संबंध समझें

आठ पद-समूह और उनके वाक्यगत संबंध
पदअर्थ और संबंध
यस्मात्जिससे; पहले संबंध की दिशा
न उद्विजते लोकःलोक उद्वेग को प्राप्त नहीं होता
लोकात्लोक से; दूसरे संबंध की दिशा
न उद्विजते च यःऔर जो स्वयं उद्वेग को प्राप्त नहीं होता
हर्षप्रिय वस्तु की प्राप्ति पर अंतःकरण का उत्कर्ष
अमर्षअसहिष्णुता या सहन न कर पाने वाला क्षोभ
भय-उद्वेगैःभय और उद्विग्नता सहित; चारों पदों का समूह
मुक्तो यः स च मे प्रियःजो उनसे मुक्त है, वह भी मुझे प्रिय है

यस्मात् और लोकात् में दो दिशाएँ हैं: जिससे और लोक से। दोनों ओर उद्विग्न होने की एक ही क्रिया का निषेध है। वाक्य व्यक्ति के आचरण से जुड़े प्रभाव और संसार के प्रति उसकी प्रतिक्रिया, दोनों को सामने रखता है।

लोकः को यहाँ लोक, संसार या लोगों के रूप में समझ सकते हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि हर मनुष्य की राय का सर्वेक्षण करना है। कथन भक्त के दूसरों से संबंध का गुण बताता है, सर्वसम्मति जुटाने की कोई प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं।

दूसरे चरण के चार शब्दों को एक अस्पष्ट नकारात्मकता शब्द में मिला देना भी ठीक नहीं। हर्ष प्रिय लाभ से, अमर्ष असहिष्णुता से, भय त्रास से और उद्वेग उद्विग्नता से जुड़ता है। उनके भेद से पता चलता है कि विषय केवल सुखद बनाम दुखद भावनाएँ नहीं है।

आसपास के श्लोक अर्थ को संतुलित करते हैं

12.13 से 12.17 तक विचार का क्रम
श्लोकसंबंधित गुण
12.13अद्वेष, मैत्री, करुणा, ममता-अहंकार से दूरी और क्षमा
12.14संतोष, संयम, दृढ़ निश्चय और कृष्ण में अर्पित मन-बुद्धि
12.15दो दिशाओं में अनुद्वेग और हर्ष-अमर्ष-भय-उद्वेग से मुक्ति
12.16अनपेक्षा, शुचिता, दक्षता, उदासीनता और फल-कामना वाले आरंभों का त्याग
12.17हर्ष-द्वेष-शोक-आकांक्षा से स्वतंत्रता और भक्ति

पूर्ववर्ती वर्णन में मैत्री और करुणा हैं। इसलिए अनुद्वेग को दूसरों की परवाह न करने का नाम देना कठिन है। अगले श्लोक में दक्षता भी है; स्थिरता को व्यवहार के काम समझने या करने में अयोग्यता नहीं माना गया।

12.14 में मन और बुद्धि कृष्ण में अर्पित बताए जा चुके हैं। 12.15 उसी भक्त-चित्र को आगे बढ़ाता है। प्रिय होने का बार-बार आता कथन गुणों की एक शृंखला में है, किसी सभा को नियंत्रित करने की अकेली तकनीक नहीं।

दैनिक उपयोग के लिए एक वाक्य निकालने से पहले 12.13 से 12.17 साथ पढ़ें। संदर्भ स्थिरता के साथ करुणा, विवेक, दक्षता और भक्ति को बनाए रखता है। श्लोक को लोकप्रियता या उत्पादकता के नारे जैसा बनाने के लिए इनमें से किसी पक्ष को चुपचाप हटाना अर्थ को छोटा कर देगा।

जिससे लोक उद्विग्न नहीं होता

पहली दिशा दूसरों पर अपने प्रभाव की जाँच कराती है। आधुनिक व्यवहार में इसे अनावश्यक डराने, अपमानित करने और बात बेवजह बढ़ाने से बचने के रूप में सोच सकते हैं। प्रश्न केवल यह नहीं कि मैं शांत हूँ या नहीं, बल्कि यह भी है कि मेरी क्रिया बातचीत में अनावश्यक भय या अशांति तो नहीं जोड़ती।

