हिंदू धर्म में हनुमान-उपासना: दास्य भक्ति, ग्रंथ, मंगल-शनि साधना और आचार

वाल्मीकि रामायण, रामचरितमानस और हनुमान चालीसा के आलोक में हनुमान-उपासना, दास्य भक्ति, मंगल-शनि साधना, सात्विक अर्पण और चारित्रिक आदर्श समझें।

ज्योतिष और हिंदू परंपरालेख · 12 मिनटRead in English ↗

संक्षिप्त उत्तर: हिंदू धर्म में हनुमान-उपासना का क्या अर्थ है

हिंदू धर्म में हनुमान-उपासना का केंद्र श्रीराम के प्रति निष्काम दास्य भक्ति, विवेक, साहस, विनम्रता और संयम को जीवन में उतारना है। वाल्मीकि रामायण (किष्किंधा और सुंदरकांड) तथा गोस्वामी तुलसीदास के रामचरितमानस और हनुमान चालीसा के आधार पर भक्त राम-दरबार और स्वतंत्र हनुमान मंदिरों में मंगल-शनि प्रार्थना, सात्विक नैवेद्य और परोपकार के माध्यम से उनकी आराधना करते हैं।

  • शास्त्रीय आधारों में वाल्मीकि रामायण के किष्किंधा व सुंदरकांड, तुलसीदास का रामचरितमानस, हनुमान चालीसा और संकटमोचन हनुमानाष्टक प्रमुख हैं।
  • हनुमान जी की आराधना श्रीराम-दरबार में दास्य-भाव से और स्वतंत्र मंदिरों में वीर व रक्षक रूप—दोनों में समान श्रद्धा से होती है।
  • सात्विक गृहस्थ उपासना स्त्री-पुरुष दोनों के लिए खुली है और भय-आधारित तंत्र-दावों या निश्चित भौतिक गारंटियों को अस्वीकार करती है।

शास्त्रीय आधार: वाल्मीकि रामायण का सुंदरकांड, तुलसीदास का मानस और चालीसा परंपरा

हनुमान जी की उपासना विद्वानों से लेकर सामान्य गृहस्थों तक को समान रूप से क्यों प्रेरित करती है, इसे समझने के लिए उनके चरित्र के दो प्रमुख ग्रंथीय स्तरों को देखना उपयोगी है। आदिकाव्य वाल्मीकि रामायण के किष्किंधाकांड में ऋष्यमूक पर्वत पर जब हनुमान जी पहली बार श्रीराम और लक्ष्मण से संवाद करते हैं, तब श्रीराम उनके व्याकरण-ज्ञान, वाणी के संयम और वैदिक पांडित्य (नवव्याकरणवेत्ता) की भूरि-भूरि प्रशंसा करते हैं। इसके पश्चात सुंदरकांड में समुद्र-लंघन, लंका में सूक्ष्म निरीक्षण, अशोकवाटिका में सीता जी को धैर्य बँधाना और रावण की सभा में निर्भीक धर्म-संवाद—यह सब दिखाता है कि हनुमान जी का अतुलित बल (अतुलितबलधामं) सदैव विवेक (बुद्धिमतां वरिष्ठम्) और धर्म-मर्यादा से अनुशासित रहता है।

सोलहवीं शताब्दी में गोस्वामी तुलसीदास की अवधी और ब्रज भक्ति-परंपरा—जिसमें रामचरितमानस, विनयपत्रिका, हनुमान बाहुक, हमारा विस्तृत मार्गदर्शक हनुमान चालीसा के चालीस चौपाइयों का पाठ और अर्थ तथा आठ पदों वाला संकटमोचन हनुमानाष्टक शामिल हैं—ने हनुमान जी को दास्य भक्ति के सर्वोच्च आदर्श और कलयुग में राम-नाम के जाग्रत रक्षक के रूप में जन-जन के हृदय में स्थापित किया। इसी द्विविध भूमिका के कारण हिंदू मंदिरों में हनुमान जी के दो पूरक विग्रह मिलते हैं: एक ओर श्रीराम-दरबार (राम, सीता, लक्ष्मण और भरत-शत्रुघ्न) के चरणों में अंजलि-मुद्रा में बैठे सेवक रूप में, और दूसरी ओर स्वतंत्र मंदिरों में वीर हनुमान या पंचमुखी हनुमान के रक्षक रूप में।

