अष्टलक्ष्मी स्तोत्रम्: लक्ष्मी के आठ स्वरूप, संस्कृत पाठ और श्लोक-अर्थ

अष्टलक्ष्मी स्तोत्रम् के आठों श्लोकों का मूल संस्कृत पाठ, सरल हिंदी भावार्थ, आठ स्वरूपों का दार्शनिक महत्व और शुक्रवार व वरलक्ष्मी पूजा में पाठ-विधि पढ़ें।

ज्योतिष और हिंदू परंपरालेख · 13 मिनटRead in English ↗

संक्षिप्त उत्तर: अष्टलक्ष्मी स्तोत्रम् क्या है?

अष्टलक्ष्मी स्तोत्रम् (सुमनस वन्दित सुन्दरि माधवि से आरंभ होने वाला स्तोत्र) आठ संस्कृत श्लोकों की एक सुप्रसिद्ध भक्ति-रचना है, जिसमें देवी लक्ष्मी के आठ परस्पर संबद्ध स्वरूपों—आदि, धान्य, धैर्य, गज, संतान, विजय, विद्या और धन लक्ष्मी—की स्तुति की गई है। ये आठों पद सच्ची समृद्धि (श्री) को केवल नकद धन तक सीमित न रखकर आध्यात्मिक आधार, अन्न-सुरक्षा, साहस, गरिमा, परिवार-कल्याण, धर्मनिष्ठ विजय, ज्ञान और उदार उत्तरदायित्व के रूप में परिभाषित करते हैं।

  • आठों श्लोक अंत्यानुप्रास और लयबद्ध छंद में रचे गए हैं, जिनके अंत में प्रत्येक लक्ष्मी-स्वरूप से कृपा और संरक्षण की विशिष्ट प्रार्थना की गई है।
  • अष्टलक्ष्मी की अवधारणा आध्यात्मिक मूल (आदि), पोषण (धान्य), साहस (धैर्य), सौभाग्य (गज), पारिवारिक स्नेह (संतान), सत्कर्म में सफलता (विजय), ज्ञान (विद्या) और उत्तरदायित्वपूर्ण धन (धन) का समन्वय करती है।
  • इसका पाठ शुक्रवार, दीपावली, शरद पूर्णिमा और वरलक्ष्मी व्रत के अवसर पर दीप-प्रज्वलन और सात्विक जीवन-चर्या के साथ किया जाता है।

संपूर्ण अष्टलक्ष्मी स्तोत्रम्: श्लोक 1 से 4 (आदि, धान्य, धैर्य और गज लक्ष्मी) — मूल संस्कृत पाठ व हिंदी भावार्थ

देवी लक्ष्मी के वैदिक और पौराणिक स्वरूप—जिसका आधारभूत परिचय हमारे देवी लक्ष्मी: श्रीसूक्त, प्रतीक और उपासना परंपरा मार्गदर्शक में दिया गया है—को यह स्तोत्र आठ व्यावहारिक और आध्यात्मिक आयामों में विस्तारित करता है। पारंपरिक अष्टलक्ष्मी स्तोत्रम् का प्रत्येक पद देवी के सौंदर्य, करुणा, संगीत-प्रियता और वेद-सम्मत स्वरूप का वर्णन करते हुए अंत में एक विशिष्ट ध्रुव-पंक्ति (परिपालय माम् / सदा पालय माम्) के साथ किसी एक लक्ष्मी-स्वरूप का आह्वान करता है। नीचे प्रथम चार श्लोकों का शुद्ध देवनागरी पाठ, रोमन लिप्यंतरण और स्पष्ट हिंदी भावार्थ दिया गया है।

1. आदिलक्ष्मी (आध्यात्मिक आधार और मोक्ष-प्रदायिनी कृपा)
सुमनस वन्दित सुन्दरि माधवि चन्द्र सहोदरि हेममये ।
मुनिगण वन्दित मोक्षप्रदायिनि मञ्जुल भाषिणि वेदनुते ॥
पङ्कजवासिनि देवसुपूजित सद्गुण वर्षिणि शान्तियुते ।
जय जय हे मधुसूदन कामिनि आदिलक्ष्मि परिपालय माम् ॥ १॥
Sumanasa vandita sundari mādhavi candra sahodari hemamaye |
Munigaṇa vandita mokṣapradāyini mañjula bhāṣiṇi vedanute ||