शांत दिखना अकेले पर्याप्त नहीं। कोई बहुत धीमी आवाज में क्रूर टिप्पणी कर सकता है। दूसरा व्यक्ति महत्वपूर्ण गलती सुधारने के लिए दृढ़ता से बोल सकता है। आवाज की ऊँचाई, चेहरे का भाव और लोकप्रियता, वास्तविक कार्य की जाँच का स्थान नहीं ले सकते।

इसे इस गारंटी में बदलना भी गलती है कि कोई कभी आपत्ति नहीं करेगा। सही सुधार या उचित सीमा किसी को अप्रिय लग सकती है। व्यावहारिक प्रश्न स्पष्टता और संवेदनशीलता से काम करने का है, हर संभव प्रतिक्रिया पर नियंत्रण पाने का नहीं।

यह आधुनिक पाठक के लिए निकाला गया अनुप्रयोग है। इससे यह दावा नहीं किया जा रहा कि संस्कृत में हर विवाद की विस्तृत नीति लिखी है। विशेष परिस्थिति में तथ्य, भूमिका और जिम्मेदारी को भी ध्यान से देखना होगा।

जो लोक से उद्विग्न नहीं होता

दूसरी दिशा घटना, बात और प्रतिक्रिया ग्रहण करने वाले व्यक्ति की ओर लौटती है। इसमें संसार के संबंध में स्थिरता है। यह नहीं कहा गया कि संसार से कठिनाई, असहमति या परिवर्तन गायब हो गए।

चिंतन का अभ्यास करने वाले पाठक के लिए घटना को जानना और बिना जाँच प्रतिक्रिया में बह जाना अलग बातें हैं। सुधार को सुनते ही प्रतिष्ठा की प्रतियोगिता बनाना आवश्यक नहीं। अप्रिय परिणाम की जाँच करने के लिए तुरंत कोई शत्रु गढ़कर दोष देना भी जरूरी नहीं।

श्लोक उच्च आदर्श का वर्णन करता है। उत्तर देने से पहले छोटा विराम उपयोगी अभ्यास हो सकता है, लेकिन उससे चारों नामित अवस्थाओं से पूर्ण मुक्ति सिद्ध नहीं होती। यह भेद रहने पर अभ्यास को समय से पहले सिद्धि का दावा नहीं बनाया जाता।

दोनों दिशाएँ एक-दूसरे की सीमा भी तय करती हैं। अपनी शांति बचाने के लिए हर प्रश्न दबा देना दूसरों की अशांति बढ़ा सकता है। हर असहमति से बचने के लिए सारे विचारपूर्ण निर्णय छोड़ देना स्पष्टता को खो सकता है। दोनों अर्ध एक ही चरित्र के हिस्से हैं।

हर्ष, अमर्ष, भय और उद्वेग का भेद

चार अवस्थाएँ: अर्थ से आधुनिक उदाहरण तक
पदअर्थ का केंद्रकाल्पनिक उदाहरण
हर्षप्रिय लाभ पर प्रबल उत्कर्षप्रशंसा मिलते ही दूसरों की बात सुनना छोड़ देना
अमर्षअसहिष्णुतागलती बताए जाने को अपमान मानकर जवाबी कटाक्ष करना
भयत्रासप्रतिष्ठा घटने की आशंका से तथ्य छिपाना
उद्वेगउद्विग्नताअधूरी जानकारी पर लगातार उत्तेजित घोषणाएँ करना

हर्ष को बहुत जल्दी सरल कर दिया जाता है। शंकर प्रिय वस्तु की प्राप्ति पर अंतःकरण के उत्कर्ष से उसे समझाते हैं। इसलिए श्लोक का प्रश्न केवल अप्रिय प्रतिक्रिया से बचना नहीं है; सुखद लाभ से बँध जाने की स्थिति भी उसके भीतर है।

