विष्णु सहस्रनाम क्या है?
विष्णु सहस्रनाम भगवान विष्णु के हजार नामों की स्तुति है, जिसे महाभारत के अनुशासन पर्व में भीष्म युधिष्ठिर को सुनाते हैं। नीचे पूरे 107 नाम-श्लोक संस्कृत, रोमन लिप्यंतरण और मौलिक हिंदी भावार्थ सहित हैं। साथ में चुना आरंभिक ध्यान, संवाद, वनमाली प्रार्थना और फलश्रुति के 22 श्लोक दिए हैं। नामावली नामों को अलग-अलग नमस्कार में रखती है; उसका पाठरूप स्तोत्र से भिन्न है।
- मूल भाषा: संस्कृत
- मुख्य स्तोत्र: 107 श्लोक
- यहाँ पूरा पाठ-क्रम: 144 पद
- रोमन पंक्ति: IAST लिप्यंतरण
यह स्तुति एक ही इच्छा को बार-बार कहने का क्रम नहीं है। इसमें जगत और उसका आधार, प्राण और साक्षी, उदारता और संयम, अवतारों की परिचित कथाएँ तथा रूप से परे वर्णन साथ आते हैं। नारायण, वासुदेव, गोविंद और हरि जैसे नाम दार्शनिक विशेषणों के बीच लौटते हैं। पाठक विष्णु को अनेक संबंधों में स्मरण करता है।
संवाद इस अर्थ को खोलता है। युधिष्ठिर परम आश्रय, उपासना, श्रेष्ठ धर्म और जन्म के बंधन से मुक्ति पूछते हैं। भीष्म भक्तिभाव में उत्तर देते हैं। इसलिए सहस्रनाम का लक्ष्य हर नाम से कोई अलग भौतिक परिणाम निकालना नहीं, बल्कि शरण, स्मरण और आध्यात्मिक समझ की दिशा बनाना है।
कौन-सा संपूर्ण संस्करण यहाँ दिया है?
यह पाठ संस्कृत डॉक्यूमेंट्स में उपलब्ध महाभारत-रूप वाले विष्णु सहस्रनाम को आधार बनाता है। मुख्य श्लोकों की तुलना संस्कृत विकिस्रोत के पाठ से की गई है। यहाँ प्रत्येक खंड की संख्या अलग है: संवाद 1 और नाम-श्लोक 1 अलग पद हैं। प्रचलित शांताकारं ध्यान को पाठ की भूमिका के रूप में अलग रखा गया है; उसकी गिनती हजार नामों में नहीं होती।
यहाँ संपूर्ण पाठ से आशय चुने गए 107 नाम-श्लोक, संवाद के सभी तेरह श्लोक, वनमाली प्रार्थना और फलश्रुति के बाईस श्लोक हैं। हर मंदिर-पुस्तिका के सभी परिशिष्ट इससे अभिप्रेत नहीं हैं। औपचारिक न्यास, अतिरिक्त ध्यान और बाद की प्रार्थनाएँ अलग पाठ-पद्धतियों का हिस्सा हो सकती हैं।
| खंड | पदों की संख्या | भूमिका |
|---|---|---|
| शांताकारं ध्यान | 1 | ध्यान के लिए प्रचलित विष्णु-छवि |
| संवाद | 13 | कथन, युधिष्ठिर के प्रश्न और भीष्म का उत्तर |
| नामस्तोत्र | 107 | विश्वं से सर्वप्रहरणायुध तक हजार नामों का क्रम |
| वनमाली प्रार्थना | 1 | नाम-गणना के बाहर रक्षा की समापन प्रार्थना |
| फलश्रुति | 22 | सुनने, पाठ करने और भक्ति के फल की पारंपरिक स्तुति |
हिंदी अर्थ प्रत्येक पद का संक्षिप्त भावार्थ है। वह किसी एक आचार्य की विस्तृत टीका का विकल्प नहीं है। एक नाम की अनेक पारंपरिक व्युत्पत्तियाँ हो सकती हैं। पाठ को समझने के लिए संक्षिप्त भावार्थ उपयोगी है, पर उसे सभी व्याख्याओं का अंतिम निर्णय न मानें। अणु-बृहत् या चल-अचल जैसे विरोधी नामों में दोनों शब्दों को साथ पढ़ना विशेष उपयोगी है।
आरंभिक ध्यान और महाभारत का संवाद
ध्यान में विष्णु का परिचित रूप आता है। इसके बाद संवाद स्तोत्र के वक्ता और प्रयोजन को बताता है। संवाद 1 कथावाचक का कथन है; 2–3 युधिष्ठिर के प्रश्न हैं; 4–13 भीष्म का उत्तर है। सीखते समय संस्कृत के बाद हिंदी अर्थ पढ़ें। निरंतर पाठ में संस्कृत पंक्तियाँ पढ़ी जाती हैं; भावार्थ को श्लोक की तरह गाने की आवश्यकता नहीं।
आरंभिक ध्यान
आरंभिक ध्यान
शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं
विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम् ।
लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं
वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम् ॥śāntākāraṃ bhujagaśayanaṃ padmanābhaṃ sureśaṃ
viśvādhāraṃ gaganasadṛśaṃ meghavarṇaṃ śubhāṅgam |
lakṣmīkāntaṃ kamalanayanaṃ yogibhirdhyānagamyaṃ
vande viṣṇuṃ bhavabhayaharaṃ sarvalokaikanātham ||भावार्थ: मैं शांत रूप वाले, सर्प पर शयन करने वाले, पद्मनाभ विष्णु को नमन करता हूँ। वे देवों के स्वामी, विश्व के आधार, आकाश जैसे व्यापक और मेघवर्ण हैं। लक्ष्मीप्रिय, कमलनेत्र और योगियों के ध्यानगम्य प्रभु संसार-भय हरने वाले तथा सभी लोकों के नाथ हैं।
युधिष्ठिर और भीष्म का संवाद
संवाद 1
श्रुत्वा धर्मानशेषेण पावनानि च सर्वशः ।
युधिष्ठिरः शान्तनवं पुनरेवाभ्यभाषत ॥śrutvā dharmānaśeṣeṇa pāvanāni ca sarvaśaḥ |
yudhiṣṭhiraḥ śāntanavaṃ punarevābhyabhāṣata ||भावार्थ: धर्म और पावन विषयों को सुनकर युधिष्ठिर शंतनुपुत्र भीष्म से फिर प्रश्न करते हैं। कथावाचक का यह श्लोक आगे के प्रश्नों को चल रहे संवाद में रखता है।
संवाद 2
किमेकं दैवतं लोके किं वाप्येकं परायणम् ।
स्तुवन्तः कं कमर्चन्तः प्राप्नुयुर्मानवाः शुभम् ॥kimekaṃ daivataṃ loke kiṃ vāpyekaṃ parāyaṇam |
stuvantaḥ kaṃ kamarcantaḥ prāpnuyurmānavāḥ śubham ||भावार्थ: युधिष्ठिर पूछते हैं: जगत में एक परम देवता और परम आश्रय कौन है? किसकी स्तुति तथा पूजा से मनुष्य शुभ की ओर बढ़ते हैं? प्रश्न उपासना और जीवन की दिशा से जुड़े हैं।
संवाद 3
को धर्मः सर्वधर्माणां भवतः परमो मतः ।
किं जपन्मुच्यते जन्तुर्जन्मसंसारबन्धनात् ॥ko dharmaḥ sarvadharmāṇāṃ bhavataḥ paramo mataḥ |
kiṃ japanmucyate janturjanmasaṃsārabandhanāt ||भावार्थ: वे पूछते हैं कि सभी धर्मों में भीष्म किसे श्रेष्ठ मानते हैं और किसका जप जन्म-संसार के बंधन से मुक्ति देता है। स्तोत्र का परिचय मोक्ष संबंधी इस प्रश्न में है।
संवाद 4
जगत्प्रभुं देवदेवमनन्तं पुरुषोत्तमम् ।
स्तुवन् नामसहस्रेण पुरुषः सततोत्थितः ॥jagatprabhuṃ devadevamanantaṃ puruṣottamam |
stuvan nāmasahasreṇa puruṣaḥ satatotthitaḥ ||भावार्थ: भीष्म उत्तर में जगत के प्रभु, देवों के देव, अनंत पुरुषोत्तम की सहस्र नामों से निरंतर स्तुति कहते हैं। यह भाव अगले श्लोकों में आगे बढ़ता है।
संवाद 5
तमेव चार्चयन्नित्यं भक्त्या पुरुषमव्ययम् ।
ध्यायन् स्तुवन् नमस्यंश्च यजमानस्तमेव च ॥tameva cārcayannityaṃ bhaktyā puruṣamavyayam |
dhyāyan stuvan namasyaṃśca yajamānastameva ca ||भावार्थ: अविनाशी पुरुष की भक्तिपूर्वक नित्य पूजा, ध्यान, स्तुति, नमस्कार और यजन का वर्णन है। स्मरण के अनेक रूप साथ आते हैं; बात केवल शब्द दोहराने की नहीं है।
संवाद 6
अनादिनिधनं विष्णुं सर्वलोकमहेश्वरम् ।
लोकाध्यक्षं स्तुवन्नित्यं सर्वदुःखातिगो भवेत् ॥anādinidhanaṃ viṣṇuṃ sarvalokamaheśvaram |
lokādhyakṣaṃ stuvannityaṃ sarvaduḥkhātigo bhavet ||भावार्थ: आदि और अंत से रहित विष्णु, सभी लोकों के महेश्वर तथा अध्यक्ष की स्तुति दुःख से पार होने से जोड़ी गई है। यह भीष्म के उपदेश की आध्यात्मिक आश्रय-भाषा है।
संवाद 7
ब्रह्मण्यं सर्वधर्मज्ञं लोकानां कीर्तिवर्धनम् ।
लोकनाथं महद्भूतं सर्वभूतभवोद्भवम् ॥brahmaṇyaṃ sarvadharmajñaṃ lokānāṃ kīrtivardhanam |
lokanāthaṃ mahadbhūtaṃ sarvabhūtabhavodbhavam ||भावार्थ: ब्रह्मण्य, सर्वधर्मज्ञ, लोकों की कीर्ति बढ़ाने वाले तथा लोकनाथ की स्तुति है। महद्भूत और सभी प्राणियों की उत्पत्ति का आधार भी उसी वर्णन में आता है।
संवाद 8
एष मे सर्वधर्माणां धर्मोऽधिकतमो मतः ।
यद्भक्त्या पुण्डरीकाक्षं स्तवैरर्चेन्नरः सदा ॥eṣa me sarvadharmāṇāṃ dharmo'dhikatamo mataḥ |
yadbhaktyā puṇḍarīkākṣaṃ stavairarcennaraḥ sadā ||भावार्थ: भीष्म अपना मत कहते हैं: भक्तिपूर्वक पुण्डरीकाक्ष की स्तुति और पूजा को वे श्रेष्ठ धर्म मानते हैं। वक्ता का यह मत संवाद के वैष्णव भाव में पढ़ा जाता है।
संवाद 9
परमं यो महत्तेजः परमं यो महत्तपः ।
परमं यो महद्ब्रह्म परमं यः परायणम् ॥paramaṃ yo mahattejaḥ paramaṃ yo mahattapaḥ |
paramaṃ yo mahadbrahma paramaṃ yaḥ parāyaṇam ||भावार्थ: उसी प्रभु को परम तेज, परम तप, परम ब्रह्म और परम आश्रय कहा गया है। प्रकाश, साधना, सत्य तथा शरण के चार भाव एक स्तुति में मिलते हैं।
संवाद 10
पवित्राणां पवित्रं यो मङ्गलानां च मङ्गलम् ।
दैवतं देवतानां च भूतानां योऽव्ययः पिता ॥pavitrāṇāṃ pavitraṃ yo maṅgalānāṃ ca maṅgalam |
daivataṃ devatānāṃ ca bhūtānāṃ yo'vyayaḥ pitā ||भावार्थ: पवित्रों में पवित्र, मंगलों में मंगल, देवताओं के देव और भूतों के अविनाशी पिता का स्मरण है। यह गुणों की उत्कट स्तुति है।
संवाद 11
यतः सर्वाणि भूतानि भवन्त्यादियुगागमे ।
यस्मिंश्च प्रलयं यान्ति पुनरेव युगक्षये ॥yataḥ sarvāṇi bhūtāni bhavantyādiyugāgame |
yasmiṃśca pralayaṃ yānti punareva yugakṣaye ||भावार्थ: युग के आरंभ में सभी प्राणी इसी आधार से उत्पन्न होते और युगांत में उसी में लीन होते हैं। सृष्टि तथा प्रलय नामस्तुति का विश्व-संदर्भ बनाते हैं।
संवाद 12
तस्य लोकप्रधानस्य जगन्नाथस्य भूपते ।
विष्णोर्नामसहस्रं मे शृणु पापभयापहम् ॥tasya lokapradhānasya jagannāthasya bhūpate |
viṣṇornāmasahasraṃ me śṛṇu pāpabhayāpaham ||भावार्थ: भीष्म राजा को जगन्नाथ विष्णु के सहस्र नाम सुनने के लिए कहते हैं। उन्हें पाप और भय को हरने वाला बताया गया है। संवाद अब वास्तविक नामस्तोत्र की ओर बढ़ता है।
संवाद 13
यानि नामानि गौणानि विख्यातानि महात्मनः ।
ऋषिभिः परिगीतानि तानि वक्ष्यामि भूतये ॥yāni nāmāni gauṇāni vikhyātāni mahātmanaḥ |
ṛṣibhiḥ parigītāni tāni vakṣyāmi bhūtaye ||भावार्थ: वे महात्मा के गुणों से जुड़े प्रसिद्ध नाम, जिन्हें ऋषियों ने गाया है, कल्याण के लिए कहेंगे। गौणानि गुणसूचक नामों का संकेत है, हजार अलग व्यक्तियों का नहीं।
