भगवद्गीता महाभारत के भीष्म पर्व में श्रीकृष्ण और अर्जुन का संवाद है। इसमें सात सौ अथवा कुछ पाठ-परंपराओं में सात सौ एक श्लोक माने जाते हैं, जिन्हें अठारह अध्यायों में व्यवस्थित किया गया है। प्रत्येक अध्याय को योग कहा गया है।
आरंभ: प्रश्न और कर्तव्य
पहला अध्याय अर्जुन के विषाद और नैतिक दुविधा को सामने रखता है। दूसरा अध्याय आत्मा, समत्व और कर्तव्य की आधारभूमि देता है। तीसरा से पाँचवाँ अध्याय कर्म, ज्ञान और संन्यास के परस्पर संबंध को खोलता है।
मन, ध्यान और ईश्वर-बोध
छठा अध्याय ध्यान और मन-संयम की चर्चा करता है। सातवें से बारहवें अध्यायों में ज्ञान, परम सत्ता, विश्वरूप और भक्ति के विविध आयाम सामने आते हैं। ग्यारहवें अध्याय का विश्वरूप-दर्शन इस मध्य भाग का विशेष शिखर है।
प्रकृति, गुण और जीवन-दृष्टि
तेरहवें से सत्रहवें अध्यायों में क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ, तीन गुण, पुरुषोत्तम, दैवी-आसुरी संपदा तथा श्रद्धा के प्रकार समझाए जाते हैं। अठारहवाँ अध्याय पूर्ववर्ती शिक्षाओं का समन्वय करते हुए कर्म, स्वधर्म, त्याग और मोक्ष पर लौटता है।
पढ़ने का व्यावहारिक तरीका
एक बार में बहुत अधिक पढ़ने के स्थान पर प्रतिदिन कुछ श्लोक मूल पाठ, अनुवाद और एक प्रामाणिक टीका के साथ पढ़ें। प्रसंग को समझे बिना किसी एक श्लोक को अलग निष्कर्ष के रूप में न लें। अलग भाष्यों में मतभेद मिलें तो उन्हें परंपरागत दृष्टियों के रूप में पढ़ें।