माण्डूक्य मंत्र 6: अर्थ और अनुवाद

माण्डूक्य उपनिषद् के छठे मंत्र का संस्कृत पाठ और अर्थ जानें। सर्वेश्वर, अंतर्यामी तथा समस्त प्राणियों के स्रोत की व्याख्या संदर्भ सहित पढ़ें।

हिंदू संस्कृति और दर्शनलेख · 7 मिनटRead in English ↗

संक्षिप्त उत्तर: माण्डूक्य मंत्र 6 क्या कहता है?

माण्डूक्य उपनिषद् का छठा मंत्र आत्मा के तीसरे पाद, प्राज्ञ, का वर्णन ईश्वरत्व, सर्वज्ञता और जगत के मूल स्रोत की भाषा में करता है। इसका भाव है: “यह सबका ईश्वर, सबका ज्ञाता, अंतर्यामी और सबका स्रोत है; इसी से प्राणियों की उत्पत्ति और लय होते हैं।” मंत्र 5 ने गहरी निद्रा का परिचय दिया है; मंत्र 6 उस अनुभव के व्यापक अर्थ की ओर बढ़ता है। इसके बाद मंत्र 7 तुरीय, अर्थात् “चौथी” अवस्था, का वर्णन करता है जो जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति की सामान्य सीमाओं से परे है।

यह मंत्र यह नहीं कहता कि सामान्य नींद अपने-आप मुक्ति दे देती है। यह आत्मा तथा गहरी निद्रा से जुड़े अव्यक्त कारण की दार्शनिक व्याख्या करता है। भाष्य-परंपराएँ प्राज्ञ, ईश्वर और तुरीय के संबंध को अलग तरह से समझाती हैं; इसलिए मंत्र के मूल शब्द और किसी एक दर्शन की व्याख्या अलग रखना उपयोगी है।

संस्कृत पाठ और सरल अर्थ

एष सर्वेश्वर एष सर्वज्ञ एषोऽन्तर्याम्येष योनिः सर्वस्य प्रभवाप्ययौ हि भूतानाम् ॥ ६ ॥

eṣa sarveśvara eṣa sarvajña eṣo’ntaryāmī eṣa yoniḥ sarvasya prabhavāpyayau hi bhūtānām

सरल अनुवाद है: “यह सबका ईश्वर है, सबका ज्ञाता है, भीतर स्थित नियंता है और सबका स्रोत है। प्राणी इसी से उत्पन्न होते हैं और इसी में लीन होते हैं।” अनुवाद में योनि के लिए “स्रोत”, “गर्भ” या “उद्गम” जैसे शब्द मिलते हैं। ये सभी उस मूल आधार का संकेत देते हैं जिससे जीव प्रकट होते हैं और जिसमें लौटते हैं।

एष अर्थात् “यह” पिछले मंत्र में बताए आत्म-स्वरूप से संबंध जोड़ता है। यह किसी दूर स्थित वस्तु की कल्पना भर नहीं है। मंत्र चैतन्य और अनुभव के आधार पर विचार करने को कहता है; उसका पूरा तात्त्विक अर्थ पढ़े जा रहे भाष्य और परंपरा पर निर्भर करता है।

सर्वेश्वर, सर्वज्ञ और अंतर्यामी

सर्वेश्वर का अर्थ “सबका ईश्वर” और सर्वज्ञ का अर्थ “सबका ज्ञाता” है। अंतर्यामी को प्रायः “भीतर से नियमन करने वाला” या “हृदय में स्थित नियंता” कहा जाता है। ये शब्द आत्मा को केवल किसी एक व्यक्ति की निजी चेतना तक सीमित नहीं रखते; वे ऐसे मूल सिद्धांत की बात करते हैं जो सभी प्राणियों में विद्यमान और समस्त जगत के क्रम से जुड़ा है।

“नियंता” का अर्थ यह सरल धारणा नहीं कि कोई शक्ति हर घटना को अलग से निर्देशित करती रहती है। वेदांत चर्चा में यह शब्द अंतःस्थित आत्मतत्त्व, ईश्वर या व्यक्ति और समष्टि के संबंध को समझा सकता है। भाष्यकार अलग अर्थों पर जोर देते हैं। अध्ययन करते समय लिखें कि किसी व्याख्या में कौन-सा अर्थ लिया गया है; अंग्रेजी या हिंदी का एक पर्याय ही अंतिम अर्थ नहीं होता।

मंत्र गहरी निद्रा की बात क्यों करता है?