संपूर्ण विष्णु सहस्रनाम: नाम-श्लोक 1–107
मुख्य नामस्तोत्र के संपूर्ण पाठ के लिए नीचे के 107 श्लोक क्रम से पढ़ें। समूहों के लिंक अध्ययन के पड़ाव हैं, अलग-अलग सहस्रनाम नहीं। प्रत्येक कार्ड में संस्कृत, रोमन पाठ और हिंदी भावार्थ साथ हैं। कठिन संयुक्ताक्षर सीखते समय रुकें; किसी रिकॉर्डिंग की गति पकड़ने से पहले शब्दों को पहचानें।
नाम-श्लोक 1–20
नाम-श्लोक 1
विश्वं विष्णुर्वषट्कारो भूतभव्यभवत्प्रभुः ।
भूतकृद्भूतभृद्भावो भूतात्मा भूतभावनः ॥viśvaṃ viṣṇurvaṣaṭkāro bhūtabhavyabhavatprabhuḥ |
bhūtakṛdbhūtabhṛdbhāvo bhūtātmā bhūtabhāvanaḥ ||भावार्थ: आरंभ में विश्व, उसमें व्याप्त सत्ता और यज्ञ की पवित्र वषट्-ध्वनि विष्णु के नाम बनते हैं। वे भूत, भविष्य और वर्तमान के प्रभु तथा प्राणियों के उत्पत्ति-कारण, आधार, अंतरात्मा और पोषक कहे गए हैं।
नाम-श्लोक 2
पूतात्मा परमात्मा च मुक्तानां परमा गतिः ।
अव्ययः पुरुषः साक्षी क्षेत्रज्ञोऽक्षर एव च ॥pūtātmā paramātmā ca muktānāṃ paramā gatiḥ |
avyayaḥ puruṣaḥ sākṣī kṣetrajño'kṣara eva ca ||भावार्थ: यहाँ पवित्र आत्मा, परमात्मा और मुक्त जनों की परम गति का स्मरण है। आगे अविनाशी पुरुष, अनुभव के साक्षी और क्षेत्र को जानने वाली चेतना की स्तुति है, जो बदलते रूपों के साथ नष्ट नहीं होती।
नाम-श्लोक 3
योगो योगविदां नेता प्रधानपुरुषेश्वरः ।
नारसिंहवपुः श्रीमान् केशवः पुरुषोत्तमः ॥yogo yogavidāṃ netā pradhānapuruṣeśvaraḥ |
nārasiṃhavapuḥ śrīmān keśavaḥ puruṣottamaḥ ||भावार्थ: विष्णु को योग का स्वरूप और योग जानने वालों का नेता कहा गया है। प्रकृति और पुरुष पर प्रभुता के साथ नरसिंह रूप, श्री का संबंध, केशव और पुरुषोत्तम नाम आते हैं। दर्शन और अवतार-स्मरण यहाँ साथ हैं।
नाम-श्लोक 4
सर्वः शर्वः शिवः स्थाणुर्भूतादिर्निधिरव्ययः ।
सम्भवो भावनो भर्ता प्रभवः प्रभुरीश्वरः ॥sarvaḥ śarvaḥ śivaḥ sthāṇurbhūtādirnidhiravyayaḥ |
sambhavo bhāvano bhartā prabhavaḥ prabhurīśvaraḥ ||भावार्थ: सर्वव्यापकता, संहार, कल्याण और स्थिरता के नाम एक साथ आते हैं। प्राणियों के आरंभ और अविनाशी आधार के रूप में उनकी स्तुति है। इस विष्णु-स्तोत्र में शर्व और शिव भी विशेषण-रूप नाम हैं।
नाम-श्लोक 5
स्वयम्भूः शम्भुरादित्यः पुष्कराक्षो महास्वनः ।
अनादिनिधनो धाता विधाता धातुरुत्तमः ॥svayambhūḥ śambhurādityaḥ puṣkarākṣo mahāsvanaḥ |
anādinidhano dhātā vidhātā dhāturuttamaḥ ||भावार्थ: स्वयंभू सत्ता और कल्याणदाता का स्मरण सूर्य की छवि, कमल जैसे नेत्र और महान ध्वनि के साथ है। आरंभ और अंत से रहित धाता-विधाता सभी के धारण और व्यवस्था के आधार के रूप में आते हैं।
नाम-श्लोक 6
अप्रमेयो हृषीकेशः पद्मनाभोऽमरप्रभुः ।
विश्वकर्मा मनुस्त्वष्टा स्थविष्ठः स्थविरो ध्रुवः ॥aprameyo hṛṣīkeśaḥ padmanābho'maraprabhuḥ |
viśvakarmā manustvaṣṭā sthaviṣṭhaḥ sthaviro dhruvaḥ ||भावार्थ: सामान्य माप से परे विष्णु इंद्रियों के स्वामी, पद्मनाभ और देवों के प्रभु हैं। विश्व की रचना, मनन और रूप-निर्माण की छवियाँ उनके विशाल, प्राचीन और स्थिर आधार से जुड़ती हैं।
नाम-श्लोक 7
अग्राह्यः शाश्वतः कृष्णो लोहिताक्षः प्रतर्दनः ।
प्रभूतस्त्रिककुब्धाम पवित्रं मङ्गलं परम् ॥agrāhyaḥ śāśvataḥ kṛṣṇo lohitākṣaḥ pratardanaḥ |
prabhūtastrikakubdhāma pavitraṃ maṅgalaṃ param ||भावार्थ: इंद्रियों से पकड़ में न आने वाली शाश्वत सत्ता का स्मरण है। कृष्ण, लोहिताक्ष और संहार की शक्ति के साथ तीनों दिशात्मक लोकों का आश्रय, पवित्रता और परम मंगल की स्तुति मिलती है।
नाम-श्लोक 8
ईशानः प्राणदः प्राणो ज्येष्ठः श्रेष्ठः प्रजापतिः ।
हिरण्यगर्भो भूगर्भो माधवो मधुसूदनः ॥īśānaḥ prāṇadaḥ prāṇo jyeṣṭhaḥ śreṣṭhaḥ prajāpatiḥ |
hiraṇyagarbho bhūgarbho mādhavo madhusūdanaḥ ||भावार्थ: जीवन देने वाले और प्राणस्वरूप प्रभु को ज्येष्ठ, श्रेष्ठ तथा प्रजापति कहा गया है। हिरण्यगर्भ और भूगर्भ की सृष्टि-छवियों के बाद माधव तथा मधुसूदन नाम आते हैं, जो श्री और मधु-वध की परंपरा याद दिलाते हैं।
नाम-श्लोक 9
ईश्वरो विक्रमी धन्वी मेधावी विक्रमः क्रमः ।
अनुत्तमो दुराधर्षः कृतज्ञः कृतिरात्मवान् ॥īśvaro vikramī dhanvī medhāvī vikramaḥ kramaḥ |
anuttamo durādharṣaḥ kṛtajñaḥ kṛtirātmavān ||भावार्थ: प्रभुता और साहसी गति के साथ धनुष, मेधा और क्रम का उल्लेख है। अनुत्तम तथा दुराधर्ष प्रभु कर्म को जानते हैं। कृति और आत्मवान नाम पूर्णता तथा अपने स्वरूप में स्थित रहने का भाव प्रकट करते हैं।
नाम-श्लोक 10
सुरेशः शरणं शर्म विश्वरेताः प्रजाभवः ।
अहः संवत्सरो व्यालः प्रत्ययः सर्वदर्शनः ॥sureśaḥ śaraṇaṃ śarma viśvaretāḥ prajābhavaḥ |
ahaḥ saṃvatsaro vyālaḥ pratyayaḥ sarvadarśanaḥ ||भावार्थ: देवों के स्वामी, शरण और सुखस्वरूप का स्मरण विश्व के बीज और प्रजा के उत्पत्ति-कारण के साथ होता है। दिन और वर्ष से समय की छवि आती है; अंत में अगम्यता, चेतना और सर्वदृष्टि की स्तुति है।
नाम-श्लोक 11
अजः सर्वेश्वरः सिद्धः सिद्धिः सर्वादिरच्युतः ।
वृषाकपिरमेयात्मा सर्वयोगविनिःसृतः ॥ajaḥ sarveśvaraḥ siddhaḥ siddhiḥ sarvādiracyutaḥ |
vṛṣākapirameyātmā sarvayogaviniḥsṛtaḥ ||भावार्थ: अजन्मा प्रभुता, सिद्ध स्वरूप और समस्त जगत के आदि कारण की स्तुति है। अच्युत का भाव अपने स्वरूप से न गिरने का है। वृषाकपि की व्याख्याएँ परंपराओं में भिन्न हैं; आगे अमेय आत्मा और बंधनातीतता आती है।
नाम-श्लोक 12
वसुर्वसुमनाः सत्यः समात्माऽसम्मितः समः ।
अमोघः पुण्डरीकाक्षो वृषकर्मा वृषाकृतिः ॥vasurvasumanāḥ satyaḥ samātmā'sammitaḥ samaḥ |
amoghaḥ puṇḍarīkākṣo vṛṣakarmā vṛṣākṛtiḥ ||भावार्थ: वास करने वाली सत्ता, उदार मन, सत्य और समान आत्मभाव पहले आते हैं। इस पाठ में असम्मित का भाव माप से परे है। कमलनेत्र तथा धर्म-संबंधी कर्म और रूप निष्पक्ष, मंगलमय आचरण की छवि बनाते हैं।
नाम-श्लोक 13
रुद्रो बहुशिरा बभ्रुर्विश्वयोनिः शुचिश्रवाः ।
अमृतः शाश्वतस्थाणुर्वरारोहो महातपाः ॥rudro bahuśirā babhrurviśvayoniḥ śuciśravāḥ |
amṛtaḥ śāśvatasthāṇurvarāroho mahātapāḥ ||भावार्थ: रुद्र-संबंधी शक्ति, अनेक सिर और विश्व को धारण करने का स्मरण पवित्र श्रवण के साथ है। अमृतता, शाश्वत स्थिरता, उत्तम आश्रय और महान तप उस सत्ता की व्यापकता और ध्यानयोग्यता बताते हैं।
नाम-श्लोक 14
सर्वगः सर्वविद्भानुर्विष्वक्सेनो जनार्दनः ।
वेदो वेदविदव्यङ्गो वेदाङ्गो वेदवित् कविः ॥sarvagaḥ sarvavidbhānurviṣvakseno janārdanaḥ |
vedo vedavidavyaṅgo vedāṅgo vedavit kaviḥ ||भावार्थ: सर्वगत ज्ञान और प्रकाश के बाद विष्वक्सेन तथा जनार्दन नाम आते हैं। वेद, वेद का ज्ञान, उसके अंग और कवि की दूरदृष्टि उसी स्तुति में जुड़ते हैं। ज्ञान का स्वरूप यहाँ केवल शब्द याद करने से व्यापक है।
नाम-श्लोक 15
लोकाध्यक्षः सुराध्यक्षो धर्माध्यक्षः कृताकृतः ।
चतुरात्मा चतुर्व्यूहश्चतुर्दंष्ट्रश्चतुर्भुजः ॥lokādhyakṣaḥ surādhyakṣo dharmādhyakṣaḥ kṛtākṛtaḥ |
caturātmā caturvyūhaścaturdaṃṣṭraścaturbhujaḥ ||भावार्थ: लोक, देव और धर्म के अध्यक्ष की स्तुति कारण और कार्य के साथ है। चार आत्मरूप, चार व्यूह, चार दंत और चार भुजाएँ अनेक अभिव्यक्तियों की याद दिलाती हैं। बार-बार आने वाला चार यहाँ धार्मिक रूपक है।
नाम-श्लोक 16
भ्राजिष्णुर्भोजनं भोक्ता सहिष्णुर्जगदादिजः ।
अनघो विजयो जेता विश्वयोनिः पुनर्वसुः ॥bhrājiṣṇurbhojanaṃ bhoktā sahiṣṇurjagadādijaḥ |
anagho vijayo jetā viśvayoniḥ punarvasuḥ ||भावार्थ: प्रकाश, भोजन और भोक्ता के नाम दाता, अर्पण और ग्रहण के संबंध को दिखाते हैं। सहनशीलता तथा जगत के आरंभ के बाद निष्पापता, विजय और प्राणियों में फिर-फिर निवास करने की छवि आती है।
नाम-श्लोक 17
उपेन्द्रो वामनः प्रांशुरमोघः शुचिरूर्जितः ।
अतीन्द्रः सङ्ग्रहः सर्गो धृतात्मा नियमो यमः ॥upendro vāmanaḥ prāṃśuramoghaḥ śucirūrjitaḥ |
atīndraḥ saṅgrahaḥ sargo dhṛtātmā niyamo yamaḥ ||भावार्थ: उपेंद्र और वामन छोटे रूप से व्यापक होने वाले अवतार का स्मरण कराते हैं। शुद्धता और बल के साथ संग्रह, सृष्टि तथा धृत आत्मस्वरूप आते हैं। नियम और यम व्यवस्था तथा संयम की छवियाँ हैं।
नाम-श्लोक 18
वेद्यो वैद्यः सदायोगी वीरहा माधवो मधुः ।
अतीन्द्रियो महामायो महोत्साहो महाबलः ॥vedyo vaidyaḥ sadāyogī vīrahā mādhavo madhuḥ |
atīndriyo mahāmāyo mahotsāho mahābalaḥ ||भावार्थ: जानने योग्य सत्ता ज्ञाता और सदा योग में स्थित भी है। वीर-विजय, माधव और मधु की मधुरता के बाद इंद्रियातीत स्वरूप, अद्भुत माया, महान उत्साह और महाबल की स्तुति आती है।
नाम-श्लोक 19
महाबुद्धिर्महावीर्यो महाशक्तिर्महाद्युतिः ।
अनिर्देश्यवपुः श्रीमानमेयात्मा महाद्रिधृक् ॥mahābuddhirmahāvīryo mahāśaktirmahādyutiḥ |
anirdeśyavapuḥ śrīmānameyātmā mahādridhṛk ||भावार्थ: महान बुद्धि, वीर्य, शक्ति और ज्योति साथ-साथ बढ़ाकर कही गई हैं। जिसका रूप पूरी तरह संकेतित नहीं किया जा सकता, वह श्री से युक्त भी है। अमेय आत्मा और पर्वतधारण दार्शनिक भाव को अवतार-कर्म से जोड़ते हैं।
नाम-श्लोक 20
महेष्वासो महीभर्ता श्रीनिवासः सतां गतिः ।
अनिरुद्धः सुरानन्दो गोविन्दो गोविदां पतिः ॥maheṣvāso mahībhartā śrīnivāsaḥ satāṃ gatiḥ |