हिंदी भावार्थ: शुद्ध हृदय वाले देवताओं द्वारा वंदित, माधव (विष्णु) की प्रिया, क्षीरसागर से प्रकट चंद्रमा की सहोदरी, स्वर्णमयी आभा वाली, मुनिगणों द्वारा पूजित, मोक्ष प्रदान करने वाली (मोक्षप्रदायिनि), मधुर भाषिणी और वेदों द्वारा स्तुत हे देवि! कमल में निवास करने वाली, सद्गुणों की वर्षा करने वाली और शांति से युक्त हे मधुसूदन-प्रिया आदिलक्ष्मी! आपकी जय हो, आप मेरी रक्षा और पालन करें।

2. धान्यलक्ष्मी (अन्न-सुरक्षा, कृषि-समृद्धि और पोषण)
अयि कलि कल्मष नाशिनि कामिनि वैदिक रूपिणि वेदमये ।
क्षीरसमुद्भव मङ्गल रूपिणि मन्त्रनिवासिनि मन्त्रनुते ॥
मङ्गलदायिनि अम्बुजवासिनि देवगणाश्रित पादयुते ।
जय जय हे मधुसूदन कामिनि धान्यलक्ष्मि सदा पालय माम् ॥ २॥
Ayi kali kalmaṣa nāśini kāmini vaidika rūpiṇi vedamaye |
Kṣīrasamudbhava maṅgala rūpiṇi mantranivāsini mantranute ||

हिंदी भावार्थ: कलियुग के कलुष (दोषों) का नाश करने वाली, वैदिक स्वरूपिणी, वेदमयी, क्षीरसागर से उत्पन्न मंगलमयी मूर्ति, मंत्रों में निवास करने वाली और मंत्रों द्वारा आराधित हे माते! सबका कल्याण करने वाली, कमलवासिनि और देवगणों को आश्रय देने वाले चरणों से युक्त हे मधुसूदन-प्रिया धान्यलक्ष्मी (अन्न व पोषण की अधिष्ठात्री)! सदैव मेरा पालन करें।

3. धैर्यलक्ष्मी / वीरलक्ष्मी (आंतरिक साहस, मनोबल और निर्भयता)
जयवरवर्षिणि वैष्णवि भार्गवि मन्त्रस्वरूपिणि मन्त्रमये ।
सुरगण पूजित शीघ्रफलप्रद ज्ञानविकासिनि शास्त्रनुते ॥
भवभयहारिणि पापविमोचनि साधुजनाश्रित पादयुते ।
जय जय हे मधुसूदन कामिनि धैर्यलक्ष्मि परिपालय माम् ॥ ३॥
Jayavaravarṣiṇi vaiṣṇavi bhārgavi mantrasvarūpiṇi mantramaye |
Suragaṇa pūjita śīghraphalaprada jñānavikāsini śāstranute ||

हिंदी भावार्थ: विजय और श्रेष्ठ वरदानों की वर्षा करने वाली, वैष्णवी, भृगु-नंदिनी (भार्गवी), मंत्रस्वरूपिणी, ज्ञान का विकास करने वाली (ज्ञानविकासिनि) और शास्त्रों द्वारा प्रशंसित हे देवि! संसार के भय को हरने वाली (भवभयहारिणि), पाप से मुक्त करने वाली और सज्जनों की आश्रय-रूपा हे धैर्यलक्ष्मी! मुझे संकटों में अडिग साहस दें और मेरी रक्षा करें।

