संक्षिप्त उत्तर: रक्षाबंधन (राखी) क्या है?
रक्षाबंधन (राखी) श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि को मनाया जाने वाला स्नेह, विश्वास और परस्पर रक्षा-संकल्प का प्रमुख हिंदू पर्व है, जिसमें बहनें, भाई, पुरोहित और परिजन कलाई पर रक्षासूत्र बाँधकर धर्म व कुशलता की कामना करते हैं। धर्मशास्त्र के ग्रंथों में भद्रा (विष्टि करण) के दौरान राखी बाँधना पूर्णतः वर्जित माना गया है और भद्रा समाप्ति के बाद अपराह्न काल या प्रदोष काल को श्रेष्ठ मुहूर्त बताया गया है।
- श्रावण शुक्ल पूर्णिमा के प्रथम अर्धभाग में रहने वाली भद्रा (विष्टि करण) के समाप्त होने पर ही रक्षासूत्र बाँधा जाता है।
- शास्त्रीय पूजन में राजा बलि और लक्ष्मी-वामन प्रसंग से जुड़ा मंत्र 'येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः' पढ़ा जाता है।
- इसी पूर्णिमा पर वैदिक 'श्रावणी उपाकर्म' (अवनी अविट्टम), तटीय 'नारळी पूर्णिमा' और हयग्रीव जयंती भी मनाई जाती हैं।
श्रावण पूर्णिमा के पंचांग नियम: भद्रा काल का निषेध और अपराह्न मुहूर्त का चयन
निर्णयसिंधु, धर्मसिंधु और व्रतराज जैसे प्रामाणिक धर्मशास्त्रीय ग्रंथों में स्पष्ट सूत्र दिया गया है—'भद्रायां द्वे न कर्तव्ये श्रावणी फाल्गुनी तथा'—अर्थात् भद्रा काल में दो कार्य कभी नहीं करने चाहिए: श्रावणी (रक्षाबंधन) और फाल्गुनी (होलिका दहन)। पंचांगीय गणित के अनुसार प्रत्येक चंद्र तिथि के दो भाग (करण) होते हैं, और प्रत्येक पूर्णिमा तिथि का प्रथम अर्धभाग सदैव 'विष्टि करण' होता है, जिसे ज्योतिष व पुराणों में सूर्य देव और छाया की पुत्री तथा शनि देव की बहन 'भद्रा' कहा गया है। जब भद्रा का वास मृत्युलोक (पृथ्वी) में हो अथवा श्रावण पूर्णिमा के पूर्वार्ध में भद्रा व्याप्त हो, तब रक्षासूत्र बाँधने के लिए भद्रा समाप्ति (विष्टि करण समाप्त होकर बव करण के आरंभ) की प्रतीक्षा की जाती है। भद्रा के वास और चंद्र राशि के गणित को विस्तार से समझने के लिए आप हमारी भद्रावास: चंद्र राशि से भद्रा के निवास और प्रभाव की गणना मार्गदर्शिका और पंचांग व अंग्रेजी तारीख के अंतर के लिए हिंदू पंचांग में तिथि और कैलेंडर तारीख का अंतर लेख पढ़ सकते हैं।
भद्रा समाप्त होने के बाद रक्षाबंधन के लिए सबसे श्रेष्ठ समय 'अपराह्न काल' (दिनमान के पाँच भागों में चौथा भाग, अर्थात् दोपहर के बाद का समय) माना गया है। यदि किसी वर्ष पूर्णिमा तिथि दोपहर या संध्या में प्रारंभ हो और भद्रा सूर्यास्त के बाद तक रहे, तो पंचांगों में दो विकल्प दिए जाते हैं: या तो रात्रि से पूर्व भद्रा समाप्त होने पर 'प्रदोष काल' में रक्षासूत्र बाँधा जाए (अथवा अत्यंत अपरिहार्य यात्रा की स्थिति में ही 'भद्रा पुच्छ' काल का उपयोग किया जाए), या फिर अगले दिन सूर्योदय के बाद तीन मुहूर्त से अधिक व्याप्त रहने वाली 'उदयातिथि पूर्णिमा' के प्रातःकाल में पर्व मनाया जाए। भारत की अमांत और पूर्णिमांत पंचांग दोनों ही प्रणालियों में शुक्ल पक्ष और पूर्णिमा एक ही दिन पड़ती है, इसलिए श्रावण शुक्ल पूर्णिमा पूरे देश को एक ही चंद्र-दिवस पर जोड़ती है।