aniruddhaḥ surānando govindo govidāṃ patiḥ ||भावार्थ: महान धनुष, पृथ्वी का धारण और श्री का निवास सज्जनों की गति के साथ आते हैं। अनिरुद्ध स्वरूप देवों के आनंद से जुड़ता है। गोविंद और गोविदांपति में गो शब्द की अनेक पारंपरिक व्याख्याएँ संभव हैं।
नाम-श्लोक 21–40
नाम-श्लोक 21
मरीचिर्दमनो हंसः सुपर्णो भुजगोत्तमः ।
हिरण्यनाभः सुतपाः पद्मनाभः प्रजापतिः ॥marīcirdamano haṃsaḥ suparṇo bhujagottamaḥ |
hiraṇyanābhaḥ sutapāḥ padmanābhaḥ prajāpatiḥ ||भावार्थ: किरण, संयम, हंस, सुंदर पंखों वाला रूप और श्रेष्ठ सर्प की छवियाँ एक क्रम में आती हैं। हिरण्यनाभ, तप, पद्मनाभ और प्रजापति नाम फिर सृष्टि और उसके आधार की ओर ध्यान ले जाते हैं।
नाम-श्लोक 22
अमृत्युः सर्वदृक् सिंहः सन्धाता सन्धिमान् स्थिरः ।
अजो दुर्मर्षणः शास्ता विश्रुतात्मा सुरारिहा ॥amṛtyuḥ sarvadṛk siṃhaḥ sandhātā sandhimān sthiraḥ |
ajo durmarṣaṇaḥ śāstā viśrutātmā surārihā ||भावार्थ: मृत्यु से परे स्वरूप और सर्वदृष्टि सिंह की शक्ति के साथ हैं। संबंध बनाने और धारण करने वाले स्थिर, अजन्मा प्रभु आगे अजेय शिक्षक, प्रसिद्ध आत्मस्वरूप और देव-विरोधियों के विनाशक कहे गए हैं।
नाम-श्लोक 23
गुरुर्गुरुतमो धाम सत्यः सत्यपराक्रमः ।
निमिषोऽनिमिषः स्रग्वी वाचस्पतिरुदारधीः ॥gururgurutamo dhāma satyaḥ satyaparākramaḥ |
nimiṣo'nimiṣaḥ sragvī vācaspatirudāradhīḥ ||भावार्थ: गुरु और गुरुतम को प्रकाशमय आश्रय, सत्य और सत्यपराक्रम के रूप में याद किया गया है। निमिष और अनिमिष के साथ माला, वाणी का अधिपत्य तथा उदार बुद्धि आती है। रूपों से मार्गदर्शन का भाव खुलता है।
नाम-श्लोक 24
अग्रणीर्ग्रामणीः श्रीमान् न्यायो नेता समीरणः ।
सहस्रमूर्धा विश्वात्मा सहस्राक्षः सहस्रपात् ॥agraṇīrgrāmaṇīḥ śrīmān nyāyo netā samīraṇaḥ |
sahasramūrdhā viśvātmā sahasrākṣaḥ sahasrapāt ||भावार्थ: अग्रणी और समूह के नेता के साथ श्री, न्याय तथा वायु जैसी गति का स्मरण है। सहस्र सिर, आँखें और पाँव विश्वात्मा का व्यापक रूपक बनाते हैं; यह साधारण मानव-शरीर की गिनती नहीं है।
नाम-श्लोक 25
आवर्तनो निवृत्तात्मा संवृतः सम्प्रमर्दनः ।
अहः संवर्तको वह्निरनिलो धरणीधरः ॥āvartano nivṛttātmā saṃvṛtaḥ sampramardanaḥ |
ahaḥ saṃvartako vahniranilo dharaṇīdharaḥ ||भावार्थ: आवर्तन, निवृत्ति और आवरण के भाव साथ आते हैं। संप्रमर्दन, दिन के प्रवर्तन, अग्नि और वायु की छवियों के बाद पृथ्वी धारण करने वाले प्रभु का स्मरण है। परिवर्तन और स्थायी आधार एक स्तुति में मिलते हैं।
नाम-श्लोक 26
सुप्रसादः प्रसन्नात्मा विश्वधृग्विश्वभुग्विभुः ।
सत्कर्ता सत्कृतः साधुर्जह्नुर्नारायणो नरः ॥suprasādaḥ prasannātmā viśvadhṛgviśvabhugvibhuḥ |
satkartā satkṛtaḥ sādhurjahnurnārāyaṇo naraḥ ||भावार्थ: सुंदर प्रसाद और प्रसन्न आत्मभाव के बाद विश्व को धारण, ग्रहण और व्याप्त करने वाले स्वरूप आते हैं। सम्मान देने और पाने, साधुता, जह्नु, नारायण तथा नर के नाम उदारता और विविध कथात्मक संबंध दिखाते हैं।
नाम-श्लोक 27
असङ्ख्येयोऽप्रमेयात्मा विशिष्टः शिष्टकृच्छुचिः ।
सिद्धार्थः सिद्धसङ्कल्पः सिद्धिदः सिद्धिसाधनः ॥asaṅkhyeyo'prameyātmā viśiṣṭaḥ śiṣṭakṛcchuciḥ |
siddhārthaḥ siddhasaṅkalpaḥ siddhidaḥ siddhisādhanaḥ ||भावार्थ: असंख्यता और अमेयता के बाद विशिष्टता, शिष्ट आचरण के निर्माण और पवित्रता की स्तुति है। सिद्ध उद्देश्य और संकल्प के साथ सिद्धि के दाता तथा साधन आते हैं। ये प्रभु के विशेषण हैं, पाठक के हर काम का वचन नहीं।
नाम-श्लोक 28
वृषाही वृषभो विष्णुर्वृषपर्वा वृषोदरः ।
वर्धनो वर्धमानश्च विविक्तः श्रुतिसागरः ॥vṛṣāhī vṛṣabho viṣṇurvṛṣaparvā vṛṣodaraḥ |
vardhano vardhamānaśca viviktaḥ śrutisāgaraḥ ||भावार्थ: वृष शब्द की पुनरावृत्ति धर्म और पोषण की पारंपरिक छवियाँ लाती है। वर्धन और वर्धमान वृद्धि के भाव हैं। विविक्त तथा श्रुतिसागर के साथ अलगाव और पवित्र ज्ञान की गहराई भी इसी स्तुति में जुड़ती है।
नाम-श्लोक 29
सुभुजो दुर्धरो वाग्मी महेन्द्रो वसुदो वसुः ।
नैकरूपो बृहद्रूपः शिपिविष्टः प्रकाशनः ॥subhujo durdharo vāgmī mahendro vasudo vasuḥ |
naikarūpo bṛhadrūpaḥ śipiviṣṭaḥ prakāśanaḥ ||भावार्थ: सुंदर भुजाएँ, दुर्धर स्वरूप और वाणी की सामर्थ्य प्रभुता तथा वसु देने और वास करने के भाव से जुड़ती हैं। अनेक और विशाल रूप, शिपिविष्ट तथा प्रकाशन के नाम अलग-अलग प्रकार की व्यापकता बताते हैं।
नाम-श्लोक 30
ओजस्तेजोद्युतिधरः प्रकाशात्मा प्रतापनः ।
ऋद्धः स्पष्टाक्षरो मन्त्रश्चन्द्रांशुर्भास्करद्युतिः ॥ojastejodyutidharaḥ prakāśātmā pratāpanaḥ |
ṛddhaḥ spaṣṭākṣaro mantraścandrāṃśurbhāskaradyutiḥ ||भावार्थ: ओज, तेज और द्युति को धारण करने वाला प्रकाशात्मा स्मरण किया गया है। ऋद्धि, स्पष्ट अक्षर तथा मंत्र के बाद चंद्रकिरण और सूर्य की चमक आती है। शीतल और प्रखर दोनों प्रकाश-छवियाँ एक ही स्तुति में हैं।
नाम-श्लोक 31
अमृतांशूद्भवो भानुः शशबिन्दुः सुरेश्वरः ।
औषधं जगतः सेतुः सत्यधर्मपराक्रमः ॥amṛtāṃśūdbhavo bhānuḥ śaśabinduḥ sureśvaraḥ |
auṣadhaṃ jagataḥ setuḥ satyadharmaparākramaḥ ||भावार्थ: चंद्र-संबंधी छवि, प्रकाश और शशबिंदु के बाद देवों के स्वामी का नाम आता है। औषध पोषण और उपचार का धार्मिक रूपक है। जगत का सेतु तथा सत्यधर्म का पराक्रम अंत में जुड़ते हैं।
नाम-श्लोक 32
भूतभव्यभवन्नाथः पवनः पावनोऽनलः ।
कामहा कामकृत्कान्तः कामः कामप्रदः प्रभुः ॥bhūtabhavyabhavannāthaḥ pavanaḥ pāvano'nalaḥ |
kāmahā kāmakṛtkāntaḥ kāmaḥ kāmapradaḥ prabhuḥ ||भावार्थ: तीनों काल के नाथ के बाद वायु, पवित्र करने वाले और अनल का स्मरण है। इच्छा को हटाने, बनाने, प्रिय होने और प्रदान करने के अलग-अलग संबंध आते हैं। नामों का यह क्रम इच्छा पर एक ही सरल निर्णय नहीं देता।
नाम-श्लोक 33
युगादिकृद्युगावर्तो नैकमायो महाशनः ।
अदृश्यो व्यक्तरूपश्च सहस्रजिदनन्तजित् ॥yugādikṛdyugāvarto naikamāyo mahāśanaḥ |
adṛśyo vyaktarūpaśca sahasrajidanantajit ||भावार्थ: युगों का आरंभ और आवर्तन करने वाले प्रभु की अनेक माया और महाशन रूप की स्तुति है। अदृश्य सत्ता व्यक्त रूप भी लेती है। सहस्र और अनंत विजय के नाम काल तथा अभिव्यक्ति की व्यापकता दिखाते हैं।
नाम-श्लोक 34
इष्टोऽविशिष्टः शिष्टेष्टः शिखण्डी नहुषो वृषः ।
क्रोधहा क्रोधकृत्कर्ता विश्वबाहुर्महीधरः ॥iṣṭo'viśiṣṭaḥ śiṣṭeṣṭaḥ śikhaṇḍī nahuṣo vṛṣaḥ |
krodhahā krodhakṛtkartā viśvabāhurmahīdharaḥ ||भावार्थ: इष्ट और शिष्टेष्ट प्रियता के नाम हैं; अविशिष्ट सीमित भेद से परे होने का भाव लाता है। शिखंडी, नहुष और वृष के बाद क्रोध हटाने तथा उत्पन्न करने के विरोधी चित्र आते हैं। विश्वबाहु और महीधर उन्हें व्यापक संदर्भ देते हैं।
नाम-श्लोक 35
अच्युतः प्रथितः प्राणः प्राणदो वासवानुजः ।
अपांनिधिरधिष्ठानमप्रमत्तः प्रतिष्ठितः ॥acyutaḥ prathitaḥ prāṇaḥ prāṇado vāsavānujaḥ |
apāṃnidhiradhiṣṭhānamapramattaḥ pratiṣṭhitaḥ ||भावार्थ: अच्युत और प्रसिद्ध प्रभु प्राण तथा प्राणदाता भी कहे गए हैं। वासव के अनुज, जल के भंडार और अधिष्ठान के बाद अप्रमत्त तथा प्रतिष्ठित स्वरूप आते हैं। धारण और निरंतर सजगता इस पद का मुख्य भाव हैं।
नाम-श्लोक 36
स्कन्दः स्कन्दधरो धुर्यो वरदो वायुवाहनः ।
वासुदेवो बृहद्भानुरादिदेवः पुरन्दरः ॥skandaḥ skandadharo dhuryo varado vāyuvāhanaḥ |
vāsudevo bṛhadbhānurādidevaḥ purandaraḥ ||भावार्थ: स्कंद, भार धारण करने वाले और वरदाता के साथ वायु से संचरण का भाव आता है। वासुदेव, विशाल प्रकाश तथा आदिदेव के बाद पुरंदर नाम दृढ़ विरोध को तोड़ने वाली शक्ति का स्मरण कराता है।
नाम-श्लोक 37
अशोकस्तारणस्तारः शूरः शौरिर्जनेश्वरः ।
अनुकूलः शतावर्तः पद्मी पद्मनिभेक्षणः ॥aśokastāraṇastāraḥ śūraḥ śaurirjaneśvaraḥ |
anukūlaḥ śatāvartaḥ padmī padmanibhekṣaṇaḥ ||भावार्थ: अशोक तथा तारण शोक से परे होने और पार लगाने की छवियाँ हैं। शूर और शौरि के साथ जनों के ईश्वर, अनुकूल स्वरूप तथा अनेक आवर्तन आते हैं। पद्म और कमल जैसे नेत्र सौम्यता जोड़ते हैं।
नाम-श्लोक 38
पद्मनाभोऽरविन्दाक्षः पद्मगर्भः शरीरभृत् ।
महर्द्धिरृद्धो वृद्धात्मा महाक्षो गरुडध्वजः ॥padmanābho'ravindākṣaḥ padmagarbhaḥ śarīrabhṛt |
maharddhirṛddho vṛddhātmā mahākṣo garuḍadhvajaḥ ||भावार्थ: पद्मनाभ, अरविंदाक्ष और पद्मगर्भ शरीरों के धारणकर्ता को कमल की छवि में रखते हैं। ऋद्धि, वृद्ध आत्मस्वरूप तथा विशाल दृष्टि के बाद गरुड़ध्वज का स्मरण वैष्णव पहचान को स्पष्ट करता है।
नाम-श्लोक 39
अतुलः शरभो भीमः समयज्ञो हविर्हरिः ।
सर्वलक्षणलक्षण्यो लक्ष्मीवान् समितिञ्जयः ॥atulaḥ śarabho bhīmaḥ samayajño havirhariḥ |
sarvalakṣaṇalakṣaṇyo lakṣmīvān samitiñjayaḥ ||भावार्थ: अतुल और भीम में अनुपम तथा प्रबल स्वरूप हैं। समयज्ञ और हविर्हरि उचित अवसर तथा अर्पण के संबंध दिखाते हैं। सभी लक्षणों से पहचाने जाने वाले लक्ष्मीवान प्रभु संघर्ष में विजय की छवि भी रखते हैं।
नाम-श्लोक 40
विक्षरो रोहितो मार्गो हेतुर्दामोदरः सहः ।
महीधरो महाभागो वेगवानमिताशनः ॥vikṣaro rohito mārgo heturdāmodaraḥ sahaḥ |
mahīdharo mahābhāgo vegavānamitāśanaḥ ||भावार्थ: अविनाशी स्वरूप मार्ग और कारण भी है। दामोदर नाम उदर पर बंधन वाली परिचित कृष्ण-छवि का स्मरण कराता है। सहनशीलता, पृथ्वी धारण, महान भाग्य, वेग तथा अमित ग्रहण उसी प्रभु की व्यापकता हैं।