4. गजलक्ष्मी (गरिमा, लोक-कल्याण और सौभाग्य)
जय जय दुर्गति नाशिनि कामिनि सर्वफलप्रद शास्त्रमये ।
रथगज तुरगपदाति समावृत परिजन मण्डित लोकनुते ॥
हरिहर ब्रह्म सुपूजित सेवित तापनिवाऱिणि पादयुते ।
जय जय हे मधुसूदन कामिनि गजलक्ष्मि रूपेण पालय माम् ॥ ४॥
Jaya jaya durgati nāśini kāmini sarvaphalaprada śāstramaye |
Rathagaja turagapadāti samāvṛta parijana maṇḍita lokanute ||

हिंदी भावार्थ: दुर्गति का नाश करने वाली, संपूर्ण शुभ फल देने वाली, रथ, गज, अश्व और पदाति सेना व परिजनों से शोभित तथा लोक-वंदिता हे माते! हरि (विष्णु), हर (शिव) और ब्रह्मा द्वारा पूजित तथा तीनों तापों का निवारण करने वाले चरणों से युक्त हे देवि! गजलक्ष्मी के रूप में मेरी रक्षा करें।

संपूर्ण अष्टलक्ष्मी स्तोत्रम्: श्लोक 5 से 8 (संतान, विजय, विद्या और धन लक्ष्मी) तथा समग्र समृद्धि-दृष्टि

स्तोत्र के उत्तरार्ध (श्लोक 5 से 8) में पारिवारिक निरंतरता, सत्कर्म में धैर्यपूर्ण विजय, विद्या-कौशल और धर्म-सम्मत धन का आह्वान है। विशेष रूप से सप्तम श्लोक में देवी को भारति भार्गवि कहकर यह दर्शाया गया है कि भारतीय परंपरा में विद्या (सरस्वती-भाव) और श्री (लक्ष्मी-भाव) परस्पर पूरक हैं।

5. सन्तानलक्ष्मी (पारिवारिक स्नेह, संरक्षण और निरंतरता)
अयिखग वाहिनि मोहिनि चक्रिणि रागविवर्धिनि ज्ञानमये ।
गुणगणवारिधि लोकहितैषिणि सप्तस्वर भूषित गाननुते ॥
सकल सुरासुर देवमुनीश्वर मानव वन्दित पादयुते ।
जय जय हे मधुसूदन कामिनि सन्तानलक्ष्मि परिपालय माम् ॥ ५॥
Ayikhaga vāhini mohini cakriṇi rāgavivardhini jñānamaye |
Guṇagaṇavāridhi lokahitaiṣiṇi saptasvara bhūṣita gānanute ||

हिंदी भावार्थ: गरुड़वाहिनी (खगवाहिनि), चक्रधारिणी, भक्ति-प्रेम को बढ़ाने वाली, ज्ञानमयी, सद्गुणों की सागर, लोक-कल्याणकारिणी (लोकहितैषिणि) और सप्तस्वरों से अलंकृत संगीत द्वारा स्तुत हे देवि! देव, मुनि और मनुष्यों द्वारा वंदित चरणों वाली हे सन्तानलक्ष्मी! हमारे परिवार का संरक्षण और पोषण करें।

6. विजयलक्ष्मी (सत्कर्म में संकल्प-सिद्धि और बाधा-मुक्ति)
जय कमलासिनि सद्गति दायिनि ज्ञानविकासिनि गानमये ।
अनुदिन मर्चित कुङ्कुम धूसर भूषित वासित वाद्यनुते ॥
कनकधरास्तुति वैभव वन्दित शङ्करदेशिक मान्यपदे ।
जय जय हे मधुसूदन कामिनि विजयलक्ष्मि सदा पालय माम् ॥ ६॥
Jaya kamalāsini sadgati dāyini jñānavikāsini gānamaye |
Kanakadharāstuti vaibhava vandita śaṅkaradeśika mānyapade ||

हिंदी भावार्थ: कमलासना, सद्गति देने वाली, ज्ञान का प्रकाश फैलाने वाली, प्रतिदिन कुंकुम-अर्चन और सुमधुर वाद्यों से पूजित तथा आचार्य शंकर द्वारा रचित कनकधारा स्तोत्र से वंदित चरणों वाली हे विजयलक्ष्मी! शुभ और धर्मसंगत कार्यों में सदैव मेरी रक्षा करें।