शास्त्रीय रक्षासूत्र मंत्र (येन बद्धो बली राजा), पौराणिक कथाएँ और श्रावण पूर्णिमा की विविध परंपराएँ
वैदिक और पौराणिक पूजा-पद्धतियों में कलाई पर रक्षासूत्र बाँधते समय दानवीर राजा बलि के प्रसंग से जुड़ा प्रसिद्ध संस्कृत मंत्र बोला जाता है: 'येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः। तेन त्वामनुबध्नामि रक्षे मा चल मा चल॥' इसका अर्थ है—'जिस धर्म, सत्य और वचन के रक्षासूत्र से महाबली दानवराज बलि बाँधे गए थे, उसी पवित्र बंधन से मैं तुम्हें बाँधता/बाँधती हूँ; हे रक्षे (रक्षासूत्र)! तुम अडिग रहना, कभी विचलित मत होना।' भागवत पुराण और वामन पुराण की परंपरा के अनुसार जब भगवान विष्णु ने वामन अवतार में राजा बलि की भक्ति से प्रसन्न होकर पाताल लोक (सुतल) में उनका द्वारपाल बनना स्वीकार किया, तब माता लक्ष्मी ने श्रावण पूर्णिमा के दिन राजा बलि को रक्षासूत्र बाँधकर अपना भाई बनाया और उपहार स्वरूप भगवान विष्णु को पुनः वैकुंठ चलने का आग्रह किया।
भविष्य पुराण (उत्तर पर्व) में रक्षासूत्र की एक और प्राचीन कथा मिलती है: देवासुर संग्राम के दौरान जब इंद्र पराजित होने लगे, तब देवगुरु बृहस्पति के परामर्श से इंद्राणी (शची) ने श्रावण शुक्ल पूर्णिमा को वैदिक मंत्रों से अभिमंत्रित रक्षासूत्र इंद्र की दाहिनी कलाई पर बाँधा, जिससे उन्हें विजय और सुरक्षा प्राप्त हुई। इसी प्रकार महाभारत की लोकप्रसिद्ध कथा में शिशुपाल-वध के समय जब सुदर्शन चक्र से श्रीकृष्ण की तर्जनी उँगली में चोट लगी, तब द्रौपदी ने तुरंत अपनी साड़ी का आँचल फाड़कर पट्टी बाँध दी; श्रीकृष्ण ने उस एक-एक धागे का ऋण चीरहरण के संकट में द्रौपदी की लाज बचाकर चुकाया। भाई-बहन के स्नेह के अतिरिक्त राजस्थान और मारवाड़ी परिवारों में भाभी की चूड़ी पर 'लूम्बा राखी' बाँधने की सुंदर परंपरा है। साथ ही, श्रावण पूर्णिमा को दक्षिण और उत्तर भारत में वेदपाठी व गृहस्थ सप्तर्षियों का तर्पण कर 'श्रावणी उपाकर्म' (तमिल में अवनी अविट्टम) मनाते हैं, और महाराष्ट्र व गुजरात के तटीय मछुआरे और नाविक समुद्र देवता वरुण को नारियल अर्पित कर 'नारळी पूर्णिमा' मनाते हैं।
| श्रावण पूर्णिमा का कालखंड | पंचांगीय / करण परिभाषा | राखी बाँधने की शास्त्रीय उपयुक्तता | गृहस्थ परिवारों के लिए व्यावहारिक निर्देश |
|---|---|---|---|
| भद्रा काल (विष्टि करण) | पूर्णिमा तिथि का प्रथम अर्धभाग (आरंभ से लगभग 10.5–12 घंटे) | पूर्णतः वर्जित ('भद्रायां द्वे न कर्तव्ये') | भोजन व थाली की तैयारी करें; राखी बाँधने के लिए भद्रा समाप्ति की प्रतीक्षा करें। |
| भद्रा मुख | भद्रा पुच्छ के बाद आने वाली दो घटी (48 मिनट) की अवधि | अशुभ; किसी भी मांगलिक कार्य के लिए त्याज्य | इस समय में रक्षासूत्र का अनुष्ठान प्रारंभ न करें। |
| भद्रा पुच्छ | भद्रा के अंतिम भाग की तीन घटी (72 मिनट) की अवधि | केवल अपरिहार्य यात्रा या आपात स्थिति में अनुमत | केवल तभी उपयोग करें जब भद्रा समाप्ति तक रुकना असंभव हो। |
| अपराह्न काल (भद्रा रहित) | विष्टि करण समाप्त होने के बाद दिनमान का चौथा भाग | धर्मसिंधु के अनुसार सर्वश्रेष्ठ मुख्य मुहूर्त | तिलक, रक्षासूत्र, आरती और पारिवारिक उत्सव के लिए आदर्श समय। |