नाम-श्लोक 41–60
नाम-श्लोक 41
उद्भवः क्षोभणो देवः श्रीगर्भः परमेश्वरः ।
करणं कारणं कर्ता विकर्ता गहनो गुहः ॥udbhavaḥ kṣobhaṇo devaḥ śrīgarbhaḥ parameśvaraḥ |
karaṇaṃ kāraṇaṃ kartā vikartā gahano guhaḥ ||भावार्थ: उद्भव और क्षोभण उत्पत्ति तथा हलचल के भाव हैं। श्रीगर्भ और परमेश्वर के बाद करण, कारण, कर्ता तथा विकर्ता आते हैं। गहन और गुह नाम बताते हैं कि यह आधार सरल बाहरी वर्णन से पूरा नहीं खुलता।
नाम-श्लोक 42
व्यवसायो व्यवस्थानः संस्थानः स्थानदो ध्रुवः ।
परर्द्धिः परमस्पष्टस्तुष्टः पुष्टः शुभेक्षणः ॥vyavasāyo vyavasthānaḥ saṃsthānaḥ sthānado dhruvaḥ |
pararddhiḥ paramaspaṣṭastuṣṭaḥ puṣṭaḥ śubhekṣaṇaḥ ||भावार्थ: व्यवसाय, व्यवस्था, संस्थान तथा स्थान देने के नाम ध्रुव स्थिरता तक पहुँचते हैं। परम ऋद्धि और स्पष्टता के साथ तुष्टि, पुष्टि तथा शुभ दृष्टि हैं। इस स्थायित्व में पोषण और प्रसन्नता भी शामिल हैं।
नाम-श्लोक 43
रामो विरामो विरजो मार्गो नेयो नयोऽनयः ।
वीरः शक्तिमतां श्रेष्ठो धर्मो धर्मविदुत्तमः ॥rāmo virāmo virajo mārgo neyo nayo'nayaḥ |
vīraḥ śaktimatāṃ śreṣṭho dharmo dharmaviduttamaḥ ||भावार्थ: राम, विराम और विरज के बाद मार्ग, नेय, नय तथा अनय आते हैं। नेतृत्व और उससे स्वतंत्रता के भाव साथ हैं। वीर तथा शक्तिमानों में श्रेष्ठ प्रभु धर्म और धर्म के उत्तम ज्ञाता भी कहे गए हैं।
नाम-श्लोक 44
वैकुण्ठः पुरुषः प्राणः प्राणदः प्रणवः पृथुः ।
हिरण्यगर्भः शत्रुघ्नो व्याप्तो वायुरधोक्षजः ॥vaikuṇṭhaḥ puruṣaḥ prāṇaḥ prāṇadaḥ praṇavaḥ pṛthuḥ |
hiraṇyagarbhaḥ śatrughno vyāpto vāyuradhokṣajaḥ ||भावार्थ: वैकुंठ और पुरुष प्राण, प्राणदाता तथा प्रणव भी हैं। विस्तार और हिरण्यगर्भ के साथ विरोध का नाश, व्याप्ति और वायु आते हैं। अधोक्षज साधारण इंद्रियज्ञान में पूरी तरह न समाने वाले स्वरूप की ओर संकेत करता है।
नाम-श्लोक 45
ऋतुः सुदर्शनः कालः परमेष्ठी परिग्रहः ।
उग्रः संवत्सरो दक्षो विश्रामो विश्वदक्षिणः ॥ṛtuḥ sudarśanaḥ kālaḥ parameṣṭhī parigrahaḥ |
ugraḥ saṃvatsaro dakṣo viśrāmo viśvadakṣiṇaḥ ||भावार्थ: ऋतु, सुदर्शन, काल और परमेष्ठी विश्व की व्यवस्था को सामने रखते हैं। उग्रता, संवत्सर तथा दक्षता के साथ विश्राम और विश्वदक्षिण आते हैं। समय के संचालन और शांति के आश्रय की स्तुति साथ होती है।
नाम-श्लोक 46
विस्तारः स्थावरस्थाणुः प्रमाणं बीजमव्ययम् ।
अर्थोऽनर्थो महाकोशो महाभोगो महाधनः ॥vistāraḥ sthāvarasthāṇuḥ pramāṇaṃ bījamavyayam |
artho'nartho mahākośo mahābhogo mahādhanaḥ ||भावार्थ: विस्तार तथा स्थावर आधार प्रमाण और अविनाशी बीज भी हैं। अर्थ और अनर्थ मूल्य या उद्देश्य के साथ उससे स्वतंत्रता की व्याख्या खोलते हैं। महाकोश, महाभोग और महाधन समृद्धि की व्यापक भाषा हैं।
नाम-श्लोक 47
अनिर्विण्णः स्थविष्ठोऽभूर्धर्मयूपो महामखः ।
नक्षत्रनेमिर्नक्षत्री क्षमः क्षामः समीहनः ॥anirviṇṇaḥ sthaviṣṭho'bhūrdharmayūpo mahāmakhaḥ |
nakṣatranemirnakṣatrī kṣamaḥ kṣāmaḥ samīhanaḥ ||भावार्थ: अनिर्विण्ण, स्थविष्ठ और अभू के बाद धर्म का यूप तथा महामख की यज्ञ-छवियाँ हैं। नक्षत्रों की नेमि, क्षमा, क्षाम स्वरूप और समीहन विश्व की गति को धैर्य तथा प्रयास के साथ जोड़ते हैं।
नाम-श्लोक 48
यज्ञ इज्यो महेज्यश्च क्रतुः सत्रं सतां गतिः ।
सर्वदर्शी विमुक्तात्मा सर्वज्ञो ज्ञानमुत्तमम् ॥yajña ijyo mahejyaśca kratuḥ satraṃ satāṃ gatiḥ |
sarvadarśī vimuktātmā sarvajño jñānamuttamam ||भावार्थ: यज्ञ, इज्य और महेज्य के साथ क्रतु तथा सत्र आते हैं। सज्जनों की गति सर्वदर्शी, मुक्तात्मा और सर्वज्ञ भी है। ज्ञानमुत्तम नाम अनुष्ठान की भाषा को श्रेष्ठ ज्ञान के भाव से जोड़ता है।
नाम-श्लोक 49
सुव्रतः सुमुखः सूक्ष्मः सुघोषः सुखदः सुहृत् ।
मनोहरो जितक्रोधो वीरबाहुर्विदारणः ॥suvrataḥ sumukhaḥ sūkṣmaḥ sughoṣaḥ sukhadaḥ suhṛt |
manoharo jitakrodho vīrabāhurvidāraṇaḥ ||भावार्थ: सुंदर व्रत, मुख, सूक्ष्मता तथा मधुर घोष के बाद सुखदाता और सुहृद का स्मरण है। मनोहर प्रभु जितक्रोध, वीरबाहु तथा विदारण भी हैं। सौम्य और प्रबल दोनों पक्ष इस श्लोक में उपस्थित हैं।
नाम-श्लोक 50
स्वापनः स्ववशो व्यापी नैकात्मा नैककर्मकृत् ।
वत्सरो वत्सलो वत्सी रत्नगर्भो धनेश्वरः ॥svāpanaḥ svavaśo vyāpī naikātmā naikakarmakṛt |
vatsaro vatsalo vatsī ratnagarbho dhaneśvaraḥ ||भावार्थ: स्वापन, स्ववश और व्यापक स्वरूप अनेक आत्मरूप तथा कर्मों के साथ हैं। वत्सल और वत्सी स्नेह व देखभाल का भाव देते हैं। रत्नगर्भ और धनेश्वर पोषण की इसी भाषा को संपदा तक बढ़ाते हैं।
नाम-श्लोक 51
धर्मगुब्धर्मकृद्धर्मी सदसत्क्षरमक्षरम् ।
अविज्ञाता सहस्रांशुर्विधाता कृतलक्षणः ॥dharmagubdharmakṛddharmī sadasatkṣaramakṣaram |
avijñātā sahasrāṃśurvidhātā kṛtalakṣaṇaḥ ||भावार्थ: धर्म के रक्षक, निर्माता और धारणकर्ता के बाद सत्-असत् तथा क्षर-अक्षर आते हैं। अविज्ञाता, सहस्रांशु, विधाता और कृतलक्षण में अज्ञेयता तथा व्यवस्था साथ हैं। विरोधी पद एक सीमित वर्ग से बड़ी व्यापकता दर्शाते हैं।
नाम-श्लोक 52
गभस्तिनेमिः सत्त्वस्थः सिंहो भूतमहेश्वरः ।
आदिदेवो महादेवो देवेशो देवभृद्गुरुः ॥gabhastinemiḥ sattvasthaḥ siṃho bhūtamaheśvaraḥ |
ādidevo mahādevo deveśo devabhṛdguruḥ ||भावार्थ: किरणों की नेमि, सत्त्व में स्थिति और सिंह-छवि के बाद भूतमहेश्वर हैं। आदिदेव, महादेव, देवेश तथा देवभृत् के गुरु उत्पत्ति, महान प्रभुता और मार्गदर्शन की स्तुति आगे बढ़ाते हैं।
नाम-श्लोक 53
उत्तरो गोपतिर्गोप्ता ज्ञानगम्यः पुरातनः ।
शरीरभूतभृद्भोक्ता कपीन्द्रो भूरिदक्षिणः ॥uttaro gopatirgoptā jñānagamyaḥ purātanaḥ |
śarīrabhūtabhṛdbhoktā kapīndro bhūridakṣiṇaḥ ||भावार्थ: उत्तर, गोपति और गोप्ता संरक्षण के नाम हैं; ज्ञानगम्य ज्ञान से पहुँचने का भाव है। पुरातन प्रभु शरीरधारी प्राणियों को धारण और उनके अनुभव को ग्रहण करते हैं। कपींद्र तथा भूरिदक्षिण कथा और उदारता की छवियाँ जोड़ते हैं।
नाम-श्लोक 54
सोमपोऽमृतपः सोमः पुरुजित्पुरुसत्तमः ।
विनयो जयः सत्यसन्धो दाशार्हः सात्वताम्पतिः ॥somapo'mṛtapaḥ somaḥ purujitpurusattamaḥ |
vinayo jayaḥ satyasandho dāśārhaḥ sātvatāmpatiḥ ||भावार्थ: सोम और अमृत ग्रहण करने के बाद विजय, पुरुषोत्तमता, विनय तथा सत्यसंधता आते हैं। दाशार्ह और सात्वतों के स्वामी कृष्ण से जुड़े वंश तथा समुदाय का स्मरण कराते हैं। यज्ञ और कथा की भाषा साथ रहती है।
नाम-श्लोक 55
जीवो विनयिता साक्षी मुकुन्दोऽमितविक्रमः ।
अम्भोनिधिरनन्तात्मा महोदधिशयोऽन्तकः ॥jīvo vinayitā sākṣī mukundo'mitavikramaḥ |
ambhonidhiranantātmā mahodadhiśayo'ntakaḥ ||भावार्थ: जीव, विनयिता और साक्षी के बाद मुकुंद मुक्ति देने वाले प्रभु की पारंपरिक छवि है। अमित विक्रम, जलनिधि, अनंत आत्मा तथा महोदधि में शयन अंत में अंतक के समापन-भाव से जुड़ते हैं।
नाम-श्लोक 56
अजो महार्हः स्वाभाव्यो जितामित्रः प्रमोदनः ।
आनन्दो नन्दनो नन्दः सत्यधर्मा त्रिविक्रमः ॥ajo mahārhaḥ svābhāvyo jitāmitraḥ pramodanaḥ |
ānando nandano nandaḥ satyadharmā trivikramaḥ ||भावार्थ: अज, महार्ह तथा स्वाभाव्य के साथ शत्रु-विजय और प्रमोदन, आनंद, नंदन व नंद के आनंद-भाव आते हैं। सत्यधर्मा के बाद त्रिविक्रम तीन पगों में व्यापक हुए अवतार का स्मरण कराता है।
नाम-श्लोक 57
महर्षिः कपिलाचार्यः कृतज्ञो मेदिनीपतिः ।
त्रिपदस्त्रिदशाध्यक्षो महाशृङ्गः कृतान्तकृत् ॥maharṣiḥ kapilācāryaḥ kṛtajño medinīpatiḥ |
tripadastridaśādhyakṣo mahāśṛṅgaḥ kṛtāntakṛt ||भावार्थ: महर्षि कपिलाचार्य, कृतज्ञ और मेदिनीपति ज्ञान तथा पृथ्वी के अधिपत्य के नाम हैं। त्रिपद, त्रिदशाध्यक्ष, महाशृंग और कृतांतकृत अलग-अलग अवतार, देव-व्यवस्था तथा समापन की छवियाँ साथ रखते हैं।
नाम-श्लोक 58
महावराहो गोविन्दः सुषेणः कनकाङ्गदी ।
गुह्यो गभीरो गहनो गुप्तश्चक्रगदाधरः ॥mahāvarāho govindaḥ suṣeṇaḥ kanakāṅgadī |
guhyo gabhīro gahano guptaścakragadādharaḥ ||भावार्थ: महावराह और गोविंद के साथ सुसेना तथा स्वर्ण आभूषण की छवि है। गुह्य, गंभीर, गहन और गुप्त स्वरूप अंत में चक्रगदाधर कहलाता है। परिचित आयुधों के साथ भीतर की अगम्यता बनी रहती है।
नाम-श्लोक 59
वेधाः स्वाङ्गोऽजितः कृष्णो दृढः सङ्कर्षणोऽच्युतः ।
वरुणो वारुणो वृक्षः पुष्कराक्षो महामनाः ॥vedhāḥ svāṅgo'jitaḥ kṛṣṇo dṛḍhaḥ saṅkarṣaṇo'cyutaḥ |
varuṇo vāruṇo vṛkṣaḥ puṣkarākṣo mahāmanāḥ ||भावार्थ: वेधा, स्वांग, अजित कृष्ण और दृढ़ के बाद संकर्षण तथा अच्युत आते हैं। वरुण, वारुण, वृक्ष, पुष्कराक्ष और महामना विविध संबंध आगे बढ़ाते हैं। सभी नामों को एक ही स्थूल आकृति में बाँधना आवश्यक नहीं।
नाम-श्लोक 60
भगवान् भगहाऽऽनन्दी वनमाली हलायुधः ।
आदित्यो ज्योतिरादित्यः सहिष्णुर्गतिसत्तमः ॥bhagavān bhagahā''nandī vanamālī halāyudhaḥ |
ādityo jyotirādityaḥ sahiṣṇurgatisattamaḥ ||भावार्थ: भगवान और आनंदी के साथ वनमाली तथा हलायुध की परिचित छवियाँ हैं। आदित्य, सूर्य का प्रकाश, सहिष्णुता और श्रेष्ठ गति इन्हें विश्व की ज्योति तथा परम आश्रय के भाव तक फैलाते हैं।
नाम-श्लोक 61–80
नाम-श्लोक 61
सुधन्वा खण्डपरशुर्दारुणो द्रविणप्रदः ।
दिवस्पृक् सर्वदृग्व्यासो वाचस्पतिरयोनिजः ॥sudhanvā khaṇḍaparaśurdāruṇo draviṇapradaḥ |