अमर्ष की व्याख्या असहिष्णुता है। व्यवहार के उदाहरण में वह सुधार या दूसरे के अलग निर्णय को सह न पाने जैसा दिख सकता है। लेकिन उदाहरण के कारण संस्कृत पद को केवल उसी एक आधुनिक परिस्थिति तक सीमित नहीं करना चाहिए।

भय त्रास है और उद्वेग उद्विग्नता। अनुभव में वे साथ आ सकते हैं, फिर भी केवल एक ही शब्द की पुनरावृत्ति नहीं हैं। अलग नाम रखने से यह देखने का अवसर मिलता है कि प्रतिक्रिया को वास्तव में क्या चला रहा है। हर असुविधाजनक अनुभव पर एक ही लेबल न लगाया जाए।

ये पाठ और आचरण की समझ के भेद हैं। श्लोक दूसरों के भीतर की अवस्था का अंक देने वाला मापदंड उपलब्ध नहीं कराता। किसी का दिखाई देता कष्ट उसकी भक्ति की कमी सिद्ध करता है, ऐसी घोषणा के बजाय सावधान आत्म-परीक्षण अधिक उचित उपयोग है।

शंकर भाष्य क्या स्पष्ट करता है?

12.15 के संस्कृत शंकर भाष्य में व्यक्ति का उल्लेख संन्यासी के रूप में स्पष्ट है। लोक के संबंध में संताप और संक्षोभ के अभाव से अनुद्वेग खोला गया है। इसके बाद चारों नामित अवस्थाओं का अलग अर्थ दिया गया है।

हर्ष प्रिय लाभ पर अंतःकरण का उत्कर्ष है, जिसकी प्रबलता समझाने के लिए रोमांच और अश्रुपात जैसे संकेत आते हैं। अमर्ष असहिष्णुता, भय त्रास और उद्वेग उद्विग्नता है। ये भाष्य के पद-अर्थ हैं। नीचे का पुस्तकालय प्रसंग इस लेख का नया उदाहरण है।

अद्वैत का व्यापक संदर्भ भी महत्वपूर्ण है। आसपास की शृंखला में शंकर सम्यग्दर्शन में स्थित संन्यासियों और उस दार्शनिक संदर्भ में भक्ति की चर्चा करते हैं। पूरे प्रसंग को केवल सार्वजनिक छवि सँभालने की पुस्तिका बना देना भाष्य के महत्वपूर्ण हिस्से को छोड़ देगा।

उस संदर्भ को पहचानने का अर्थ यह दावा नहीं कि सभी परंपराएँ हर पद का बिल्कुल समान अर्थ देती हैं। पाठक को स्पष्ट पता होना चाहिए कि कौन-सी व्याख्या चल रही है और कहाँ लेख उस व्याख्या को बताने से आगे आधुनिक अनुप्रयोग दे रहा है।

स्थिरता के साथ सुधार और सीमा भी संभव हैं

अनुद्वेग और आवश्यक स्पष्टता साथ रखें
स्थितिविवेकपूर्ण प्रतिक्रियागलत निष्कर्ष
किसी तथ्य में गलतीस्पष्ट सुधार और जरूरत हो तो क्षमा-याचनासुधार से असुविधा हुई तो सुधार ही गलत है
असहमतिबिना अपमान कारण बतानासबको सहमत करना अनिवार्य है
वास्तविक समस्याजाँचकर उचित कार्रवाई करनाशांति का अर्थ समस्या को न देखना है
हानिकारक व्यवहारसम्मान के साथ सीमा और जवाबदेहीशांत रहने के लिए हर व्यवहार स्वीकार करें

जरूरी बात और उसमें जोड़ी गई अनावश्यक शत्रुता अलग करें। तथ्य का सुधार सीधा हो सकता है; स्पष्ट होने के लिए उसे अपमान की जरूरत नहीं। अस्वीकार में कारण और सीमा कही जा सकती है, बिना तिरस्कार का प्रदर्शन किए।