हनुमान-उपासना (दास्य भक्ति) के चार आधार-स्तंभ1. राम-नाम और स्मरणप्रत्येक हनुमान प्रार्थना का आरंभ श्रीराम-सीता-लक्ष्मण स्मरण सेवाल्मीकि सुंदरकांड एवं तुलसीदास कृत रामचरितमानस2. स्वाध्याय और पाठहनुमान चालीसा, संकटमोचन अष्टक और सुंदरकांड का अर्थ-सहित पाठकेवल यांत्रिक गति के बजाय चौपाइयों के भाव का चिंतन3. सात्विक उपचारदीप, लाल पुष्प, गुड़-चना/बूँदी नैवेद्य और तुलसी दल अर्पणमंदिर मर्यादा का पालन और बिना लिंग-भेद के सात्विक भक्ति4. चारित्रिक आचार व सेवाबल + बुद्धि (विवेक) + विनय (निरहंकारिता) का समन्वययश की कामना के बिना समाज और परिवार की निस्वार्थ सेवा
शास्त्रीय हनुमान-भक्ति में श्रीराम-स्मरण, अर्थपूर्ण पाठ, सात्विक अर्पण और निस्वार्थ सेवा—चारों का संतुलन रहता है।
हनुमान-उपासना के प्रमुख ग्रंथ और साधना में उनका योगदान
ग्रंथ एवं परंपराभाषा और संरचनाहनुमान जी के स्वरूप का चित्रणदैनिक व साप्ताहिक उपासना में उपयोग
वाल्मीकि रामायण (किष्किंधा व सुंदरकांड)शास्त्रीय संस्कृत महाकाव्य (सुंदरकांड में 68 सर्ग)नीतिज्ञ परामर्शदाता, व्याकरणज्ञ, सीता के करुणामय दूत और धर्मनिष्ठ वीरमंगलवार, शनिवार या विशेष संकल्पों पर सुंदरकांड का पारायण
रामचरितमानस (सुंदरकांड) — तुलसीदासअवधी दोहा, चौपाई, सोरठा और छंददास्य भक्ति की साकार मूर्ति जिनका बल राम-कृपा और विनम्रता से जाग्रत होता हैपारिवारिक या सामूहिक संगीतमय पाठ और नित्य स्वाध्याय
हनुमान चालीसा — तुलसीदासअवधी; 2 दोहे (आरंभ), 40 चौपाइयाँ और 1 अंतिम दोहाज्ञान, गुण, सुग्रीव-विभीषण-लक्ष्मण सहायता और भक्त-रक्षा का सहज सारश्रीराम-स्मरण के पश्चात प्रातः या सायंकाल नियमित पाठ
संकटमोचन हनुमानाष्टक — तुलसीदासअवधी/ब्रज; मत्तगयंद छंद के 8 पदबालपन से लंका-युद्ध तक संकट हरने के आठ प्रसंगों का स्मरणकठिन समय में धैर्य और साहस के लिए चालीसा के साथ पाठ
हनुमान बाहुक एवं आंजनेय स्तोत्रअवधी (बाहुक) और संस्कृत स्तोत्र-परंपरावायुपुत्र और रुद्रांश के रूप में स्तुति तथा कष्ट में धैर्य की प्रार्थनाउचित चिकित्सा और संयम के साथ मानसिक बल के लिए पाठ

मंगलवार–शनिवार उपासना, सात्विक नैवेद्य और समावेशी उपासना-आचार

उत्तर, मध्य और दक्षिण भारत से लेकर प्रवासी हिंदू मंदिरों तक मंगलवार (मंगलवार) और शनिवार (शनिवार) को हनुमान जी की विशेष आराधना का दिन माना जाता है, साथ ही चैत्र पूर्णिमा, कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी (नरक चतुर्दशी) या मार्गशीर्ष मूल नक्षत्र को हनुमान जयंती मनाई जाती है। घर पर चरणबद्ध पूजन, आचमन, संकल्प और मंत्र-क्रम के लिए हमारा विस्तृत मार्गदर्शक घर पर हनुमान पूजा विधि और सामग्री देखें। घरेलू सात्विक पूजा के लिए स्वच्छ आसन, घी या तिल के तेल का दीपक, लाल या पीले फूल, भोग में श्रीराम को प्रिय तुलसी दल, और गुड़-भुना चना, बूँदी, लड्डू या केले जैसा सरल नैवेद्य पूर्णतः पर्याप्त है।