divaspṛk sarvadṛgvyāso vācaspatirayonijaḥ ||भावार्थ: सुंदर धनुष तथा परशु के साथ दारुण बल और द्रविण प्रदान करना आता है। दिवस्पृक्, सर्वदृक् व्यास तथा वाचस्पति आकाश, दृष्टि और वाणी के संबंध दिखाते हैं। अयोनिज सामान्य गर्भजन्म से अलग उत्पत्ति का भाव है।
नाम-श्लोक 62
त्रिसामा सामगः साम निर्वाणं भेषजं भिषक् ।
संन्यासकृच्छमः शान्तो निष्ठा शान्तिः परायणम् ॥trisāmā sāmagaḥ sāma nirvāṇaṃ bheṣajaṃ bhiṣak |
saṃnyāsakṛcchamaḥ śānto niṣṭhā śāntiḥ parāyaṇam ||भावार्थ: सामगान, निर्वाण, भेषज और भिषक् संन्यास तथा शम से जुड़ते हैं। शांत, निष्ठा, शांति और परायण विश्राम व मुक्ति की धार्मिक छवि पूर्ण करते हैं। यह स्तुति की भाषा है, उपचार का निर्देश नहीं।
नाम-श्लोक 63
शुभाङ्गः शान्तिदः स्रष्टा कुमुदः कुवलेशयः ।
गोहितो गोपतिर्गोप्ता वृषभाक्षो वृषप्रियः ॥śubhāṅgaḥ śāntidaḥ sraṣṭā kumudaḥ kuvaleśayaḥ |
gohito gopatirgoptā vṛṣabhākṣo vṛṣapriyaḥ ||भावार्थ: शुभ अंग, शांति देना, सृष्टि और पृथ्वी में प्रसन्नता के बाद गोहित, गोपति तथा गोप्ता संरक्षण का भाव देते हैं। वृषभाक्ष और वृषप्रिय धर्म की पारंपरिक छवियों से कल्याण तथा जीवन-धारण को जोड़ते हैं।
नाम-श्लोक 64
अनिवर्ती निवृत्तात्मा सङ्क्षेप्ता क्षेमकृच्छिवः ।
श्रीवत्सवक्षाः श्रीवासः श्रीपतिः श्रीमतांवरः ॥anivartī nivṛttātmā saṅkṣeptā kṣemakṛcchivaḥ |
śrīvatsavakṣāḥ śrīvāsaḥ śrīpatiḥ śrīmatāṃvaraḥ ||भावार्थ: अनिवर्ती और निवृत्तात्मा के साथ संक्षेप्ता, क्षेमकृत् तथा शिव के कल्याणकारी नाम हैं। श्रीवत्स-चिह्न वाला वक्ष, श्री का निवास तथा श्रीपति अमूर्त भावों के बीच परिचित विष्णु-स्वरूप स्पष्ट करते हैं।
नाम-श्लोक 65
श्रीदः श्रीशः श्रीनिवासः श्रीनिधिः श्रीविभावनः ।
श्रीधरः श्रीकरः श्रेयः श्रीमाँल्लोकत्रयाश्रयः ॥śrīdaḥ śrīśaḥ śrīnivāsaḥ śrīnidhiḥ śrīvibhāvanaḥ |
śrīdharaḥ śrīkaraḥ śreyaḥ śrīmām̐llokatrayāśrayaḥ ||भावार्थ: श्रीद, श्रीश, श्रीनिवास, श्रीनिधि और श्रीविभावन श्री के दान, अधिपत्य, निवास, भंडार तथा प्रसार के नाम हैं। श्रीधर और श्रीकर के बाद श्रेय तथा तीन लोकों का आश्रय आता है; श्री का भाव धन से व्यापक है।
नाम-श्लोक 66
स्वक्षः स्वङ्गः शतानन्दो नन्दिर्ज्योतिर्गणेश्वरः ।
विजितात्माऽविधेयात्मा सत्कीर्तिश्छिन्नसंशयः ॥svakṣaḥ svaṅgaḥ śatānando nandirjyotirgaṇeśvaraḥ |
vijitātmā'vidheyātmā satkīrtiśchinnasaṃśayaḥ ||भावार्थ: सुंदर नेत्र और अंग, अनेक आनंद तथा ज्योतियों के समूह के ईश्वर के बाद विजितात्मा और अविधेयात्मा आते हैं। सत्कीर्ति तथा छिन्नसंशय स्पष्टता और भीतर की दृढ़ स्वतंत्रता का भाव पूर्ण करते हैं।
नाम-श्लोक 67
उदीर्णः सर्वतश्चक्षुरनीशः शाश्वतस्थिरः ।
भूशयो भूषणो भूतिर्विशोकः शोकनाशनः ॥udīrṇaḥ sarvataścakṣuranīśaḥ śāśvatasthiraḥ |
bhūśayo bhūṣaṇo bhūtirviśokaḥ śokanāśanaḥ ||भावार्थ: उदीर्ण और सर्वतश्चक्षु के साथ अनीश किसी उच्चतर अधिपति से मुक्त होने का भाव है। शाश्वत स्थिरता, पृथ्वी पर शयन, भूषण तथा भूति के बाद विशोक और शोकनाशन सौम्य आश्रय बनाते हैं।
नाम-श्लोक 68
अर्चिष्मानर्चितः कुम्भो विशुद्धात्मा विशोधनः ।
अनिरुद्धोऽप्रतिरथः प्रद्युम्नोऽमितविक्रमः ॥arciṣmānarcitaḥ kumbho viśuddhātmā viśodhanaḥ |
aniruddho'pratirathaḥ pradyumno'mitavikramaḥ ||भावार्थ: ज्योतिमय, अर्चित और कुंभ की छवियाँ विशुद्ध आत्मा तथा विशोधन से जुड़ती हैं। अनिरुद्ध, अप्रतिरथ, प्रद्युम्न और अमित विक्रम के नाम इसी प्रकाशमय स्वरूप में विशिष्ट तथा वीर संबंध खोलते हैं।
नाम-श्लोक 69
कालनेमिनिहा वीरः शौरिः शूरजनेश्वरः ।
त्रिलोकात्मा त्रिलोकेशः केशवः केशिहा हरिः ॥kālaneminihā vīraḥ śauriḥ śūrajaneśvaraḥ |
trilokātmā trilokeśaḥ keśavaḥ keśihā hariḥ ||भावार्थ: कालनेमि के विनाश, वीरता और शौरि के बाद तीन लोकों की आत्मा तथा ईश्वर आते हैं। केशव, केशिहा और हरि विशाल अधिपत्य को कृष्ण-कथाओं तथा हरण करने वाले स्वरूप से जोड़ते हैं।
नाम-श्लोक 70
कामदेवः कामपालः कामी कान्तः कृतागमः ।
अनिर्देश्यवपुर्विष्णुर्वीरोऽनन्तो धनञ्जयः ॥kāmadevaḥ kāmapālaḥ kāmī kāntaḥ kṛtāgamaḥ |
anirdeśyavapurviṣṇurvīro'nanto dhanañjayaḥ ||भावार्थ: कामदेव, कामपाल, कामी तथा कांत इच्छा और प्रियता के नाम हैं। कृतागम पवित्र शिक्षाओं के संबंध को जोड़ता है। अनिर्देश्य रूप विष्णु, वीर और अनंत भी है; धनंजय धन के अर्जन का भाव लाता है।
नाम-श्लोक 71
ब्रह्मण्यो ब्रह्मकृद् ब्रह्मा ब्रह्म ब्रह्मविवर्धनः ।
ब्रह्मविद् ब्राह्मणो ब्रह्मी ब्रह्मज्ञो ब्राह्मणप्रियः ॥brahmaṇyo brahmakṛd brahmā brahma brahmavivardhanaḥ |
brahmavid brāhmaṇo brahmī brahmajño brāhmaṇapriyaḥ ||भावार्थ: इस पद में ब्रह्म-संबंधी शब्द लगातार आते हैं: ब्रह्म का हित, निर्माण, वृद्धि और ज्ञान। ब्रह्मा, ब्रह्म तथा ब्राह्मण संबंधित होते हुए व्याकरण और प्रयोग में अलग पद हैं। पूरे क्रम को एक ही अर्थ देना उचित नहीं।
नाम-श्लोक 72
महाक्रमो महाकर्मा महातेजा महोरगः ।
महाक्रतुर्महायज्वा महायज्ञो महाहविः ॥mahākramo mahākarmā mahātejā mahoragaḥ |
mahākraturmahāyajvā mahāyajño mahāhaviḥ ||भावार्थ: महाक्रम, महाकर्म, महातेज तथा महोरग के बाद महाक्रतु, महायज्वा, महायज्ञ और महाहवि आते हैं। बार-बार आया महा प्रत्येक छवि का विस्तार करता है; कर्म और यज्ञ के विभिन्न पक्ष एक ही स्तुति में मिलते हैं।
नाम-श्लोक 73
स्तव्यः स्तवप्रियः स्तोत्रं स्तुतिः स्तोता रणप्रियः ।
पूर्णः पूरयिता पुण्यः पुण्यकीर्तिरनामयः ॥stavyaḥ stavapriyaḥ stotraṃ stutiḥ stotā raṇapriyaḥ |
pūrṇaḥ pūrayitā puṇyaḥ puṇyakīrtiranāmayaḥ ||भावार्थ: स्तव्य, स्तवप्रिय, स्तोत्र, स्तुति और स्तोता में आराध्य, आराधना और आराधक साथ हैं। पूर्ण तथा पूरयिता के साथ पुण्य, पुण्यकीर्ति और अनामय आते हैं। यह पद स्तुति के पूरे संबंध पर ध्यान ले जाता है।
नाम-श्लोक 74
मनोजवस्तीर्थकरो वसुरेता वसुप्रदः ।
वसुप्रदो वासुदेवो वसुर्वसुमना हविः ॥manojavastīrthakaro vasuretā vasupradaḥ |
vasuprado vāsudevo vasurvasumanā haviḥ ||भावार्थ: मन के वेग और तीर्थ बनाने के बाद वसु प्रदान करने का नाम दो बार आता है। वासुदेव, वसु, वसुमना और हवि निवास, संपदा तथा अर्पण के भाव जोड़ते हैं। वसुप्रद की पुनरावृत्ति पाठ का हिस्सा है।
नाम-श्लोक 75
सद्गतिः सत्कृतिः सत्ता सद्भूतिः सत्परायणः ।
शूरसेनो यदुश्रेष्ठः सन्निवासः सुयामुनः ॥sadgatiḥ satkṛtiḥ sattā sadbhūtiḥ satparāyaṇaḥ |
śūraseno yaduśreṣṭhaḥ sannivāsaḥ suyāmunaḥ ||भावार्थ: सद्गति, सत्कृति, सत्ता, सद्भूति तथा सत्परायण शुभ गति, कर्म और अस्तित्व के भाव हैं। शूरसेन तथा यदुश्रेष्ठ के बाद सन्निवास और सुयामुन यदुवंश, निवास तथा यमुना-संबंधी स्मरण जोड़ते हैं।
नाम-श्लोक 76
भूतावासो वासुदेवः सर्वासुनिलयोऽनलः ।
दर्पहा दर्पदो दृप्तो दुर्धरोऽथापराजितः ॥bhūtāvāso vāsudevaḥ sarvāsunilayo'nalaḥ |
darpahā darpado dṛpto durdharo'thāparājitaḥ ||भावार्थ: भूतों का आवास और सभी प्राणों का निवास वासुदेव हैं। दर्प हटाने, देने तथा दृप्त स्वरूप के नाम साथ आते हैं। दुर्धर और अपराजित प्रभु की स्तुति को हर आत्मविश्वास के निषेध में बदलना उचित नहीं।
नाम-श्लोक 77
विश्वमूर्तिर्महामूर्तिर्दीप्तमूर्तिरमूर्तिमान् ।
अनेकमूर्तिरव्यक्तः शतमूर्तिः शताननः ॥viśvamūrtirmahāmūrtirdīptamūrtiramūrtimān |
anekamūrtiravyaktaḥ śatamūrtiḥ śatānanaḥ ||भावार्थ: विश्वमूर्ति, महामूर्ति और दीप्तमूर्ति के साथ अमूर्तिमान भी आते हैं। अनेक रूप, अव्यक्त, शतमूर्ति और शतानन किसी एक सीमित चित्र से आगे जाते हैं। व्यक्त रूप और रूपातीत भाव साथ पढ़े जाने चाहिए।
नाम-श्लोक 78
एको नैकः सवः कः किं यत् तत्पदमनुत्तमम् ।
लोकबन्धुर्लोकनाथो माधवो भक्तवत्सलः ॥eko naikaḥ savaḥ kaḥ kiṃ yat tatpadamanuttamam |
lokabandhurlokanātho mādhavo bhaktavatsalaḥ ||भावार्थ: एक और अनेक के बाद कः, किम्, यत् और तत् जैसे प्रश्नसूचक तथा निर्देशकारी पद आते हैं। अनुत्तम पद लोकबंधु, लोकनाथ, माधव और भक्तवत्सल भी है। दार्शनिक प्रश्न फिर आत्मीय संबंध की ओर लौटते हैं।
नाम-श्लोक 79
सुवर्णवर्णो हेमाङ्गो वराङ्गश्चन्दनाङ्गदी ।
वीरहा विषमः शून्यो घृताशीरचलश्चलः ॥suvarṇavarṇo hemāṅgo varāṅgaścandanāṅgadī |
vīrahā viṣamaḥ śūnyo ghṛtāśīracalaścalaḥ ||भावार्थ: स्वर्ण वर्ण, हेम अंग, सुंदरता और चंदन के आभूषण के साथ प्रबल तथा अनुपम स्वरूप हैं। शून्य, घृताशी, अचल और चल के विरोधी भाव भी आते हैं। यह केवल प्रतिमा का भौतिक विवरण नहीं है।
नाम-श्लोक 80
अमानी मानदो मान्यो लोकस्वामी त्रिलोकधृक् ।
सुमेधा मेधजो धन्यः सत्यमेधा धराधरः ॥amānī mānado mānyo lokasvāmī trilokadhṛk |
sumedhā medhajo dhanyaḥ satyamedhā dharādharaḥ ||भावार्थ: अमानी के साथ मान देने वाले और मान्य प्रभु का स्मरण है। लोकस्वामी तथा त्रिलोकधृत् के बाद सुमेधा, मेधज, धन्य और सत्यमेधा आते हैं। धराधर अंत में पृथ्वी का आधार होने का भाव जोड़ता है।
नाम-श्लोक 81–100
नाम-श्लोक 81
तेजोवृषो द्युतिधरः सर्वशस्त्रभृतां वरः ।
प्रग्रहो निग्रहो व्यग्रो नैकशृङ्गो गदाग्रजः ॥tejovṛṣo dyutidharaḥ sarvaśastrabhṛtāṃ varaḥ |
pragraho nigraho vyagro naikaśṛṅgo gadāgrajaḥ ||भावार्थ: तेजोवृष और द्युति धारण करने के बाद शस्त्रधारियों में श्रेष्ठता है। प्रग्रह, निग्रह, व्यग्र, अनेक शृंग तथा गदाग्रज शक्ति, नियंत्रण, तत्परता और विशिष्ट संबंधों की कई छवियाँ साथ रखते हैं।