| प्रदोष काल / उदयातिथि पूर्णिमा | भद्रा समाप्ति पश्चात् संध्या काल या अगले दिन की सूर्योदय-व्यापिनी पूर्णिमा | जब दोपहर भर भद्रा रहे तब मान्य द्वितीयक मुहूर्त | दो दिनों में पूर्णिमा बँटने पर अपने शहर के पंचांग का समय देखें। |
| पर्व का नाम | प्रमुख क्षेत्र और समुदाय | पूजित देवता / ऋषि | मुख्य अनुष्ठानिक क्रिया |
|---|---|---|---|
| रक्षाबंधन (राखी / सलूनो) | उत्तर, मध्य, पश्चिम और अखिल भारतीय परिवार | कुलदेवता, लक्ष्मी-नारायण और पारिवारिक स्नेह | रोली-अक्षत तिलक, कलाई पर रक्षासूत्र, आरती, मिठाई और आशीर्वाद। |
| श्रावणी उपाकर्म / अवनी अविट्टम | तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, आंध्र, महाराष्ट्र व उत्तर भारत | महर्षि वेदव्यास, सप्तर्षि और गायत्री | प्रायश्चित्त संकल्प, कांडर्षि तर्पण और नवीन यज्ञोपवीत (जनेऊ) धारण। |
| नारळी पूर्णिमा | महाराष्ट्र (कोंकण), गोवा और गुजरात के तटीय समाज | वरुण देव (समुद्र देवता) | मानसून शांत होने पर समुद्र में सुसज्जित श्रीफल (नारियल) अर्पित करना। |
| पवित्रोपना और हयग्रीव जयंती | वैष्णव मंदिर (गुजरात, ओडिशा, तमिलनाडु, मणिपुर) | भगवान विष्णु / ज्ञान-अवतार भगवान हयग्रीव | विष्णुजी को सूत की 'पवित्रा' माला अर्पित करना और विद्या-ग्रंथों का पूजन। |
रक्षा बंधन की तिथि और स्थानीय मुहूर्त
यह पर्व श्रावण पूर्णिमा से जुड़ा है, किसी तय अगस्त तारीख़ से नहीं। साल और स्थान के अनुसार पंचांग में तिथि का आरंभ या अंत अलग अंग्रेज़ी दिन पर हो सकता है। कई उत्तर भारतीय पंचांग राखी बाँधने के लिए भद्रा से बचने की सलाह देते हैं और उपलब्ध होने पर उचित दिनकाल या प्रदोष का समय बताते हैं। सही चयन-नियम परंपरा के अनुसार बदल सकता है; अपने परिवार के पंचांग या मंदिर-कैलेंडर में पुष्टि करें।
समारोह जिस शहर में होगा, वही स्थान चुनें—खासकर जब परिवार के लोग अलग समय-क्षेत्रों में हों। वर्ष, पूर्णिमा तिथि, भद्रा समाप्ति और स्थानीय मुहूर्त साथ में देखें। दिल्ली के लिए बना संदेश टोरंटो, दुबई या सिंगापुर में अपने-आप लागू नहीं होगा। धार्मिक समय को सप्ताहांत में होने वाले सामुदायिक कार्यक्रम से अलग रखें।
राखी बाँधने का भाव
रक्षा बंधन का अर्थ सुरक्षा का बंधन माना जाता है। आज कई परिवारों में धागा परस्पर स्नेह, भाई-बहन के अपनत्व और कल्याण के आशीर्वाद का प्रतीक है। दूर रहने वाले रिश्तेदार मिठाई, छोटा उपहार, साथ का भोजन या फोन-कॉल साझा कर सकते हैं। ये रीतियाँ हैं, परिवार के प्रेम को नापने का पैमाना नहीं।
यह समारोह भाई-बहन, चचेरे-ममेरे रिश्तेदार, मित्र और चुने हुए परिवारजन अपने ढंग से कर सकते हैं। यह न कहें कि लिंग के आधार पर एक व्यक्ति ही दूसरे की रक्षा करने को बाध्य है या उपहार महँगा होना चाहिए। सम्मान, सुनना और जरूरत पर मदद करने का साझा संकल्प धागे से आगे पर्व को अर्थ देता है।
राखी से जुड़ी कथाएँ
रक्षा बंधन के साथ कई कथाएँ सुनाई जाती हैं। इनमें इंद्राणी द्वारा इंद्र को रक्षा-सूत्र बाँधने का प्रसंग और महाभारत से जोड़ी जाने वाली द्रौपदी-कृष्ण कथा शामिल हैं। दूसरी लोकप्रिय कथाएँ राजा-रानी या रक्षा माँगती बहन का प्रसंग बताती हैं। उनके पाठ और बाद की लोक-परंपराएँ अलग हो सकती हैं।