7. विद्यालक्ष्मी (ज्ञान, कला, कौशल और विवेक)
प्रणत सुरेश्वरि भारति भार्गवि शोकविनाशिनि रत्नमये ।
मणिमय भूषित कर्णविभूषण शान्तिसमावृत हास्यमुखे ॥
नवनिधि दायिनि कलिमलहारिणि कामित फलप्रद हस्तयुते ।
जय जय हे मधुसूदन कामिनि विद्यालक्ष्मि सदा पालय माम् ॥ ७॥
Praṇata sureśvari bhārati bhārgavi śokavināśini ratnamaye |
Navanidhi dāyini kalimalahāriṇi kāmita phalaprada hastayute ||

हिंदी भावार्थ: देवताओं द्वारा प्रणत सुरेश्वरी, भारती और भार्गवी स्वरूपा, शोक का नाश करने वाली, मणिमय कर्ण-आभूषणों और शांत मुस्कान से युक्त मुखमंडल वाली हे देवि! नवनिधियाँ प्रदान करने वाली और कलि-मल को हरने वाली हे विद्यालक्ष्मी! मुझे सद्बुद्धि और विद्या देकर सदैव पालित करें।

8. धनलक्ष्मी (धर्म-सम्मत अर्थ और उदार उत्तरदायित्व)
धिमिधिमि धिन्धिमि धिन्धिमि-दिन्धिमि दुन्दुभि नाद सुपूर्णमये ।
घुमघुम घङ्घुम घङ्घुम घङ्घुम शङ्ख निनाद सुवाद्यनुते ॥
वेदपुराणेतिहास सुपूजित वैदिक मार्ग प्रदर्शयिते ।
जय जय हे मधुसूदन कामिनि धनलक्ष्मि रूपेण पालय माम् ॥ ८॥
Dhimidhimi dhindhimi dhindhimi-dindhimi dundubhi nāda supūrṇamaye |
Vedapurāṇetihāsa supūjita vaidika mārga pradarśayite ||

हिंदी भावार्थ: ‘धिमि-धिमि’ दुंदुभि के मांगलिक नाद और ‘घुम-घुम’ शंखध्वनि व सुवाद्यों के मध्य पूजित, वेद, पुराण और इतिहास द्वारा वंदित तथा धर्म-सम्मत वैदिक मार्ग दिखाने वाली (वैदिक मार्ग प्रदर्शयिते) हे मधुसूदन-प्रिया! धनलक्ष्मी के रूप में मेरा पालन करें।

अष्टलक्ष्मी का समग्र समृद्धि-मंडल: केवल धन से व्यापक जीवन-दृष्टिआदि एवं विद्या लक्ष्मीआध्यात्मिक आधार (मोक्षप्रदायिनि) और निर्मल ज्ञानविवेक और धर्म तय करते हैं कि साधनों का उपयोग कैसे होधान्य एवं संतान लक्ष्मीअन्न-पोषण और परिवार का करुणामय संरक्षणगृहस्थ जीवन की खाद्य-सुरक्षा और पीढ़ियों का संस्कारधैर्य एवं विजय लक्ष्मीआंतरिक मनोबल (भवभयहारिणि) और सत्कर्म में स्थिरतासंकट में धैर्य और नीतिपूर्ण परिश्रम से लक्ष्य-सिद्धिगज एवं धन लक्ष्मीसामाजिक गरिमा (लोकहितैषिणि) और धर्मसंगत अर्थवैदिक मार्ग (वैदिक मार्ग प्रदर्शयिते) से अर्जित व साझा धन
अष्टलक्ष्मी स्तोत्र में ‘धनलक्ष्मी’ का स्थान आठवाँ है और उसे स्पष्ट रूप से ‘वैदिक मार्ग प्रदर्शयिते’ (धर्म और नीति के मार्ग) से जोड़ा गया है।