नाम-श्लोक 82
चतुर्मूर्तिश्चतुर्बाहुश्चतुर्व्यूहश्चतुर्गतिः ।
चतुरात्मा चतुर्भावश्चतुर्वेदविदेकपात् ॥caturmūrtiścaturbāhuścaturvyūhaścaturgatiḥ |
caturātmā caturbhāvaścaturvedavidekapāt ||भावार्थ: चार मूर्ति, भुजा, व्यूह, गति, आत्मभाव और भाव के नाम चार वेदों के ज्ञान तक जाते हैं। अंत में एकपाद एक आधार का संकेत है। संख्या-क्रम धार्मिक छवि है, साधारण शरीर के अंग गिनने का निर्देश नहीं।
नाम-श्लोक 83
समावर्तोऽनिवृत्तात्मा दुर्जयो दुरतिक्रमः ।
दुर्लभो दुर्गमो दुर्गो दुरावासो दुरारिहा ॥samāvarto'nivṛttātmā durjayo duratikramaḥ |
durlabho durgamo durgo durāvāso durārihā ||भावार्थ: समावर्त और अनिवृत्तात्मा के बाद दुर्जय, दुरतिक्रम, दुर्लभ, दुर्गम, दुर्ग तथा दुरावास आते हैं। दुरारिहा प्रबल विरोध के नाश का भाव है। दु शब्द का क्रम महिमा और पहुँच की कठिनता दिखाता है।
नाम-श्लोक 84
शुभाङ्गो लोकसारङ्गः सुतन्तुस्तन्तुवर्धनः ।
इन्द्रकर्मा महाकर्मा कृतकर्मा कृतागमः ॥śubhāṅgo lokasāraṅgaḥ sutantustantuvardhanaḥ |
indrakarmā mahākarmā kṛtakarmā kṛtāgamaḥ ||भावार्थ: शुभ अंग तथा लोकसारंग के साथ सुतंतु और तंतुवर्धन सूक्ष्म सूत्र तथा उसके विस्तार की छवि देते हैं। इंद्रकर्मा, महाकर्मा, कृतकर्मा और कृतागम कर्म, सिद्ध कार्य तथा शिक्षाओं की निरंतरता जोड़ते हैं।
नाम-श्लोक 85
उद्भवः सुन्दरः सुन्दो रत्ननाभः सुलोचनः ।
अर्को वाजसनः शृङ्गी जयन्तः सर्वविज्जयी ॥udbhavaḥ sundaraḥ sundo ratnanābhaḥ sulocanaḥ |
arko vājasanaḥ śṛṅgī jayantaḥ sarvavijjayī ||भावार्थ: उद्भव, सुंदर, सुंद, रत्ननाभ और सुलोचन सौंदर्य की छवियाँ हैं। अर्क, वाजसन और शृंगी के बाद जयंत तथा सर्वविज्जयी आते हैं। सुंदरता के साथ पोषण, शक्ति और विजय का भाव बना रहता है।
नाम-श्लोक 86
सुवर्णबिन्दुरक्षोभ्यः सर्ववागीश्वरेश्वरः ।
महाह्रदो महागर्तो महाभूतो महानिधिः ॥suvarṇabindurakṣobhyaḥ sarvavāgīśvareśvaraḥ |
mahāhrado mahāgarto mahābhūto mahānidhiḥ ||भावार्थ: सुवर्णबिंदु और अक्षोभ्य सभी वाणी-स्वामियों के ईश्वर भी हैं। महाह्रद, महागर्त, महाभूत और महानिधि गहराई तथा विशाल धारण की छवियाँ हैं। वाणी से स्तुति होती है, पर उसका विषय वाणी से अधिक व्यापक है।
नाम-श्लोक 87
कुमुदः कुन्दरः कुन्दः पर्जन्यः पावनोऽनिलः ।
अमृताशोऽमृतवपुः सर्वज्ञः सर्वतोमुखः ॥kumudaḥ kundaraḥ kundaḥ parjanyaḥ pāvano'nilaḥ |
amṛtāśo'mṛtavapuḥ sarvajñaḥ sarvatomukhaḥ ||भावार्थ: कुमुद, कुंदर और कुंद के बाद वर्षा, पवित्रता तथा वायु की छवियाँ हैं। यहाँ अमृताश पढ़ा गया है, जिसका संबंध अमृत से है। अमृतवपु, सर्वज्ञ और सर्वतोमुख आगे आते हैं; अमृतांश अलग पाठांतर है।
नाम-श्लोक 88
सुलभः सुव्रतः सिद्धः शत्रुजिच्छत्रुतापनः ।
न्यग्रोधोऽदुम्बरोऽश्वत्थश्चाणूरान्ध्रनिषूदनः ॥sulabhaḥ suvrataḥ siddhaḥ śatrujicchatrutāpanaḥ |
nyagrodho'dumbaro'śvatthaścāṇūrāndhraniṣūdanaḥ ||भावार्थ: सुलभ, सुव्रत और सिद्ध के साथ शत्रु-विजय तथा संतापन आते हैं। न्यग्रोध, उदुंबर और अश्वत्थ वृक्षों की छवियाँ हैं। चाणूर के विनाश का स्मरण प्रकृति तथा कृष्ण के वीर कर्म को साथ रखता है।
नाम-श्लोक 89
सहस्रार्चिः सप्तजिह्वः सप्तैधाः सप्तवाहनः ।
अमूर्तिरनघोऽचिन्त्यो भयकृद्भयनाशनः ॥sahasrārciḥ saptajihvaḥ saptaidhāḥ saptavāhanaḥ |
amūrtiranagho'cintyo bhayakṛdbhayanāśanaḥ ||भावार्थ: सहस्र ज्वाला तथा सात जिह्वा, ईंधन और वाहन अग्नि-संबंधी विस्तार दिखाते हैं। अमूर्ति, अनघ और अचिंत्य के साथ भयकृत् तथा भयनाशन आते हैं। प्रबल और आश्रय देने वाले दोनों पक्ष उपस्थित हैं।
नाम-श्लोक 90
अणुर्बृहत्कृशः स्थूलो गुणभृन्निर्गुणो महान् ।
अधृतः स्वधृतः स्वास्यः प्राग्वंशो वंशवर्धनः ॥aṇurbṛhatkṛśaḥ sthūlo guṇabhṛnnirguṇo mahān |
adhṛtaḥ svadhṛtaḥ svāsyaḥ prāgvaṃśo vaṃśavardhanaḥ ||भावार्थ: अणु-बृहत्, कृश-स्थूल और गुणभृत्-निर्गुण विरोधी पद व्यापकता खोलते हैं। अधृत तथा स्वधृत बाहरी आधार से स्वतंत्रता बताते हैं। प्राग्वंश और वंशवर्धन के साथ उत्पत्ति तथा निरंतरता का भाव आता है।
नाम-श्लोक 91
भारभृत् कथितो योगी योगीशः सर्वकामदः ।
आश्रमः श्रमणः क्षामः सुपर्णो वायुवाहनः ॥bhārabhṛt kathito yogī yogīśaḥ sarvakāmadaḥ |
āśramaḥ śramaṇaḥ kṣāmaḥ suparṇo vāyuvāhanaḥ ||भावार्थ: भार धारण, कथित स्वरूप, योगी और योगीश के साथ सर्वकामद आते हैं। आश्रम, श्रमण, क्षाम, सुपर्ण और वायुवाहन आश्रय, प्रयास तथा गति की छवियाँ हैं। विश्राम और साधना को साथ समझना चाहिए।
नाम-श्लोक 92
धनुर्धरो धनुर्वेदो दण्डो दमयिता दमः ।
अपराजितः सर्वसहो नियन्ताऽनियमोऽयमः ॥dhanurdharo dhanurvedo daṇḍo damayitā damaḥ |
aparājitaḥ sarvasaho niyantā'niyamo'yamaḥ ||भावार्थ: धनुष धारण, धनुर्वेद, दंड, दमयिता और दम अनुशासन के भाव हैं। अपराजित, सर्वसह और नियंता के बाद अनियम तथा अयम बाहरी नियंत्रण से स्वतंत्रता दिखाते हैं। व्यवस्था और स्वतंत्र प्रभुता साथ हैं।
नाम-श्लोक 93
सत्त्ववान् सात्त्विकः सत्यः सत्यधर्मपरायणः ।
अभिप्रायः प्रियार्होऽर्हः प्रियकृत् प्रीतिवर्धनः ॥sattvavān sāttvikaḥ satyaḥ satyadharmaparāyaṇaḥ |
abhiprāyaḥ priyārho'rhaḥ priyakṛt prītivardhanaḥ ||भावार्थ: सत्त्ववान, सात्त्विक, सत्य तथा सत्यधर्मपरायण अच्छे और सत्य आचरण का आधार हैं। अभिप्राय, प्रियार्ह, अर्ह, प्रियकृत् तथा प्रीतिवर्धन उस आधार को प्रियता और प्रेम बढ़ाने वाले संबंध में फैलाते हैं।
नाम-श्लोक 94
विहायसगतिर्ज्योतिः सुरुचिर्हुतभुग्विभुः ।
रविर्विरोचनः सूर्यः सविता रविलोचनः ॥vihāyasagatirjyotiḥ surucirhutabhugvibhuḥ |
ravirvirocanaḥ sūryaḥ savitā ravilocanaḥ ||भावार्थ: आकाशगति और ज्योति के बाद सुरुचि तथा हुतभुक् आते हैं। रवि, विरोचन, सूर्य, सविता और रविलोचन सूर्य की निरंतर छवि बनाते हैं। प्रकाश और जीवन को प्रवर्तित करने वाली शक्ति की स्तुति है।
नाम-श्लोक 95
अनन्तो हुतभुग्भोक्ता सुखदो नैकजोऽग्रजः ।
अनिर्विण्णः सदामर्षी लोकाधिष्ठानमद्भुतः ॥ananto hutabhugbhoktā sukhado naikajo'grajaḥ |
anirviṇṇaḥ sadāmarṣī lokādhiṣṭhānamadbhutaḥ ||भावार्थ: अनंत, हुतभुक् और भोक्ता सुखदाता, अनेक जन्मों में प्रकट तथा अग्रज भी हैं। अनिर्विण्ण, सदा सहनशील प्रभु लोकाधिष्ठान और अद्भुत कहे गए हैं। अनेक अभिव्यक्तियों में भी उनका आधारस्वरूप बना रहता है।
नाम-श्लोक 96
सनात्सनातनतमः कपिलः कपिरव्ययः ।
स्वस्तिदः स्वस्तिकृत्स्वस्ति स्वस्तिभुक्स्वस्तिदक्षिणः ॥sanātsanātanatamaḥ kapilaḥ kapiravyayaḥ |
svastidaḥ svastikṛtsvasti svastibhuksvastidakṣiṇaḥ ||भावार्थ: सनात और सनातनतम, कपिल, कपि तथा अव्यय के बाद स्वस्ति के पाँच संबंध आते हैं। स्वस्ति देने, बनाने, स्वयं स्वस्ति होने, ग्रहण करने तथा प्रदान करने से एक कल्याणकारी भाव अनेक रूपों में खुलता है।
नाम-श्लोक 97
अरौद्रः कुण्डली चक्री विक्रम्यूर्जितशासनः ।
शब्दातिगः शब्दसहः शिशिरः शर्वरीकरः ॥araudraḥ kuṇḍalī cakrī vikramyūrjitaśāsanaḥ |
śabdātigaḥ śabdasahaḥ śiśiraḥ śarvarīkaraḥ ||भावार्थ: अरौद्र, कुंडली और चक्री के साथ विक्रम तथा ऊर्जित शासन हैं। शब्दातीत और शब्दसह भाषा से परे होकर उसे धारण करने के भाव हैं। शिशिर और शर्वरीकर शीतलता तथा रात्रि का विश्राम जोड़ते हैं।
नाम-श्लोक 98
अक्रूरः पेशलो दक्षो दक्षिणः क्षमिणांवरः ।
विद्वत्तमो वीतभयः पुण्यश्रवणकीर्तनः ॥akrūraḥ peśalo dakṣo dakṣiṇaḥ kṣamiṇāṃvaraḥ |
vidvattamo vītabhayaḥ puṇyaśravaṇakīrtanaḥ ||भावार्थ: अक्रूर, पेशल, दक्ष और दक्षिण में सौम्यता तथा कुशलता है। क्षमाशीलों में श्रेष्ठ प्रभु विद्वत्तम और वीतभय भी हैं। पुण्यश्रवणकीर्तन सुनने तथा स्मरण के पवित्र भाव से श्लोक समाप्त करता है।
नाम-श्लोक 99
उत्तारणो दुष्कृतिहा पुण्यो दुःस्वप्ननाशनः ।
वीरहा रक्षणः सन्तो जीवनः पर्यवस्थितः ॥uttāraṇo duṣkṛtihā puṇyo duḥsvapnanāśanaḥ |
vīrahā rakṣaṇaḥ santo jīvanaḥ paryavasthitaḥ ||भावार्थ: उत्तारण और दुष्कृतिहा कठिनाई से पार तथा दुष्कर्म के हरण के नाम हैं। पुण्य और दुःस्वप्ननाशन के बाद वीरहा, रक्षण, संत, जीवन और पर्यवस्थित आश्रय तथा सर्वत्र उपस्थिति की छवि बनाते हैं।
नाम-श्लोक 100
अनन्तरूपोऽनन्तश्रीर्जितमन्युर्भयापहः ।
चतुरश्रो गभीरात्मा विदिशो व्यादिशो दिशः ॥anantarūpo'nantaśrīrjitamanyurbhayāpahaḥ |
caturaśro gabhīrātmā vidiśo vyādiśo diśaḥ ||भावार्थ: अनंत रूप और अनंत श्री के साथ क्रोध-विजय तथा भयहरण हैं। चतुरश्र की समता या पूर्णता और गंभीर आत्मभाव के बाद विदिश, व्यादिश तथा दिशा आते हैं। असीमता के साथ व्यवस्था भी है।
नाम-श्लोक 101–107
नाम-श्लोक 101
अनादिर्भूर्भुवो लक्ष्मीः सुवीरो रुचिराङ्गदः ।
जननो जनजन्मादिर्भीमो भीमपराक्रमः ॥anādirbhūrbhuvo lakṣmīḥ suvīro rucirāṅgadaḥ |
janano janajanmādirbhīmo bhīmaparākramaḥ ||भावार्थ: अनादि स्वरूप, भूर्भुव और लक्ष्मी के बाद सुवीर तथा रुचिरांगद आते हैं। जनन और जन्म का आदि कारण भीम तथा भीमपराक्रम कहे गए हैं। सृष्टि की उत्पत्ति और प्रबल रक्षा का भाव साथ है।
नाम-श्लोक 102
आधारनिलयोऽधाता पुष्पहासः प्रजागरः ।
ऊर्ध्वगः सत्पथाचारः प्राणदः प्रणवः पणः ॥ādhāranilayo'dhātā puṣpahāsaḥ prajāgaraḥ |