इसी तरह प्रतिक्रिया सुनना हर आरोप को स्वतः सत्य मान लेना नहीं है। शांत जाँच करके जो प्रमाणित हो उसे स्वीकार सकते हैं और जो अस्पष्ट हो उसे स्पष्ट कह सकते हैं। आदर्श तथ्य से अधिक साफ संबंध बनाने में सहायक होना चाहिए, स्वचालित सहमति का नियम नहीं।

हानि की बात सामने आए तो उसे गंभीरता से सुनना और उसके आधार देखना आवश्यक है। प्रभावित व्यक्ति से बिना उद्वेग दिखे रहने की माँग करना चरित्र पर चिंतन वाले श्लोक का दुरुपयोग होगा। स्थिर प्रतिक्रिया में हानिकारक कार्य रोकना और परिणाम की जिम्मेदारी तय करना भी आ सकता है।

काल्पनिक पुस्तकालय कार्यक्रम का उदाहरण

कल्पना करें कि सामुदायिक पुस्तकालय के कार्यक्रम का आरंभ-समय आयोजक ने गलत घोषित कर दिया। कोई सहभागी सार्वजनिक चर्चा में गलती बताता है। आयोजक पहले संकोच अनुभव करता है और फिर सामने वाले के बोलने के ढंग पर कटाक्ष करने की इच्छा होती है।

काल्पनिक पुस्तकालय कार्यक्रम: चार ठोस निर्णय
घटनाप्रतिक्रिया की दिशा
घोषणा में आरंभ का समय गलत हैपहले सही समय की पुष्टि और स्पष्ट सुधार
कोई सार्वजनिक रूप से गलती बताता हैव्यक्ति पर कटाक्ष के बिना तथ्य स्वीकारना
सुधार के बाद प्रशंसा मिलती हैश्रेय के साथ मदद करने वालों को भी पहचानना
फिर भी किसी को असुविधा रहती हैउसकी बात सुनकर संभव सहायता और सीमाएँ बताना

अधिक सावधान क्रम सही समय की जाँच और जानकारी के सुधार से शुरू होगा। आयोजक हुई असुविधा स्वीकार कर सकता है और वास्तव में उपलब्ध सहायता बता सकता है। हर सहभागी अंत में संतुष्ट ही होगा, ऐसा वादा जरूरी नहीं।

सुधार पर प्रशंसा मिले तो भी विचार खत्म नहीं होता। आयोजक देख सकता है कि प्रशंसा के बाद बची हुई शिकायतों को वह हल्के में तो नहीं लेने लगा। इस तरह उदाहरण में हर्ष भी आता है, साथ ही असहिष्णुता, प्रतिष्ठा घटने का भय और उद्विग्नता भी।

यह प्रसंग काल्पनिक और जानबूझकर सामान्य है। इससे जाँचा जा सकने वाला व्यवहार स्पष्ट होता है, आध्यात्मिक सिद्धि प्रमाणित नहीं होती। इसका अर्थ यह भी नहीं कि व्यक्ति अपनी झेंप की ईमानदार स्वीकृति दबा दे। उपयोगी परिवर्तन अधिक स्पष्ट और कम प्रतिशोधी प्रतिक्रिया की ओर है।

छह चरणों में पाठ और चिंतन

  1. 12.13 से 12.17 साथ पढ़कर भक्ति का संदर्भ पहचानें।
  2. अनुद्वेग की दोनों दिशाएँ अलग पंक्तियों में लिखें।
  3. हाल की एक बातचीत चुनें और उद्देश्य आरोपित करने से पहले दिखने वाले तथ्य लिखें।
  4. पूछें कि अपने शब्द या काम से कौन-सी अनावश्यक अशांति जुड़ी।
  5. देखें कि चार नामित अवस्थाओं में कौन-सी प्रतिक्रिया समझने में मदद करती है; सूची को निदान न बनाएँ।
  6. एक ठोस सुधार, स्वीकृति या सीमा पहचानें जो परिस्थिति अब भी माँगती है।