समकालीन परिवारों के लिए उपासना से जुड़े दो व्यावहारिक और नैतिक बिंदुओं को स्पष्ट समझना आवश्यक है। पहला, महिलाओं द्वारा हनुमान-उपासना: स्त्री, पुरुष और बच्चे—सभी समान श्रद्धा से हनुमान जी की प्रार्थना कर सकते हैं, घर में दीप जला सकते हैं, नैवेद्य अर्पित कर सकते हैं और हनुमान चालीसा या सुंदरकांड का पाठ कर सकते हैं। कुछ पारंपरिक मंदिरों में जहाँ हनुमान जी की नैष्ठिक ब्रह्मचारी रूप में प्राण-प्रतिष्ठित पाषाण प्रतिमा होती है, वहाँ गर्भगृह के भीतर मूर्ति को सीधे स्पर्श करने या सिंदूर-चमेली का चोला चढ़ाने का कार्य केवल नियुक्त पुजारियों तक सीमित रहता है। गर्भगृह की मूर्ति-स्पर्श संबंधी उस स्थानीय मर्यादा को यह भ्रामक रूप नहीं देना चाहिए कि महिलाओं के लिए हनुमान-भक्ति या चालीसा-पाठ वर्जित है। दूसरा, भय दिखाकर महँगे तांत्रिक उपाय बेचने या मुकदमे, बीमारी व धन-लाभ की शत-प्रतिशत गारंटी देने वाले दावों से दूर रहें; सच्ची हनुमान-उपासना निर्भयता, ईमानदारी और सेवा सिखाती है।

हनुमान-उपासना में क्षेत्रीय अर्पण-रीतियाँ और गृहस्थ आचार-मर्यादा
उपासना का पक्षउत्तर एवं मध्य भारतीय रीतिदक्षिण भारतीय (आंजनेय) रीतिगृहस्थ एवं नैतिक मार्गदर्शन
प्रमुख नैवेद्य और पत्रबूँदी, बेसन के लड्डू, गुड़-चना, लाल गुड़हल/गेंदे के फूल और तुलसी दलवड़ा माला (उड़द दाल के वड़ों की माला), वेन्नै काप्पु (मक्खन अलंकरण), पान के पत्तों की माला (वेत्रिलै माला) और तुलसी मालाघर पर ताजा, सात्विक और सामर्थ्य के अनुसार भोग लगाएँ तथा प्रसाद परिवार व पड़ोसियों में बाँटें
मंदिर अलंकरण (शृंगार)मंदिर के पुजारियों द्वारा सिंदूर और चमेली के तेल से चोला अर्पणचंदन लेपन, नवनीत (मक्खन) शृंगार और रजत/स्वर्ण कवच धारणघर के चित्र या छोटी प्रतिमा पर केवल सिंदूर या चंदन का तिलक लगाएँ; कागज के चित्र पर तेल न डालें
श्रीराम-दरबार से संबंधचालीसा या सुंदरकांड से पूर्व ‘श्रीराम जय राम जय जय राम’ संकीर्तनवैष्णव मंदिरों में पेरुमल (विष्णु/राम) के साथ ‘सिरिय तिरुवडि’ के रूप में अर्चनहनुमान पूजा में सदैव श्रीराम, सीता और लक्ष्मण का संक्षिप्त स्मरण अवश्य करें
समावेशी सहभागितास्त्री, पुरुष और बच्चे सभी चालीसा पाठ, आरती और दर्शन में सहभागी होते हैंसभी भक्त आंजनेय अर्चन, नाम-रामायण गान और प्रदक्षिणा में भाग लेते हैंप्राण-प्रतिष्ठित मूर्ति के स्पर्श-नियम को प्रार्थना या पाठ के अधिकार से अलग समझें