हर राखी-रीति का एक ही ऐतिहासिक आरंभ बताना जरूरी नहीं। सावधान लेख कथा को भक्ति-परंपरा या महाकाव्य से जुड़ी स्मृति कहता है, किसी एक शास्त्र का शब्दशः अंश नहीं। परिवार किसी दूसरी कथा को जान सकता है या आज के रिश्ते पर ध्यान दे सकता है।
घर पर सरल समारोह
कई घर राखी, दीप या कुमकुम की छोटी थाली, मिठाई और शुभकामना रखते हैं। आम क्रम में परिवार इकट्ठा होता है, अपनी रीति के अनुसार प्रार्थना या तिलक करता है, धागा बाँधता है और आशीर्वाद या उपहार साझा करता है। क्रम और सामग्री अलग-अलग हो सकती है; सबके लिए एक ही खरीद-सूची नहीं।
- स्थानीय तिथि और घर में माने जाने वाले समय की पुष्टि करें।
- राखी बाँधने और पहनने वाले व्यक्ति की पसंद पूछें।
- सहज धागा चुनें; बहुत कसकर न बाँधें और त्वचा को चुभने वाली सामग्री से बचें।
- रिश्ते के अनुसार आशीर्वाद, भोजन या फोन साझा करें।
- दूर रह रहे रिश्तेदार चाहें तो संदेश या वीडियो-कॉल से शामिल हों।
कुछ लोग हाथ की बनी या दोबारा उपयोग योग्य राखी चुनते हैं; दूसरे सादी प्रार्थना करते हैं। भागीदारी स्वेच्छा से होनी चाहिए।
श्रावण पूर्णिमा के क्षेत्रीय पर्व
महाराष्ट्र और कोंकण तट के कुछ हिस्सों में नारळी पूर्णिमा समुद्रतटीय समुदायों से जुड़ी है; नारियल अर्पण, मछली पकड़ने का मौसम और स्थानीय रीति अलग हो सकती है। कुछ क्षेत्रों में कजरी पूर्णिमा या अन्य मौसमी पर्वों भी इसी पूर्णिमा के आसपास आती हैं। वैदिक-अध्ययन के कई समुदायों में यजुर्वेद उपाकर्म या अवणी अवित्तम अलग संस्कार है, जो किसी वर्ष इसी दिन पड़ सकता है। कैलेंडर पर एक दिन होना इन्हें रक्षा बंधन की समान विधि नहीं बनाता।
स्कूल, कार्यस्थल या प्रवासी संस्था राखी-मिलन तिथि के पास सप्ताहांत पर कर सकती है। कार्यक्रम की सूचना में धार्मिक कैलेंडर-दिन और आयोजन-दिन अलग लिखें। अन्य तिथि-व्रत का उदाहरण हमारी पुत्रदा एकादशी मार्गदर्शिका है, जो बताती है कि स्थानीय पंचांग के नियम को नाम से बताना क्यों उपयोगी है।
दूरी और विविधता के साथ उत्सव
विदेश में रह रहे परिवार राखी भेज सकते हैं, खुद बना सकते हैं, संदेश लिख सकते हैं या समय मिलने पर कॉल रख सकते हैं। कोई व्यक्ति राखी न मनाता हो तो प्यार भरी शुभकामना को रस्म निभाने का दबाव न बनाएं। मिठाई भेजने से पहले भोजन-संबंधी जरूरत पूछें और अंतरराष्ट्रीय डाक के नियम देखें।
कुछ समुदाय भाई-बहन से आगे के रिश्तों को भी दिन में जगह देते हैं; कुछ केवल निकट परिवार में समारोह रखते हैं। जो रीति आप साझा कर रहे हों, उसका संदर्भ बताएं, उसे हर हिंदू घर का नियम न कहें। हिंदी, अंग्रेज़ी या क्षेत्रीय भाषा में संदेश—सब स्नेह पहुँचा सकते हैं।
संबंधित पर्व और उपासना मार्गदर्शिकाएँ
भद्रावास की गणना, पंचांग की तिथि और घड़ी की तारीख के अंतर तथा अमांत व पूर्णिमांत चंद्र मास प्रणालियों को समझने के लिए नीचे दिए गए लेख पढ़ें।
सामान्य प्रश्न
पाठकों के सामान्य प्रश्नों के संक्षिप्त उत्तर।
श्रावण पूर्णिमा पर भद्रा काल में राखी बाँधना क्यों वर्जित माना जाता है?