ūrdhvagaḥ satpathācāraḥ prāṇadaḥ praṇavaḥ paṇaḥ ||भावार्थ: आधारनिलय और अधाता के साथ फूल-सी मुस्कान तथा जागरूकता की छवियाँ हैं। ऊर्ध्वग, सत्पथाचार, प्राणद और प्रणव के बाद पण अर्पण या विनिमय से संबंधित अर्थों की ओर संकेत करता है।
नाम-श्लोक 103
प्रमाणं प्राणनिलयः प्राणभृत्प्राणजीवनः ।
तत्त्वं तत्त्वविदेकात्मा जन्ममृत्युजरातिगः ॥pramāṇaṃ prāṇanilayaḥ prāṇabhṛtprāṇajīvanaḥ |
tattvaṃ tattvavidekātmā janmamṛtyujarātigaḥ ||भावार्थ: प्रमाण, प्राणनिलय, प्राणभृत् और प्राणजीवन जीवन के आधार को बताते हैं। तत्त्व, तत्त्वविद् और एकात्मा के बाद जन्म, मृत्यु तथा जरा से परे होने का नाम है। प्राण से परम आधार तक क्रम बढ़ता है।
नाम-श्लोक 104
भूर्भुवःस्वस्तरुस्तारः सविता प्रपितामहः ।
यज्ञो यज्ञपतिर्यज्वा यज्ञाङ्गो यज्ञवाहनः ॥bhūrbhuvaḥsvastarustāraḥ savitā prapitāmahaḥ |
yajño yajñapatiryajvā yajñāṅgo yajñavāhanaḥ ||भावार्थ: भूर्भुवःस्वः के वृक्ष और तार के बाद सविता तथा प्रपितामह आते हैं। यज्ञ, यज्ञपति, यज्वा, यज्ञांग और यज्ञवाहन अनुष्ठान के स्वामी, करने वाले, अंग तथा साधन को एक संबंध में रखते हैं।
नाम-श्लोक 105
यज्ञभृद् यज्ञकृद् यज्ञी यज्ञभुग् यज्ञसाधनः ।
यज्ञान्तकृद् यज्ञगुह्यमन्नमन्नाद एव च ॥yajñabhṛd yajñakṛd yajñī yajñabhug yajñasādhanaḥ |
yajñāntakṛd yajñaguhyamannamannāda eva ca ||भावार्थ: यज्ञ का धारण, निर्माण, अनुष्ठान और ग्रहण उसके साधन, अंत तथा गुह्य भाव से जुड़ते हैं। अन्न तथा अन्नाद अंत में आते हैं। अर्पण का संबंध जीवन के सामान्य भोजन और पोषण तक फैलता है।
नाम-श्लोक 106
आत्मयोनिः स्वयञ्जातो वैखानः सामगायनः ।
देवकीनन्दनः स्रष्टा क्षितीशः पापनाशनः ॥ātmayoniḥ svayañjāto vaikhānaḥ sāmagāyanaḥ |
devakīnandanaḥ sraṣṭā kṣitīśaḥ pāpanāśanaḥ ||भावार्थ: आत्मयोनि और स्वयंजात के साथ वैखान तथा सामगायन आते हैं। देवकीनंदन स्रष्टा, क्षितीश और पापनाशन भी हैं। एक विशिष्ट जन्म की कृष्ण-छवि विश्व की उत्पत्ति तथा पालन से जुड़ती है।
नाम-श्लोक 107
शङ्खभृन्नन्दकी चक्री शार्ङ्गधन्वा गदाधरः ।
रथाङ्गपाणिरक्षोभ्यः सर्वप्रहरणायुधः ॥śaṅkhabhṛnnandakī cakrī śārṅgadhanvā gadādharaḥ |
rathāṅgapāṇirakṣobhyaḥ sarvapraharaṇāyudhaḥ ||भावार्थ: शंख, नंदक तलवार, चक्र, शार्ङ्ग धनुष, गदा तथा रथ का चक्र अंतिम आयुधधारी स्वरूप हैं। अक्षोभ्य प्रभु सभी रक्षा-साधन धारण करते हैं। इस नाम-गणना में सर्वप्रहरणायुध अंतिम, हजारवाँ नाम है।
वनमाली प्रार्थना और संपूर्ण फलश्रुति
नाम-गणना श्लोक 107 के सर्वप्रहरणायुध पर समाप्त होती है। इसके बाद वनमाली रक्षा-प्रार्थना है। फलश्रुति सुनने, पाठ और भक्ति का पारंपरिक फल बताती है। आरोग्य, संपदा और मुक्ति के कथन धार्मिक आश्वासन हैं, मापे हुए परिणाम या व्यक्तिगत भविष्यवचन नहीं। आगे अच्छे आचार का जो महत्व आता है, उसे भी उतना ही ध्यान दें।
वनमाली समापन प्रार्थना
समापन प्रार्थना
वनमाली गदी शार्ङ्गी शङ्खी चक्री च नन्दकी ।
श्रीमान् नारायणो विष्णुर्वासुदेवोऽभिरक्षतु ॥vanamālī gadī śārṅgī śaṅkhī cakrī ca nandakī |
śrīmān nārāyaṇo viṣṇurvāsudevo'bhirakṣatu ||भावार्थ: वनमाला धारण करने वाले, गदा, शार्ङ्ग धनुष, शंख, चक्र और नंदक तलवार से युक्त श्रीमान नारायण, विष्णु, वासुदेव हमारी रक्षा करें। यह प्रार्थना हजार नामों के बाद आती है; गिनती पूरी करने के लिए अतिरिक्त नाम नहीं जोड़ती।
फलश्रुति 1–22
फलश्रुति 1
इतीदं कीर्तनीयस्य केशवस्य महात्मनः ।
नाम्नां सहस्रं दिव्यानामशेषेण प्रकीर्तितम् ॥itīdaṃ kīrtanīyasya keśavasya mahātmanaḥ |
nāmnāṃ sahasraṃ divyānāmaśeṣeṇa prakīrtitam ||भावार्थ: समापन कहता है कि स्तुति योग्य महात्मा केशव के दिव्य सहस्र नाम पूरे कहे गए हैं। नाम-क्रम समाप्त होकर पाठ के फल का वर्णन शुरू होता है।
फलश्रुति 2
य इदं शृणुयान्नित्यं यश्चापि परिकीर्तयेत् ।
नाशुभं प्राप्नुयात्किञ्चित्सोऽमुत्रेह च मानवः ॥ya idaṃ śṛṇuyānnityaṃ yaścāpi parikīrtayet |
nāśubhaṃ prāpnuyātkiñcitso'mutreha ca mānavaḥ ||भावार्थ: नियमित सुनने और पाठ करने को इस लोक तथा परलोक के शुभ से जोड़ा गया है। यह फलश्रुति का भक्तिपूर्ण आश्वासन है; जीवन में कभी कठिनाई न आने की तथ्यात्मक गारंटी नहीं।
फलश्रुति 3
वेदान्तगो ब्राह्मणः स्यात्क्षत्रियो विजयी भवेत् ।
वैश्यो धनसमृद्धः स्याच्छूद्रः सुखमवाप्नुयात् ॥vedāntago brāhmaṇaḥ syātkṣatriyo vijayī bhavet |
vaiśyo dhanasamṛddhaḥ syācchūdraḥ sukhamavāpnuyāt ||भावार्थ: ऐतिहासिक वर्ण-भाषा में ब्राह्मण के लिए वेदांतज्ञान, क्षत्रिय के लिए विजय, वैश्य के लिए संपदा और शूद्र के लिए सुख कहा गया है। इसका पाठ आज किसी के अध्ययन या भक्ति पर रोक स्थापित नहीं करता।
फलश्रुति 4
धर्मार्थी प्राप्नुयाद्धर्ममर्थार्थी चार्थमाप्नुयात् ।
कामानवाप्नुयात्कामी प्रजार्थी प्राप्नुयात्प्रजाम् ॥dharmārthī prāpnuyāddharmamarthārthī cārthamāpnuyāt |
kāmānavāpnuyātkāmī prajārthī prāpnuyātprajām ||भावार्थ: धर्म, अर्थ, इच्छित फल और संतान की आकांक्षाएँ पाठ से जोड़ी गई हैं। यह पारंपरिक फलवर्णन है; किसी व्यक्ति के धन या संतान का निश्चित भविष्यवचन नहीं।
फलश्रुति 5
भक्तिमान् यः सदोत्थाय शुचिस्तद्गतमानसः ।
सहस्रं वासुदेवस्य नाम्नामेतत्प्रकीर्तयेत् ॥bhaktimān yaḥ sadotthāya śucistadgatamānasaḥ |
sahasraṃ vāsudevasya nāmnāmetatprakīrtayet ||भावार्थ: भक्त पाठक नियमित उठकर, शुचिता रखते हुए और वासुदेव में मन लगाकर सहस्र नाम कहता है। यहाँ केवल गिनती पूरी करने के बजाय भक्ति तथा ध्यान को प्रमुखता है।
फलश्रुति 6
यशः प्राप्नोति विपुलं ज्ञातिप्राधान्यमेव च ।
अचलां श्रियमाप्नोति श्रेयः प्राप्नोत्यनुत्तमम् ॥yaśaḥ prāpnoti vipulaṃ jñātiprādhānyameva ca |
acalāṃ śriyamāpnoti śreyaḥ prāpnotyanuttamam ||भावार्थ: यश, संबंधियों में आदर, स्थिर श्री और उत्तम श्रेय फल के रूप में कहे गए हैं। श्री का मंगलकारी भाव किसी निश्चित आय, संपत्ति या धनराशि के वचन से व्यापक है।
फलश्रुति 7
न भयं क्वचिदाप्नोति वीर्यं तेजश्च विन्दति ।
भवत्यरोगो द्युतिमान्बलरूपगुणान्वितः ॥na bhayaṃ kvacidāpnoti vīryaṃ tejaśca vindati |
bhavatyarogo dyutimānbalarūpaguṇānvitaḥ ||भावार्थ: निर्भयता, वीर्य, तेज, आरोग्य, बल और सुंदर गुण साथ कहे गए हैं। आरोग्य की भाषा धार्मिक मंगलकामना है। बीमारी होने पर पाठ को चिकित्सा का विकल्प मानना इसका व्यावहारिक निष्कर्ष नहीं है।
फलश्रुति 8
रोगार्तो मुच्यते रोगाद्बद्धो मुच्येत बन्धनात् ।
भयान्मुच्येत भीतस्तु मुच्येतापन्न आपदः ॥rogārto mucyate rogādbaddho mucyeta bandhanāt |
bhayānmucyeta bhītastu mucyetāpanna āpadaḥ ||भावार्थ: रोग, बंधन, भय और आपदा से मुक्ति आश्रय का भाव व्यक्त करती है। भक्तिपूर्ण आशा को उपचार, सुरक्षा या आवश्यक सहायता छोड़ने का निर्देश नहीं समझना चाहिए।
फलश्रुति 9
दुर्गाण्यतितरत्याशु पुरुषः पुरुषोत्तमम् ।
स्तुवन्नामसहस्रेण नित्यं भक्तिसमन्वितः ॥durgāṇyatitaratyāśu puruṣaḥ puruṣottamam |
stuvannāmasahasreṇa nityaṃ bhaktisamanvitaḥ ||भावार्थ: पुरुषोत्तम की भक्तिपूर्वक नित्य सहस्रनाम स्तुति कठिनाइयों से पार होने से जुड़ी है। इसका भाव धैर्य और शरण है; किसी समस्या के समाधान की मापी हुई समयसीमा नहीं दी गई।
फलश्रुति 10
वासुदेवाश्रयो मर्त्यो वासुदेवपरायणः ।
सर्वपापविशुद्धात्मा याति ब्रह्म सनातनम् ॥vāsudevāśrayo martyo vāsudevaparāyaṇaḥ |
sarvapāpaviśuddhātmā yāti brahma sanātanam ||भावार्थ: वासुदेव के आश्रित और परायण मनुष्य को पाप से शुद्ध होकर सनातन ब्रह्म की ओर जाता कहा गया है। यह पूर्व की इच्छाओं से आगे मोक्ष की आध्यात्मिक दिशा है।
फलश्रुति 11
न वासुदेवभक्तानामशुभं विद्यते क्वचित् ।
जन्ममृत्युजराव्याधिभयं नैवोपजायते ॥na vāsudevabhaktānāmaśubhaṃ vidyate kvacit |
janmamṛtyujarāvyādhibhayaṃ naivopajāyate ||भावार्थ: भक्तों के लिए अशुभ तथा जन्म, मृत्यु, जरा और रोग के भय से मुक्ति कही गई है। भय पर यह आध्यात्मिक दृष्टि शारीरिक अमरता का दावा नहीं है।
फलश्रुति 12
इमं स्तवमधीयानः श्रद्धाभक्तिसमन्वितः ।
युज्येतात्मसुखक्षान्तिश्रीधृतिस्मृतिकीर्तिभिः ॥imaṃ stavamadhīyānaḥ śraddhābhaktisamanvitaḥ |
yujyetātmasukhakṣāntiśrīdhṛtismṛtikīrtibhiḥ ||भावार्थ: श्रद्धा और भक्ति से पाठ करने को आत्मसुख, क्षांति, श्री, धृति, स्मृति तथा कीर्ति से जोड़ा गया है। फलवर्णन पाठक के स्वभाव और स्थिर ध्यान की ओर भी जाता है।
फलश्रुति 13
न क्रोधो न च मात्सर्यं न लोभो नाशुभा मतिः ।
भवन्ति कृतपुण्यानां भक्तानां पुरुषोत्तमे ॥na krodho na ca mātsaryaṃ na lobho nāśubhā matiḥ |
bhavanti kṛtapuṇyānāṃ bhaktānāṃ puruṣottame ||भावार्थ: पुरुषोत्तम के पुण्यवान भक्तों में क्रोध, ईर्ष्या, लोभ और अशुभ बुद्धि न रहने का आदर्श कहा गया है। यह नैतिक आकांक्षा है; केवल पाठ करना हानिकारक आचरण को उचित नहीं बनाता।
फलश्रुति 14
द्यौः सचन्द्रार्कनक्षत्रा खं दिशो भूर्महोदधिः ।
वासुदेवस्य वीर्येण विधृतानि महात्मनः ॥dyauḥ sacandrārkanakṣatrā khaṃ diśo bhūrmahodadhiḥ |
vāsudevasya vīryeṇa vidhṛtāni mahātmanaḥ ||भावार्थ: चंद्र, सूर्य और नक्षत्रों सहित आकाश, दिशाएँ, पृथ्वी तथा महोदधि वासुदेव की शक्ति से धारण किए गए बताए जाते हैं। अनेक प्रदेशों के एक आधार की विश्वस्तुति है।