मंत्र 5 गहरी निद्रा के अनुभवकर्ता को प्राज्ञ कहता है; उस समय सामान्य स्वप्न नहीं होता और बाहरी विषयों की परिचित चेतना भी नहीं रहती। मंत्र 6 उसी तीसरे पाद को समस्त प्राणियों के स्रोत तथा अंतर्यामी के रूप में वर्णित करता है। सुषुप्ति में व्यक्ति को ज्ञाता और ज्ञेय का सामान्य भेद अनुभव नहीं होता, लेकिन जागने पर संसार का परिचित अनुभव लौट आता है। उपनिषद् इस अवस्था को चेतना की जाँच का एक चरण बनाता है, अंतिम आध्यात्मिक उपलब्धि नहीं।

यह फर्क महत्वपूर्ण है: स्वप्न याद न होना आत्मज्ञान के बराबर नहीं। नींद अस्थायी है और उसका अंत जागने में होता है। उपनिषद् जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति की तुलना करके पूछता है कि इन सबमें मूल क्या है। अगला मंत्र तुरीय का वर्णन कर इस प्रश्न को आगे बढ़ाता है।

माण्डूक्य उपनिषद् की रचना में मंत्र 6

माण्डूक्य उपनिषद् केवल बारह मंत्रों का संक्षिप्त ग्रंथ है। आरंभ में ओम् को समस्त काल और अस्तित्व से जोड़ा गया है; अगले मंत्र जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति को उसके पादों से जोड़ते हैं। मंत्र 6 तीसरे पाद का वर्णन पूरा करता है। मंत्र 7 फिर कहता है कि आत्मा न केवल भीतर की चेतना है, न केवल बाहरी चेतना, न दोनों का मिश्रण, न सामान्य चेतना और न अचेतनता। उसे शांत, मंगलमय और अद्वैत कहा गया है, और जानने योग्य बताया गया है।

इस क्रम से स्पष्ट है कि मंत्र 6 अकेला पूरा उपदेश नहीं है। ईश्वर और कारण की भाषा उस प्रश्न की तैयारी करती है जिसे मंत्र 7 स्पष्ट करता है: अवस्था-आधारित वर्णनों से परे आत्मा क्या है? आगे के मंत्र अ, उ, म और उनके बाद के मौन को इस शिक्षा से जोड़ते हैं। पूरा बारह-मंत्रों वाला पाठ पढ़ना किसी एक श्लोक को अलग लेने से अधिक उपयोगी है।

वेदांत में प्राज्ञ और ईश्वर की व्याख्या

अद्वैत की अनेक व्याख्याओं में गहरी निद्रा के व्यक्तिगत अनुभवकर्ता को प्राज्ञ कहा जाता है और समष्टि के कारण-तत्त्व को ईश्वर के रूप में समझाया जाता है। तब मंत्र 6 की सर्वज्ञ प्रभु वाली भाषा किसी सीमित व्यक्ति की नींद का विवरण नहीं, बल्कि समष्टि के कारण-दृष्टिकोण का वर्णन बनती है। अद्वैत तुरीय को इस कारण-अवस्था से भी अलग रखता है; वह केवल अज्ञानपूर्ण रिक्तता नहीं है।

वेदांत की दूसरी परंपराएँ जीव, ईश्वर और जगत के संबंध को अपनी विशिष्ट धर्म-दृष्टि से समझाती हैं। इसलिए “इस मंत्र का केवल यही अर्थ है” कहना मतभेद को छिपा सकता है। सावधान पाठक भाष्य की परंपरा पहचानता है, संस्कृत पदों को देखता है और मानता है कि छोटा मंत्र गहन व्याख्या आमंत्रित करता है। मूल शब्दों को समझाना संभव है, बिना यह दावा किए कि सभी परंपराओं का दर्शन बिल्कुल एक है।

‘उत्पत्ति और लय’ का भाव

प्रभव और अप्यय जैसे पद प्रकट होने और लौटने का संकेत देते हैं: प्राणी एक मूल स्रोत से आते और उसी में लीन होते हैं। हिंदू चिंतन में जगत को सृष्टि, स्थिति और लय के चक्रों में समझने की परंपरा रही है; इसे केवल एक बार हुए आरंभ की कहानी तक सीमित नहीं किया जाता। मंत्र 6 में स्रोत का रूपक ध्यान को बदलते रूपों से हटाकर उस आधार की ओर ले जाता है जिस पर उनका प्रकट होना निर्भर है।