श्रावण मास के शुक्रवार, दीपावली और हमारे वरलक्ष्मी व्रत का महत्व और कथा तथा चरणबद्ध वरलक्ष्मी पूजा विधि और घरेलू नियम मार्गदर्शकों में वर्णित पर्वों पर परिवार इन आठों श्लोकों का पाठ करते हुए प्रत्येक पद के अंत में पुष्प या कुंकुम अर्पित करते हैं।

अष्टलक्ष्मी स्तोत्रम् के आठों श्लोकों का सार: प्रमुख संस्कृत विशेषण, प्रतिमा-लक्षण और जीवन-आयाम
श्लोक एवं स्वरूपआरंभिक पंक्ति व प्रमुख संस्कृत विशेषणपारंपरिक प्रतिमा-लक्षण (शिल्प)मानव जीवन का संबद्ध आयाम
1. आदिलक्ष्मीसुमनस वन्दित... मोक्षप्रदायिनि, सद्गुणवर्षिणि, शान्तियुतेचतुर्भुज रूप: कमल, श्वेत ध्वज, अभय और वरद मुद्राआध्यात्मिक आधार, आंतरिक शांति और परम कल्याण
2. धान्यलक्ष्मीअयि कलि कल्मष नाशिनि... क्षीरसमुद्भव, मङ्गलदायिनिअष्टभुज हरित वस्त्र: दो कमल, गदा, धान की बालियाँ, गन्ना, केले, अभय-वरदअन्न-सुरक्षा, कृषि के प्रति कृतज्ञता और परिवार का पोषण
3. धैर्य (वीर) लक्ष्मीजयवरवर्षिणि... भवभयहारिणि, ज्ञानविकासिनिअष्टभुज रक्त वस्त्र: चक्र, शंख, धनुष-बाण, त्रिशूल/खड्ग, ताड़पत्र ग्रंथ, अभय-वरदमानसिक दृढ़ता, संकट में साहस और भय-मुक्ति
4. गजलक्ष्मीजय जय दुर्गति नाशिनि... रथगजतुरग, तापनिवाऱिणिचतुर्भुज रूप, दोनों ओर स्वर्ण-कलश से अभिषेक करते दो श्वेत गजसामाजिक प्रतिष्ठा, लोक-मंगल और त्रिविध तापों से शांति
5. सन्तानलक्ष्मीअयिखग वाहिनि... लोकहितैषिणि, सप्तस्वरभूषितषड्भुज रूप: दो कलश, खड्ग, ढाल, अभय मुद्रा और गोद में बालकपारिवारिक स्नेह, संतान-कल्याण और सांस्कृतिक निरंतरता
6. विजयलक्ष्मीजय कमलासिनि... सद्गतिदायिनि, कनकधरास्तुति-वन्दितअष्टभुज रक्त-कमलासना: खड्ग, ढाल, पाश, शंख, चक्र, पद्म, अभय-वरदधर्मसंगत परिश्रम में धैर्य और बाधाओं पर विजय
7. विद्यालक्ष्मीप्रणत सुरेश्वरि भारति भार्गवि... शोकविनाशिनि, नवनिधिदायिनिचतुर्भुज रूप: कमल और ज्ञान-पुस्तक धारण किए शांत मुस्कानयुक्त मुखशिक्षा, कला-कौशल, व्यावसायिक दक्षता और विवेक
8. धनलक्ष्मीधिमिधिमि धिन्धिमि... वैदिक मार्ग प्रदर्शयितेषड्भुज रूप: चक्र, शंख, कलश, धनुष-बाण, कमल और स्वर्ण-मुद्रा वृष्टि हस्तईमानदार आजीविका, आर्थिक संतुलन और दानशील उत्तरदायित्व

हिंदी और अंग्रेज़ी में स्तोत्र को कैसे समझें

भक्त संस्कृत पद पढ़ते हैं, देवनागरी प्रति लेते हैं या रोमन लिपि के लिप्यंतरण के साथ पाठ करते हैं। हिंदी और अंग्रेज़ी अर्थ समझने के साधन हैं; वे संस्कृत ध्वनि का स्थान नहीं लेते। देखें कि चुनी हुई प्रति में वही पद हों जिन्हें आप पढ़ना चाहते हैं और उसका लिप्यंतरण उसी ध्वनि से मेल खाता हो। कुछ पाठों में “धैर्य लक्ष्मी” की जगह “वीर लक्ष्मी” मिलता है; संयुक्त शब्द और स्तुति-पंक्ति की विराम-रचना भी बदल सकती है।