फलश्रुति 15
ससुरासुरगन्धर्वं सयक्षोरगराक्षसम् ।
जगद्वशे वर्ततेदं कृष्णस्य सचराचरम् ॥sasurāsuragandharvaṃ sayakṣoragarākṣasam |
jagadvaśe vartatedaṃ kṛṣṇasya sacarācaram ||भावार्थ: देव, असुर, गंधर्व, यक्ष, सर्प और राक्षस सहित चर-अचर जगत कृष्ण के अधीन कहा गया है। यह ग्रंथ की धार्मिक विश्वकल्पना की भाषा है।
फलश्रुति 16
इन्द्रियाणि मनो बुद्धिः सत्त्वं तेजो बलं धृतिः ।
वासुदेवात्मकान्याहुः क्षेत्रं क्षेत्रज्ञ एव च ॥indriyāṇi mano buddhiḥ sattvaṃ tejo balaṃ dhṛtiḥ |
vāsudevātmakānyāhuḥ kṣetraṃ kṣetrajña eva ca ||भावार्थ: इंद्रिय, मन, बुद्धि, सत्त्व, तेज, बल और धृति वासुदेवात्मक कहे गए हैं। क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ भी इसमें हैं। अनुभव तथा उसके ज्ञाता का संबंध फिर सामने आता है।
फलश्रुति 17
सर्वागमानामाचारः प्रथमं परिकल्प्यते ।
आचारप्रभवो धर्मो धर्मस्य प्रभुरच्युतः ॥sarvāgamānāmācāraḥ prathamaṃ parikalpyate |
ācāraprabhavo dharmo dharmasya prabhuracyutaḥ ||भावार्थ: सभी आगमों में आचार को पहले रखा गया है। आचार से धर्म प्रकट होता है और अच्युत धर्म के प्रभु हैं। यह श्लोक पाठ को नैतिक जिम्मेदारी से अलग समझने का संशोधन करता है।
फलश्रुति 18
ऋषयः पितरो देवा महाभूतानि धातवः ।
जङ्गमाजङ्गमं चेदं जगन्नारायणोद्भवम् ॥ṛṣayaḥ pitaro devā mahābhūtāni dhātavaḥ |
jaṅgamājaṅgamaṃ cedaṃ jagannārāyaṇodbhavam ||भावार्थ: ऋषि, पितर, देव, महाभूत, धातु और समस्त चर-अचर जगत नारायण से उत्पन्न कहा गया है। एक स्रोत का भाव अस्तित्व के विविध क्षेत्रों तक बढ़ता है।
फलश्रुति 19
योगो ज्ञानं तथा साङ्ख्यं विद्याः शिल्पादिकर्म च ।
वेदाः शास्त्राणि विज्ञानमेतत्सर्वं जनार्दनात् ॥yogo jñānaṃ tathā sāṅkhyaṃ vidyāḥ śilpādikarma ca |
vedāḥ śāstrāṇi vijñānametatsarvaṃ janārdanāt ||भावार्थ: योग, ज्ञान, सांख्य, विद्याएँ, शिल्प-कर्म, वेद, शास्त्र और विज्ञान जनार्दन से जुड़े कहे गए हैं। ध्यान के साथ कौशलपूर्ण कार्य भी ज्ञान की इस व्यापक दृष्टि में शामिल हैं।
फलश्रुति 20
एको विष्णुर्महद्भूतं पृथग्भूतान्यनेकशः ।
त्रींल्लोकान्व्याप्य भूतात्मा भुङ्क्ते विश्वभुगव्ययः ॥eko viṣṇurmahadbhūtaṃ pṛthagbhūtānyanekaśaḥ |
trīṃllokānvyāpya bhūtātmā bhuṅkte viśvabhugavyayaḥ ||भावार्थ: एक महद्भूत विष्णु अनेक पृथक प्राणियों में उपस्थित होकर तीन लोकों में व्याप्त हैं। अव्यय विश्वभुक् की छवि में नामों के एकत्व और अनेकत्व का भाव फिर लौटता है।
फलश्रुति 21
इमं स्तवं भगवतो विष्णोर्व्यासेन कीर्तितम् ।
पठेद्य इच्छेत्पुरुषः श्रेयः प्राप्तुं सुखानि च ॥imaṃ stavaṃ bhagavato viṣṇorvyāsena kīrtitam |
paṭhedya icchetpuruṣaḥ śreyaḥ prāptuṃ sukhāni ca ||भावार्थ: श्रेय और सुख चाहने वाले को विष्णु की इस स्तुति का पाठ करने को कहा गया है। यहाँ व्यास का पारंपरिक उल्लेख है; वह किसी आधुनिक अनुवादक की पहचान नहीं है।
फलश्रुति 22
विश्वेश्वरमजं देवं जगतः प्रभुमव्ययम् ।
भजन्ति ये पुष्कराक्षं न ते यान्ति पराभवम् ॥viśveśvaramajaṃ devaṃ jagataḥ prabhumavyayam |
bhajanti ye puṣkarākṣaṃ na te yānti parābhavam ||भावार्थ: अजन्मा, अविनाशी विश्वेश्वर तथा कमलनेत्र प्रभु के भक्तों के लिए पराभव न होने का आश्वासन है। समापन दिव्य आश्रय का विश्वास है, हर सांसारिक प्रतियोगिता जीतने का वचन नहीं।
हजार नामों की गिनती, अर्थ और उच्चारण
सहस्र का अर्थ हजार और नाम का अर्थ नाम है। यह संख्या विशेषणों के पारंपरिक विभाजन की है, छपी पंक्ति में रिक्त स्थानों की नहीं। संधि से ध्वनियाँ जुड़ती हैं; कई शब्द मिलकर एक गिना हुआ नाम बन सकते हैं। एक नाम अलग स्थानों पर फिर आ सकता है। पुनरावृत्ति हटाने से परंपरागत क्रम बदल जाएगा। क्रमांकित नामावली में एक से हजार तक प्रविष्टियाँ हैं; इस व्यवस्था का अंतिम नाम सर्वप्रहरणायुध है।
स्तोत्र इन नामों को छंद की पंक्तियों में रखता है। नामावली में अलग नमस्कार के लिए व्याकरणिक रूप बदलता है, जैसे ॐ … नमः। विष्णुः का विष्णवे होना इसका उदाहरण है। प्रत्येक छपे शब्द को बिना विभाजन और व्याकरण जाँचे अलग नामावली प्रविष्टि बना देना सही तरीका नहीं है।
| पाठ | क्या समझें | पढ़ने में ध्यान |
|---|---|---|
| विश्वं — viśvam | पहला नाम जगत या समग्रता का भाव देता है | आरंभिक प्रार्थनाएँ नाम-गणना में न जोड़ें |
| नारायणः — nārāyaṇaḥ | इसके अनेक पारंपरिक अर्थ हैं | ā दीर्घ और ṇ मूर्धन्य न है |
| शिवः — śivaḥ | कल्याणकारी विशेषण विष्णु की स्तुति में भी है | कुछ देव-विशेषण विभिन्न स्तुतियों में आते हैं |
| वसुप्रदः — vasupradaḥ | श्लोक 74 में दो बार आता है | पुनरावृत्ति को छपाई की भूल मानकर न हटाएँ |
| अमृताशः / अमृतांशः | यहाँ श्लोक 87 में अमृताश चुना गया है | अमृतांश अलग शब्द और पाठांतर है |
| सर्वप्रहरणायुधः | श्लोक 107 का अंतिम गिना हुआ नाम | वनमाली प्रार्थना इस गिनती के बाहर है |
IAST में ā, ī, ū दीर्घ स्वर हैं; ṛ ऋ है; ś और ṣ श तथा ष के भेद दिखाते हैं। ṃ अनुस्वार और ḥ विसर्ग के चिह्न हैं। ’ अवग्रह में लुप्त स्वर का संकेत है। खड़ी रेखाएँ दंड के विराम हैं, उच्चारण का शब्द नहीं। हिंदी बोलते समय अंत का अ अक्सर लुप्त होता है; संस्कृत पाठ में संबंधित स्वर देखकर पढ़ें।
किसी संस्करण में स्पष्ट नासिक्य व्यंजन और दूसरे में अनुस्वार लिखा हो सकता है। कभी अंतर वास्तव में शब्द का पाठांतर होता है। सीखते समय एक संस्करण रखें और पूरे श्लोक में अंतर देखें। चुने श्लोक 12 का समात्माऽसम्मितः बिना समझे दूसरे विभाजन से न बदलें। अलग टीका के अर्थ को अलग पाठ पर लागू करने से भ्रम हो सकता है।
पढ़ने तथा अध्ययन की सरल योजना
पहली बार में अध्ययन और तेज पाठ को अलग रखें। ध्यान का अर्थ, दो प्रश्न-श्लोक और पहले पाँच नाम-श्लोक से शुरू करें। एक लौटता भाव पहचानें, जैसे धारण या साक्षी। अगले दिन अपने चिह्नित स्थान से आगे पढ़ें। यह अध्ययन की योजना है; सभी 107 मुख्य श्लोक पढ़ने से पहले इसे संपूर्ण पाठ न कहें।
अध्ययन के लिए 1–20, 21–40, 41–60, 61–80, 81–100 और अंत में 101–107 का क्रम लिया जा सकता है। प्रत्येक समूह के लिए आवश्यक दिन दें। कठिन पंक्ति में संस्कृत धीरे पढ़ें, रोमन पंक्ति मिलाएँ, अर्थ देखें और उसी संस्करण का विश्वसनीय पाठ सुनें। समूह परिचित होने के बाद पूरा स्तोत्र निरंतर पढ़ना सरल होता है।
सामान्य भक्तिपाठ में आरामदायक आसन और ध्यान दे सकने वाला समय चुनें। घर की परंपरा में चित्र, फूल या दीप हो सकते हैं। इस लेख में उन्हें सबके लिए अनिवार्य सामग्री नहीं बनाया गया है। संकल्पित अनुष्ठान, मंदिर का क्रम या गुरु-निर्देशित साधना के अतिरिक्त नियम उसी पद्धति में सीखने चाहिए।
फलश्रुति में ऐतिहासिक वर्ण-भाषा, संतान की आकांक्षा और आरोग्य की मंगलकामनाएँ हैं। पूरा पाठ प्रसंग सहित रखा गया है। उससे आज किसी विद्यार्थी को बाहर करना, रोग का निदान करना या संतान का भविष्य तय करना उचित निष्कर्ष नहीं है। श्लोक 17 का आचार पर जोर पाठ को जीवन की जिम्मेदारी से जोड़ता है।
पृष्ठ का मुख्य पाठ जावास्क्रिप्ट चलने से पहले भी पढ़ा जा सकता है। ऊपर के बटन से अक्षर बड़े करें, समूह लिंक से पुराने श्लोक पर लौटें और प्रिंट से अध्ययन प्रति बनाएँ। पाठ तथा अर्थ के लिए कोई खाता या ऑडियो प्लेयर आवश्यक नहीं है।
छोटी विष्णु-प्रार्थना के लिए उग्रं वीरं नरसिंह पाठ पढ़ें। दूसरी संपूर्ण रचना के लिए हनुमान चालीसा का पाठ और अर्थ देखें। सरल गृह-उपासना का क्रम घर पर शुरुआती पूजा में मिलता है।
सामान्य प्रश्न
ये उत्तर संस्करण, गिनती और पाठ सीखने की बात स्पष्ट करते हैं।
विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र है या हजार अलग मंत्र?
यहाँ दिया पाठ छंदबद्ध स्तोत्र है, जिसमें परंपरागत गणना के हजार नाम आते हैं। नामावली उन्हें अलग-अलग नमस्कारों में रखती है। दोनों रूप उपयोगी हैं, पर उनका व्याकरण और पाठ-क्रम एक जैसा नहीं है।
हजार नामों के लिए केवल 107 मुख्य श्लोक क्यों हैं?
एक श्लोक में कई गिने हुए विशेषण आते हैं। हजार नामों की संख्या है, श्लोकों की नहीं। आरंभ, संवाद और समापन के पद मुख्य नाम-श्लोकों से अलग रखे गए हैं।
क्या चुने संस्करण का पूरा पाठ यहाँ है?
हाँ। 107 नाम-श्लोक, संवाद के तेरह, एक शांताकारं ध्यान, एक वनमाली प्रार्थना और फलश्रुति के बाईस पद हैं। कुल 144 पद संस्कृत, लिप्यंतरण और मौलिक भावार्थ सहित हैं। वैकल्पिक न्यास तथा अन्य परिशिष्ट इस संस्करण के बाहर हैं।
क्या रोमन अक्षरों से पाठ कर सकते हैं?
IAST पंक्ति संस्कृत ध्वनियों का सहायक लिप्यंतरण है। हिंदी भावार्थ अर्थ समझाता है, वह मूल मंत्र नहीं है। दीर्घ स्वर, विसर्ग, अनुस्वार और संयुक्त व्यंजन धीरे सीखें; पाठ-शिक्षक का मार्गदर्शन उपयोगी है।
नाम बार-बार क्यों आते हैं और पुस्तकों में अंतर क्यों है?
पुनरावृत्ति प्राप्त नाम-क्रम का हिस्सा है। पुस्तकों में नासिक्य लेखन, संधि, विभाजन या वास्तविक पाठांतर भी हो सकते हैं। एक संस्करण से सीखें और पूरे श्लोक में अंतर जाँचें; अलग पंक्तियाँ मनमाने ढंग से न मिलाएँ।
क्या निश्चित मिनटों में पाठ पूरा करना जरूरी है?
इस मार्गदर्शिका में निश्चित अवधि नहीं है। गति परिचय, अर्थ पढ़ने और आरंभिक प्रार्थनाओं पर निर्भर है। अध्ययन समूहों में हो सकता है; संपूर्ण पाठ तभी कहें जब पूरा अपेक्षित क्रम पढ़ा हो।