रामायण और भक्ति परंपराओं में हनुमान

रामायण में हनुमान प्रमुख पात्र हैं; विशेषकर सुंदरकांड में वे समुद्र पार करते, लंका में सीता को खोजते और उनके तथा राम के बीच संदेश ले जाते हैं। तुलसीदास की रामचरितमानस और हनुमान चालीसा जैसे बाद के भक्ति-ग्रंथों ने करोड़ों लोगों का उनसे परिचय कराया। अनेक वैष्णव परंपराओं में राम के प्रति उनकी भक्ति दास्य भक्ति—ईश्वर की प्रेमपूर्वक सेवा—का आदर्श है। दूसरी परंपराएँ हनुमान को अपने आप में शक्तिशाली रक्षक और आराध्य देव मानती हैं।

रामायण की शाखाओं, क्षेत्रों और समुदायों में कथाएँ तथा विवरण बदलते हैं। कोई भक्त बल पर, कोई विद्या, ब्रह्मचर्य, आरोग्य, रक्षा या बुद्धि पर बल देता है। इन बातों को उसी परंपरा के संदर्भ में समझें जिसने कथा कही है; इन्हें एक सर्वमान्य जीवनी न बना दें। पढ़ते समय देखें कि अंश वाल्मीकि रामायण, लोकभाषा के रूपांतर, पुराण या बाद के स्तोत्र से है। हर विधा की अपनी शैली और भक्ति-भूमिका होती है।

भक्त जिन गुणों को जीवन में अपनाते हैं

हनुमान का आदर्श बल को संयम से जोड़ता है। राम का काम हो तो वे निश्चयपूर्वक आगे आते हैं, पर यश अपने लिए माँगने के बजाय राम को श्रेय देते हैं। साधक इसे सामान्य जीवन में इस तरह ला सकता है: अपनी शक्ति से रक्षा करना, डराना नहीं; बिना अहंकार कौशल बढ़ाना; सत्य बोलना; और बिना प्रशंसा माँगे सहायता देना। सेवा पड़ोसी का साथ देने, परिवार की देखभाल, स्वयंसेवा या सौंपी गई जिम्मेदारी ठीक से निभाने जितनी सरल हो सकती है।

विवेक भी भक्ति का भाग है। हनुमान सुनते, देखते और परिस्थिति के अनुसार व्यवहार चुनते हैं; साहस का अर्थ बिना सोचे काम करना नहीं। परिवार या मंदिर में उनका अनुसरण करने का अर्थ नियमित प्रार्थना, कथा का अध्ययन और धैर्य साधना हो सकता है। इसका दावा नहीं कि भक्त शारीरिक रूप से अजेय हो जाएगा या सफलता पक्की है। उद्देश्य पूज्य आदर्श को आचरण का मार्गदर्शन बनने देना है, साथ ही समुदायों में उनकी कथा से ली गई अलग सीखों का सम्मान करना है।

प्रार्थना, पूजा और हनुमान ग्रंथों का पाठ

भक्ति के अभ्यास में दीप जलाना, फूल या फल चढ़ाना, नाम या मंत्र जपना, आरती गाना या रामायण का अंश पढ़ना हो सकता है। अनेक लोग हनुमान चालीसा पढ़ते हैं; कोई सुंदरकांड, क्षेत्रीय हनुमान स्तुति या पारिवारिक प्रार्थना पढ़ता है। नए साधक अनुवाद सहित कुछ पंक्तियाँ पढ़ें और देखें कि उनमें किसकी प्रशंसा है—सेवा, विवेक, साहस, विनम्रता या राम-स्मरण। अर्थ समझना भी अभ्यास का हिस्सा है।

घर की पूजा में परिवार या विश्वसनीय मंदिर से सीखी रीति अपनाएँ। चढ़ावे और विधियाँ अलग होती हैं; साधारण निजी प्रार्थना के लिए बड़ा आयोजन जरूरी नहीं। मंदिर जाएँ तो कतार, अर्पण, जूते, फोटोग्राफी और सहभागिता के स्थानीय निर्देश देखें। कुछ मंत्र और औपचारिक साधनाएँ गुरु-परंपरा में सिखाई जाती हैं; यह न मानें कि छोटी ऑनलाइन सूचना गुरु का मार्गदर्शन है। निजी भक्ति सरल, सम्मानपूर्ण और निभाने योग्य रह सकती है।