अध्ययन के लिए एक बार में एक पद पढ़ें। उसमें आए लक्ष्मी-रूप, स्तुति किए गए गुण और दोहराई गई प्रार्थना को पहचानें। पूछें: यह पद अन्न, ज्ञान, साहस, रक्षा, समृद्धि या कृपा के किस रूप की बात करता है? इससे काव्यात्मक भाव समझ आता है और हर पंक्ति को शाब्दिक वादा बनाने से बचते हैं।

पूजा में स्तोत्र जोड़ने का सरल तरीका

अष्टलक्ष्मी स्तोत्र लक्ष्मी-पूजा, शुक्रवार की भक्ति या दीपावली और वरलक्ष्मी व्रत जैसे पारिवारिक अवसर पर पढ़ा जा सकता है। ये भक्तिपूर्ण विकल्प हैं, हर घर के लिए अनिवार्य तिथि नहीं। पहली बार पढ़ रहे हों तो सरल रखें और परिवार को परिचित पाठ चुनें।

  1. प्रार्थना की साफ जगह तैयार करें और पुस्तक या ध्वनि-पाठ पास रखें।
  2. लक्ष्मी का छोटा स्मरण कर अपना संकल्प मन में रखें।
  3. धीमी गति से पद पढ़ें और हर स्वरूप का भाव समझें।
  4. आभार के साथ पाठ पूरा करें और अपनी रीति हो तो प्रसाद बाँटें।

फूल, दीप या नैवेद्य अर्पित करना वैकल्पिक है और परिवार के अनुसार बदलता है। दीपक की निगरानी करें तथा उसे परदे या कागज से दूर रखें। बिना दीप जलाए शांत पाठ भी स्तोत्र से जुड़ने का उचित तरीका है।

समृद्धि के बारे में स्तोत्र का व्यापक भाव

आठ स्वरूप भक्त को जीवन की कई आधार-शक्तियों पर विचार करने का अवसर देते हैं: अन्न, साहस, परिवार की देखभाल, शिक्षा, सार्थक काम में सफलता और बाँटने योग्य साधन। समृद्धि की प्रार्थना के साथ बजट बनाना, पढ़ना, ईमानदारी से काम करना, स्वास्थ्य सेवा लेना और एक-दूसरे की मदद करना भी जरूरी है। पूजा इन कर्मों का विकल्प नहीं।

अर्थ बताते समय स्पष्ट करें कि “धन” और “समृद्धि” का भक्तिपूर्ण भाव पद और परंपरा पर निर्भर करता है। आर्थिक कठिनाई को कम भक्ति का प्रमाण न कहें और यह वादा न करें कि पाठ से संतान, परीक्षा या आय निश्चित होगी। संतान लक्ष्मी को परिवार के कल्याण की प्रार्थना समझा जा सकता है, प्रजनन का आश्वासन नहीं; विद्या लक्ष्मी ज्ञान का सम्मान करती हैं, जिसमें शिक्षक और अभ्यास भी आवश्यक हैं।

पाठांतर और सम्मानजनक उपयोग

भक्ति-पाठ की पुस्तकों में वर्तनी, पद-शीर्षक, लिप्यंतरण और रचयिता के नाम को लेकर अंतर हो सकता है। सार्वजनिक पाठ, पूजा-पुस्तिका या ऑनलाइन अर्थ तैयार करते समय एक प्रति चुनें और उसका संस्कृत, लिप्यंतरण तथा भावार्थ एक-दूसरे से मिलाकर रखें। पाठ अलग हो तो उसे नाम दें; अलग पंक्तियों को चुपचाप न मिलाएँ। छोटा भावार्थ पद की भक्ति-भावना बचाए, अपने अर्थ को अकेला सही अर्थ न कहे।