यह मंत्र आधुनिक भौतिकी का विवरण नहीं देता, इसलिए इसे ब्रह्मांड-विज्ञान का वैज्ञानिक सिद्धांत बताना उचित नहीं। यह उपनिषद् के भीतर का आध्यात्मिक और तात्त्विक कथन है। कोई अनुवाद “गर्भ” से सृजन के रूपक को बनाए रखता है, तो कोई “उद्गम” या “स्रोत” कहकर अर्थ स्पष्ट करता है। कई अनुवाद पढ़ने से अर्थ की व्यापकता दिखती है और शास्त्र तथा आधुनिक विज्ञान का भेद भी बना रहता है।

मंत्र 6 का विचारपूर्वक अध्ययन

पहले मंत्र 5, 6 और 7 को साथ पढ़ें। गहरी निद्रा, स्रोत, अंतर्यामी और तुरीय से जुड़े शब्द चिह्नित करें और देखें कि एक मंत्र से अगले मंत्र तक विचार कैसे बढ़ता है। एक सरल अनुवाद की तुलना ऐसी टीका से करें जो अपनी वेदांत-परंपरा बताती हो। संस्कृत पढ़ें तो संधि और उच्चारण के लिए विश्वसनीय संस्करण देखें; लिप्यंतरण की प्रणालियाँ अलग हो सकती हैं और रोमन अक्षर केवल सहायक हैं।

मनन के लिए पूछें कि जाग्रत, स्वप्न और निद्रा में संसार का अनुभव कैसे बदलता है और इन बदलावों के साक्षी के बारे में उपनिषद् क्या प्रश्न उठाता है। इस चिंतन को इस दावे से अलग रखें कि नींद, अचेतनता या कोई एक ध्यान-अनुभव अपने-आप आत्मज्ञान है। यह मंत्र दार्शनिक खोज का मार्ग देता है। धैर्यपूर्वक पाठ, नैतिक जीवन और जानकार शिक्षक या अध्ययन-मंडली की सहायता किसी पंक्ति को त्वरित गारंटी बनाने से बेहतर है।

सामान्य प्रश्न

माण्डूक्य उपनिषद् मंत्र 6 का अर्थ क्या है?

यह प्राज्ञ अर्थात् सुषुप्ति के तीसरे पाद को सबका ईश्वर, ज्ञाता, अंतर्यामी और वह स्रोत बताता है जिससे प्राणी उत्पन्न होकर लीन होते हैं।

मंत्र 6 के संस्कृत आरंभ का अर्थ क्या है?

“एष सर्वेश्वर एष सर्वज्ञ” का अर्थ है “यह सबका ईश्वर और सबका ज्ञाता है।”

अंतर्यामी का क्या अर्थ है?

अंतर्यामी का सामान्य अर्थ भीतर से नियमन करने वाला है; भाष्य और दर्शन के अनुसार इसकी व्याख्या बदल सकती है।

क्या मंत्र 6 कहता है कि गहरी नींद मुक्ति है?

नहीं। नींद अस्थायी अवस्था है। उपनिषद् जाग्रत और स्वप्न के साथ इसकी तुलना के बाद मंत्र 7 में तुरीय का वर्णन करता है।

‘योनि: सर्वस्य’ का क्या अर्थ है?

इसका अनुवाद “सबका स्रोत” या “सबका उद्गम” हो सकता है; यह प्राणियों के मूल आधार की ओर संकेत करता है।

मंत्र 6 और मंत्र 7 में क्या अंतर है?

मंत्र 6 प्राज्ञ नामक तीसरे पाद का वर्णन करता है; मंत्र 7 तुरीय को सामान्य अवस्थाओं से परे बताता है।

क्या मंत्र 6 ओम् के बारे में है?

यह ओम् और आत्मा पर माण्डूक्य उपनिषद् की शिक्षा का हिस्सा है, पर इसका सीधा विषय प्राज्ञ और प्राणियों का स्रोत है।

क्या सभी वेदांत परंपराएँ मंत्र 6 का एक ही अर्थ करती हैं?

नहीं। प्राज्ञ, ईश्वर, जीव और तुरीय के संबंध पर अलग वेदांत परंपराओं की व्याख्याएँ भिन्न हो सकती हैं।

लेख सूची पर लौटें →

Google पर एस्ट्रोज्ञान से जुड़े रहें

एस्ट्रोज्ञान को Google Search में अपने पसंदीदा स्रोतों में जोड़ें।

Google पर पसंदीदा स्रोत बनाएँ