शुरुआती साधक के लिए सरल दिनचर्या

नए साधक बिना व्रत लिए या कठोर विधि की नकल किए नियमित अभ्यास बना सकते हैं। उदाहरण के लिए, एक मिनट शांत बैठें, हनुमान और राम का स्मरण करें, छोटा अंश पढ़ें, समझ आने वाली भाषा में प्रार्थना करें और उस दिन सेवा का एक काम चुनें। मंदिर जाएँ तो वहाँ के निर्देश मानें और समुदाय की पूजा को सीखने का अवसर दें। कथा, प्रश्न और अपनाने योग्य गुणों पर छोटी डायरी भी रख सकते हैं।

  1. विश्वसनीय परंपरा का छोटा ग्रंथ या प्रार्थना चुनें।
  2. कथा और अर्थ समझें; जप जल्दी पूरा करने की दौड़ न लगाएँ।
  3. संयम सहित साहस और दिखावे के बिना सेवा का अभ्यास करें।
  4. दिनचर्या स्वेच्छा से रखें और स्वास्थ्य, काम तथा परिवार के अनुसार बदलें।

कुछ भक्त मंगलवार, शनिवार या हनुमान जयंती को व्रत या विशेष साधना करते हैं। ये स्वैच्छिक रीति हैं और परिवार तथा गुरु-परंपरा से बदलती हैं। स्वास्थ्य के कारण उपवास उचित न हो तो न करें; प्रार्थना, पाठ और सेवा भी हनुमान-स्मरण के सार्थक मार्ग हैं।

हनुमान भक्ति का राम-भक्ति से संबंध

अनेक प्रिय कथाओं में हनुमान की भक्ति राम के साथ उनके संबंध से अलग नहीं है। इसलिए कोई साधक हनुमान पूजा में राम, सीता और लक्ष्मण का संक्षिप्त स्मरण भी कर सकता है। इसका अर्थ यह नहीं कि हर हनुमान भक्त एक ही धर्मशास्त्रीय व्याख्या मानता है। वैष्णव गुरु-परंपराएँ हनुमान को राम की दिव्य कथा में रखती हैं, जबकि कुछ समुदाय उनकी उपासना को अधिक स्वतंत्र रूप दे सकते हैं। स्थानीय पूजा में भक्ति के रूप मिल भी सकते हैं।

आरंभिक अध्ययन में राम-भक्ति हनुमान के कर्म को समझाती है: वे अपने से बड़े उद्देश्य की सेवा करते हैं, सीता की रक्षा करते हैं और राम का संदेश ले जाते हैं। पर प्रार्थना के लिए गहन दर्शन का ज्ञान जरूरी नहीं। छोटी सच्ची प्रार्थना, मंदिर में सम्मानपूर्ण व्यवहार और प्रिय गुणों के अनुसार जीने का प्रयास पर्याप्त शुरुआत है। किसी खास संप्रदाय का अध्ययन हो तो गहरे सिद्धांत के लिए उसी के आचार्यों का मार्ग लें।

डर फैलाने वाले दावों से बचें और संतुलन रखें

हनुमान साहस और रक्षा के लिए पूजित हैं, पर भक्ति को इस गारंटी की तरह नहीं बेचना चाहिए कि बीमारी, दुर्घटना या कठिनाई कभी नहीं होगी। प्रार्थना अर्थ और सांत्वना दे सकती है, पर चिकित्सा, सुरक्षा, परामर्श या व्यावहारिक समस्या-समाधान का स्थान नहीं लेती। जो व्यक्ति डराकर धन माँगे, आध्यात्मिक हानि की धमकी दे या विपत्ति से बचने के लिए महँगा अनुष्ठान अनिवार्य बताए, उससे सावधान रहें।

व्रत स्वास्थ्य और जिम्मेदारियों के अनुकूल होना चाहिए। उपवास भक्ति का प्रमाण नहीं; काम, बीमारी या देखभाल के कारण पूजा छूटने से व्यक्ति बुरा हिंदू नहीं बन जाता। दूसरे के चरित्र या भविष्य पर उसके कर्मकांड देखकर दावा न करें। हनुमान में सम्मानित गुण—विनम्रता और निस्वार्थ सेवा से जुड़ा बल—भक्तों के आपसी व्यवहार को भी दिशा दे सकते हैं।