अभ्यास जानबूझकर छोटा है। वह ध्यान ऐसी बात पर रखता है जिसे देखा और बदला जा सकता है, बिना दूसरों की सारी भावनाओं पर नियंत्रण का दावा किए। दोबारा पाठ पढ़ने पर घटना का वह पक्ष भी दिख सकता है जो पहले छूट गया था।

इसे प्रभावित न दिखने की प्रतियोगिता न बनाएँ। कठिनाई की विचारपूर्ण स्वीकृति कभी-कभी कुछ भी मुझे छू नहीं सकता की घोषणा से अधिक ईमानदार होती है। पाठ का कठिन आदर्श अजेय दिखने के प्रदर्शन के बजाय धैर्यपूर्ण अध्ययन चाहता है।

पूर्ण अध्ययन के लिए संबंधित श्लोक

गीता 12.13 अद्वेष, मैत्री और करुणा को साथ रखती है। गीता 12.16 दक्षता और अनपेक्षा का विस्तार करती है। दोनों के साथ पढ़ने से अनुद्वेग को हर जिम्मेदारी से हट जाने तक सीमित नहीं किया जाता।

गीता 17.15 का वाणी-संयम बातचीत के बाहर की ओर जाने वाले प्रभाव की उपयोगी तुलना है। गीता 2.48 की समता स्थिरता का दूसरा प्रसंग देती है, जिसकी अपनी भाषा और तर्क हैं।

मूल श्लोक, चुना भाष्य और व्यवहार का उदाहरण अलग पहचानते रहें। उद्देश्य भक्ति और चरित्र के चित्र को इतनी स्पष्टता से समझना है कि उस पर ईमानदारी से विचार हो सके और जिन लोगों के साथ व्यवहार किया जाए उनके प्रति संवेदनशीलता बनी रहे।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

गीता 12.15 का मुख्य अर्थ क्या है?

यह ऐसे भक्त का वर्णन है जो लोक को उद्विग्न नहीं करता, लोक से उद्विग्न नहीं होता और हर्ष, अमर्ष, भय तथा उद्वेग से मुक्त है। कृष्ण-भक्ति के संदर्भ में भीतर की स्थिरता और दूसरों का ध्यान साथ आते हैं।

यहाँ अमर्ष का अर्थ क्या है?

शंकर उसे असहिष्णुता कहते हैं। सुधार सहन न कर पाने वाला क्षोभ एक आधुनिक उदाहरण हो सकता है, लेकिन वही पद का एकमात्र उपयोग नहीं है।

क्या श्लोक के अनुसार सबका मुझे पसंद करना जरूरी है?

इसे सार्वभौम स्वीकृति की माँग न बनाएँ। विचारपूर्ण सुधार या सीमा किसी को अप्रिय लग सकती है। व्यवहारगत प्रश्न अपनी क्रिया और प्रतिक्रिया का है, सबकी प्रतिक्रिया पर नियंत्रण का नहीं।

क्या अनुद्वेग का अर्थ समस्या अनदेखी करना है?

ऐसा व्यावहारिक निष्कर्ष नहीं निकलता। आसपास के गुणों में करुणा और दक्षता भी हैं। स्पष्ट जाँच, सुधार और उचित सीमा स्थिरता के साथ संभव हैं।

भय के साथ हर्ष क्यों कहा गया है?

हर्ष प्रिय लाभ पर उत्कर्ष से जुड़ता है। वर्णन अनुकूल घटनाओं की आसक्ति भी देखता है, केवल प्रतिकूल भावनाओं की सूची नहीं देता।

क्या पुस्तकालय वाला उदाहरण मूल शास्त्र में है?

नहीं। वह चिंतन के लिए रचा गया काल्पनिक उदाहरण है। संस्कृत श्लोक और शंकर भाष्य अलग बताए गए हैं, और उदाहरण से आध्यात्मिक सिद्धि का दावा नहीं किया गया।

स्रोत और संदर्भ

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