यह स्तोत्र भाषा-कौशल की परीक्षा नहीं है। बच्चे और नए पाठक पहले सुन सकते हैं, रोमन लिप्यंतरण का सहारा ले सकते हैं या हिंदी अर्थ पढ़ सकते हैं। किसी को अनजानी भाषा में पढ़ने के लिए दबाव न दें। स्तोत्र के बिंबों का सम्मान करते हुए धीरे-धीरे सीखना भी भक्ति का हिस्सा है।

उच्चारण, छंद-लय और शुक्रवार व वरलक्ष्मी व्रत में पाठ-पद्धति

चूँकि अष्टलक्ष्मी स्तोत्रम् में आंतरिक अनुप्रास (अंत्यानुप्रास) और समस्त-पदों की संगीतमय शृंखला है, इसलिए इसकी चार पंक्तियों की संरचना समझ लेने पर उच्चारण अत्यंत सहज हो जाता है। प्रत्येक श्लोक की प्रथम तीन पंक्तियों में देवी के संबोधन-परक विशेषण हैं जो प्रायः ह्रस्व ‘इ’ या ‘ए’ पर समाप्त होते हैं (जैसे—सुन्दरि, माधवि, सहोदरि, हेममये, मोक्षप्रदायिनि, वेदनुते), जबकि चौथी पंक्ति में ध्रुव-वाक्य जय जय हे मधुसूदन कामिनि के साथ उस श्लोक के विशिष्ट लक्ष्मी-स्वरूप का नाम और परिपालय माम् अथवा सदा पालय माम् आता है। प्रत्येक पंक्ति के मध्य में हल्का विराम लेने से श्वास संतुलित रहता है और आठवें श्लोक के ध्वन्यात्मक शब्दों (धिमिधिमि धिन्धिमि तथा घुमघुम घङ्घुम) का उच्चारण स्पष्ट होता है।

शुक्रवार की संध्या-पूजा, दीपावली या वरलक्ष्मी व्रत में देवी के चित्र या कलश के समक्ष घी का दीपक प्रज्वलित करें, प्रत्येक श्लोक की अंतिम पंक्ति पर क्रमशः आदिलक्ष्मी से धनलक्ष्मी तक का स्मरण करते हुए आठ बार अक्षत, पुष्प-पंखुड़ी या कुंकुम अर्पित करें, और अंत में सात्विक आजीविका, सद्बुद्धि तथा परिवार-कल्याण की प्रार्थना करें।

शुक्रवार पूजा, वरलक्ष्मी व्रत और दीपावली के लिए व्यावहारिक पाठ-तालिका
उपासना का अवसरवेदी की तैयारीआठ श्लोकों के साथ अर्पण की विधिउच्चारण और मनन का सूत्र
साप्ताहिक शुक्रवार संध्यापूजा-स्थान स्वच्छ कर प्रातः या सायंकाल घी/तिल का दीप जलाएँशांत लय में आठों श्लोकों का एक बार पाठ करें और अंत में पुष्प अर्पित करेंप्रत्येक सप्ताह एक श्लोक के हिंदी भावार्थ पर विशेष मनन करें
श्रावण वरलक्ष्मी व्रतपारिवारिक रीति से कलश स्थापना और नवग्रंथि सूत्र तैयार करेंप्रत्येक श्लोक की ध्रुव-पंक्ति पर कुंकुम या अखण्ड अक्षत अर्पित करेंसामूहिक पाठ में सभी सदस्य एक ही छपी हुई पुस्तक का उपयोग करें
दीपावली एवं शरद पूर्णिमागणेश-लक्ष्मी और लेखनी/पुस्तक पूजन के साथ स्वच्छ आसन लगाएँमुख्य पूजन के समय क्रमशः आठों स्वरूपों का आह्वान कर प्रसाद बाँटेंसप्तम श्लोक (विद्या) और अष्टम श्लोक (वैदिक-मार्ग धन) को वार्षिक आचरण का संकल्प बनाएँ

आगे पढ़ें

नीचे दिए गए संबंधित शास्त्र, प्रतीक और उपासना मार्गदर्शकों से आगे अध्ययन करें। प्रत्येक लेख एक विशिष्ट विषय को उसके मूल संदर्भ में स्पष्ट करता है।

सामान्य प्रश्न

पाठकों के सामान्य प्रश्नों के संक्षिप्त उत्तर।

अष्टलक्ष्मी स्तोत्रम् में देवी लक्ष्मी के किन आठ स्वरूपों की स्तुति की गई है?