भारत और प्रवासी समुदायों में हनुमान भक्ति

भारत भर में हनुमान की विविध रूपों में पूजा होती है; नेपाल, मॉरीशस, कैरेबियन, दक्षिण-पूर्व एशिया, यूरोप और अमेरिका के हिंदू समुदाय भी उनका सम्मान करते हैं। स्थानीय मंदिर किसी क्षेत्रीय रामायण, विशेष पर्व, हनुमान-रूप या भक्ति-गीतों पर बल दे सकता है। प्रवासी घर में परिवार साप्ताहिक पाठ रखे या हनुमान जयंती अपनी भाषा और जन्म-स्थान से आई रीति के साथ मनाए।

इन अंतरों से यह तय नहीं होता कि कौन-सा समुदाय ही प्रामाणिक है। वे दिखाते हैं कि भक्ति स्थान-स्थान पर कैसे जड़ पकड़ती है। नए क्षेत्र में हनुमान मंदिर जाएँ तो स्वयंसेवक से पूजा-रीति और उपयोग होने वाले ग्रंथ के बारे में पूछें। ऑनलाइन सीखते समय सामान्य भक्ति और किसी संप्रदाय के खास नियम अलग रखें। हनुमान का अनुसरण निजी स्थिर साधना हो सकता है और साथ ही हिंदू समुदायों की विविधता के लिए खुला रह सकता है।

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सामान्य प्रश्न

पाठकों के सामान्य प्रश्नों के संक्षिप्त उत्तर।

दास्य भक्ति क्या है और हनुमान जी को इसका सर्वोच्च आदर्श क्यों माना जाता है?

नवधा भक्ति में ‘दास्य भक्ति’ ईश्वर के प्रति विनम्र, निष्काम और समर्पित सेवा का भाव है। वाल्मीकि रामायण और रामचरितमानस में हनुमान जी अपने अतुलित बल, विद्या और साहस का उपयोग व्यक्तिगत यश के बजाय केवल श्रीराम और सीता के कार्य में करते हैं।

हनुमान पूजा या हनुमान चालीसा पाठ से पहले श्रीराम का स्मरण क्यों किया जाता है?

शास्त्रीय और भक्ति परंपराओं के अनुसार हनुमान जी वहीं सर्वाधिक प्रसन्न होते हैं जहाँ श्रीराम के नाम का स्मरण होता है; इसलिए पूजा के आरंभ में सीताराम और लक्ष्मण का वंदन करना हनुमान-भक्ति की मूल भावना के अनुरूप है।

क्या महिलाएँ हनुमान चालीसा, सुंदरकांड का पाठ और हनुमान पूजा कर सकती हैं?

हाँ। स्त्री, पुरुष और बच्चे सभी श्रद्धापूर्वक हनुमान चालीसा व सुंदरकांड का पाठ, दीप-प्रज्वलन, नैवेद्य अर्पण और मंदिर दर्शन कर सकते हैं। कुछ मंदिरों में ब्रह्मचारी विग्रह को सीधे स्पर्श करने का नियम केवल गर्भगृह की मूर्ति-मर्यादा से जुड़ा है, उपासना या पाठ पर रोक से नहीं।

मंगलवार और शनिवार को हनुमान जी की विशेष पूजा क्यों की जाती है?

भारतीय पंचांग और लोक-परंपरा में मंगलवार और शनिवार को हनुमान मंदिरों में दर्शन, सुंदरकांड या चालीसा पाठ तथा गुड़-चना, बूँदी या वड़ा/पान माला अर्पित करने का विशेष दिवस माना जाता है।

वाल्मीकि रामायण के सुंदरकांड और तुलसीदास की हनुमान चालीसा में क्या अंतर है?

वाल्मीकि कृत सुंदरकांड 68 सर्गों का संस्कृत महाकाव्य-खंड है जिसमें समुद्र-लंघन, सीता-दर्शन और लंका-प्रसंग का विस्तृत वर्णन है, जबकि गोस्वामी तुलसीदास कृत हनुमान चालीसा अवधी की 40 चौपाइयों में हनुमान जी के गुणों और राम-सेवा का संक्षिप्त स्तुति-गान है।

क्या हनुमान मंत्र या स्तोत्र पढ़ने से मुकदमे में जीत या रोग-मुक्ति की गारंटी मिलती है?

नहीं। भक्ति-पाठ साधक को मानसिक धैर्य, साहस और विवेक देता है, किंतु यह किसी कानूनी, आर्थिक या चिकित्सीय परिणाम की निश्चित गारंटी नहीं है और व्यावहारिक व डॉक्टरी प्रयासों का स्थान नहीं लेता।

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