हिंदू पंचांग में प्रत्येक पूर्णिमा का पहला आधा भाग 'विष्टि करण' अर्थात् भद्रा होता है। धर्मसिंधु और निर्णयसिंधु में स्पष्ट विधान है कि भद्रा काल में श्रावणी (रक्षाबंधन) और होलिका दहन नहीं करने चाहिए, क्योंकि विष्टि करण को उग्र माना गया है।
शास्त्रीय रक्षासूत्र मंत्र 'येन बद्धो बली राजा' का हिंदी अर्थ क्या है?
इस मंत्र ('येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः, तेन त्वामनुबध्नामि रक्षे मा चल मा चल') का अर्थ है: 'जिस धर्म और वचन के बंधन से महाबली दानवराज बलि बाँधे गए थे, उसी सूत्र से मैं तुम्हें बाँधता/बाँधती हूँ; हे रक्षासूत्र, तुम स्थिर रहना, कभी अडिग मत होना।'
यदि रक्षाबंधन के दिन भद्रा शाम या रात तक रहे तो परिवार क्या करें?
अपने शहर के पंचांग में भद्रा समाप्ति का सटीक समय देखें और भद्रा समाप्त होने के बाद प्रदोष काल (संध्या समय) में अथवा यदि पूर्णिमा अगले दिन सूर्योदय के बाद तीन मुहूर्त तक रहे तो उदयातिथि में राखी बाँधें।
क्या रक्षासूत्र केवल सगे भाई और बहन के बीच ही बाँधा जाता है?
नहीं। भारतीय परंपरा में रक्षासूत्र भाई-बहन के अलावा बहनों के बीच, भाभी की चूड़ी पर ('लूम्बा राखी'), पुरोहित द्वारा यजमान को, गुरु-शिष्य के बीच, तथा वृक्षों और राष्ट्र-रक्षकों को भी स्नेह और सुरक्षा के संकल्प के रूप में बाँधा जाता है।
रक्षाबंधन के तिलक में टूटे हुए चावल के बजाय अखंडित 'अक्षत' क्यों लगाए जाते हैं?
संस्कृत में 'अक्षत' का अर्थ है जिसका क्षय न हो या जो टूटा हुआ न हो। रोली या चंदन के तिलक पर साबुत चावल लगाने का भाव यह है कि परिवार का स्नेह, स्वास्थ्य और धर्म-संकल्प अखंड और अटूट बना रहे।
श्रावणी उपाकर्म (अवनी अविट्टम) और नारळी पूर्णिमा का रक्षाबंधन से क्या संबंध है?
ये तीनों पर्व एक ही तिथि—श्रावण शुक्ल पूर्णिमा—को मनाए जाते हैं। जहाँ घरों में राखी बँधती है, वहीं वैदिक परंपरा में सप्तर्षि तर्पण और जनेऊ परिवर्तन (उपाकर्म) होता है, तथा पश्चिमी तट पर समुद्र देवता वरुण को नारियल अर्पित कर नारळी पूर्णिमा मनाई जाती है।