इस स्तोत्र में आदिलक्ष्मी (आध्यात्मिक मूल), धान्यलक्ष्मी (अन्न व पोषण), धैर्य या वीरलक्ष्मी (साहस), गजलक्ष्मी (सौभाग्य व गरिमा), सन्तानलक्ष्मी (परिवार-कल्याण), विजयलक्ष्मी (सत्कर्म में सफलता), विद्यालक्ष्मी (ज्ञान व कौशल) और धनलक्ष्मी (धर्म-सम्मत अर्थ) की स्तुति है।

अष्टलक्ष्मी स्तोत्र समृद्धि को केवल नकद धन से अलग कैसे परिभाषित करता है?

धनलक्ष्मी को आठवें स्थान पर रखकर और उससे पहले शांति (आदि), अन्न (धान्य), साहस (धैर्य), गरिमा (गज), पारिवारिक स्नेह (संतान), धैर्यपूर्ण प्रयास (विजय) तथा विद्या को रखकर यह स्तोत्र सिखाता है कि वास्तविक समृद्धि जीवन के इन सभी मूल्यों के संतुलन में है।

छठे श्लोक में ‘कनकधरास्तुति’ और ‘शंकरदेशिक’ का उल्लेख क्यों आया है?

विजयलक्ष्मी के छठे श्लोक में ‘कनकधरास्तुति वैभव वन्दित शङ्करदेशिक मान्यपदे’ कहकर आदि शंकराचार्य द्वारा रचित प्रसिद्ध कनकधारा स्तोत्र का स्मरण किया गया है।

तीसरे स्वरूप को ‘धैर्यलक्ष्मी’ और ‘वीरलक्ष्मी’ दोनों नामों से क्यों जाना जाता है?

विभिन्न क्षेत्रीय पाठों और मंदिर-परंपराओं में तीसरे स्वरूप को आंतरिक मनोबल के अर्थ में ‘धैर्यलक्ष्मी’ और संकट में पराक्रम के अर्थ में ‘वीरलक्ष्मी’ कहा जाता है; इस स्तोत्र की ध्रुव-पंक्ति में प्रायः ‘धैर्यलक्ष्मि परिपालय माम्’ पाठ मिलता है।

गृहस्थ जीवन में अष्टलक्ष्मी स्तोत्रम् का पाठ कब करना विशेष शुभ माना जाता है?

भक्त इसका पाठ सामान्यतः शुक्रवार की प्रातः या संध्या पूजा, श्रावण शुक्रवार, वरलक्ष्मी व्रत, शरद पूर्णिमा और दीपावली के लक्ष्मी-पूजन में करते हैं।

आठवें श्लोक की ध्वन्यात्मक पंक्तियों (‘धिमिधिमि धिन्धिमि’) का उच्चारण कैसे करें?

आठवें श्लोक की प्रथम दो पंक्तियाँ दुंदुभि (नगाड़े) और शंख की मांगलिक ध्वनि का अनुकरण करती हैं; इन्हें बहुत तेज बोलने के बजाय शांत, सधी हुई लय में पढ़ें ताकि अगली पंक्ति ‘वैदिक मार्ग प्रदर्शयिते’ का भाव स्पष्ट रहे।

Google पर एस्ट्रोज्ञान से जुड़े रहें

एस्ट्रोज्ञान को Google Search में अपने पसंदीदा स्रोतों में जोड़ें।

Google पर पसंदीदा स्रोत बनाएँ